परिसीमन का साया : माया तेरे तीन नाम, परसा, परसू, परसराम, ध्‍वस्‍त गणित चौंकाने वाले होगें परिणाम

परिसीमन का साया : माया तेरे तीन नाम, परसा, परसू, परसराम, ध्‍वस्‍त गणित चौंकाने वाले होगें परिणाम

श्रंखलाबद्ध आलेख करवट-6

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’

पिछले अंक से जारी …

यूं अब विधानसभा चुपाव काफी नजदीक आ गये हैं और चुनावी सागर की जल तल में जमी काई भी काफी हद तक छंट गयी है । कुछ राजनीतिक दलों की निगाहें (सभी की नहीं) लगे हाथ होली बाद होने वाले लोकसभा चुनावों पर भी लगी हुयीं हैं । और वे अपनी तैयारी में लोकसभा चुनावों की तैयारी को भी शामिल कर चल रहे हैं ।

वैसे लोकसभा का चुनाव अभी परिदृश्‍य से परे है और जनता यानि मतदाता के मनोमस्तिष्‍क में लोकसभा चुनावों का कोई कीड़ा नहीं रेंग रहा अत: हम अभी इस आलेख में लोकसभा चुनावों को अपने जिक्र व चर्चा से परे रख कर केवल विधानसभा चुनावों के परिदृश्‍य व आलोक में ही इस आलेख को लिखेंगे व पढ़ेंगे । कतिपय जगह कतिपय राजनीतिक दलों की लोकसभा चुनाव सम्‍बन्‍धी बातों का आलेख में कहीं जिक्र आये भी तो उसे महज विधानसभा चुनावों के परिप्रेक्ष्‍य में ही ग्रहण करें ।

जहॉं राजनीतिक दल इस समय अपने अपने लठ्ठ भांजने में लगे हैं वहीं हवाई तलवारें भी आसमान चूमने लगीं हैं । एक दूसरे पर आरोप प्रत्‍यारोपों का दौर शुरू हुये हालांकि अर्सा गुजर गया है । लेकिन अभी पार्टियों के लोकल प्रत्‍याशी घोषित न होने से आरोपों की यह बौछारें उच्‍च स्‍तरीय ही हैं अभी स्‍थानीय स्‍तर पर इनका अभ्‍यास युद्ध प्रारंभ नहीं हुआ है ।

राजनीतिक दल जिन्‍होंने अपने प्रत्‍याशी घोषित कर दिये हैं, उनका चुनाव प्रचार प्रारंभ हो गया है । हालांकि अभी चुनाव आयोग ने चुनाव का ऐलान करके सबको अपनी अपनी पॉंत जमाने का औपचारिक रंग दे दिया है और कई दल और कई नेता अपनी अपनी बिसात बिछाने में लग बठे हैं ।

वर्तमान परिदृश्‍य में किसके क्‍या हाल हें इस पर एक सरसरी नजर डाल ली जाये तो विषय विस्‍तार को समझना आसान रहेगा ।

पहले आईये चम्‍बल घाटी से ही शुरू करते हैं यहॉं बहुजन समाज पार्टी ने अपने सभी विधानसभा क्षेत्रों में प्रत्‍याशी घोषित कर दिये हैं वहीं किंचित विवादों के चलते लगे हाथ लोकसभा का प्रत्‍याशी भी धोषित कर दिया है । भाजशपा ने अभी केवल तीन विधानसभा में ही प्रत्‍याशीयों का चयन किया है जिसमें अभी तक घोषित केवल दिमनी विधानसभा का प्रत्‍याशी हुआ है । सपा के प्रत्‍याशीयों का चयन अंतिम रूप में हैं और शीघ्र ही घोषित कर दिया जायेगा । वहीं लोक जन शक्ति पार्टी के प्रत्‍याशीयों की सूची भी घोषित की जा चुकी है । अन्‍य छिटपुट पार्टीयां भी प्रत्‍याशी चयन की कवायद में जुटी हैं 1 व्‍यापक व बृहद प्रभावी पार्टीयां कांग्रेस और भाजपा की चयन सूचीयां अभी कॉंट छॉंट और रद्दोबदल के दौर में हैं जो कि दीपावली के बाद क्रमवार घोषित होंगीं जिसमें स्‍पष्‍टत: मुरैना व दिमनी विधानसभा अंतिम समय तक रोकीं जायेंगीं । इन विधानसभाओं पर संभवत: सबसे आखिरी सूची में ही कांग्रेस व भाजपा अपने प्रत्‍याशी घोषित करेंगें ।

जहॉं कुछ विश्‍लेषक अबकी बार दिमनी विधानसभा को सर्वाधिक संवेदन शील सीट मान कर चल रहे हैं वहीं भारी हिंसा व उपद्रव की आशंका भी जता रहे हैं । आईये अब देखते हैं कि वस्‍तुस्थिति क्‍या है ।

वस्‍तुत: मुरैना विधानसभा सीट अभी कई पेचो खम में फंसी है अव्‍वल तो बहुजन समाज पार्टी ने अपना पिछला प्रत्‍याशी दोहरा कर परशुराम मुद्गल को मुरैना सीट पर उतारने की धोषणा की है वहीं पिछली बार परशुराम मुद्गल के मुकाबले ब्राह्मण समाज के अन्‍य कद्दावर नेता बलवीर सिंह डण्‍डोतिया को मुरैना लोकसभा का टिकिट का लोभ देकर मौन कर दिया है, यहॉं उल्‍लेखनीय है कि ब्राह्मण समाज को परशुराम मुदगल की पिछली पराजय का कारण बलवीर डण्‍डोतिया प्रतीत होते हैं और ब्राह्मणों का तर्क है कि बलवीर डण्‍डोतिया ने ब्राह्मणों के वोट काट लिये थे वरना परशुराम विजयी होता ।

उधर भाजपा में वर्तमान विधायक एवं मंत्री रूस्‍तम सिंह के अलावा जिन अन्‍य नामों पर मशक्‍कत हो रही है उनमें नगर पालिका पार्षद अनिल गोयल अल्‍ली, लक्ष्‍मीनारायण सिंह हर्षाना, तथा रामस्‍वरूप गुप्‍ता, और रामसेवक गुप्‍ता आदि हैं । अब भाजपा किसे प्रत्‍याशी बनायेगी ये वक्‍त बतायेगा ।

मुरैना सीट पर ही कांग्रेस में राकेश गर्ग, सोवरन सिंह मावई और दिनेश गुर्जर तथा रघुराज सिंह कंसाना पंक्ति में हैं । सपा का मुरैना टिकिट अभी विचाराधीन है । भाजशपा से पंजाब केसरी के पत्रकार गुप्‍ता, डॉ माहेश्‍वरी, और मनोरमा जैन स्‍कूल संचालिका कस्‍तूरबा स्‍कूल, उल्‍लेखनीय हे कि मनोरमा जैन समाजवादी पार्टी से भी टिकिट मांग रहीं हें ।

दिमनी विधानसभा से सपा द्वारा मोती सिंह गुर्जर, भाजशपा ने शिवचरण उपाध्‍याय, और बसपा ने रवीन्‍द्र सिंह तोमर तथा लोक जन शक्ति पार्टी द्वारा प्रेम कुमार जाटव को अपना प्रत्‍याशी बनाया है कांग्रेस व भाजपा के प्रत्‍याशी यहॉं अभी घोषित होने बाकी हैं ।

जौरा और सुमावली के क्षेत्र नये परिसीमन में कुछ बदल कर जातीय गणित यहॉं परिवर्तित हुये हैं । वैसे जातीय गणित तो लगभग हर विधानसभा सीट पर बदल गये हैं ।

जहॉं मुरैना विधानसभा सीट पर यदि भाजपा वर्तमान रूस्‍तम सिंह को टिकिट देती है तो भाजपा में एक वजनदारी कायम नजर आती है या फिर किसी एकदम नये व अविवादित चेहरे को लाने पर ही भाजपा का बेड़ा पार संभव नजर आता है । किन्‍तु वर्तमान में जिन प्रत्‍याशीयों के नाम भाजपा में उछल रहे हैं मुझे नहीं लगता कि विश्‍लेषणत्‍मक तौर पर वे भाजपा को कोई सकारात्‍मक नतीजा दे पायेंगें । जहॉं रूस्‍तम सिंह के शहरी वोट अबकी बार कुछ कम होंगे तो ग्रामीण वोट बढ् जायेंगे । रूस्‍तम सिंह ने ग्रामीण विकास और पंचायत मंत्री रहते भले ही समूचे मध्‍यप्रदेश और समूचे मुरैना जिला में कोई काम न करवाया हो किन्‍तु मुरैना विधानसभा के ग्रामीण क्षेत्र विशेषकर गूजर बाहुल्‍य क्षेत्रों में बहुत काम करवाया है और इन क्षेत्रों को मंत्री ने चकाचक करवा दिया है, वहीं शहर मुरैना के कुछ विशिष्‍ट क्षेत्रों में भी मंत्री ने खासा काम कराया है । इन क्षेत्रों के मतदाता भाजपा सरकार से भले ही चिढ़े हुये हों लेकिन रूस्‍तम सिंह पर रीझे और मेहरबान हैं । इस हिसाब से रूस्‍तम सिंह भाजपा के आज भी वजनदार प्रत्‍याशी आंके जाते हैं ।

वहीं दूसरी ओर भाजपा के न्ररपालिका पार्षद अनिल गोयल अल्‍ली को शहर का वैश्‍य वर्ग काफी अधिक संख्‍या में समर्थन देगा वहीं ग्रामीण क्षेत्र में भी वैश्‍य समुदाय का समर्थन उन्‍हें मिल जायेगा लेकिन यदि इसी क्रम में यदि भाजशपा यदि पंजाब केसरी के पत्रकार गुप्‍ता को टिकिट देकर प्रत्‍याशी बना बैठी तो अनिल गोयल अल्‍ली को जमानत बचाने के भी लाले पड़ जायेंगे । क्‍योंकि अल्‍ली को भाजपा के पारम्‍परिक वोट के अतिरिक्‍त अन्‍य समाज शायद ही वोट दे । जबकि रूस्‍तम सिंह के मामले में जातीय रूझान केवल मुरैना ग्रामीण क्षेत्र तक सीमित है और शहरी मतदाता में हर जाति के वोट उन्‍हें मिलना आसान है । लक्ष्‍मीनारायण हर्षाना इस सारी दौड़ में अभी काफी पीछे छूट रहे हैं लेकिन उन्‍हें गुर्जर मतों और कुछ शहरी वैश्‍य मतों के सहारे अपनी दमदारी नजर आ रही है ।

भाजपा के ही अन्‍य नेता रामसेवक गुप्‍ता पूर्व विधायक एवं रामस्‍वरूप गुप्‍ता की स्थिति अभी कमजोर नजर आ रही है, लम्‍बे समय की निष्क्रियता से उन्‍हें अभी आउटडेटेड माना जायेगा तो उपयुक्‍त होगा ।

बहुजन समाज पार्टी के विवादित नेता परशुराम मुद्गल पिछली बार हुयी गलतियों को अब दोहराने के मूड में नहीं हैं और अबकी बार पूरा जोर जान लगाकर मुरैना विधानसभा के परिणामों को पलटने की कवायद में लगे हैं । हालांकि बसपा नेता मुद्गल पर कई अपराध कराने और उनमें लिप्‍त होने के आरोप बरकरार हैं साथ ही पुलिस के दलाल के रूप में उनकी छवि बिगड़ी हुयी है लेकिन उनके नजरिये से सारे विश्‍लेषण और गणित को सामने रखें तो मुरैना विधानसभा के परिणामों में वे करिश्‍माई बदलाव कर भी सकते हैं । लेकिन यह बदलाव कांग्रेस प्रत्‍याशी के ऊपर निर्भर करेगा कि कांग्रेस किसे अपना प्रत्‍याशी बनायेगी । यदि कांग्रेस सोवरन सिंह मावई को पुन: रिपीट करती है और भाजपा भी रूस्‍तम सिंह को मैदान में रखती है तो यह स्थिति बिल्‍कुल पिछले वर्ष सन 2003 के विधानसभा चुनाव के मानिन्‍द होगी । बस फर्क यह होगा कि अबकी बार मुकाबला कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा न होकर त्रिकोणीय संघर्ष होगा और कांग्रेस, बसपा या भाजपा में से कोई भी जीत सकता है किन्‍तु जीत का अन्‍तर काफी कम होगा । वैसे सम्‍भव है कि इस त्रिकोणीय मुकाबले में रूस्‍तम सिंह ही विजयी हो जायें क्‍योंकि जहॉं राजपूत वोटों को अबकी बार बसपा प्रत्‍याशी परशुराम मुद्गल खींचने की जुगाड़ में हैं तो जाटव समाज के वोट बसपा के विरूद्ध अबकी बार पड़ने की संभावनायें उन्‍हें कमजोर भी करतीं हैं । ऐसा नहीं कि जाटव वोट केवल मुरैना विधानसभा में ही बसपा के खिलाफ जायेंगे बल्कि समूचे चम्‍बल क्षेत्र में ही जाटव समाज बसपा क खिलाफ वोटिंग करेगा ऐसा ऐलान जाटव समाज द्वारा किया गया है, इसके पीछे प्रमुख कारण डॉ. पी.पी. चौधरी की हत्‍या, फूल सिंह बरैया की बगावत और अनीता हितेन्‍द्र चौधरी की बसपा के खिलाफ खुली ऐलाने जंग है । इस गणित पर बसपा को अबकी बार भरी संख्‍या में जाटव वोटों के वोट बैंक से हाथ धोकर अन्‍य वर्ग व जातियों का नया वोट बैंक बनाना होगा । यह एक खास वजह है जिससे बहुजन समाज पार्टी को भारी नुकसान समूची चम्‍बल घाटी में संभव है । लेकिन यदि बसपा तकनीकी तौर पर अन्‍य वर्ग जातियों व समाजों का नया वोट बैंक यदि इस दरम्‍यान उपजा लेती है तो बेशक यह करिश्‍मा होगा । और वाकई बसपा की दाद देनी पड़ेगी । वैसे यह मुझे मुश्किल जान पड़ता है, कयोंकि किसी भी पार्टी का नया वोट बैंक मुरैना जिला में केवल दिमनी विधानसभा से ही उपज सकता है क्‍योंकि वर्षो बाद यह सीट आरक्षित से सामान्‍य हुयी है और पूरी तरह फ्रेश है यहॉं जिस पार्टी की भी फतह होगी भविष्‍य में समूचे मुरैना जिला पर उसका ही वोट बैंक होगा । क्‍योंकि दिमनी विधानसभा सीट जहॉं अम्‍बाह एवं गोहद विधानसभा सीटों पर सीधा सीधा प्रभाव डालेगी (निकटवर्ती एवं तोमर राजपूत बाहुल्‍य सीटें) वहीं आगामी लोकसभा चुनाव में मुरैना लोकसभा सीट पर भी प्रत्‍यक्ष पकड़ व प्रभाव रखेगी ।

