• क्‍या हवा में चलेंगे ई ज्ञान सूचना केन्‍द्र, करोड़ों लुटाने के बाद भी अंचल में सेवायें उपलब्‍ध नहीं

भ्रष्‍टाचार मिटाने की योजना में भ्रष्‍टाचार, ई शासन प्रणाली पहले चरण में ही अवसान पर

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’

·        पारदर्शिता और भ्रष्‍टाचार निवारण के नाम पर अंचल में ठगी का कारोबार

  • क्‍या हवा में चलेंगे ई ज्ञान सूचना केन्‍द्र, करोड़ों लुटाने के बाद भी अंचल में सेवायें उपलब्‍ध नहीं

भाग -1

आपने ई शासन प्रणाली या ई गवर्नेन्‍स या ई ज्ञान सूचना सेवा केन्‍द्र, कॉमन सर्विस सेण्‍टर जैसे नाम अवश्‍य ही सुन रखे होंगे । इन दिनों चम्‍बलांचल में तथाकथि‍त सेवा केन्‍द्रों की स्‍थापना के नाम पर बाहर की संस्‍थाओं ने गरीब बेरोजगारों को सुनहरे सब्‍ज बाग दिखा कर करोड़ों रूपये बटोर लिये हैं और रकम जमा करने के पॉंच महीने बाद भी इन केन्‍द्रों और इनकी सेवाओं का कोई अता पता नहीं हैं । पैसा जमा करने वाले बेरोजगार इन दिनों न केवल दर बदर की ठोकरें खा रहे हैं बल्कि उनकी शिकायत सुनने वाला भी कोई नहीं है ।

एक संस्‍था ने जनवरी माह से लगातार अखबारी विज्ञापन देकर बेरोजगारों को सुनहरे सब्‍जबाग दिखाना शुरू किये और चन्‍द माह के भीतर करोड़ो रूपये वसूल डाले । उनकी योजना के मुताबिक चम्‍बलअंचल में ई ज्ञान केन्‍द्र खोले जाने के लिये उन्‍हें म.प्र.शासन द्वारा अधिकृत किया गया है और एवज में वे बाकायदा म.प्र. के इलेक्‍ट्रॉनिकी विभाग के एक पत्र और जिला पंचायत मुरैना के एक पत्र की छायाप्रतियां जनता में बांटते फिर रहे हैं । लोग इन पत्रों को देख कर भ्रम में फंस कर उनकी लुभावनी बातों में फंस कर उन्‍हें रकम दे बैठते हैं और बड़ी खूबसूरती से ठग लिये जाते हैं ।

हमने सारे मामले की पड़ताल की तो कई रहस्‍य प्‍याज के छिलकों के मानिन्‍द खुलते चले गये और बेरोजगारों को ठगे जाने तथा तथाकथित यूचना केन्‍द्रों की सच्‍चाई खुद ब खुद सामने आ गयीं । हमारी तहकीकात के मुताबिक रोचक तथ्‍य यह है कि तथाकथित संस्‍था जो कि चम्‍बल अंचल में ई ज्ञान केन्‍द्र खेले जाने का दावा कर के बेरोजगारों से अनाप शनाप धन हड़पने में लगी है और म.प्र. शासन द्वारा स्‍वयं को अधिकृत बता रही है उसकी असलियत यह है कि अव्‍वल तों सूचना सेवा केन्‍द्र स्‍थापना हेतु ई ज्ञान केन्‍द्र नामक कोई परियोजना न तो म.प्र. शासन की ही है और न भारत सरकार की । और न ही ई ज्ञान केन्‍द्र नामक कोई योजना ही भारत शासन की ई गवर्नेन्‍स प्रणाली का हिस्‍सा है ।

इसी प्रकार ई गुमटी के नाम पर बरगलाये जा रहे लोगों को यह जानकर हैरत होगी कि ई गवर्नेन्‍स प्रणाली में ई गुमटी नामक कोई योजना वर्तमान में अस्तित्‍व में ही नहीं है ।

ई गुमटी व ई ज्ञान नामक परियोजनायें म.प्र. की पिछली दिग्विजय सिंह सरकार द्वारा किसी जमाने में चलाईं गयीं थीं जो कि बुरी तरह फ्लाप होकर वर्षो पहले ठप्‍प होकर बन्‍द हो गयीं थीं । आज वर्षो बाद इन योजनाओं को ई गवर्नेन्‍स की आड़ में चालू करने की कोशिश न केवल उपहास की स्थिति निर्मित कर रही है बल्कि म.प्र. के भ्रष्‍टाचार के महामहिमों की उखड़ती सत्‍ता पर उनके पुन: काबिजी और नियंत्रण की कोशिशों की भी रोचक दास्‍तां बयां करती है ।

 

क्रमश: जारी अगले अंक में ………..

पूरी तरह ध्‍वस्‍त हुआ सूचना का अधिकार कानून, खामियों ने किया कमजोर और प्रभावहीन

पूरी तरह ध्‍वस्‍त हुआ सूचना का अधिकार कानून, खामियों ने किया कमजोर और प्रभावहीन

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’

सूचना का अधिकार 2005- एक सिंहावलोकन भाग -7 (वर्ष सन 2005 से जारी आलेख)

  • नहीं मिलती आवेदकों को सूचना, तमाम विसंगतियां और सूराखों से मनमाने होते हैं निराकरण
  • धारा 4 का तीन साल बाद आज तक पालन नहीं किया किसी ने, सरकारी कार्यालयों के अलावा स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं ने बलाए ताक धरा कानून

पिछले अंक से आगे …….

