महाझूठे शिवराज सिंह के खस्ताहाल म ध्यप्रदेश में बिजली कटौती फिर सिर चढ़ कर बोली

संभागीय मुख्यालय पर 16 घंटे और जिला मुख्यालयों पर 20 घंटे की बिजली कटौती
मुरैना 27 दिसंबर 12, स्वर्णिम म.प्र. बनाने का पिछले चार साल से दावा और वादा कर रही म.प्र. की शिवराज सिंह सरकार के बुरी तरह खस्ताहाल मध्यप्रदेश में पिछले एक हफ्ते से बिजली कटौती का कहर टूट पड़ा है । विकास और प्रगति के मामले में घुटनों पर रेंग रही म.प्र. की सरकार जब सन 2003 में सत्ता आई तो महज एक महीने के अंद 24 घंटे बिजली देने का वायदा करके आई । मगर हालात का आलम ये है कि भाजपा की सरकार को सत्ताम में आये पूरे 10 साल गुजर गये 24 घंटे बिजली देना तो दूर आठ घंटे भी बिजली आज तक म.प्र. को मयस्सर नहीं करा पाई ।
सन 2008 के विधानसभा चुनावों में शिवराज सिंह चम्बल में पोरसा एवं जौरा की चुनावी सभाओं में वायदा करके गये थे कि पिछले 5 साल में हम आपको बिजली नहीं दे पाये लेकिन अब मेरा वायदा है कि अब अगर मेरी सरकार बनी तो मैं आपको 24 घंटे बिजली दूंगा , पोरसा की सभा में शिवराज सिंह ने यह वायदा किया कि अगर अबकी बार बरसात अच्छी हुयी तो मैं आपको 24 घंटे बिजली दूंगा , संयोगवश उस साल बहुत अच्छी वारिश हो गयी , बांघ ओवरफुल हो गये काफी पानी बांधों को खोलकर बाहर निकालना पड़ा तो चार पॉंच महीने बाद जौरा में हुयी शिवराज सिंह ने पलटी मारते हुये कहा कि अगर अबकी बार मेरी सरकार बनी तो आपको 24 घंटे बिजली दूंगा , संयोगवश शिवराज सिंह की सरकार भी बन गई तो अगले महीने ही शिवराज सिंह ने बयान दिया कि मैं क्या करूं केन्द्र कोयला ही नहीं दे रहा , मैं प्रदेश को बिजली कैसे दूं , इसके बाद जब केन्द्रीय कोयला मंत्री ने म.प्र. में आकर बयान दिया कि जितना चाहिये उतना कोयला लो , कोयले की कोई कमी नहीं है , पैसा दो और कोयला लो , तब उसके अगले महीने से शिवराज सिंह ने कहना शुरू किया कि केन्द्र घटिया कोयला दे रहा है , मैं क्याऔ करूं प्रदेश को बिजली कैसे दूं , इसके कुछ समय बाद शिवराज सिंह ने कहा कि सबके फीछर अलग अलग किये जा रहे हैं , फीछर अलग अलग होते ही प्रदेश को 24 घंटे बिजली दूंगा । फीडर भी अलग अलग कर दिये गये प्रदेश में कटिया डालना भी सन 2010 में ही बंद करा दिया गया, हाईटेंशन लाइनें सीधे हर घर तक डाल कर घर घर में मीटर टांग दिये गये बिजली के बिल आठ गुना तक बढ़ा दिये गये , दिग्विजय सिंह के शासनकाल में जिन घरों में बिजली का बिल 200 रूपये आता था उन घरों का बिजली का बिल 2000 रूपये महीने से भी ऊपर आने लगा मगर बिजली फिर भी प्रदेश को मयस्सर नहीं हुयी ।
हाल ये है कि अब तासे शिवराज सिंह के पास कोई बहाना भी नहीं बचा , अगले साल सन 2013 में फिर विधानसभा चुनाव है , सुनने में आ रहा है कि अब शिवराज सिंह चुनाव के ऐन वक्त पर प्रदेश को 24 घंटे बिजली देंगें , सवाल यह है कि दस साल तक म.प्र. को खून के ऑंसू रूला देने वाले शिवराज सिंह को दस महीने चुनाव काल में बिजली देने का जनता पुरूकार देगी या दंड । यह देखने की बात होगी कि पत्ते पत्ते पर गुलांटी खाने वाले, महज घोषणायें करने और लगातार दनादन झूठ बालने शिवराज सिंह को प्रदेश की जनता अबकी बार पुन: सत्तासीन करेगी या सत्ता से बाहर धकेल कर सदा सर्वदा के लिये राजनीति से बाहर कर देगी ।