लेकिन यह बहुजन समाज पार्टी का दुर्भाग्‍य कहिये कि फिलवक्‍त बहुजन समाज पार्टी ने यहॉं उत्‍तरप्रदेश से आयातित प्रत्‍याशी दे दिया है सो बहुजन का नया जनाधार व बोट बैंक केवल उसी दशा में संभव होगा जब कांग्रेस और भाजपा किसी कमजोर प्रत्‍याशी को यहॉं से खड़ा कर इस सीट को थाल में सजा कर बहुजन समाज पार्टी को दें दें ।

क्रमश: जारी अगले अंक में ……

मुरैना चार सीटों पर परिदृश्‍य साफ, दो पर उलझन अभी तक जारी, प्रचार के दूसरा दौर समाप्‍त होने तक कई समीकरण बदले

मुरैना चार सीटों पर परिदृश्‍य साफ, दो पर उलझन अभी तक जारी, प्रचार के दूसरा दौर समाप्‍त होने तक कई समीकरण बदले

मुरैना 24 नवम्‍बर 08, विधानसभा प्रचार का दूसरा दौरान समाप्‍त होने तक जिले की छ: विधानसभा सीटों पर जो समीकरण व परिदृश्‍य उभर कर सामने आये हैं उसमें अब केवल एक सीट मुरैना विधान सभा पर ही सीधा त्रिकोणीय संघर्ष शेष जान पड़ रहा है बकाया सीटों पर सीधा मुकाबला साफ साफ सुनिश्चित है हालांकि जौरा सीट पर त्रिकोणीय संघर्ष तो नहीं होगा लेकिन वोट काट विकट संभव है ।

छ: विधानसभाओं में रिपोर्ट लिखे जाने तक लगभग सारे निर्दलीय परिदृश्‍य से बाहर हो गये हैं और लगभग शत प्रतिशत अपना प्रचार बन्‍द करके घर बैठ चुके हैं, अब इसकी वजह कुछ भी रही हो ।

 

आज की स्थिति में कहॉं कैसा होगा संघर्ष (संभावित परिदृश्‍य)

 

मुरैना विधान सभा सीधा त्रिकोणीय संघर्ष (तीनों ही प्रत्‍याशीयों की वोट बैंक में सेंध संभव )

रूस्‍तम सिंह भाजपा

सोवरन सिंह मावई कांग्रेस

परशुराम मुद्गल बहुजन समाज पार्टी

दिमनी विधान सभा सीधा संघर्ष (दोनों प्रत्‍याशी की वोट बैंक में भारी काट होगी)

रवीन्‍द्र सिंह तोमर- बहुजन समाज पार्टी

जितेन्‍द्र सिंह तोमर सपा

संभावना- बसपा के खाते में यह सीट जायेगी

वोट काट करेंगें कांग्रेस, भाजपा और छोटी पार्टीयां तथा निर्दलीय

अम्‍बाह विधान सभा (आरक्षित)

सुरेश जाटव कांग्रेस

कमलेश जाटव भाजपा

संभावना कांग्रेस के खाते में यह सीट जायेगी

सबलगढ़ विधान सभा (दोनों प्रत्‍याशी के भारी वोट कटेंगें)

चन्‍द्र प्रकाश शर्मा बहुजन समाज पार्टी

सुरेश चौधरी कांग्रेस

संभावना यह सीट कांग्रेस के खाते में जायेगी    

जौरा विधान सभा सीट (कांग्रेस के भारी वोट कटेंगें)

वृन्‍दावन सिंह कांग्रेस

मनीराम धाकड़ बहुजन समाज पार्टी

संभावना यह सीट बसपा के खाते में जायेगी

सुमावली विधान सभा सीट (दोनों प्रत्‍याशी के भारी वोट कटेंगें)

ऐदल सिंह कंसाना कांग्रेस

गजराज सिंह सिकरवार भाजपा

संभावना यह सीट कांग्रेस के खाते में जायेगी

टीप- उपरोक्‍त परिदृश्‍य केवल अनुमान एवं प्रत्‍याशीयों के प्रचार प्रसार की स्थिति पर आधारित है

 

मुरैना विधान सभा सीट पर दो तरह की वोटिंग है जिसमें आधी वोटिंग शहरी क्षेत्र के मतदाताओं की है और आधी ग्रामीण मतदाताओं की । किसी प्रत्‍याशी के वोट शहरी क्षेत्र में अधिक हैं तो किसी के ग्रामीण क्षेत्र में अधिक हैं, गुण्‍डागर्दी और भयवश अधिकांश (सामान्‍य) आम मतदाताओं द्वारा पूर्णत: मौन साधा रखा गया है । और कोई भी कुछ भी भाव व्‍यक्‍त करने को तैयार नहीं है ।

चुनाव प्रचार का तीसरा चरण 25 तारीख को सायं 5 बजे समाप्‍त हो जायेगा और फिर चौथे चरण तक आते परिदृश्‍य में कई फेरबदल होते रहेंगें उपरोक्‍त अनुमानित परिदृश्‍य दूसरे चरण के चुनाव प्रचार की समाप्ति तक का है ।

 

 

भिण्‍ड चार सीटों पर परिदृश्‍य साफ, एक पर उलझन अभी तक जारी, प्रचार के दूसरा दौर समाप्‍त होने तक कई समीकरण बदले

भिण्‍ड चार सीटों पर परिदृश्‍य साफ, एक पर उलझन अभी तक जारी, प्रचार के दूसरा दौर समाप्‍त होने तक कई समीकरण बदले

भिण्‍ड 24 नवम्‍बर 08, विधानसभा प्रचार का दूसरा दौरान समाप्‍त होने तक जिले की पॉंच: विधानसभा सीटों पर जो समीकरण व परिदृश्‍य उभर कर सामने आये हैं उसमें अब केवल दो सीट भिण्‍ड और मेहगांव विधान सभा पर ही सीधा त्रिकोणीय संघर्ष शेष जान पड़ रहा है बकाया सीटों पर सीधा मुकाबला साफ साफ सुनिश्चित है हालांकि अटेर विधानसभा सीट पर त्रिकोणीय संघर्ष तो नहीं होगा लेकिन वोट काट विकट संभव है ।

पॉंच विधानसभाओं में रिपोर्ट लिखे जाने तक लगभग सारे निर्दलीय परिदृश्‍य से बाहर हो गये हैं

आज की स्थिति में कहॉं कैसा होगा संघर्ष (संभावित परिदृश्‍य)

भिण्‍ड विधान सभा सीधा त्रिकोणीय संघर्ष (तीनों ही प्रत्‍याशीयों की वोट बैंक में विकट सेंध संभव )

रामलखन सिंह भाजपा

राकेश सिंह कांग्रेस

नरेन्‍द्र सिंह कुशवाह समाजवादी पार्टी

संभावना- यह सीट कांग्रेस के खाते में जायेगी

अटेर विधान सभा सीधा संघर्ष (दोनों प्रत्‍याशी की वोट बैंक में भारी काट होगी)

अरविन्‍द सिंह भदौरिया- भाजपा

सत्‍यदेव कटारे- कांग्रेस

संभावना- सपा बसपा यहॉं काफी वोट काटेंगें यह सीट कांग्रेस के खाते में जायेगी

वोट काट करेंगें सपा, बसपा और छोटी पार्टीयां तथा निर्दलीय

गोहद विधान सभा (आरक्षित) भारी वोट काट होगी

माखन सिंह कांग्रेस

लाल सिंह आर्य भाजपा

संभावना कांग्रेस के खाते में यह सीट जायेगी

लहार विधान सभा (दोनों प्रत्‍याशी के भारी वोट कटेंगें)

मुन्‍नी त्रिपाठी भाजपा

डॉ गोविन्‍द सिंह कांग्रेस

संभावना यह सीट कांग्रेस के खाते में जायेगी

मेहगांव विधान सभा सीट त्रिकोणीय मुकाबला (भाजपा के भारी वोट कटेंगें)

दशरथ सिंह बहुजन समाज पार्टी

राकेश सिंह भाजपा

हरी सिंह कांग्रेस

संभावना यह सीट कांग्रेस के खाते में जायेगी

टीप- उपरोक्‍त परिदृश्‍य केवल अनुमान एवं प्रत्‍याशीयों द्वारा किये गये प्रचार प्रसार की प्रतिक्रियाओं पर आधारित है

भिण्‍ड विधान सभा सीट पर दो तरह की वोटिंग है जिसमें आधी वोटिंग शहरी क्षेत्र के मतदाताओं की है और आधी ग्रामीण मतदाताओं की । किसी प्रत्‍याशी के वोट शहरी क्षेत्र में अधिक हैं तो किसी के ग्रामीण क्षेत्र में अधिक हैं, गुण्‍डागर्दी और भयवश अधिकांश (सामान्‍य) आम मतदाताओं द्वारा पूर्णत: मौन साधा रखा गया है । और कोई भी कुछ भी भाव व्‍यक्‍त करने को तैयार नहीं है । भिण्‍ड विधानसभा सीट पर डॉ; रामलखन सिंह और चोधरी राकेश सिंह बहुत पुराने पारम्‍परिक प्रतिद्वन्‍दी हैं जिसमें रामलखन सिंह जीतते आये हैं, किन्‍तु अबकी बार क्‍या होगा यह वक्‍त बतायेगा व्‍यक्‍त संभावनायें द्वितीय चुनाव प्रचार के दौर की समाप्ति काल तक की हैं ।

चुनाव प्रचार का तीसरा चरण 25 तारीख को सायं 5 बजे समाप्‍त हो जायेगा और फिर चौथे चरण तक आते परिदृश्‍य में कई फेरबदल होते रहेंगें उपरोक्‍त अनुमानित परिदृश्‍य दूसरे चरण के चुनाव प्रचार की समाप्ति तक का है ।

आओ विद्युत बचाएं: देश को आगे ले जाये ं, विद्युत की बचत ही विद्युत का उत्प ादन है

आओ विद्युत बचाएं: देश को आगे ले जायें, विद्युत की बचत ही विद्युत का उत्पादन है

आदेश शर्मा (भारद्वाज)

काशी नरेश की गली , भारद्वाज बाडा ग्वालियर, मोबाइल : 9826284045

विद्युत राष्ट्रीय ऊर्जा है तथा राष्ट्र की समृध्दि और विकास का आधार भी। विद्युत ऊर्जा के उपयोग और उपभोग के प्रति आम जनता और उपभोक्ता की सोच दूरगामी परिणामों को लेकर गंभीर नहीं है। विद्युत का उपयोग बेदर्दी और प्रतिस्पर्धात्मक आधार पर हो रहा है। आम तौर पर होने वाले कार्यक्रमों में इस तरह की स्पर्धा बढ़-चढ़ कर देखी जा सकती है । प्राय: लोग विद्युत उपयोग का भी दिखावा करते हैं और कहते हैं कि ”हमने इतनी रोशनी की” हमें ऐसे थोथे विचारों को त्यागना होगा जो राष्ट्रीय ऊर्जा का संकट बढाने वाले साबित हों । दरअसल विद्युत का मितव्ययता से उपयोग ही राष्ट्र और समाज के भविष्य को मजबूती प्रदान करने वाला हो सकता है।

विद्युत ऊर्जा का उपयोग हमें अपनी कड़ी मेहनत से अर्जित धन की तरह करना चाहिए। साथ ही हमें अपने मन में यह भाव भी लाना होगा कि हम राष्ट्रीय ऊर्जा का अनावश्यक और अनाधिकृत उपयोग कर अपराध न करें । विद्युत ऊर्जा के अनियमित उपयोग से बिजली और पानी की समस्या विकराल रूप ले रही है जिससे सामाजिक वैमनस्यता बढ रही है और राष्ट्रीय और सामाजिक प्रगति भी अवरूध्द होती है।

हमारे देश में पॉच तरीकों से विद्युत उत्पादन किया जा सकता है इनमें से (हाइड्रो इलेक्ट्रिसिटी ) जल विद्युत इकाई के निर्माण एवं उपयोग योग्य बनाने में लगभग 10 से 12 वर्ष का समय, हजारों व्यक्तियों का श्रम और 1000 करोड़ की अनुमानित लागत आती है तब कहीं 450 से 500 मेगावॉट विद्युत उत्पादन वाली विद्युत इकाई स्थापित होती है । जिससे प्रति यूनिट उत्पादन लागत लगभग 60 पैसे आती है ।

कोयले से उत्पादित की जाने वाली (ताप विद्युत) इकाई के कार्य को पूरा करने में पांच वर्ष छ: माह का समय और लगभग 500 करोड़ की लागत आती है जिससे 250 से 500 मेगावॉट का उत्पादन होता है । ताप विद्युत ऊर्जा की लागत 2.50 रूपये प्रति यूनिट आती है। वहीं नाभिकीय विद्युत (न्युक्लिीयर इलेक्ट्रिीसिटी) इकाई को उत्पादन योग्य बनाने में पॉच वर्ष का समय और 900 करोड़ रूपये की राशि खर्च कर 500 से 1000 मेगावॉट विद्युत उत्पादन किया जा सकता है । नाभिकीय ऊर्जा की प्रति यूनिटउत्पादन लागत लगभग 1.90 रूपये आती है। सौर ऊर्जा और वायु वेग से (विन्ड इलेक्ट्रिसिटी) विद्युत उर्जा का उत्पादन रेगिस्तानों अथवा समुद्री तटों आदि पर जहां सूर्य की तेज किरणों से अथवा तीव्र गति वायु औसतन 60 से 75 किमी प्रति घण्टा के वेग से चलती हो से किया जाता है ।