अक्‍टूबर 2005 में जब भारत में सूचना का अधिकार अधिनियम लागू हुआ तो स्‍वतंत्रता प्राप्ति के बाद से ही भ्रष्‍टाचार, अनसुनेपन, मनमानेपन से त्रस्‍त लोगों को इससे काफी उम्‍मीद और आशा की किरणें जागीं, और जैसा कि इस कानून की मंशा को इसी कानून में लिखा गया कि यह पारदर्शिता लाने और भारत को भ्रष्‍टाचारमुक्‍त बनाने का ब्रह्मास्‍त्र साधन हो ।

कानून को सफलतापूर्वक सॅपादित करने हेतु इसके कुछ प्रारंभिक एवं कुछ प्रक्रियात्‍मक उपाय भी इस कानून में निर्धारित किये गये थे । कुल मिला कर कानून को क्रियान्वित व लागू किये जाने के लिये विशिष्‍ट व सकारात्‍मक प्रक्रिया अवधारित की गयी थी । जहॉं यह भारत का पहला ऐसा अधिनियम था जो जनता को सीधे सीधे सूचना प्राप्ति तथा उसके उपयोग किये जाने की केवल स्‍वतंत्रता ही नहीं देता था बल्कि इसके पश्‍चात अन्‍य कानूनी व प्रशासनिक तथा सार्वजनिक उपायों के जरिये हस्‍तक्षेप का पश्‍चातवर्ती अधिकार भी मुहैया कराता था ।

भारत में लम्‍बे अर्से से भ्रष्‍टाचार व अंधेरगर्दी की मलाई मार रहे अफसर इतना अधिक काला पीला नीला हरा किये बैठे हैं कि वे इस कानून के लागू होने के दिनांक 12 अक्‍टूबर 2005 से ही इससे अन्‍दरूनी दुश्‍मनी मान बैठे थे और हर हाल में शुरू से ही ठान कर बैठे थे कि इस कानून की न केवल धज्जियां ही उड़ानी हैं बल्कि इसे पूरी तरह असफल भी करना है । कानून लागू होने के दिन से ही उनका पुरजोर विरोध स्‍वत: ही चालू हो गया था, ठीक बिल्‍कुल उसी तरह जैसे इलेक्ट्रिकल इंजीनियर में लेन्‍ज का नियम होता है या न्‍यूटन का भौतिक शास्‍त्र का तीसरा नियम जिसे प्रतिक्रिया का नियम कहते हैं ।

इन राष्‍ट्र विरोधी तत्‍वों या अफसर वर्ग ने और उनके बाबू वर्गीय चेलों ने शुरू से ही न केवल हरेक को बरगलाना शुरू किया बल्कि अफवाह भी जम कर फैलायीं कि कुछ नहीं यह कानून तो पूरी तरह फेल हो चुका है और जल्‍दी ही इसे वापस लिया जा रहा है, या इसमें संशोधन किया जा रहा है वगैरह वगैरह …. मैंने इस प्रकार की कई अनर्गल बातें स्‍वयं कई जगह सुनीं । मुझे बड़ी कोफ्त होती थी और तकलीफ भी कि कल संभव है इन्‍हें खुद ही इसी कानून का सहारा लेना पड़ जाये और यही जो इस कानून को अवमंदित या भोंथरा करने की कोशिश जी तोड़ कर रहे हैं, खुद ही इसका इस्‍तेमाल करने लायक नहीं रहेंगे ।

इस कानून को ऐन दशहरे के दिन लागू किया गया था सो हिन्‍दू मान्‍यता के अनुसार इस त्‍यौहार के दिन दसों दिशायें चौकस खुलतीं हैं और इस दिन हुआ कार्य प्रत्‍येक दशा में पूर्ण सफल होता ही है ।

मैंने अब तक सूचना का अधिकार सम्‍बन्‍धी करीब डेढ़ दो हजार मामले हैण्‍डल किये और हर मामले का गहराई से अध्‍ययन करने का भी सुअवसर मुझे मिला ।

 

मुझे यह लिखने में कोई संकोच नहीं कि जनता का यह अमोध अस्‍त्र या अचूक हथियार आज न केवल दिशा से भटक कर दिशाहीन हो गया बल्कि इस कानून की शुरूआती ढांचागत खामियां इस अधिनियम के अवलंघन कारीयों के लिये न केवल वरदान सिद्ध हुयीं अपितु इस कानून की मंशा को पूरी तरह खत्‍म कर राष्‍ट्र विरोधी अवलंघनकारीयों की मंशा की गुलाम मात्र बनकर रह गयीं ।

शुरूआत में जब किसी महात्‍वाकांक्षी और दीर्घकालीय प्रभावक कानून की अवधारणा स्‍थापित की जाती है तो उसमें ढांचागत व अनुभवगत प्रक्रियात्‍मक दोषों का होना स्‍वा‍भाविक है किन्‍तु लम्‍बे अनुभव के बाद उन्‍हें निरन्‍तर रखा जाना तो त्रुटि नहीं बल्कि जानबूझ कर किया गया अपराध बन जाती है । इस कानून को स्‍थापित किये जाने और प्रचलन में लाये जाने तक जो विसंगतियां और खामियां थीं, यदि वक्‍त वक्‍त पर उनका सिंहावलोकन कर उन्‍हें ठीक किया जाता रहता तो इतने ताकतवर कानून की यह दुर्दशा और दुर्गति नहीं होती ।