काफी समय, कठिनाईयों, करोड़ों रूपये की लागत तथा हजारों हाथों की मेहनत से उत्पादित विद्युत ऊर्जा की मांग जिस तेजी से बढ रही है उसके अनुरूप उत्पादन किया जाना संभव नहीं हो पा रहा । भविष्य में ऊर्जा संकट से निजात दिलाने के लिये सरकार ने बिरसिंगपुर में 500 मेगावॉट और अमरकंटक में 210 मेगावॉट बाणसागर, टोन्स, रीवा के सिलपरा में तीन विद्युत इकाईयों में 40 मेगावॉट, 30 मेगावॉट और 20 मेगावॉट के अलावा मणी खेडा बांध पर भी एक जल विद्युत ईकाई को उत्पादन योग्य बनाया जा रहा है । म.प्र. शासन और विद्युत मण्डल दोनों की जागरूकता से विद्युत के क्षेत्र में किये जा रहे सकारात्मक प्रयास भी दिखाई दे रहे हैं। इन प्रयत्नों के साथ – साथ विद्युत उपभोक्ताओं का सक्रिय सहयोग भी अति आवश्यक है। हमें विद्युत उर्जा बचत के लिये कम उर्जा खपत कर अधिक रोशनी प्रदान करने वाले सी.एफएल को उपयोग में लाना चाहिये। साथ ही जब भी घर के बाहर जावें बत्ती बुझाना भी न भूलें ।

सड़क बत्ती के उपयोग में 250 वॉट के हैलोजन बल्वों की जगह 100 वॉट की सी.एफ.एल उपयोग में लावें । साथ ही सर्किट व्यवस्था से चलने वाली सड़क बत्ती को अमल में लाना चाहिये। ऊर्जा संकट में ए.सी. तथा अधिक विद्युत खपत वाले उपकरणों का मित्तव्ययता से उपयोग करना चाहिये ताकि ए.सी. से बाहर निकलने पर होने वाले शारीरिक तापमान के असन्तुलन से होने वाली बीमारियों से भी बचा जा सके । इस प्रकार सावधानी से जहाँ हम शरीर को स्वस्थ्य रख सकते हैं वहीं ऊर्जा बचत के महायज्ञ में भी अपना योगदान दे सकते हैं ।

ऊर्जा बचत हमें जोड़ती है । परिवार के सभी सदस्य एक कमरे में इकट्ठा बैठकर बत्ती, पंखा या कूलर का सामूहिक उपभोग करके भी विद्युत की बचत कर सकते हैं । नगरीय क्षेत्र में पानी के लिये प्रत्येक घर में प्रयुक्त होने वाली 250 वॉट की विद्युत मोटरों को एक साथ एक समय में चलाकर भारी विद्युत ऊर्जा खर्च की जाती है । अगर वार्ड और मोहल्लों में पानी की बडी टंकियों निर्मित की जाकर ज्यादा दबाब से पानी दिये जाने की व्यवस्था को व्यवहार में लावें तो विद्युत की काफी बचत की जा सकती है।

विवाह समारोह और अन्य सार्वजनिक आयोजनों हेतु उपयोगी क्षेत्रफल में पर्याप्त प्रकाश मिलने में उपयोग होने लायक भार की ही स्वीकृति प्रदान की जावे । एक ही स्थान पर चार-चार बल्वों का उपयोग न करें । अनावश्यक उपयोग की जा रही विद्युत ऊर्जा को रोका जाकर विद्युत बचत की जा सकती है। यदि संभव हो तो शादी समारोह आदि दिन में आयोजित किये जावें जिससे बिजली की बचत होगी । स्कूलों और महाविद्यालयों में विद्यार्थियों को विद्युत उपयोग की महत्ता से अवगत कराने के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किये जा सकते हैं ।साथ ही सरकारी कार्यालयों में सीमित विद्युत उपयोग किया जावे । प्रदेश के शासकीय कार्यालयों द्वारा देश के अन्य राज्यों के समान पांच दिवसीय कार्यशील सप्ताह शैली को अंगीकार किया जाना चाहिये। बाजार सायं काल जल्दी बन्द किये जावें। सड़क बत्ती सांयकाल देरी से चालू की जाकर सुबह जल्दी बन्द की जावें। हीटर/गीजर की जगह सौर ऊर्जा से चलने वाले उपकरण का उपयोग किया जावे तथा सी एफ एल सस्ती दरों पर सुलभ हों । विद्युत बचत के उपायों को अपनाकर हम मॉल एवं शापिंग कॉम्पलेकसों में उपयोगिता के आधार पर विद्युत का उपयोग हो न की प्रदर्शनार्थ अनाप – शनाप विद्युत प्रयुक्त की जावे। भवनों के निर्माण में प्राकृतिक प्रकाश का अधिक लाभ मिले, इस बात का ध्यान रखा जावे। विद्युत बचत के उपायों को अपनाकर हम करोड़ों रूपये और हजारों हाथों की कड़ी मेहनत से उत्पादित की जाने वाली विद्युत ऊर्जा के उचित उपयोग से प्रदेश के उद्योगों, कृषि क्षेत्र और चिकित्सा जैसे अतिमहत्वपूर्ण कार्य हेतु पर्याप्त विद्युत ऊर्जा प्रदान कर प्रदेश और देश की प्रगति में अपना योगदान दे सकते हैं।

आदेश शर्मा (भारद्वाज)

काशी नरेश की गली

भारद्वाज बाडा ग्वालियर

मेबाइल : 9826284045

समलैंगिक विवाद : ‘सर्वश्रेष्ठ प् राणी’ की ‘श्रेष्ठता’ पर उठते सवाल

समलैंगिक विवाद : ‘सर्वश्रेष्ठ प्राणी’ की ‘श्रेष्ठता’ पर उठते सवाल

निर्मल रानी, email: nirmalrani@gmail.com nirmalrani2000@yahoo.co.in nirmalrani2003@yahoo.com 163011, महावीर नगर, अम्बाला शहर,हरियाणा फोन-98962-93341

हमारे धर्मशास्त्र हमें यह बताते हैं कि ईश्वर ने पृथ्वी पर 84 लाख विभिन्न यौनियों के रूप में प्राणियों की संरचना की है। प्राणियों की इस विशाल सूची में मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ प्राणी के रूप में स्वीकार किया गया है। इस्लामिक मान्यताओं के अनुसार भी अल्लाह ने इंसान को अशरंफुल मंखलूंकात के रूप में स्थान दिया है। जिसका अर्थ है प्रकृति की सभी रचनाओं में सर्वोत्तम। ंजाहिर है इंसान रूपी ऐसे विशिष्ट प्राणी से इसी प्रकार की विशिष्ट, असाधारण तथा सर्वश्रेष्ठ कारगुंजारियों की भी उम्मीद की जानी चाहिए। नि:संदेह समय व काल के अनुरूप यह सर्वश्रेष्ठ प्राणी ऐसी अनेक कारगुंजारियां अंजाम देता आ रहा है जिसने इंसान के सर्वश्रेष्ठ होने की मान्यताओं पर मोहर लगाई है तथा इसकी पुष्टि की है। परन्तु इसी के साथ-साथ कभी-कभी यह भी देखा गया है कि इसी इंसान रूपी प्राणी ने कभी-कभी अनैतिकता तथा घटियापन की उन सीमाओं को भी पार किया है जिनकी उम्मीद जानवरों से भी नहीं की जा सकती।

कुदरत ने पृथ्वी पर जितने प्राणियों की संरचना की, उन सभी में दो प्रकार के लिंग की व्यवस्था की। एक पुल्लिंग तथा दूसरा स्त्रीलिंग। इन्हीं दोनों लिंगों के माध्यम से पूरी सृष्टि का निर्माण हुआ तथा यह सिलसिला अभी तक जारी है। बड़े आश्चर्य की बात है कि इंसान रूपी तथाकथित सर्वश्रेष्ठ प्राणी के अतिरिक्त पृथ्वी के शेष अन्य सभी ‘अश्रेष्ठ’ कहे जा सकने वाले प्राणियों ने तो प्रकृति द्वारा निर्धारित सभी मापदंडों की लाज रखते हुए उसके बनाए नियमों का अक्षरश: पालन किया तथा आज भी करते आ रहे हैं। परन्तु अपनी बुद्धिमता का परचम लहराने वाला इंसान ंकुदरत द्वारा निर्धारित लिंग भेद की सीमाओं तथा मापदंडों की अवहेलना करने के लिए उत्सुक दिखाई दे रहा है।

इंसानों के मध्य से एक नए एवं अप्राकृतिक रिश्ते के सूत्रपात की ंखबरें आ रही हैं जिसे समलैंगिक रिश्तों का नाम दिया जा रहा है। इसका अर्थ है कि कोई भी पुरुष किसी अन्य पुरुष के साथ तथा कोई भी स्त्री किसी अन्य स्त्री के साथ अपनी इच्छानुसार यौन संबंध स्थापित कर सकते हैं। इस प्रकरण में सुखद बात केवल यह है कि इंसानों में ऐसी सोच तथा ऐसे विचार रखने वालों की संख्या नाममात्र है। परन्तु इसके बावजूद भारत सहित दुनिया के अन्य तमाम देशों को मिलाकर ऐसे लोगों की संख्या अब इतनी ंजरूर हो गई है कि इनकी आवांज को दुनिया सुन रही है तथा महत्व भी दे रही है।

भारतवर्ष अपनी स्वयं की संस्कृति एवं सभ्यता रखने वाला एक प्राचीन देश है। यहां धार्मिक एवं प्राकृतिक मान्यताओं का सदैव आदर किया जाता रहा है। यही वजह है कि समलैंगिकता जैसा मनोरोग इस देश में कभी भी फल-फूल नहीं पाया। संभवत: यही वजह रही होगी जबकि विश्वव्यापी ब्रिटिश उपसाम्राज्यवाद के दौर में समलैंगिकता के विरुद्ध यदि कहीं ंकानून बनाया गया अथवा समलैंगिकता को ंगैरंकानूनी घोषित किया गया तो वह भारत ही दुनिया का पहला देश था। 1860 ई0 में लॉर्ड मैकॉले ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के अन्तर्गत इसे अपराध घोषित किया। परन्तु गत् 2 जुलाई को दिल्ली उच्च न्यायालय ने समलैंगिक आन्दोलन चलाने वालों के पक्ष में एक ऐसा निर्णय सुना दिया जिससे कि ‘सर्वश्रेष्ठ प्राणी’ की श्रेष्ठता पर वांकई एक बड़ा प्रश्चिन्ह लग गया। दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश ए पी शाह तथा न्यायाधीश एस मुरलीधर की न्यायपीठ ने एक ऐतिहासिक निर्णय सुनाते हुए यह ंफैसला दिया कि समलैंगिक रिश्ते बनाना धारा 377 के अन्तर्गत अपराध की श्रेणी में नहीं आता। हालांकि इस ंफैसले के साथ-साथ न्यायपीठ ने व्यस्क होने अर्थात् 18 वर्ष से अधिक की आयु होने तथा आपसी रंजामंदी होने की शतर्ें भी साथ रखी हैं। अदालत के इस ंफैसले से समलैंगिक रिश्ते रखने वाले तथा इनके प्रति हमदर्दी रखने वालों में कांफी जोश व उत्साह देखा जा रहा है। परन्तु भारत का सभ्य समाज चाहे वह किसी भी धर्म व सम्प्रदाय का क्यों न हो, उच्च न्यायालय के इस ंफैसले से हतप्रभ है।

समलैंगिक रिश्तों को मान्यता दिलाए जाने की लड़ाई लड़ने वाले संगठन जो गत् 8 वर्षों से अपने कथित अधिकारों के लिए संघर्षरत थे, अब लुकछुप कर अपने रिश्ते स्थापित करने के बजाए और मुखरित होकर अपने संबंधों का ढिंढोरा पीटने तथा इसे प्रचारित करने की मुद्रा में हैं। यह मुट्ठीभर लोग समलैंगिक रिश्तों को लेकर अपने सामाजिक व मानवाधिकारों की बात कर रहे हैं। इनका तर्क है कि इन्हें इनकी ंखुशी व मंर्जी के अनुरूप रहने व जीने दिया जाए। अपनी निराली तथा आश्चर्यपूर्ण इच्छाओं को मनवाने की कोशिशों में लगा यह वर्ग प्राकृतिक तथा नैतिक मान्यताओं की ओर ध्यान देना ही नहीं चाहता। इस नाममात्र वर्ग को तो बस अपनी संतुष्टि तथा अपनी इच्छाओं की पूर्ति करने मात्र की ही चिंता है। यह वर्ग इस ओर भी ध्यान नहीं देना चाहता कि उनकी इन हरकतों का नई युवा पीढ़ी पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

आज दुनिया मौसम के बदलते मिंजाज को लेकर कितना चिंतित व परेशान है। इसका कारण मनुष्य द्वारा सही दिशा में आगे बढ़ते हुए विकास के मार्ग तेंजी से तय करना तथा विकास के ही नाम पर होने वाले जंगलों की कटाई, चिमनी से उठने वाले धुएं, प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों की संख्या में प्रतिदिन होने वाला इंजांफा तथा युद्ध से जूझने वाले हालात आदि हैं। इन सभी क्रियाओं के सकारात्मक तथा प्राकृतिक होने के बावजूद इस समय सृष्टि पर ऐसा ंखतरा मंडरा है जिसे ग्लोबल वार्मिंग का नाम दिया जा रहा है। कल्पना कीजिए कि यदि इंसान द्वारा इंसानी रिश्ते स्थापित करने के लिए अप्राकृतिक यौन संबंधों का सहारा लिया गया और वह भी केवल इंसान की संतुष्टि एवं उसकी ंखुशी की ंखातिर तो इस पृथ्वी पर क्या कुछ नहीं घट सकता।

इंसान की इच्छाएं असीम होती हैं। अप्राकृतिक रूप से समलैंगिक संबंध स्थापित करने की इच्छा रखने वाला व्यक्ति अपने यौन सुख की ंखातिर समलैंगिक होने के अतिरिक्त अन्य किसी स्तर तक भी जा सकता है। यदि वह किसी अन्य प्राणी के साथ यौन संबंध स्थापित करना चाहे, तब भी ऐसा इंसान अपने पक्ष में तरह-तरह के तर्क पेश कर सकता है। और यदि भविष्य में ‘बदलते समय’ के नाम पर ऐसे रिश्ते स्थापित किए जाने को भी सामाजिक मान्यता प्रदान कर दी गई तो निश्चित रूप से यह पृथ्वी रहने योग्य नहीं रह जाएगी। ऐसे रिश्ते समाज में कैसे विकार पैदा करेंगे, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