 

अभी हाल ही में शीर्ष न्‍यायालय तक ने इस कमजोर अधिनियम का तीखा उपहास बना दिया, मामले ने एकसी विसंगतियों की स्थिति उत्‍पन्‍न कर दी कि गोया अब अधिनियम नहीं अल्कि अधिनियम से शासित व्‍यक्ति तय करेगा कि अधिनियम उस पर लागू है कि नहीं । खैर इसमें शीर्ष अदालत का अहम्‍मन्‍यतापूर्ण व्‍यवहार रहा हो या अधिनियम की अपने हिसाब से व्‍याख्‍या करने की कवायद, जो भी रहा हो देश में इसका संदेश कतई अच्‍छा नहीं गया । और इस अधिनियम की बची खुची दुर्गति हो गयी सो अलग । ऐसी अपमान जनक परिस्थितियों में जनता का कानून कहे जाने वाले इस अधिनियम को तो वापस ले लिया जायेगा तो बेहतर होगा, कम से कम जनता का झूठा भ्रम या आस तो टूटेंगे ।

 

क्रमश: जारी अगले अंक में …………..

ग्रहों की उलटफेरी का तगड़ा खेल चालू हुआ, होगी भारी उथल पुथल

ग्रहों की उलटफेरी का तगड़ा खेल चालू हुआ, होगी भारी उथल पुथल

तेजी मन्‍दी सहित राजनीतिक द्वंद्ध बढ़ेगा, पूरी तरह बदलेगी गोचर की तस्‍वीर आने वाले दिन लायेंगे जन्‍म कुण्‍डलियों में तूफान

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’

भाग-1

कुछ अर्से से परेशान चल रहे लोगों को जहॉं अब राहत मिल सकती है वहीं चन्‍द अर्से से मजे मार रहे लोगों के लिये परेशानी का दौर शुरू हो सकता है । तकदीरी आसमान में भारी उलटफेरी शुरू हो चुकी है और लगभग सारे ही ग्रह आने वाले चन्‍द रोज के भीतर अपने अपने ठीये यानि स्‍थान परिवर्तन करेंगे या उनकी स्थिति परिवर्तन होगा । कुल मिला कर सारे ग्रह किसी न किसी बदलाव पर चल रहे हैं और इस भारी उलटफेर का हेर फेर भी आम आदमी और सांसारिक परिदृश्‍य पर भी व्‍यापक प्रभाव डालने वाला होगा ।

मजे की बात ये है कि यह बदलाव 25 अप्रेल से ही चालू हो चुका है और आने वाले लगभग 20-25 दिनों तक यह लगातार चलेगा । जिस श्‍ानि ने वक्री होकर तेल और लोहे को आसमान की ऊंचाईयों पर ले जाकर मंहगाई बढ़ा कर आम आदमी की पहुँच से बाहर कर दिया था, ज्‍योतिषीय विवेचना के अनुसार यही शनि आने वाली 3 मई को वापस मार्गी गति पर आ रहे हैं, इनकी वक्री गति समाप्‍त होकर मार्गी होते ही तेल और लोहे को वापस जमीन का रूख करना पड़ेगा वहीं अन्‍य ग्रहों की मार के चलते इन्‍हें भारी मन्‍दी के दौर से भी गुजरना पड़ सकता है ।

कौन कब कैसे बदलेगा

शुक्र 25 अप्रेल को मीन राशि से मेष में प्रवेश कर चुके हैं

बुध अतिचारी गति से चल रहे हैं, 14 अप्रेल को मेष राशि में प्रवेश किया था, अस्‍त चल रहे थे, 27 अप्रेल को बुधोदय हो चुका है, और 29 अप्रेल को मेष राशि छोड़कर वृष राशि में प्रवेश करेंगे । 6 जुलाई तक वृष राशि में ही अस्‍त उदय वक्री मार्गी होकर डटे रहेंगे ।

मंगल 28 अप्रेल को मिथुन राशि छोड़कर कर्क राशि में प्रवेश करेंगे । 21 जून तक कर्क में ही टिके रहेंगे ।

सूर्य वर्तमान में मेष राशि में गोचर है, 14 मई से वृष राशि में चले जायेंगे ।

राहू वर्तमान में कुंभ राशि में हैं 30 अप्रेल से मकर राशि में आ जायेंगे ।

केतु वर्तमान में सिंह राशि में हैं 30 अप्रेल से कर्क राशि में आ जायेंगे ।

गुरू वर्तमान में मार्गी गति से धनु राशि में गतिशील हैं, 9 मई से धनु राशि में ही वक्री हो जायेंगे और 10 डिग्री से अधिक तक पीछे जाकर लगभग एक तिहाई चाल पलटेंगे ।