अत: ंजरूरत इस बात की है कि समलैंगिक रिश्तों को ंकायम करने वाले तथा इनकी वकालत करने वाले लोग जो निश्चित रूप से हमारे ही भाई-बहनों के समान हैं तथा हमारे ही समाज के प्रमुख अंग हैं, को इस विषय पर समझाया बुझाया जाए तथा समलैंगिकता के रूप में प्रकट होने वाले मनोरोग रूपी इस लक्षण का समुचित इलाज कराया जाए। ऐसा नहीं है कि समलैंगिकता के पक्ष में सैकड़ों तर्क प्रस्तुत करने वाला यह मुट्ठी भर वर्ग समलैंगिक रिश्तों के बाद मिलने वाले संभावित भयावह परिणामों को समझ नहीं सकेगा। यहां इस विषय पर इस्लामी इतिहास की एक घटना का उल्लेख करना उचित होगा। इस्लामी इतिहास में हंजरत लूत नामक एक पैंगम्बर हुए हैं। कहा जाता है कि एक विशेष क्षेत्र के लोग उनके समय में पुरुषों के मध्य समलैंगिक रिश्ते अत्याधिक स्थापित करते थे। ंखुदा को जब यह बात नागवार गुंजरी तब आकाशवाणी के माध्यम से खुदा ने हंजरत लूत को यह पैंगाम दिया कि वे लोगों को अपनी इस ंगैर ंकुदरती हरकतों से बांज आने को कहें अन्यथा उन्हें ंखुदा के ंकहर का सामना करना पड़ेगा। हंजरत लूत ने ंखुदा का पैंगाम आम लोगों तक पहुंचाया परन्तु आवाम ने पैंगम्बर द्वारा जारी किए गए ंखुदा के हुक्म की अनसुनी कर दी। परिणामस्वरूप उस पूरे क्षेत्र में बड़े-बड़े पत्थरों की भीषण बारिश हुई। ंखुदा के इस अंजाब के बाद लोगों की आंखें खुलीं और उन्होंने अपने दुष्कर्मों से तौबा की।

प्राकृतिक प्रतिक्रया से सम्भवत: बेंखबर दिल्ली उच्च न्यायालय के ंफैसले ने हालांकि समलैंगिकों की हौसलाअंफंजाई की है। परन्तु ऐसा नहीं लगता कि उच्चतम न्यायालय व भारतीय संसद भी दिल्ली उच्च न्यायालय का समर्थन करेगा। समाज तथा सरकार को इस बात की पूरी कोशिश करनी चाहिए कि किसी भी प्रकार से भारत में रहने वाले समलैंगिकों को यह समझाया जा सके कि उनके द्वारा मात्र उनकी यौन संतुष्टि अथवा ंखुशी के लिए उठाया जाने वाला उनका कोई भी ंकदम न केवल प्रकृति विरोधी तथा भारतीय संस्कृति व सभ्यता का विरोधी है बल्कि देश की कर्णधार नई युवा पीढ़ी के भविष्य के लिए भी ऐसी कोशिशें अत्यन्त घातक हैं। निर्मल रानी

महापौर ने शहरी नवीनीकरण मिशन में ग ्वालियर को शामिल किये जाने के लिये क ेन्द्र सरकार को धन्यवाद दिया

महापौर ने शहरी नवीनीकरण मिशन में ग्वालियर को शामिल किये जाने के लिये केन्द्र सरकार को धन्यवाद दिया

ग्वालियर दिनांक 01.07.2009- महापौर विवेक नारायण शेजवलकर द्वारा ग्वालियर नगर को जवाहरलाल नेहरू शहरी नवीनीकरण मिशन जे.एण्ड.एन.यू.आर.एम. के विस्तार में शामिल किये जाने के लिये केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री जयपाल रेड्डी को धन्यवाद दिया है।

श्री शेजवलकर ने आज केन्द्रीय विकास मंत्री को एक फैक्स भेजकर केन्द्र सरकार को ग्वालियर शहर को इस योजना में शामिल करने के लिये धन्यवाद प्रेषित किया। उन्होंने अपने फैक्स भेजकर लेख किया है कि ग्वालियर शहर इस योजना में शामिल हो इस हेतु ग्वालियर की अनेकों सामाजिक, व्यवसायिक संस्थाओं यथा चैम्बर ऑफ कॉमर्स, लॉयन्स क्लब इत्यादि तथा शहर के जनप्रतिनिधियों द्वारा गत अनेक वर्षों से प्रयास किये गये थे। 18 दिसम्बर 2005 को माननीय प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह जी ग्वालियर प्रवास पर उपस्थित हुये थे, उस समय भी ग्वालियर के जनप्रतिनिधि जिनमें ग्वालियर के समस्त पूर्व महापौर तथा मंत्रीगण भी शामिल थे हमें उनसे ग्वालियर को इस योजना में शामिल किये जाने हेतु निवेदन किया था।

श्री शेजवलकर ने माननीय प्रधानमंत्री को भी अपना वादा पूरा करने के लिये धन्यवाद दिया है। नगर निगम महापौर विवेक नारायण शेजवलकर द्वारा ग्वालियर शहर के विकास के लिये लागू किये गये इस मिशन में प्रभारी कार्यवाही करवाने के लिये ग्वालियर चंबल अंचल के सांसदों सर्वश्री श्रीमंत यशोधरा राजे सिंधिया, ज्योतिरादित्य सिंधिया, अशोक अर्गल एवं नरेन्द्र सिंह तोमर, प्रभात झा का भी धन्यवाद ज्ञापित किया है कि उनके द्वारा ग्वालियर शहर के विकास के लिये केन्द्र में पुरजोर वकालत कर ग्वालियर को शहरी नवीनीकरण मिशन में शामिल कराया।

म0प्र0 शासन के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को भी एक धन्यवाद पत्र भेजकर महापौर विवेक नारायण शेजवलकर ने इस मिशन की पैरवी के लिये धन्यवाद देते हुये लेख किया है कि विगत 12 जनवरी 2006 को ग्वालियर के जनप्रतिनिधियों तथा व्यापारिक संस्थाओं प्रतिनिधि मण्डलों के निवेदन पर आपके द्वारा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को जवाहरलाल नेहरू, शहरी नवीनीकरण मिशन में शामिल किये जाने का अनुरोध किया गया। उसी का परिण्ााम है कि आज हमारे सारे प्रयास फलिभूत हुये हैं।

श्री शेजवलकर ने कहा कि शहरी नवीनीकरण योजना में ग्वालियर के शामिल हो जाने से ग्वालियर शहर में विकास के नये रास्ते खुलेंगे तथा ग्वालियर का औद्योगिक विकास भी होगा तथा ग्वालियर की आधारभूत संरचना में लाभदायी परिवर्तन आयेंगे।

क्षेत्र की विकास योजना सभी को साथ ले कर बनेगी-नरेन्द्र सिंह तोमर

क्षेत्र की विकास योजना सभी को साथ लेकर बनेगी-नरेन्द्र सिंह तोमर

Narendra Singh Tomar”Anand” and Rajesh Singh Sikarwar

-राजनैताओं को लोकोपयोगी सेवाओं का निजी उपयोग बर्दाश्त नही

- बिजली संकट का समाधान जुलाई-अगस्त में संभव

-4 जुलाई को होगी शहर विकास पर खुली चर्चा

मुरैना 30 जून 09 आज शहर के प्रतिष्ठित राजश्री होटल में पत्रकारों की खचाखच भरी सभा में पत्रकारों से चर्चा करते हुये मुरैना-श्योपुर क्षेत्र के सांसद श्री नरेन्द्र सिंह तोमर ने कहा कि आज लोकसभा चुनाव के उपरान्त स्थानीय पत्रकारों से मेरी पहली मुलाकात हो रही है। और यहा से भाजपा को विजयी बनाने में सभी का सहयोग व समर्थन प्राप्त हुआ है, जिसके लिये मैं भारतीय जनता पार्टी की ओर से एवं स्वयं अपनी ओर से सभी का हार्दिक धन्यवाद देता हूँ। विशेष रूप से सभी पत्रकार बन्धुओं के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करता हूँ।

श्री तोमर ने बताया कि आगामी 4 जुलाई को प्रदेश के स्थानीय स्वशासन एवं नगरी विकास मंत्री श्री बाबूलाल गौर मुरैना आयेगे। और पत्रकारों से भी चर्चा करेगें। तथा नगरीय विकास पर सभी से खुली चर्चा करेगें। जिससे नगर के विकास का ब्लू प्रिन्ट बन सके। श्री तोमर ने कहा कि 6 जुलाई से पं.श्यामाप्रसाद मुखर्जी के जन्म दिवस से भाजपा का सदस्यता अभियान भी शुरू होगा तथा भाजपा कार्यकर्ताओं द्वारा अपने अपने क्षेत्रों में वृक्षारोपण भी किया जायेगा।

अंचल में व्याप्त बिजली संकट पर पत्रकारों द्वारा प्रश्न पूछे जाने पर श्री तोमर ने बताया कि पानी नही बरसने से पैदा हुये संकट के कारण वर्तमान बिजली समस्या पैदा हो गयी है। और जुलाई अगस्त के महीने तक इस समस्या का निदान हो जायेगा। ईश्वर की कृपा रही तो अच्छी जल वर्षा के उपरान्त भरपूर बिजली उपलब्ध हो सकेगी।

कुछ राजनैतिक बाहुबलियों द्वारा सरकारी लोकोपयोगी सेवाओं जैसे सरकारी हैण्ड पंम्पों में सीेधे मोटर लगाकर अपने घरों में निजी इस्तेमाल किये जाने पर श्री तोमर ने कहा कि कोई भी राजनैतिक दल या बाहुबली या राजनेता इस प्रकार का कृत्य करता है तो वह अक्षम्य है और सामाजिक अपराधी है। मैं इस की निंदा करता हूँ। जब समर्थ लोग गरीबों के हक जैसे पानी पर डाका डालते है तो ईश्वर का भी हृदय काँप जाता है। किसी को भी ऐसा नही करना चाहिये।

संसदीय क्षेत्र के विकास और उन्नति की योजना के सम्बन्ध में श्री तोमर ने कहा कि क्षेत्र के विकास का अनेक पहलुओं और आयामों के संदर्भ में समुचित सुगठित व सुनियोजित परियोजना तैयार की जानी आवश्यक है। इसके लिये सभी पत्रकारों, बुद्धिजीवीयों एवं समाज के सभी वर्गो को साथ बिठालकर चर्चा की जायेगी और पत्रकारों को साथ ले जाकर पूरे क्षेत्र का ब्लू प्रिंन्ट तैयार किया जायेगा एवं क्षेत्र में फै ली विरासतो, ऐतिहासिक संपदाओं का राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में ख्यातिकरण एवं उनका संरक्षण व पर्यटकीय महत्व प्रतिपादन हेतु व्यापक योजना बनाई जायेगी।

बेरोजगार नौजवानों को उचित रोजगार प्राप्त हो तथा काम के अवसर मिले जिससे वें पथ से न भटके इस बात पर विशेष ध्यान दिया जायेगा। इस अवसर पर भारतीय जनता पार्टी के प्रदेशाध्यक्ष क्षेत्रीय सांसद नरेन्द्र सिंह तोमर के अलावा जिला अध्यक्ष नागेन्द्र तिवारी, कृषि उद्योग विकास निगम के अध्यक्ष मुंशीलाल, केदार यादव, गजराज सिंह सिकरवार, डा. जितेन्द्र चतुर्वेदी, वरिष्ठ अभिभाषक रामस्वरूप गुप्ता महेश मिश्रा, पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष हमीर पटेल,महिला मोर्चा अध्यक्षा श्रीमती सुमन कुशवाह, श्रीवल्लभ डण्डोतिया सहित पार्टी संगठन के पदाधिकारी मौजूद थे।

नर्रा रहे मीडिया का टेंटुआ ऐंठा, बिज ली पानी पूरी तरह बन्द, ग्वालियर चम् बल में कोहराम

नर्रा रहे मीडिया का टेंटुआ ऐंठा, बिजली पानी पूरी तरह बन्द, ग्वालियर चम्बल में कोहराम

19 घण्टे तक चैलेन्ज के साथ ठोक के बिजली कटौती, पानी सप्लाई अपने आप ही बन्द

हम अमन चाहते हैं जुल्म के खिलाफ, फैसला गर जंग से होगा तो जंग ही सही !

ग्वालियर/ भिण्ड/ मुरैना/ श्योपुर 16- 27 जून 09 , सरकार से पंगा यानि खुलेआम दंगा ! ग्वालियर चम्बल संभाग में पिछले 1 जून से की जा रही अंधाधुन्ध अघोषित कटौती पर जहाँ आम जनता और वकीलों ने सड़को पर उतर कर आन्दोलन तथा विरोध प्रदर्शन के जरिये भारी भभ्भर मचा रखा था वहीं मीडिया दनादन और धुऑंधार बिजली कटौती के खिलाफ खबरें लगाने में जुटा था !

अंतत: सरकार को जो करना था वह उसने कर डाला, भारत की दो कहावत बड़ी मशहूर हैं एक तो – काला बामन गोरा ….. इसका मतलब और अर्थ म.प्र. वासी इस समय भली भांति समझ रहे हैं दूसरी भैंस पूंछ उठायेगी तो का करेगी…..गोबर ! यानि जित्ती ज्यादा से ज्यादा बिगाड़ने की ताकत होगी बस उत्ता ही बिगाड़ेगी !

ग्वालियर चम्बल वाले इन दिनों इन कहावतों से रोजाना दो चार हो रहे हैं !

बदला बदला बदला, बदला लेना केवल चम्बल वालों का प्रायवेट हक ही नहीं बल्कि सरकार भी इस हक से परिपूर्ण है !

नर्रा रहे मीडिया और आन्दोलन कारीयों को आखिर सबक सिखाते हुये ग्वालियर चम्बल के समूचे जिले में शहरों और गॉवों में सोमवार 15 जून से सरकार ने खासी रणनीति के तहत विशेष कार्यवाही की ! हुआ ये कि चुन चुन कर कुछ चुनिन्दा क्षेत्र विशेषों में बिजली सप्लाई सुबह नियमित बिजली कटौती के साथ रात 1 बजे तक के लिये पूरी तरह बन्द कर दी ! बिजली सप्लाई बन्द होने से पीने का पानी अपने आप ही बन्द हो गया ! और सरकार के कहर से इन पीड़ित क्षेत्र विशेष में बिजली पानी के लिये त्राहि त्राहि मच गयी ! 23 जून से यह बिजली कटौती सबेरे 6 बजे से रात 3 बजे तक कर दी ।

मजे की बात ये रही कि बिजली घर पर जब इस सम्बन्ध में चर्चा की गयी तो बिजली घर वालों का रिरियाते हुये जवाब था कि का करें साब आप तो जानते ही हैं, हम मजबूर हैं ऊपर से जबरदस्ती बिजली काटने का आदेश दिया है, कारो बामन है, बमहनियाई तो दिखावेगा ! बिजलीघर के इस अप्रत्याशित जवाब को हमने रिकार्ड किया है !

कारो बामन तो स्टेट लेवल पर है लेकिन मुरैना मे तो बनियों की सरकार है, प्रभारी मंत्री, संभाग आयुक्त, कलेक्टर से लेकर एस.ई. जे.ई सब बनिये बैठे हैं, ये बनिये कब से बमहिनयाई करने लगे, हम गरजे, वह फिर रिरियाया ! का करें साब हम पर दया रखना, हम मजबूर हैं !

चलो खैर उस गरीब छोटे कर्मचारी से आगे बात करना बेकार था लेकिन यह अनुभव सारे विश्व के साथ शेयर करने लायक जरूर है !

खैर बिजली काटने से हमें नुकसान कम सरकार को नुकसान ज्यादा है , समाचार नहीं प्रकाशित होते तो साली सरकार के नहीं छपते, हमारा आलेख कभी रूकता नहीं, पूरी दम लगा लें तो भी रोक नही सकते !

खैर म.प्र. स्वर्णिम राज्य बनने जा रहा है, पूत के पाँव पालने में नजर आ रहे हैं, जब आप पूरे संभाग में पूरी प्रशासनिक सरकार केवल एक जाति विशेष की बैठा देते हैं तब ऐसा ही होता है, यह हमारा पुराना अनुभव है ! खैर मुरैना की सरकार तो सेठ जी के हाथों में है सो यहाँ जो भी अफसर रहेगा सेठ जी का आदमी ही रहेगा, कोई हैरत की बात नहीं ! पता नहीं कैसे पुलिस विभाग में अभी तक बनिये क्‍यों नहीं भेजे , मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह जी हमारी इल्‍तजा है कि मुरैना पुलिस जो अब तक ठीक ठाक चल रही है, कोई बनिया एस.पी. और सी.एस.पी. तलाश के मुरैना भिजवा दो, दूसरी जाति के अफसर शोभा नहीं दे रहे और ऐसे लग रहे हैं जैसे बगुलों के बीच में हँस घुस बैठे हों । बनिये कलेक्‍टर और कमिश्‍नर यहॉं पहले भी रहे हैं लेकिन सरकार की आजादी से लेकर ऐसी दुर्दशा हमने आज तक नहीं देखी । और हॉं लगे हाथ एकाध बनिये को जिला पंचायत और शिक्षा विभाग में भी भिजवा देना, जिससे बनिया प्रशासन की टेढ़ी नजर इन विभाग पर से हट जाये । बनिया प्रशासन अभी उन्‍हीं विभागों पर कहर ढा रहा है जहॉं बनिये अफसर नहीं हैं ।

अभी प्रभारी मंत्री की पत्रकारवार्ता को गुजरे महज दो हफ्ते ही गुजरे हैं और बिजली कटौती पर प्रभारी मंत्री की पत्रकारों ने 70 फीसदी टाइम तक खिंचाई की ओर मंत्री को बिना जवाब दिये ही पत्रकार वार्ता खत्म करके बिलबिलाते हमने ऑखों से देखा था ! संयोग देखिये कि प्रभारी मंत्री भी बनिया है ! यानि ऊपर से नीचे तक तराजू तनी है !

अब का कहिये – अंजामे गुलिस्तां का होगा, हर जगह तराजू ठुकी हुयी ! तौल के मिलेगी पानी और बिजली, नर्राओगे तो टेंटुआ दाब के कटेगी बिजली और पानी !

बनिया प्रशासन के कारनामों पर हमने पूरी रिपोर्ट तैयार की है और हम जगत को बताने के भारी इच्‍छुक हैं कि कैसे चम्‍बल में इन दिनों हर चीज पर हर सरकारी काम पर सौदेबाजी होती है और भ्रष्‍टाचार का नंगा ताण्‍डव चम्‍बल में चल रहा है, केवल भ्रष्‍टाचार ही नहीं बल्कि कई नंगे सच इस रिपोर्ट में हैं । हमें नहीं लगता कि आपका बनिया प्रशासन इसे छपने देगा , हॉंलांकि इस रिपोर्ट का 70 फीसदी भाग चम्‍बल पर और 30 फीसदी भाग समूचे मध्‍यप्रदेश पर है , हम आपके स्‍वर्णिम मध्‍यप्रदेश के कुछ राज फाश करने के लिये बेताब हैं, कुछ मामले तो तत्‍काल कार्यवाही योग्‍य हैं । बिजली रही तो वायदा है जल्‍दी ही इसकी पूरी श्रंखला छापेंगें भी और कार्यवाही भी करवायेंगें । आप नहीं करोगे तो कोई और करेगा । विष वृक्षों को उखाड़ फेंकना अपना पुराना शौक है । हम इसे उखाड़ फेंकेंगे यह हमारा प्रण है । बिजली नहीं रहे ये दुआ करना, जब तक बिजली नहीं तभी तक टोपी सलामत मानना सेठजी ।

ये भारत का नया संविधान है, नया संस्करण है भईये जहाँ हर अफसर, मंत्री और मातहत बनिया होवेगा, तराजू साथ रखेगा, ठाला बैठा तौल बॉट करेगा, धरजा और मरजा का राग अलापेगा ! ऐसी की तैसी लोकतंत्र की करेगा ! जय श्री राम, जय हिन्द, जय भारत !

जल प्रेम का इतिहास बताती ग्वालियर की बावड़ियाँ

जल प्रेम का इतिहास बताती ग्वालियर की बावड़ियाँ

- देव श्रीमाली

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा ग्रामीण पत्रकारिता विकास संस्थान के अध्यक्ष हैं)

ग्वालियर संगीत की नगरी है । इसी जमीं पर मियाँ तानसेन उर्फ तन्ना मिश्रा ने संगीत का ककहरा सीखा । संगीत सम्राट बने और बादशाह अकबर के नौ रत्नों में शुमार हुए । तोमर राजवंश के महान शासक राजा मानसिंह तोमर ने यहीं पर ‘ध्रुपद’ की रचना की। लेकिन संगीत ही नहीं ग्वालियर के शासकों का प्रेम जल संरक्षण को लेकर भी उतना ही प्रगाढ़ रहा है जितना संगीत के प्रति । इसकी गवाही देने के लिए आज भी ग्वालियर शहर के कोने – कोने पर कहीं जीर्ण शीर्ण तो कहीं ठीक ठाक हालत में मौजूद बावड़ियों के अवशेषों से स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है ।

ग्वालियर बावड़ियों के लिहाज से इतना समृध्द है और इनका निर्माण इतने शानदार स्थापत्य के साथ और कलात्मक तरीके से कराया गया है कि आज के इंजीनियर तक इन्हें देखकर चमत्कृत हो जाते हैं । यही वजह है कि कई बार तो जल संरक्षण से जुड़े लोग कहते हैं कि ग्वालियर को सिर्फ संगीत ही नही बल्कि ” संगीत और बावड़ियों का शहर ” कहा जाना चाहिए ।

दरअसल ग्वालियर का जन्म ही चमत्कारिक जल के जल संरक्षण के प्रयासों के साथ ही हुआ अर्थात ग्वालियर राज्य की नींव ही एक बावड़ी की स्थापना के साथ हुई । ग्वालियर के ऐतिहासिक दुर्ग का निर्माण गोपगिरि पर्वत पर किया गया जो बाद में गोपाद्रि और उसके बाद गोपाचल पर्वत कहलाया । फजल अली के एतिहासिक ग्रंथ – ‘कुलियाते ग्वालियर’ जो कि अकबर के शासन काल में लिखा गया था, मैं ग्वालियर के क्षेत्रीय इतिहास के उपलब्ध फारसी स्त्रोतों में लिखा है – ” विक्रमादित्य के हुकूमत के 332 वर्ष गुजरे थे और हिजरी सन् 332 वर्ष पूर्व एक जमींदार सूरसेन का था, उसने ग्वालियर किले की बुनियाद रखी । उसने प्रथम निर्माण ‘ सूरजकुंड ‘ के रूप में करवाया तथा ग्वालिपा ऋषि के आर्शीवाद से 36 वर्ष राज्य किया । इस मामले को लेकर एक किंवदंती थी इस अंचल में शताब्दियों से प्रचलित है । इसके मुताबिक सूरसेन कोढ़ रोग से पीड़ित था और बड़ा जमींदार होने के बावजूद अपने इस रोग के कारण बहुत दु:खी रहता था । एक बार वह जंगल में भटकते हुए गोपगिरि पर पहुँच गया जहाँ ग्वालिपा ऋषि तपस्यारत थे । प्यास से व्याकुल सूरसेन को देखकर ग्वालिपा ऋषि ने उससे कहा -” बहुत दु:खी और परेशान हो । जाओ सामने के कुण्ड में जाकर हाथ धोकर पानी पी लो ।” ऋषि ग्वालिपा के बताये अनुसार जब वह पास में स्थित छोटे से गड्डे के पास पहुँचा और उसने पानी में हाथ डालकर धोए । पानी पीकर प्यास बुझाने के बाद जब उसकी निगाह अपने हाथों पर पड़ी तो वह एकदम चमत्कृत हो गया । उस करिश्माई जल के स्पर्श से सूरसेन के हाथों का कोढ़ जाता रहा । वह प्रसन्नतापूर्वक ग्वालिपा ऋषि के पास जाकर उनके चरणों में जाकर गिर पड़ा । ग्वालिपा ऋषि ने राज करने का आर्शीवाद दिया । सूरसेन से उस गड्डे पर एक भव्य बावड़ी का निर्माण करके ग्वालियर राज्य की स्थापना की । यह ऐतिहासिक बावड़ी आज भी ग्वालियर दुर्ग में स्थित है जो ”सूरजकुंड ” के नाम से जानी जाती है ।

ग्वालियर दुर्ग परिसर में ही एक और दुर्लभ बावड़ी स्थित है – एक पत्थर की बावड़ी । इस अद्भुत वास्तु कौशल से निर्मित बावड़ी का निर्माण तत्कालीन तोमर शासक डूंगरेंद्र सिंह और कीर्ति सिंह (1394-1520) ने कराया । इसकी खासियत यह है कि इसका निर्माण एक ही पत्थर पर काटकर किया गया है । तात्कालीन शासक जैन धर्मावलंबी थे लिहाजा उन्होनें इसमें भगवान पार्श्वनाथ की पद्मासनस्थ प्रतिमा भी निर्मित कराई। दुर्ग परिसर में स्थित यह स्थल देशभर के जैन धर्मावलंबियों का बड़ा तीर्थ क्षेत्र है ।

इस अंचल के लोगों के जल प्रेम का एक और किस्सा विश्व विख्यात है । यह है ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर और एक गूजरी निन्नी की प्रेम कहानी, जो इतिहास में मृगनयनी के रूप में जानी जाती है । कहा जाता है कि राजा मानसिंह तोमर शिकार के लिए राई गाँव की ओर गये । रास्ते में दो भैंसो की लड़ाई हो रही थी जिससे मार्ग अवरूध्द हो गया। यह लड़ाई देखने के लिए राजा भी खड़े हो गये । पास मे ही गाँव की कुछ कन्याएँ खड़ी थीं, जो कि गूजर समाज की थी । इनमें एक ने आगे बढ़कर भैंस का सींग पकड़कर उन्हें अलग अलग कर दिया । राजा उस गूजरी की बहादुरी और उसके अद्वितीय नैसर्गिक सौंदर्य पर मोहित हो गए । उन्होनें उसे विवाह का प्रस्ताव दिया । लेकिन निन्नी नामक इस गूजरी ने राजा के समक्ष एक शर्त रखी कि वह तभी शादी करेगी जब उसके पीने के लिए सांक नदी का पानी किले में पहुँचे । राजा मानसिंह ने दुर्ग पर एक पृथक महल बनवाया जो आज भी गूजरी महल के नाम से जाना जाता है और राजा मानसिंह ने मृगनयनी नामक अपनी इस रानी को पीने के लिए सांक नदी से महल तक पानी लाने के लिए पाइप लाइन डलवाई थी किले पर उस जल संरक्षण के लिए एक बावड़ी का भी निर्माण भी कराया था । इनके अवशेष अभी भी ग्वालियर दुर्ग के आसपास मौजूद हैं ।

ग्वालियर में मौजूद कुछ पुरातन ऐतिहासिक बावड़ियॉ :-

यूँ तो ग्वालियर शहर के हर हिस्से में बावड़ियों के अवशेष मौजूद है, जिनकी संख्या सैकड़ों में है । इनमें से अनेक नष्ट हो गई । कुछ अतिक्रमण का शिकार हो गई और कई सिकुड़कर कुएँ में तब्दील हो गई ।ऐसी कुछ बावड़ियों की जानकारी को दो भागों में बॉटा जा सकता है :- (क) ग्वालियर दुर्ग की बावड़ियाँ और (ख) शहर में स्थित बावड़ियाँ ।

(क) ग्वालियर दुर्ग

भारत में ऐसे कम ही ऐसे दुर्ग है जहाँ इतनी ऊँचाई पर जल प्रदाय व्यवस्था के सुचारू प्रयास किये गये हों । यहाँ स्थित प्रमुख बावड़ियाँ इस प्रकार हैं :-