शनि वर्तमान में सिंह राशि में होकर, वक्री गति से 7 डिग्री तक पीछे आ गये हैं, 3 मई से मार्गी हो जायेंगे और आगे बढ़ना दोबारा शुरू करेंगे । 17 अगस्‍त से अस्‍त होकर 21 सितम्‍बर को पुन: उदित होंगे, और 31 दिसम्‍बर 2008 तक मार्गी गति में ही बने रह कर 27 डिग्री तक ऊपर चढ़ जायेंगे ।

चन्‍द्र विशद व बड़ी विवेचनाओं में गण्‍यमान्‍य नहीं । हर सवा दो दिन में राशि परिवर्तन स्‍वाभाविक चाल है ।

पूरे के पूरे नौ ग्रहों के इस भारी फेर बदल का विहंगम दृष्टिपात और सिंहावलोकन जिस भारी उथल पुथल और उलटफेरी की ओर इशारा करता है, वह काफी चौंकाने वाली और व्‍यापक रूप से प्रभावकारी है । जहॉं सस्‍ते मन्‍दे, मंहगाई और सस्‍ताई का खेल अब उल्‍टा पुल्‍टा होगा वहीं, ग्रहों की स्थिति गोचरवश जो प्रबल व प्रभावकारी स्थिति में चल रहे थे या चल रहे हैं, यदि उनकी जन्‍म कुण्‍डली में ग्रहों की स्थिति ठीक ठाक नहीं तो उन्‍हें पराभव या कष्‍टकारी स्थितियों से गुजरना पड़ सकता है । बिल्‍कुल ऐसा ही उन लोगों के लिये भी है जिनका वर्तमान समय गोचर के अनुसार ठीक नहीं है, यदि उनकी जन्‍म कुण्‍डली में ग्रहों की स्थिति ठीक ठाक है तो उनके उत्‍थान का वक्‍त आ गया है अन्‍यथा और भी अधिक बुरी स्थिति हो सकती है ।

क्रमश : अगले अंक में जारी ….

मुरैना उपजेल से शातिर कैदी फरार, लापता कैदी की जमानत हुयी

मुरैना उपजेल से शातिर कैदी फरार, लापता कैदी की जमानत हुयी
पहले भी भाग चुका है जी आर.पी. थाने से और किशोर जेल से
तहसील ब्‍यूरो, मुरैना
मुरैना 20 अप्रेल 08, कल मुरैना उपजेल में हुये एक आश्‍चर्यजनक घटनाक्रम में एक कैदी जेल से फरार हो गया । फरार कैदी को तलाश पाने में नाकाम जेल प्रशासन ने आनन फानन में कैदी की फर्जी जमानत करवा कर जमानत भी भरवा दी और उसे जमानत पर रिहा बता दिया ।
विश्‍वस्‍त सूत्रों से प्राप्‍त जानकारी के अनुसार कल दीपा उर्फ बहरा बाल्‍मीक नामक कैदी मुरैना जेल से भाग निकला यह कैदी 25 बी और धारा 109 के तहत जेल में कुछ समय से बन्‍द था । कल जेल परिसर की सफाई के लिये कुछ कैदीयों को निकाला गया था, जिसमें अन्‍य कैदी तो जेल गार्ड के साथ काम के बाद वापस लौट आये लेकिन दीपा उर्फ बहरा बाल्‍मीक नामक कैदी गार्ड के साथ वापस नहीं लौटा जिसमें कुछ संतरी ऐसे भी उस समय ड्यूटी पर थे जो नियमित नहीं थे और घटे घटनाक्रम से उनकी नौकरी पर बन आयी थी । ऐसे में जेल प्रशासन ने आनन फानन में मुरैना जे.एम.एफ.सी. कोर्ट से फरार कैदी की जमानत भी खुद करवायी और उसे भरवा भी खुद ही दिया । बाद में उसे जेल से जमानत पर रिहा दिखा कर मामले को रफा दफा कर दिया ।
बाद में इसी घटनाक्रम को जेल प्रशासन ने अन्‍य कैदी हीरो उर्फ पप्‍पू बाल्‍मीक नामक कैदी के साथ घटा हुआ बता कर अखबारों में नकली खबर छपवा दी, हीरो उर्फ पप्‍पू बाल्‍मीक नामक कैदी अभी भी जेल में ही बन्‍द है और फरार हुआ कैदी दीपा उर्फ बहरा बाल्‍मीक नामक कैदी है ।
दीपा उर्फ बहरा बाल्‍मीक नामक कैदी पहले भी जी.आर.पी. थाने से और किशोर जेल से इसी प्रकार फरार हो चुका है ।

बैतूल चुनाव : कांग्रेस नही कमलनाथ को झटका, मुख्‍यमंत्री की दौड़ से बाहर हो सकते हैं