सूरजकुंड :- ग्वालियर ऋषि के कहने पर सूरजसेन ने इसको उत्तम सरोवर में तब्दील किया । माना जाता है कि इस कुंड के निर्माण से निकले पत्थरों से ही दुर्ग के लिए दीवारें बनाई गई । मातृचेट ने इसे सुधारा और पुननिर्माण कराया ।

गंगोला ताल :- दुर्ग पर ही स्थित तालनुमा इस बावड़ी का निर्माण 8 वीं सदी में किया गया । इसका नाम राजा मानसिंह कालीन गंगू भगत के नाम पर पड़ा । माना जाता है कि इससे निकले पत्थरों से तेली का मंदिर बनवाया गया ।

ग्वालियर दुर्ग के बारे में इब्नबतूता ने जो अपना यात्रा वृतांत लिखा है कि उसके मुताबिक ”किले के अंदर काफी पानी के हौज हैं । किले की दीवार मिले हुए 20 कुएँ हैं जिनके पास ही दीवार में मजनीक और अरादे लगे हुए हैं ।’ यहाँ मध्य युग में 21 कुएँ, सरोवर और बावड़ियों की मौजूदगी का उल्लेख मिलता है । इनमें से जौहर ताल, तिकोनिया ताल, रानी ताल, चेरी ताल, एक खंबा ताल, कटोरा ताल, नूर सागर अभी भी अवशेष की दशा में मौजूद हैं ।

(ख) ग्वालियर शहर

ग्वालियर शहर में बावड़ियों की भरमार रही है । इनमें से कई का तो अब अता पता ही नहीं है । मसलन बेला की बावड़ी के नाम से ग्वालियर में एक प्रसिध्द स्थान है लेकिन वर्तमान में यहाँ कोई बावड़ी नहीं है । इतिहास में लेख है कि राजा मानसिंह ने बेला की बावड़ी का निर्माण कराया था । राजा वीर सिंह ने भी एक बावड़ी बनवाई थी जिसे कालांतर में बॉध के रूप में विकसित किया गया था । इसको हाल ही में सरकार ने पुन: विकसित किया है जो वीरपुर बाँध के नाम से जाना जाता है ।

सिंधिया राज परिवार के शाही निवास जय विलास पैलेस, ऊषा किरण पैलेस, की चहारदीवारी में रहे कई किलोमीटर लंबे परिसर में, जो अब कालोनियों में तब्दील हो गई हैं में दर्जनों बावड़ियाँ जीर्ण शीर्ण हालत में मौजूद है । ग्वालियर शहर में जनकताल, सागर ताल, गजराराजा स्कूल,कमलाराजा कालेज पुराने हाईकोर्ट के पास, माधौनगर, हिरणवन, शारदा विहार, निम्बाजी की खोह में शानदार स्थापत्य वाली बावड़ियों के अवशेष अभी भी मौजूद हैं । इनमें से कुछ बावड़ियों का जीर्णोध्दार भी किया गया है जो नागरिकों के लिए पेयजल की आपूर्ति कर रही है ।यदि बाकी बावड़ियों को संरक्षित एवं पुनर्जीवित किया जाए तो एक ओर तो ग्वालियर की इन ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण होगा वहीं ये ग्वालियर की पेयजल समस्या से निजात दिलाने में सहायक होंगी ।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा ग्रामीण पत्रकारिता विकास संस्थान के अध्यक्ष हैं)

म.प्र. पी.ई.टी. 2009 का परीक्षा परिणाम घोषित

म.प्र. पी.ई.टी. 2009 का परीक्षा परिणाम घोषित

भोपाल/ मुरैना (ग्‍वालियर टाइम्‍स) 24 जून 09 म.प्र. व्‍यावसायिक प्रवेश परीक्षा मण्‍डल द्वारा आयोजित प्री इंजीनियर टेस्‍ट परीक्षा 2009 पी.ई.टी.- 2009 का परीक्षा परिणाम घोषित कर दिया गया है ।

आज रात 23 जून को 10 बज कर 25 मिनिट पर मण्‍डल द्वारा परीक्षा परिणाम इण्‍टरनेट पर जारी कर दिया गया । रात भर छात्र छात्रायें अपना परीक्षा परिणाम इण्‍टरनेट पर देखते रहे तथा इण्‍टरनेट संचालकों से मोबाइल फोन के जरिये परिणाम पता लगाते रहे । उल्‍लेखनीय है कि विगत 7 जून को पी.ई.टी. की परीक्षा सम्‍पन्‍न हुयी थी ।

राजनीति से लोकनीति, राजनेता से लो कनेता बनाम राजतंत्र से लोकतंत्र- का ंग्रेस की पहल बनाम चिथड़ों से इज्जत ढ ांपने की कवायद

चमचा में गुन बहुत हैं सदा राखिये संग, कांग्रेस रोती फिरे सामन्ती के संग

राजनीति से लोकनीति, राजनेता से लोकनेता बनाम राजतंत्र से लोकतंत्र- कांग्रेस की पहल बनाम चिथड़ों से इज्जत ढांपने की कवायद

नरेन्द्र सिंह तोमर ”आनन्द”

अभी हाल ही में एक खबर पढ़ने में आयी कि कांग्रेस ने राजे रजवाड़े या सामन्ती प्रतीक नाम उल्लेखों के उपयोग पर रोक लगा दी है !

खबर ठीक है, और लगता है कि कांग्रेस देश में आधे अधूरे लोकतंत्र को या राजतंत्र के बदनुमा दागों को साफ कर साफ सुथरा परिपक्व लोकतंत्र लाना चाह रही है ! साधारण बुध्दि के हर व्यक्ति को यही आभास होगा ! मैंने इस पर चिन्तन किया ! मुझे इसलिये भी विचार करना पड़ा कि मेरा खुद का सम्बन्ध भी रजवाड़े से है और यह अलग बात है कि जो असल रजवाड़े या राजपूत हैं वे आमतौर पर किसी भी सामन्ती नामोल्लेख को नहीं करते ! असल राजा और राजवंश अधिकतर न तो आमतौर पर कुंवर, राजा या महाराजा या अन्य ऐसा कुछ लिखते हैं बल्कि सीधे सपाट अपना नाम लिखते हैं ! भारत में राजपूतों व रजवाड़ों में अपने उपनाम को साथ लिखने का सामान्य तौर पर रिवाज है जैसे मैं तोमर हूँ और तोमर राजवंश का प्रतीक उपनाम तोमर जो कि मुझे जन्म से ही मिला हुआ है अब भई इसे मैं कैसे छोड़ सकता हूँ !

अब तोमर राजवंश ने दिल्ली बसाई, महाभारत जैसा महान युध्द लड़ा, इन्द्रप्रस्थ निर्मित किया, महाराजा अनंगपाल सिंह ने दिल्ली में लालकोट बनवाया, लोहे की कील गड़वाई (लौह स्तम्भ) या सूरजकुण्ड हरियाणा में ठुकवा दिया या ऐसाह में गढ़ी बसाई या महाराज देववरम या वीरमदेव ने ग्वालियर पर तोमर राज्य स्थापना की तो इसमें मेरा क्या कसूर है ! अगर पुरखों को पता होता कि सन 2009 में जाकर उनके वंशजों को उनके कुकर्मों का दण्ड भोगना पड़ेगा और अपने होने की पहचान खत्म करना पड़ेगी और तोमर होना या कहलाना एक राजनीतिक दल विशेष के लिये अयोग्यता हो जायेगी या भारतीय जीवनतंत्र में उन्हें बहिष्कृत होना पड़ेगा तो वे काहे को ससुरी दिल्ली बसाते काहे को राज्य संचालन करते काहे को महाभारत लड़ते और काहे को इस भारत की सीमाये समूची एशिया तक फैलाते ! काहे को भगवान श्रीकृष्ण के वसुदैव कुटुम्बकम सिध्दान्त पर अमल कर अमनो चैन का शासन करते !

अब कुछ लग रहा है कि पुरखों ने दिल्ली बसा कर ही गलत कर दिया न दिल्ली होती न देश में टेंशन होता ! दिल्ली की वजह से पूरे देश में टेंशन है ! खैर चलो अच्छा हुआ कि हम किसी सामन्ती लफ्ज का इस्तेमाल नहीं करते, चलो अच्छा है कि हम कांग्रेस में नहीं है, अब तो भविष्य में भी नहीं जाना है, नही ंतो पता चलेगा कि चौबे जी छब्बे बनने गये थे और दुबे बन कर लौट आये यानि रही बची नाक और दुम कटा कर नकटा और दुमकटा भई हमें तो नहीं बनना ! ना बाबा ना ! कतई ना !

खैर यह कोई नई बात नहीं कांग्रेस ऐसे औंधे सीधे काम पहले से ही करती आयी है उसके लिये भगवान श्री राम एक काल्पनिक व्यक्ति थे, महाभारत एक काल्पनिक युध्द था ! होगा भई होगा कांग्रेस के लिये होगा, हमारे तो पुरखों ने लड़ा है सो भईया हम तो मानेंगे, मानेंगे मानेंगे !

चलो हमारी बात हम तक ठीक है वह तो खैर है कि भारत के कुछ राजपूत अपना उपनाम नहीं लिखते जैसे उ.प्र. के कुछ हिस्सों में कई राजपूत महज सिंह लिखते हैं यही हाल कुछ और प्रदेशों में भी है !

मेरे ख्याल से टाइटलिंग अक्सर वे करते हैं जो जनाना चाहते हैं और जताना चाहते हैं कि वे किसी राजघराने से हैं या राजपूत हैं या दो नंबर के राजपूत हैं (दो नंबर के राजपूत- यह राजपूतों का कोडवर्ड है भई इसका अर्थ है गुलाम राजपूत या मीठा पानी या जिनके खानदान में गड़बड़ आ गयी है) या नकली या फर्जी राजपूत जिन्हें बताना पड़ता है कि वे राजपूत हैं या वे कहीं के राजा रहे हैं ! कांग्रेस में कुछ ज्‍यादा ही नकली और फर्जी राजे रजवाड़े हैं जिनका काम स्‍वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों का साथ देना और उनकी चमचागिरी व जी हुजूरी करना ही था (हम नहीं कहते भारत का इतिहास कहता है) इन लोगों ने भारतीय स्‍वतंत्रता सेनानीयों और क्रान्तिकारीयों की अंग्रेजों के साथ मिलकर या उनका साथ देकर हत्‍यायें कीं और देश को आजाद होने में तकरीबन 100 साल (1657 से 1947 तक) लगवा दिये 1 देश के ये गद्दार आज कांग्रेस की ही शान नहीं बल्कि भारत के महान व माननीय हैं , इसीलिये कांग्रेस कहती है कि आजादी की लड़ाई से उसका रिश्‍ता रहा है, हॉं सत्‍य है आजादी की लड़ाई के गद्दारों की फौज उसके पास है । अभी हाल ही में महारानी लक्ष्‍मीबाई का बलिदान दिवस 18 जून को गुजरा, आजादी की लड़ाई से रिश्‍ता बताने वाली कांग्रेस के किसी भी सिपाही को शहादत साम्राज्ञी का नाम तक स्‍मरण करने की सुध नहीं आयी , आखिर आती भी क्‍यों महारानी लक्ष्‍मीबाई का कोई वंशज कांग्रेस में नहीं है , हॉं महारानी लक्ष्‍मीबाई की शहादत जिसके कारण हुयी वह गद्दार जरूर कांग्रेस में है और माननीय एवं कांग्रेस के कर्णधार हैं । आप नहीं जानते तो बता देते हैं कि एक फर्जी रजवाड़ा ऐसा भी है जिसे महारानी लक्ष्‍मीबाई के शहादत स्‍थल पर जाने की इजाजत नहीं है । और कांग्रेस यानि आजादी की लड़ाई वाली कांग्रेस का सच्‍चा सिपाही है । मालुम है क्‍यों …….नहीं तो पता लगा लीजिये । शायद इसीलिये कांग्रेस को भारत के असल इतिहास से चिढ़ है और उसे बार बार बदलने और तोड़ने मोड़ने मरोड़ने की नौटंकी रचती रहती है । उसका वश चले तो भारत का इतिहास पूरी तरह खत्‍म ही कर डाले, यहॉं की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक परम्‍परायें पूरी तरह नेस्‍तनाबूद कर डाले । भगवान राम, भगवान श्री कृष्‍ण, राजा हरिश्‍चन्‍द्र, महाराणा प्रताप सब के सब काल्‍पनिक मिथक हैं 1

हालांकि आज न राजा रहे न रजवाड़े मगर राजा रजवाड़े और राजपूत के नाम पर कई लोग ऐश फरमा रहे हैं, आज तक राज कर रहे हैं ! मौज मार रहे हैं ! अधिकांशत: इनमें फर्जी या नकली राजा हैं ! जिनका राजवंश या कुल गोत्र खानदान या रजवाई से कोई ताल्लुक नहीं रहा ! मगर आज तो जलजला ऐसे नकली राजाओं का ही है !

कुछ उपाधियां या नाम प्रतीक सामन्ती नहीं होते

अब जब बात छिड़ी है तो लगे हाथ बता दें कि कुंवर, राज, श्रीमंत आदि जैसे पूर्व नाम सम्बोधन सामन्ती नहीं हैं ! भारत के हिन्दू समाज में चाहे वह जाति से बनिया हो या चमार हो या भंगी हो या गूजर हो या ब्राह्मण हो या राजपूत हो अपने दामाद या बिटिया के पति को हमेशा ही कुंवर साहब ही कह कर संबोधित करते हैं यहॉ तक कि पूरा गॉंव ही किसी भी जाति के दामाद को कुंवर साहब ही कह कर बुलाता है या गाँव मजरे में बाहर के मेहमान को कुंवर साहब ही कहा जाता है यह एक सम्मान का श्रेष्ठ आदर देने का एक प्रतीक उल्लेख है न कि सामन्ती प्रतीक ! पता नहीं किस बेवकूफ ने कुंवर जैसे नित्य प्रयोगी शब्द को सामन्ती बता दिया ! पहले तो उस बेवकूफ को ढंग से हिन्दी सीखनी चाहिये फिर भारतीय हिन्दू समाज, संस्कार व सभ्यता को जानना चाहिये !