बैतूल चुनाव : कांग्रेस नही कमलनाथ को झटका, मुख्‍यमंत्री की दौड़ से बाहर हो सकते हैंराज श्री वर्मा, भोपाल (तहसील संवाददाता)भोपाल 17 अप्रेल 08, बैतूल लोकसभा उपचुनाव के परिणाम को लेकर भाजपा नेता भले ही फूले न समा रहे हों और अपनी पीठ खुद ठोंक कर भले ही विकास और अपनी नीतियों की जीत बताते फिरते हो । हकीकत तो कुछ और ही है । बैतूल का परिणाम अधिकांश लोगों को 20-25 दिन पहले से ही पता था । कांगेस नेता कमलनाथ के घटते प्रभाव का अनुमान लगभग सभी को था और कांग्रेस को भी इसका इल्‍म हो गया था जिसके चलते अनेक युवा सांसदों को एक साथ कांग्रेस ने बैतूल भेजा था ।
कांग्रेस में अगले म.प्र. विधानसभा चुनाव को लेकर सरगर्मियां तेज हैं और अब यह चुनाव अधिक दूर भी नहीं हैं । भाजपा जहॉं शिवराज सिंह की आम आदमी गरीब आदमी के कल्‍याण की कुछ अद्भुत और अति लोकप्रिय योजनाओं के सहारे विधानसभा चुनाव की वैतरणी पार करने की उधेड़बुन में लगी है और गरीब आदमी का आम आदमी का मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह वाली छवि के साथ अपने अभियान को गति देने में लगी है वहीं कांग्रेस में बड़ी ऊहापोह की स्थिति अभी तक बनी हुयी है । कांग्रेस अपना भावी मुख्‍यमंत्री अभी तक प्रोजेक्‍ट नहीं कर पायी है ।
चर्चाओं में चल रहे कांग्रेस के भावी मुख्‍यमंत्रियों में से कमलनाथ का भी नाम बड़े जोर शोर से चलाया जा रहा था । कमलनाथ एवं दिग्विजय लॉबी कमलनाथ को मुख्‍यमंत्री के रूप में न केवल घोषित कर चुकी थी बल्कि राजधानी के आसपास यह हवा भी जोर से बना दीगयी थी कि कमलनाथ म.प्र. के अगले मुख्‍यमंत्री होंगे । कमलनाथ की लोकप्रियता समूचे मध्‍यप्रदेश में नहीं है और कमलनाथ को उनके अनुयायीयों के अलावा सम्‍पूर्ण मध्‍यप्रदेश में आम आदमी नहीं पहचानता । इसके बावजूद कमलनाथ की आगामी मुख्‍यमंत्री के रूप में हवा बनायी जाना कांग्रेस के लिये ही घातक सिद्ध हुयी । विशेषकर बैतूल उपचुनाव के परिप्रेक्ष्‍य में तो यह काफी स्‍पष्‍ट नतीजा है । बैतूल में कांग्रेस की नहीं बल्कि कमलनाथ की प्रतिष्‍ठा दॉंव पर थी, और बैतूल में कांग्रेस प्रत्‍याशी की हार के साथ कमलनाथ का तिलिस्‍म भी टूट गया ।
राजनीतिक विश्‍लेषकों ने 20 रोज पहले ही अनुमान लगा लिया था कि बैतूल में क्‍या होने वाला है, कांग्रेस की सेहत पर बैतूल लोकसभा का उपचुनाव कोई खास असर नहीं डालेगा और न इसकी गूंज दिल्‍ली जायेगी न भोपाल तक आयेगी, बस कमलनाथ को मुख्‍यमंत्री बनने से नकार देगी और शेष कुछ नहीं होने वाला ।
शिवराज सिंह इन दिनों विज्ञापनों पर धुऑंधार लुटाने में लगे हैं, मजे की बात ये है कि जिस अन्‍नपूर्णा योजना की तारीख तीन बार टल चुकी है अभी 15 अप्रेल को उसके चालू होने के पहले ही खबर आ चुकी थी कि योजना टल कर तिथि आगे बढ़ गयी है, इसके बावजूद अखबारों में 15 अप्रेल को करोड़ो के विज्ञापन छपे कि इस योजना का शुभारम्‍भ आज होगा । जनता के गाढ़े खून पसीने की कमाई की कमाई को इस तरह योजना की फर्जी घोषणाओं के लिये फर्जी विज्ञापन देकर दोनों हाथ से लुटाने वाले शिवराज सिंह को गरीब का हमदर्द तो कतई नहीं माना जा सकता । जो योजना 14 तारीख को ही स्‍थगित हो गयी हो उसका विज्ञापन 15 तारीख को कैसे छपा, यह जबरदस्‍ती विज्ञापन तकसीम करने का एक जबरदस्‍त नुस्‍खा है । अब नई तारीख पर फिर नये विज्ञापन, योजना का जो चाहे हो सो हो मीडिया के तो वारे न्‍यारे हैं ही ।
आज शिवराज ने भाजपा का फिर विज्ञापन छपाया है जिसमें शिवराज कह रहे हैं हम जीत गये हम जीत गये, बंटाढार का नया संस्‍करण हार गया वगैरह वगैरह । दिल्‍ली तक गूंजेगी गरीब की लाठी की आवाज, गरीब की लाठी में आवाज नहीं होती ।
संभवत: शिवराज चिन्तित से अधिक उतावले हैं । कहॉं राजा भोज कहॉं गंगू तेली, कहॉं विधानसभा का समग्र चुनाव और कहॉं एक लोकसभा उपचुनाव । इस एक सीट ( जो पहले से ही शिवराज की भाजपा पर थी) को ज्‍यों का त्‍यों वापस जीत लेने से क्‍या होगा, क्‍या इस एक सीट के बल पर भाजपा की केन्‍द्र में सरकार बन जायेगी या फिर केन्‍द्र से कांग्रेस की सरकार गिर जायेगी । आखिर किस फर्क की किस नये संदेश की शिवराज बात कर रहे हैं, एक सामान्‍य समझ का आदमी भी इस बात को नहीं समझ सकता कि आखिर क्‍या शिवराज ने पा लिया और क्‍या कांग्रेस ने खो दिया । एक पल के लिये सिर्फ यही मान लीजिये कि यह सीट खाली ही नहीं हुयी । केवल कांगेस के एक भावी मुख्‍यमंत्री बनने के सपने लिये कमलनाथ को मुख्‍यमंत्री की दौड़ से बाहर कर गयी, इससे तो उल्‍टे कांग्रेस को फायदा ही होगा न कि नुकसान, भावी मुख्‍यमंत्रियों की कतार थोड़ी छोटी हो गयी ।
अगर कांग्रेस इस हार जीत को खास तवज्‍जो देती है तो जरूर आश्‍चर्य की बात होगी, उपचुनावों में अक्‍सर वैसे ही प्रदेश में जिसकी सरकार हो उसके पक्ष में परिणाम जाते हैं, यह कौन सी नई बात है । और बहुत कुछ पहले से तय शुदा और सबको पता था । फिर फालतू विज्ञापनों पर शिवराज सिंह ने भाजपा के पैसे खर्च करवा डाले कि आवाज दिल्‍ली तक जायेगी ।
कांग्रेस का विधानसभा चुनाव तो कौन होगा अगला मुख्‍यमंत्री और कहॉं कौन होगा प्रत्‍याशी पर निर्भर करेंगे । और शायद कांग्रेस इससे बेखबर नहीं होगी ।

क्रिकेट के ये नये सिलसिले

क्रिकेट के ये नये सिलसिले
मनीष कुमार जोषी, सीताराम गेट के सामने, बीकानेर (राज) 9413769053जी समूह के सुभाष चंद्रा ने जब एक ख्वाब देखा तो क्रिकेट के ये नये सिलसिले शुरू हुए। क्रिकेट अपने परंपरागत रूप से बाहर आई। क्रिकेट इस सिलसिले में जिस ने भी निगाह डाली उसे दूर दूर तक गुल ही गुल नजर आये। सुभाष चंद्रा ने क्रिकेट का एक अलग साम्राज्य स्थापित कर उसका सम्राट बनने का सपना देखा तो कई और ख्वाब उससे जुड गयें। कपिल देव, ललित मोदी और शाहरूख खान के ख्वाब भी क्रिकेट के इस नये सिलसिले से जुड़ गये। सभी जुट गये गन्ने रूपी क्रिकेट को मषीन में डाल कर मिठास निचाड़ने की कोषिष में । हर एक ख्वाब क्रिकेट से जुड़ गया और क्रिकेट के नये सिलसिले शुरू हो गये। हर एक कासे क्रिकेट में दूर तक बहार ही बहार नजर आ रही है।

सुभाष चंद्रा ने आईसीएल की शुरूआत कर अपने ख्वाब हो हकीकत में बदलने की कोषिष की तो कपिलदेव को भी एक बार फिर क्रिकैट में लहलहाती फसल नजर आने लगी। क्रिकेट की काल्पनिक नई सल्तनत में वो अपने आपको सुभाष चंद्रा जैसे सम्राट के प्रधानमंत्री के रूप में देखने लगे। सुभाष चंद्रा और कपिलदेव का ख्वाब हकीकत का रूप लेता उससे पहले ही बीसीसीआई के उपाध्यक्ष ललित मोदी का ख्वाब भी क्रिकेट नये सिलसिले से जुड़ गया। मोदी की निगाह सुभाष चंद्रा से भी आगे गई और उन्हे तो क्रिकेट में बहुत दूर तक बहार की लहलहाती फसल नजर आने लगी। मोदी ने जब इस फसल को काटने की योजना बनाई तो फिल्म स्टार शाहरूख खान के मन में भी क्रिकेट की इस लहलहाती फसल को काटने की चाहत हुई। शाहरूख खान की आंखे भी क्रिकेट के सपने देखने लगी। ललित मोदी और शाहरूख का ख्वाब हकीकत में बदलता नजर आने लगा तो इस कड़ी में विजय माल्या और प्रीती जिंटा के ख्वाब भी इससे जुड़ गये। चाहतो और ख्वाबो के इसी सिलसिले की कड़ी है आईपीएल।

एक ख्वाब से क्रिकेट का यह नया सिलसिला शुरू हुआ। नये क्रिकेट के हर मोड़ नया गुल खिला रहा है। एक ख्वाब से शुरू हुए इस सिलसिले से सैकड़ो ख्वाब जुड़ चुके है। जहां सुभाष चंद्रा का ख्वाब हकीकत पर टूटता नजर आ रहा है वहीं ललित मोदी का ख्वाब हकीकत में तब्दील नजर होता आ रहा है। क्रिकेट से मनोरंजन रूपी जैसे का ज्यूस निकालने के इस ख्वाब ने खेलो की दुनिया को हिलाकर रख दिया। क्रिकेट के इस नये सिलसिले ने क्रिकेट की परिभाषा को बदल दिया है।