मेरे गाँव में एक युवक है जिसका नाम है कुमरराज या अधिक शुध्द हिन्दी में कहें तो कुंवर राज ! बेचारा गरीब किसान है सबेरे खा ले तो शाम का हिल्ला नहीं ! उसकी तो ऐसी तैसी हो गयी ! इसे तो गारण्टी से जिन्दगी में कांग्रेस में एण्ट्री नहीं मिलेगी ! भारत के गाँवों में हजारों लाखों कुअर सिंह, कुंवर सिंह, कुवरराज भरे पड़े हैं कांग्रेस के लिये ये अछूत हो गये !

श्रीमंत शब्द भी सामन्ती नहीं है भाई ! या तो आप सही हिन्दी नहीं जानते या फिर हिन्दू समाज के बारे में अ आ इ ई नहीं जानते ! हिन्दूओं में किसी को भी श्री लगा कर सम्बोधित करना बहुत पुराना रिवाज है और श्री का अर्थ होता है लक्ष्मी ! श्री और मन्त को मिलाने पर बनता है श्रीमन्त अर्थात लक्ष्मीमन्त या लक्ष्मीवन्त या लक्ष्मीवान यानि अति धनाढय व्यक्ति यानि श्रीमंत बोले तो नगरसेठ !

श्रीमंत शब्द राजा या रजवाड़े का प्रतीक नहीं है बल्कि अधिक पैसे वाले का द्योतक है ! श्रीमंत शब्द ग्वालियर के सिंधिया परिवार के लिये प्रयोग किया जाता रहा है ! और जिसका साफ अर्थ है कि अति धनाढय होने के कारण इस परिवार को श्रीमंत कह कर पुकारा गया न कि राजा या सामन्ती कारणों से !

एक कहानी – नाम में क्या धरा है

एक बहुत पुरानी कहानी है, हिन्दी में है और लम्बे समय तक स्कूलों में पढ़ाई जाती रही है जिसका शीर्षक है – नाम में क्या धरा है ! कांग्रेस को इसे पढ़ना चाहिये !

साथ ही यह भी पढ़ना चाहिये –

जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान !

मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान !!

वैसे मेरे विचार में कांग्रेस शायद कुछ और करना चाहती होगी लेकिन भटक गयी और कर कुछ और बैठी ! कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या सामन्ती प्रतीक या सामन्तीक नामोल्लेख नहीं बल्कि उसके नेताओं का सामन्ती रवैया एवं आचरण है ! उसके पास नेता कम और चमचे ज्यादा हैं ! उसके जो चन्द नेता हैं उन्हें रूआब जमाने और चमचे पालने का खासा शौक है ! कांग्रेस में टिकिट तक किसी न किसी की चमचागिरी से ही मिलता है ! और उसका नेता जो कि अपने खास व अंधे चमचे को टिकिट दिलाता है ! पॉच साल तक उसके चुन लिये जाने के बाद भी उसे नेता नहीं बनने देता बल्कि चमचा बनाये रखता है और अपने दरवाजे पर ढोक बजवाता है !

ग्वालियर चम्बल में आप जैसे ही कांग्रेस टिकिटों की बात करते हैं तो हर चुनाव में पत्रकार पहले ही अखबारों में संभावित नाम उछाल देते हैं और कांग्रेस के उम्मीदवार बता देते हैं ! क्या आप बता सकते हैं कि ऐसा कैसे होता है ! ग्वालियर चम्बल के पत्रकार इसका अधिक सटीक उत्तर दे सकते हैं, पत्रकार अपनी पैमायश का फीता योग्यता या निष्ठा या पात्रता के आधार पर नहीं बल्कि चमचागिरी के आधार पर तय करते हैं और यह जान लेना बड़ा आसान है कि कौन कितना बड़ा चमचा है ! जो जितना बड़ा चमचा उसकी दावेदारी उतनी ही अधिक मजबूत !

जो चमचा है वह नेता कैसे हो सकता है , चमचा तो सदा चमचा ही रहेगा वह नेता कभी नहीं बन सकता, इसलिये अभी तक ग्वालियर चम्बल में कांग्रेस नेता पैदा नहीं कर सकी ! चमचों को नेता बनाना एक असंभव काम है ! जो कांग्रेस से बाहर रहे वे नेता बन गये ! हाल के विधानसभा और लोकसभा चुनाव परिणाम इसका स्पष्ट जीवन्त उदाहरण हैं !

कांग्रेस को सही मायने में लोकतंत्र लाना है तो सामन्ती प्रतीक या नामोल्लेखों के पचड़े से दूर अपने नेताओं के सामन्ती आचरण व व्यवहार से छुटकारा पाना होगा, चमचे पालने वाले नेताओं को हतोत्साहित करना होगा ! चमचे हटेंगे तो नेता अपने आप आ जायेंगे ! नेता किसी का चमचा नहीं हो सकता, नेता चाहिये तो चमचे खदेड़िये ! नेताओं के सामन्ती आचरण व व्यवहार को सुधारिये ! फिर आपको जरूरत ही नहीं पड़ेगी तथाकथित नाम प्रतीक उल्लेखों को रोकने की ! चमचे ढोक बजाना बन्द कर देंगें तो कांग्रेस का खोया रूतबा लौट आयेगा ! वरना गालिब दिल बहलाने को खयाल अच्छा है !

चमचा में गुन बहुत हैं सदा राखिये संग , सदा राखिये संग, काम बहुत ही आवें !

गधा होंय बलवान प्रभु भगवान बचावे, डाके डाले पापी जम के कतल करावे !!

चरणन चाटे धूल, चमचा महान बतावे, खुद ही जावे भूल मगर सबन को गैल बतावे !!

राम प्रसाद विस्मिल : 18 जून को मनाया जायेगा अमर शहीद रामप्रसाद विस् मिल का जन्म दिन

राम प्रसाद विस्मिल : 18 जून को मनाया जायेगा अमर शहीद रामप्रसाद विस्मिल का जन्म दिन

सरफरोशी की तमन्‍ना अब हमारे दिल में है …

मुरैना 15 जून 2009/ गोली और बोली तथा डकैतों के लिए कुख्यात चम्बल अंचल को अमर शहीद रामप्रसाद विस्मिल की पितृभूमि के नाम से भी जाना जाता है । उनके पितामह नारायण सिंह तोमर मुरैना जिले के ग्राम बरवाई में रहा करते थे । गरीबी से तंग आकर वे ग्राम बरवाई को छोड़कर शाहजहांपुर जाकर बस गये । उनके ज्येष्ठ पुत्र मुरलीधर के यहां क्रांति के अमर सपूत रामप्रसाद का जन्म 18 जून 1897 (ज्येष्ठ शुक्ल 11 सम्बंत 1954 )को हुआ । उनकी मां का नाम मूलमती देवी था । उनके जन्म दिन को यादगार दिवस के रूप में मनाने के लिए 18 जून 2009 को ग्राम बरवाई में भव्य समारोह का आयोजन किया जायेगा ।

अमर शहीद रामप्रसाद विस्मिल के हृदय में परमानंद भाई के प्रभाव में आने पर देश भक्ति के भाव जागृत हुए । लाहौरकांड में परमानंद भाई को फांसी की सजा दी गई । उसी समय रामप्रसाद विस्मिल ने ब्रिटिश राज्य का नाश करने की प्रतिज्ञा ली और चाकू, लाठी, भाला , पिस्तौल आदि चलाना सीखा । उन्होने अपना क्रांति दल बनाया । मैनपुरी षडयंत्र में उनका वारंट जारी हुआ । गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्होंने चम्बल के बरवाई में आकर रहना शुरू कर दिया । क्रांति दल ने अंग्रेज राज्य का धन लूटने की योजना बनाई और रामप्रसाद विस्मिल की अगुआई में 9 अगस्त 1925 को काकोरी के पास रेल रोक कर ब्रिटिश सरकार का धन लूट लिया । इससे ब्रिटिस सरकार दहशत खा गई और काफी प्रयासों के बाद क्रांति के अमर सपूत रामप्रसाद विस्मिल को गिरफ्तार करने में सफल हुई । 19 दिसम्बर 1926 को गोरखपुर की जेल में उन्हें फांसी दी गई । मुरैना जिले के ग्राम बरवाई में उनकी याद को चिर स्थाई बनाने के लिए स्मारक बना हुआ है ।

ग्वालियर किले के मंदिर शैलोत्की र्ण प्रतिमाएं व चैत्य गुफाएँ -श्रीम ती राजबाला

ग्वालियर किले के मंदिर शैलोत्कीर्ण प्रतिमाएं व चैत्य गुफाएँ

-श्रीमती राजबाला

दिल्ली से 318 किलोमीटर व आगरा से मात्र 110 किलोमीटर दक्षिण में आगरा-मुम्बई राष्ट्रीय मार्ग पर ऐतिहासिक शहर ग्वालियर है, जिसके माथे पर मुकुट की भांति विराजमान ग्वालियर किला जनमानस के बीच कौतूहल का सबब रहा है। मुस्लिम इतिहासकार हसन निजामी ने अपनी पुस्तक ताजुल – मसअर में किले को हिन्दुस्तान के तमाम किलों की मणिमाला में प्रमुख मोती निरूपित किया है। ग्वालियर का उल्लेख पौराणिक गाथाओं में भी मिलता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ग्वालियर किले का अस्तित्व हजारों वर्ष पुराना है। मध्य युगीन काल के प्रतिहारी कच्छपघाती शासकों तत्पश्चात, तोमर वंशी राजाओं के शासन काल में हुए कला एवं सांस्कृतिक विस्तार ने ग्वालियर किले को नई पहचान दी। किले पर जहाँ भारतीय स्थापत्य की दृष्टि से विलक्षण भव्य महल हैं, वही हिन्दू व जैन मंदिर एवं शैलोत्कीर्ण गुफाएँ भी बेमिसाल हैं । हालांकि आज अधिकांश मंदिर व मूर्तियां यवन आक्रान्ताओं की क्रूरता की मूक साक्षी बनी कालजयी हस्ताक्षर सी भग्नावेशों के रूप में विद्यमान है।

ग्वालियर किला जिस पर्वत पर स्थित है उसे गोपाचल पर्वत कहते हैं। विभिन्न अभिलेखों में गोपाचल पर्वत के अन्य नामों का भी उल्लेख मिलता है मसलन गोपगिरि, गोप पर्वत, गोपाद्रि व गोपचन्द्र गिरीन्द्र। जैन मनीषियों के लिये गोपाचल पर्वत एक पवित्र धर्म स्थली है, जहां प्रतिवर्ष महावीर जयन्ती के पावन अवसर पर हजारों श्रध्दालुओं का जमावड़ा होता है। आठवीं से दसवीं शताब्दी में मध्ययुगीन प्रतिहारी कछवाहा (कच्छपघात) शासकों के शासन काल के दौरान वैष्णव, शैव व जैन धर्मों को फलने-फूलने का मौका मिला। तब ग्वालियर का स्वर्णिम युग था ।इस अवधि में स्थापत्य के क्षेत्र में सर्वाधिक सुन्दर व महत्वपूर्ण निर्माण हुये । चतुर्भुज मंदिर, तेली का मंदिर व सासबहू का मंदिर आज भी पर्यटकों के लिये आकर्षण का केन्द्र है।

चतुर्भुज मंदिर

चतुर्भुज मंदिर दौ सौ फुट ऊंचे पहाड़ी चट्टान पर बना है जो एक पहाड़ी को ऊपर से नीचे की ओर काटकर बनाया है। मंदिर मे लगे शिलालेख के अनुसार मंदिर का निर्माण 876-877 ई. में कन्नौज के शासक मिहिर भोज के शासन काल में नियुक्त कोटपाल अल्ल के निर्देशन में बनवाया गया । मंदिर के गर्भगृह में चतुर्भुजी विष्णु भगवान की स्थानक (खड़ी) मूर्ति है । गर्भगृह के सामने स्तम्भों पर टिके मुख्य मंडप की छत के नीचे श्रीकृष्ण की लीलाएं उकेरी गई हैं । स्तम्भों पर कलश, कबूतर, घंटियां, देवी-देवताओं व पशुओं की आकर्षक आकृतियां उत्कीर्ण हैं । यह शैलोत्कीर्ण मंदिर उस समय का शिल्प की दृष्टि से अनूठा प्रयोगवादी निर्माण था । किले पर बने अन्य हिन्दू मंदिरों की तुलना में चतुर्भुज मंदिर दो महत्वपूर्ण भिन्नताएं लिये हैं । एक तो यह मंदिर उत्तर भारतीय आर्य शैली में बना सम्भवत: प्राचीनतम मंदिर है व दूसरा इस मंदिर के गर्भगृह में लगे शिलालेख में विश्व की प्रथम जीरो यानि शून्य का उल्लेख है । मंदिर का मूल शिखर आक्रांताओं द्वारा नष्ट कर दिया गया था जिसे बाद में चूने द्वारा संधारित किया गया है ।

सास-बहू का मंदिर

सास-बहू का मंदिर किले के दक्षिणी भाग में पास-पास बने दो सहस्त्रबाहु मंदिर हैं जो आज सास-बहू का मंदिर नाम से विख्यात हैं । यहां लगे शिलालेख के अनुसार इन देवालयों का निर्माण सन् 1093 ई. में पालवंश के राजा महिपाल कछवाहा द्वारा करवाया गया था । जनश्रुति के अनुसार उन्होंने बड़ा विष्णु मंदिर अपनी माता और समीप बने छोटे मंदिर को अपनी शिवभक्त पत्नी को समर्पित किया था । संभवत: इन्हीं कारणों से सहस्त्रबाहू मंदिर का नाम सास-बहू का मंदिर होकर रह गया ।

गुर्जर शैली में बना यह मंदिर 12 फुट की जगती (चबूतरा) पर निर्मित किया गया है जो 100 फुट लम्बा, 63 फुट चौड़ा व 70 फुट ऊंचा है । मध्य में विशाल मंडप है, जिसकी छत चारों कोनों पर बने खम्भों पर आधारित है । मुख्य मंडप के तीन ओर लघु मंडप हैं तथा चौथी ओर गर्भगृह है । मंडप की छत में आकर्षक कलाकृतियां अंकित हैं । मंदिर की बाहरी व भीतरी दीवारों को तक्षण कला से सज्जित किया गया है । छोटा मंदिर यानि बहू का मंदिर मुख्य मंदिर के मुकाबले छोटा है व इसका वास्तु शिल्प भी अपेक्षाकृत साधारण है ।