ख्वाबो के इस सिलसिले में सभी को क्रिकेट माषूका की तरह नजर आ रही है। लेकिन वह तो बेचारी निरीह रूप से खड़ी मूक दर्षक बनी हुई है। गन्ने जैसी मिठास भरी क्रिकेट को मषीन से बार बार निकालकर उसके मिठास को निचोड़ने की पूरी कोषिष की जा रही है। अब गेंद और बल्ले का संघर्ष नहीं है। थिरकती सिने बालाओ के बीच चौको और छक्को का क्रिकेट हें। क्रिकेट का स्वयं का ख्वाब टूट गया है। क्रिकेट में फुटबाल और हॉकी की प्रतिकृति बनती जा रही है। अब मैदाने में मैच बचाने के लिए संघर्ष नहीं होता है बल्कि क्रिकेट को पीटने का संघर्ष होता है । क्रिकेट पिटती जा रही हेै। क्रिकेट का समृध्द होने का ख्वाब टूट रहा है परन्तु क्रिकेट से जुड़े लोगो का ख्वाब बुलंदिया छु रहा है। दूर तक निगाह में खिले हुए गुल में हर कोई खो जाना चाहता है। क्रिकेट के इस सिलसिले के अभी कुछ ही मोड़ देखे है परन्तु आगे इस सिलसिले को कड़वे मोड़ देखने पड़ सकते है।
सीताराम गेट के सामने, बीकानेर (राज)
9413769053

बाकी कुछ बचा सो मँहगाई मार गई ….आधी हकीकत आधा फसाना तेल देखो तेल की धार देखो

बाकी कुछ बचा सो मँहगाई मार गई ….आधी हकीकत आधा फसाना तेल देखो तेल की धार देखो

कड़वा सच

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’

 

आज चारों ओर मंहगाई का हल्‍ला है, जिधर देखो उधर चिल्‍लपों मची है, सारे के सारे नेता गला फाड़ के नर्रा रहे हैं । नर्रा क्‍या डकरा रहे हैं, रोटी कपड़ा और मकान का गाना बजा रहे हैं बजा क्‍या जनता को सुना रहे हैं , देश का समूचा मीडिया महज भोंपू बन कर रह गया है, अरे भोंपू क्‍या सार्वजनिक मूत्रालय बन कर रह गया है, जो आता है टायलट कर जाता है, नेता छोटा हो चाहे बड़ा मीडिया भोंपू की तुरही में हल्‍की सी फूंक मार जाते हैं और मीडिया भनभना कर उनकी फूंक को सुर में बदल कर एम्‍पलीफाई कर देता है ।

धन्‍य है जगत नरायन, तुमसे तो नारद अच्‍छे थे, कम से कम खुद की कारीगरी तो दिखाते थे, अच्‍छे भले चलते फिरते मीडिया थे । अरे भईया माना विज्ञापन मजबूरी है लेकिन चारण भाट बन जाना तो मजबूरी नहीं हो सकती । जो सरकारों की सेवाओं में यस राजाओं (नेताओं) की चाटुकारिता में सवैये और कवित्‍त बॉंचने लगे ।

मंहगाई मंहगाई मंहगाई, कहॉं से आयी मंहगायी, बजट में तो कुछ नहीं बढ़ाया गया फिर ये मंहगाई कहॉं से आयी । जब बजट आने से तीन दिन पहले सारे बाजार का माल अण्‍डरग्राउण्‍ड हो गया था और सिगरेट माचिस जैसी चीजें ब्‍लैक में बिक रहीं थीं, तब कोई क्‍यों नहीं नर्राया मंहगाई मंहगाई ।

पिछले दस साल में जब सोने के दाम पॉंच हजार से पन्‍द्रह हजार तक आये तब कोई क्‍यों नहीं नर्राया मंहगाई मंहगाई मंहगाई । जब सरकारी अफसरों और नेताओं के वेतन भत्‍ते पिछले दस साल में दस दफे बढ़े तब कोई क्‍यों नहीं नर्राया मंहगाई मंहगाई मंहगाई ।

चम्‍बल घाटी का मुरैना जिला सरसों का सबसे बड़ा उत्‍पादक है, यहॉं सरसों के अखण्‍ड भण्‍डार हैं, सरसों से सरसब्‍ज इस जिले में जब सरसों का तेल 88 रूपये किलो बिका तो कोई क्‍यों नहीं नर्राया मंहगाई मंहगाई मंहगाई । सरसों के भण्‍डार तो आज भी इस जिले में किलो टनों में हैं, मगर किसान के यहॉं नहीं सेठजी के यहॉं, बावजूद इसके किसान के हाथ तो मुरैना जिला में अभी भी इतनी सरसों हैं कि कम से कम ग्‍वालियर चम्‍बल में तेल के दाम चौथाई पर ले आये । लेकिन सेठजी के गोदाम में तो सरसों के इतने अकूत भण्‍डार है ( किसे नहीं पता) कि सारे देश में तेल के दाम चौथाई करा दें ।

मुरैना से प्रतिदिन बाहर जाने वाले हजारों टन तेल को रूकवा क्‍यों नहीं देते नेता जी, अभी हाल पता चल जायेगा कि मंहगाई के पीछे असल राज क्‍या है । फिर नर्राना मंहगाई मंहगाई मंहगाई । पर कैसे रूकवाओगे नेताजी सेठ जी तो आपकी रिजर्व बैंक भी हैं और वोट बैंक भी । वही सेठजी तेल और सरसों दोनों को ब्‍लॉक कर के बैठे हैं महाराज ।