मुख्य मंदिर का शिखर टूट चुका है । वर्तमान में इन देवालयों में कोई मूर्ति नहीं है । इन मूर्तियों को यवन हमलावरों ने नष्ट कर दिया था ।

तेली का मंदिर

समूचे उत्तर भारत में द्रविड़ आर्य स्थापत्य शैली का समन्वय यहीं ग्वालियर किले पर तेली मंदिर के रूप में देखने को मिलता है । इस मंदिर का वास्तविक नाम तैलंग या तैलंगाना मंदिर रहा होगा । जो बदलते समय के साथ बिगड़ कर तेली का मंदिर कहलाने लगा । लगभग सौ फुट की ऊंचाई लिये किले का यह सर्वाधिक ऊंचाई वाला प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर के निर्माण को लेकर इतिहासकार एकमत नहीं है किन्तु अधिकांश विद्वानों का मत है कि इसका निर्माण कन्नौज के राजा यशोवर्मन ने सन् 750 ई. में करवाया था ।

गंगोलाताल के समीप बना यह मंदिर विशाल जगती पर स्थापित है । शिखर ऊपर की संकरा एवं बेलन की तरह गोलाई लिये हुये है । मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व की ओर है । भीतर आयताकार गर्भगृह में छोटा मंडप है । निचले भाग में 113 लघु देव प्रकोष्ठ हैं जिनमें देवी-देवताओं की मान्य प्रतिमाएें थीं । मंदिर के चारों ओर की बाह्य दिवारों पर विभिन्न आकार प्रकार के पशु-पक्षी, फूल-पत्ते, देवी-देवताओं की अलंकृत आकृतियां हैं । कहीं-कहीं आसुरी शक्तियों वाली आकृतियां एवं प्रणय मुद्रा में प्रतिमाएॅ भी अंकित हैं । प्रवेश द्वार के एक तरफ कछुए पर यमुना व दूसरी तरफ मकर पर विराजमान गंगा की मानवाकृतियां हैं । आर्य द्रविड़ शैली युक्त इस मंदिर का वास्तुशिल्प अद्वितीय है । मंदिर के शिखर के दोनों ओर चैत्य गवाक्ष बने हैं तथा मंदिर के अग्रभाग में ऊपर की ओर मध्य में गरूढ़ नाग की पूंछ पकड़े अंकित है ।

उत्तर भारतीय अलंकरण से युक्त इस मंदिर का स्थापत्य दक्षिण द्रविड़ शैली का है । वर्तमान में इस मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है । पर दरअसल यह एक विष्णु मंदिर था । कुछ इतिहासकार इसे शैव मंदिर मानते हैं । सन 1231 में यवन आक्रमणकारी इल्तुमिश द्वारा मंदिर के अधिकांश हिस्से को ध्वस्त कर दिया गया था । तब 1881–1883 ई. के बीच अंग्रेज हुकमरानों ने मंदिर के पुरातात्विक महत्व को समझते हुये मेजर कीथ के निर्देशन में किले पर स्थित अन्य मंदिरों, मान महल(मंदिर)के साथ-साथ तेली का मंदिर का भी सरंक्षण करवाया था । मेजर कीथ ने इधर-उधर पड़े भग्नावशेषों को संजोकर तेली मंदिर के समक्ष विशाल आकर्षक द्वार भी बनवा दिया । द्वार के निचले हिस्से में लगे दो आंग्ल भाषी शिलालेखों में संरक्षण कार्य पर होने वाले खर्च का भी उल्लेख किया है ।

वर्तमान में मंदिर का केवल पूर्वी प्रवेश द्वार है। मूल मंदिर को दिल्ली के सुलतानों के शासन काल में ध्वस्त कर दिया गया था । हालांकि बाद में ब्रिटिश काल में हुये मरम्मत से मंदिर का मूल स्वरूप नष्ट हो गया है, फिर भी मेजर कीथ मंदिरों के संरक्षण कार्य का बीड़ा उठाने के लिये साधुवाद के पात्र हैं ।

माता भगवती का मंदिर

माता भगवती का मंदिर सूरज कुंड के पूर्वी किनारे पर स्थित है जो 12 वीं शताब्दी का प्रतिहार युगीन सप्तरथी मंदिर है । वर्तमान में मंदिर का वेदिबंध व जंघा का भाग ही शेष है । प्रवेश द्वार व शिखर बाद में बनाये गये हैं ।

वर्धमान मंदिर

वर्धमान मंदिर जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर वर्धमान अर्थात महावीर जी का मंदिर है । इसका निर्माण आठवीं सदी में आम नामक दिकपाल की पत्नी ने जैन मुनि आचार्य बप्प भट्ट सूरी के निर्देशन में किया था । गुर्जर शैली का तीन मंजिला यह भवन 50 फुट ऊंचा व 100 फुट लम्बा था । जैन साहित्य के अनुसार मंदिर में ठोस सोने की वर्धमान की प्रतिमा थी जो आताताईयों द्वारा लूट ली गई । सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद किले पर अंग्रेजों का आधिपत्य हो गया । यहां अंग्रेजी सैनिकों के लिये परेड मैदान बना दिया गया था । वर्तमान में इस मंदिर के प्रांगण में सिंधिया स्कूल का खेल मैदान है ।

शैलोत्कीर्ण शिल्प एवं जैन प्रतिमाएं

भारतीय इतिहास में पत्थरों पर आकृतियां उकरने की कला शैलोत्कीर्ण शिल्प लगभग बाइस सौ वर्ष पुराना है । ग्वालियर किले में विभिन्न स्थानों पर हिन्दू देवताओं व जैन धर्म के तीर्थंकरों की मूर्तियां किले की चट्टानों को काट / तराश कर बनाई गई हैं । किले पर पाई जाने वाली शैलोत्कीर्ण शिल्प को हम दो वर्गों में बाँट सकते हैं। प्रथम वर्ग में 9 वीं शताब्दी में प्रतिहार शासनकाल में मंदिरो के अलावा हिन्दू देवी देवताओं की चट्टानों पर उकेरी गई मूर्तिंयाँ हैं । दूसरे वर्ग में पंद्रहवीं शताब्दी में तोमर शासन काल में जैन धर्मावलम्बियों द्वारा विभिन्न आकार प्रकार की पद्मासन एवं खड्गासन मुद्रा में चट्टानों पर उकेरी गई जैन मूर्तियाँ एवं गुफाएँ है । प्रथम वर्ग की मूर्तियाँ किले पर स्थित लक्ष्मण द्वार एवं हथियापौर के बीच दाहिनी ओर चट्टान को काटकर विशाल शिव के भद्रावतार की मूर्ति है जिसमें गजासुर का वध करते हुए दिखाया गया है । मूर्ति का अधिकांश हिस्सा यवन आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट कर दिया गया था । इसके आगे आयताकार आले में विष्णु एवं सूर्य की स्थानक मूर्तियाँ हैं तथा उमा महेश्वर (पार्वती एवं शिव) की युगल मूर्ति पद्मासन मुद्रा में है । इन मूर्तियों को विशिष्ट अलंकृत शैली में चट्टान पर उकेरा गया है। इनके अलावा महिषासुर मर्दिनी की मूर्तियाँ एवं शिवलिंग उत्कीर्ण है । इसी प्रकार चतुर्भुज मंदिर तथा लक्ष्मण द्वार के मध्य में चट्टानों को काटकर बनाए गये आले में गणेशजी की मूर्ति है । आले की दीवार में संस्कृत में गणेश जी की स्तुति अंकित है । आले के ऊपर दोनों ओर शिव, पार्वती व कुबेर आदि की मूर्तियाँ बनी है । वर्तमान में अधिकांश मूर्तियाँ खण्डित अवस्था में हैं ।

जैन प्रतिमाएँ

दूसरे वर्ग की तोमर वंशी काल खंड में बनी जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरों की विशालकाय से लेकर छोटी- बड़ी कई प्रतिमांएँ हैं । ग्वालियर किले पर छ: अलग -अलग स्थानों पर पहाड़ी चट्टानों को काटकर लघु आकार वाले चैत्य गुफा मंदिर बनाए गये हैं । जैन तीर्थंकरों की ये सभी मूर्तियाँ भारतीय शैलोत्कीर्ण मूर्तिशिल्प का श्रेष्ठ उदाहरण हैं । साथ ही यहाँ के जैन चैत्य गुफा समूह उत्तर भारत में उपलब्ध इस परम्परा के संभवत: अंतिम उदाहरण भी । जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों को उनके पाद-पाठ पर बने खास चिन्हों से पहचाना जा सकता है । जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर की मूर्ति के नीचे बैल की आकृति है । पार्श्वनाथ जी की मूर्ति के पाद आधार पर सर्प की आकृति अंकित है । शंख चिन्ह वाली बाइसवें तीर्थंकर नेमिनाथ भगवान की मूर्तियाँ हैं तथा सिंह चिन्ह वाली चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी की मूर्ति है ।

गोपाचल पर्वत के पूर्वी भाग में एक पत्थर की बावड़ी समूह में छब्बीस चैत्य गुफाएँ हैं जिनमें तीर्थंकरों की स्थानक व आसनानस्थ मूर्तियाँ हैं । ये सभी मूर्तियाँ चट्टानों को काटकर बनाई गई हैं । प्रतिमाओं के पाद पाठ पर शिलालेख भी खुदे हुए हैं । सबसे बाईं तरफ एक पत्थर की बावड़ी है । गुफानुमा प्रवेशद्वार वाली इस बावड़ी की छत को पत्थर के स्तम्भों से टिकाया गया है, जो एक ही चट्टान को काटकर बनायी गयी है । गुफा समूह की दाँई तरफ छब्बीसवीं गुफा में प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की 57 फुट ऊँची विशाल प्रतिमा है जो ऍधेरी गुफा में एक ही चट्टान काटकर अन्दर -अन्दर बनाई गई है जिसे देखकर शिल्पियों के धैर्य एवं लगन का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है । इस गुफा समूह का निर्माण काल पंद्रहवीं शताब्दी का है । अब इस गुफा समूह तक पहुँचने के लिए पहाड़ी को काटकर 50 सीढ़ियाँ बनाई गई हैं ।

किले पर स्थित सभी जैन चैत्य गुफा समूहों में एक पत्थर की बावड़ी चैत्य गुफा समूह सबसे बड़ी है । जिसमें विभिन्न आकार प्रकार की छोटी बड़ी लगभग पन्द्रह सौ जैन प्रतिमाएं हैं। इस गुफा समूह में चट्टान को काटकर बनाई विशाल पत्थर की बावड़ी में आज भी भरपूर पानी है । सम्भवत: पानी की उपलब्धता के चलते जैन मुनि यहाँ तपस्या करते होंगे । कालांतर में यह स्थल धार्मिक स्थल के रूप में पूजा जाने लगा । एक ऐसा ऐतिहासिक दौर आया जब आक्रमणकारियों ने इन प्रतिमाओं को तहस -नहस करने का प्रयास किया । फिर काल क्रम में इनकी गुमनामी का लम्बा अरसा निकल गया ।देश की आजादी के भी कई वर्ष बाद एक पत्थर की बावड़ी गुफा समूह की सुध ली गई । स्थानीय जैन मतावलम्बियों खासकर श्री अजीत बरैया जो श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र गोपाचल पर्वत संरक्षक न्यासके प्रमुख हैं ने इसके जीर्णोध्दार में विशेष भूमिका निभाई । श्री बरैया विगत दो दशकों से इस पवित्र स्थल को हराभरा व रमणीय बनाने के प्रयास में जुटे हैं । जिसका सुफल है कि आज जैन समाज यहाँ आकर श्रध्दा भाव से पूजा पाठ करता हैं ।

दूसरे समूह की मूर्तियाँ किले पर स्थित नूरसागर के पास बड़ी चट्टान को काटकर बनाई गई है । इन गुफाओं में जैन तीर्थंकरों की पद्मासन व खड्गासन मुद्रा में कई प्रतिमांएँ है। गुफा चैत्य के आखिरी सिरे पर बारह फुट ऊँची नेमिनाथ भगवान की खड्गासन प्रतिमा है जो पत्थर के स्तम्भों पर टिके देवालय में स्थापित है । देवालय की छतों व दीवारों पर उनके जन्म से लेकर निर्वाण तक के कथानकों को उत्कीर्ण किया गया है । ये सभी 8 वीं से 10 वीं सदी में निर्मित की गई हैं ।

तीसरे समूह की मूर्तियाँ उरवाई गेट के समीप किले के पश्चिमी भाग में 20 फुट की ऊँचाई पर चट्टानों को तराश कर बनाई गई हैं । जैन तीर्थंकरों की ये मूर्तियॉ कार्योत्सर्ग एवं ध्यान मुद्रा में हैं । सभी मूर्तियों का निर्माण पंद्रहवीं शताब्दी में तोमरवंशी शासक डूंगर सिह के शासन काल में हुआ था । उरवाई गेट के समीप ही बावन गजा मूर्ति समूह की सत्तावन हाथ ऊँचाई वाली भगवान आदिनाथ की प्रमुख प्रतिमां है । यह 20 फुट ऊँचे व 20 फुट चौड़े कक्ष में पहाड़ को काटकर उत्कीर्ण की गई है । किले की जैन प्रतिमाओं में यह सबसे ऊँची प्रतिमा है । उरवाई द्वार के बाहरी भाग में त्रिशला समूह की जैन मूर्तियाँ है जिसमें चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी की माता त्रिशला की मूर्ति लेटी हुई मुद्रा में है ।इस गुफा समूह में भगवान महावीर के जन्म कथानक को कलात्मक ढंग से उत्कीर्ण किया गया है ।

उत्तर पश्चिम दिशा में ढोंढापौर के समीप बने गुफा समूह में कई जैन मूर्तियॉ हैं जो लगभग 50 फुट की ऊँचाई पर अन्दर ही अन्दर कक्ष बनाकर एक ही चट्टान को काटकर निर्मित हैं ।

ग्वालियर का किला जहां सामरिक दृष्टि से खास महत्व रखता था वहीं किले पर बने मदिर व जैन प्रतिमाएं विविधता में एकता व सभी धर्मों का सम्मान करने वाले उस समय के भारतीय समाज को भी दर्शाता है । साथ ही ये हमारे गौरवशाली अतीत और कला वैभव का भी द्योतक है ।

इति।

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