ये वही सेठ जी हैं गरीब के दुश्‍मन सेठों के मसीहा और नेताओं के रिजर्व बैंक, जिन्‍होंने चन्‍द साल पहले केन्‍द्र सरकार से खुले तेल की बिक्री पर रोक लगवा के अपने पाउचों में तेल बेचने की मंजूरी दिला ली थी, तब हम नर्राये थे खूब भभ्‍भर मचाया था और चम्‍बल के किसानों को उनके द्वारा ही पैदा की गयी सरसों का तेल खुद पिरवा कर खाने से रोकने और अपनी सरसों का तेल सेठ जी से पिरवा कर पाउच में तीन गुने जादा दामों पर खरीद कर खाने से हमने जैसे तैसे बचाया था । इसके चन्‍द सालों बाद सेठ जी ने फिर ड्राप्‍सी शिवपुरी जिले में फैलवायी थी और मुरैना के कलेक्‍टर से ऊपर ही ऊपर आर्डर निकलवा कर मुरैना जिला में खुले तेल की बिक्री बन्‍द करवाई थी तथा फिर पाउचों में तेल खपाया था, उस समय खुले बाजार में खुले तेल के दाम थे 28 रूपये किलो और सेठजी के पाउच का तेल था 70 रूपये  प्रति किलो, लोगों ने उस भ्रष्‍ट कलेक्‍टर के रहते मजबूरी में सेठ जी का तेल झेला, हमने फिर ऊधम भभ्‍भर मचाया और कलेक्‍टर बदलते ही सेठजी का आर्डर निरस्‍त कराया ।

सेठ जी के किसी जमाने में अर्जुन सिंह ( वर्तमान केन्‍द्रीय मंत्री) जीजा हुआ करते थे, उसके बाद दिग्विजय सिंह भी कुछ समय सेठ जी के जीजा बने रहे, आजकल रूस्‍तम सिंह (म.प्र. के पंचायत मंत्री ) उनके जीजा हैं या क्‍या हैं पता नहीं, मगर दोनों की जोड़ी धरम वीर जैसी जोड़ी है, इत्‍ता पता है ।

सात अजूबे इस दुनिया में आठवीं इनकी जोड़ी, तोड़े से भई टूटे ना ये धरमवीर की जोड़ी । मुझे ये गाना बहुत पसन्‍द है । और इस जोड़ी पर फिट भी है ।

सेठजी के गोदाम तेल और सरसों से लबालब हैं नेता जी, सेठजी किलो टनों में तेल रोजाना बाहर भी भेज रहे हैं, उससे ज्‍यादा अण्‍डरग्राउण्‍ड दबाये भी बैठे हैं । दम है तो रोको मंहगाई, सेठ जी का तेल म.प्र. में भी बंटवा दोगे तो प्‍यारे म.प्र. की मंहगाई गारण्‍टी से खत्‍म हो जायेगी । गारण्‍टी क्‍या चैलेन्‍ज से खत्‍म हो जायेगी । लो एक पता तो बता दिया करो कार्यवाही, इसके बाद फिर और कई पते बतायेंगे और भी माल बतायेंगे, हम घटवायेंगे मंहगाई करो कार्रवाई , फिर उसके बाद नर्राना मंहगाई मंहगाई मंहमाई ।  

दिमनी विधानसभा से बहुजन समाज पार्टी के टिकिट की लम्‍बी कतार

दिमनी विधानसभा से बहुजन समाज पार्टी के टिकिट की लम्‍बी कतार

मुरैना 8 अप्रेल 08, चम्‍बल अंचल की सबसे अधिक अहम दिमनी विधानसभा सीट के लिये चुनाव का पहला वृत्‍त काफी दिलचस्‍प और रोमांचक हो गया है । उल्‍लेखनीय है कि राजपूत बाहुल्‍य इस सीट में समूचे लोकसभा क्षेत्र को प्रभावित कर देने की ताकत व तासीर है ।

यह वही क्षेत्र है जो एक साथ तीन विधानसभा क्षेत्रों के लिये निर्णायक बनने जा रहा है । इस विधानसभा क्षेत्र के लिये प्रत्‍याशी चयन में लगभग सभी राजनीतिक दल काफी सावधानी व सतर्कता बरत रहे हैं, अव्‍वल तो यह कि यह विशुद्ध तोमर राजपूत बाहुल्‍य सीट है, दूसरे यह कि लम्‍बे समय से आरक्षित रहकर अब नये परिसीमन में सामान्‍य होकर खुलने जा रही है । तोमरों को राजनीति से एक लम्‍बे समय तक दूर रहने के बाद पुन: राजनीतिक प्रादुर्भाव अब इसी सीट से मिलेगा, जिसके लिये चम्‍बल के तोमर राजपूत न केवल काफी उत्‍साहित हैं बल्कि लम्‍बे राजनीतिक संग्राम के लिये भी अब खुद को तैयार करने में लगे हैं । और सामाजिक तौर पर तोमरों को उच्‍च सामाजिक प्रतिष्‍ठा भी प्राप्‍त है । दूसरे इस क्षेत्र के अनेक धुरन्‍धर राजनीतिज्ञ आज प्रभावशाली होकर राजनीति के शिखरों पर आसीन हैं । इस क्षेत्र के कई प्रत