फुस्स फटाखा रामदेव और खोखले बांस से मेरा टेसू झईं अड़ा का सुर आलापते अन्ना

फुस्स फटाखा रामदेव और खोखले बांस से मेरा टेसू झईं अड़ा का सुर आलापते अन्ना
नरेन्द्र सिंह तोमर ‘’आनन्दे’’
भाग-1
अभी फेसबुक पर अन्ना और रामदेव कांडों के सारे सिलसिले चलते कुछ मजेदार रोचक बातें जहॉं उभर कर सामने आयीं वहीं देश का नेतृत्व संभाल रहे जिम्मेवार आला नेताओं के भी जोरदार बयान आये, बयान युद्ध से लेकर अनशन संग्राम तक इस देश को पूरा एक लाइव टी.वी. सीरीयल देखने को मिला, देश ने बड़ी तसल्ली से पूरा टी.वी. सीरीयल देखा, सारे पात्रों की गजब की एक्टिंग भी देश ने देखी, सेंसर्ड सीन भी देखे तो अनसेंसर्ड भी जमकर देखा । हॉट बदनाम मुन्नी , हॉट शीला की जवानी भी देखने में आयी तो हॉट आइटम बॉय भी खूब देखने को मिले, कुल मिला कर मल्टी कास्ट मल्टी स्टार मल्टी मसाला फिल्म जनता को फोकट में देखने को मिली, जिसका हर सीन हर पल रोमांच और रोमांस से भरपूर फुल सस्पेन्स से रचा सना था ।
इधर अन्ना ने अपनी तुरही जंतर मंतर पर फूंकी उधर व्यायाम गुरू रामदेव का तन मन डोलने लगा और तमन्नायें बल्ली बल्ली उछल कर अंगड़ाईयां मारने लगीं । पूरी तरह बर्फ में लगी भाजपा को तलाशे तलाशे कोई मुद्दा नहीं मिल रहा था उसके हाथ भी जैसे अलाउद्दीन का चिराग लग गया और लगी दनादन घिसने कि ओये जिन्न निकल, ओये जिन्न निकल , इस सबके दरम्यां केन्द्र सरकार के पहलवान एक एक कर अखाड़े में उतरते रहे और बिना कपड़े उतारे बल ठोकते रहे, कुल मिला कर नतीजा ये निकला कि अन्ना के पहले आंदोलन पर गिड़गिड़ा कर नतमस्तक हुये केन्द्र सरकार के पहलवानों ने चारों खाने चित्तह होकर सारे अखाड़े का ऐसा तिया पांचा एक किया कि वो भूल गये कि वे सरकार हैं ।
भूल गये कि देश में संसद कहीं है, उन्हें ख्याल ही नहीं रहा कि जंतर मंतर पर जो हो रहा है वो इस देश के लिये , इस देश के संविधान के लिये, लोकतंत्र के लिये खुला चैलेंज है, देश में एक बागी जंतर मंतर पर अपने गिरोह को लेकर देश के लोकतंत्र को, देश की संसद को, भारत की जनता द्वारा चुनी गयी संसद को और सरकार को खुली बगावत कर खुली चुनौती दे रहा है, इससे देश का समूचा संसदीय लोकतंत्र, समूची संवैधानिक व्यवस्था और देश का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जायेगा, सरकार ने उसकी और उसके गिरोह की मांगें मान लीं । एक साझा मसौदा समिति गठित कर डाली, अब यह साझा मसौदा समिति किस कानून के तहत या संविधान के किस अनुच्छेद के तहत गठित हुयी ये देश में किसी को भी नहीं पता यहॉं तक कि खुद सरकार को भी नहीं पता ।
सरकार के इस कदर नैतिक रूप से गिरते ही राजनीतिक सपने और ख्वातबों में खोये व्यायाम बाबा की तमन्नाओं को पंख मिल गये और एक ऊंची राजनीतिक परवाज की ओर उनका दिल मचलने लगा, रामदेव की इस हवाई परवाज में आर.एस.एस. और भाजपा ने जम कर हवा भर दी, रामदेव फूल कर गुब्बारा हो गये ।
पूरी सुनियोजित योजना के तहत रामदेव ने दिल्ली में अपना आलीशान 5 स्टार तम्बू रामलीला मैदान में सजा दिया और बाबा का ढाबा का बोर्ड मीडिया ने टांग दिया, बाबा फूल फूल कुप्पा हुये जा रहे थे, मीडिया भाजपा और आर.एस.एस. बाबा की सारी पंक्चर भूल भुला कर दनादन पंपिंग मार मार कर हवा भरने में लगा था , बाबा ने रणनीति के तहत सरकार से बात शुरू की अनपेक्षित रूप से सरकार ने बाबा की सारी मांगें मान लीं और 500 या 1000 के नोट बंद किये जाने की मांग अव्यवाहारिक होने से बातचीत से बाहर कर दी, अब कायदा यह कहता था कि रामदेव समस्या उठाने के साथ समाधान भी साथ लेकर जाते और अपना समाधान सरकार को सुझाव के रूप में सौंपते , मगर रामदेव के पास केवल समस्यायें थीं, समाधान कोई नहीं था ।
कालेधन की बात करते करते रामदेव भूल गये कि जिस काले धन का जिकर वे कर रहे हैं वह धन है कहॉ वो तो खुद रामदेव को भी नहीं पता, फिर भी रामदेव बोले कि 400 लाख करोड़ का कालाधन है जो विदेश में जमा है, रामदेव से सरकार पूछना भूल गयी कि रामदेव ये जो 400 लाख करोड़ धन है जिसका तुम्हें पता है और हमें नहीं पता, जरा उसका पता तो दो कि वह किस बैंक में किस किस खाते में किस किस देश में जमा है जरा खाते नंबर और बैंक का नाम एवं देश का नाम तो बताओ तो लाओ हम कल से ही पड़ताल शुरू करते हैं और कालाधन वापस लाते हैं , सरकार की इस मूर्खता भरी चूक का बहुतों ने फायदा उठाया और सबने कालेधन के बारे में अपने अपने मनगढ़न्त आंकड़े बताने शुरू कर दिये कोई बोला 3000 करोड़ है कालाधन तो कोई बोला कि 50 हजार करोड़ रूपये का कालाधन है …..
क्रमश: जारी .. अगले अंक में

म.प्र.में बिजली सप्लाइ ठप्प : चंबल में बिजली कटौती फिर सिर चढ़ कर बोली ……….

म.प्र.में बिजली सप्लाइ ठप्प : चंबल में बिजली कटौती फिर सिर चढ़ कर बोली ……….
मुरैना 29जून 2011 । मुरैना एवं भिण्डम जिला में प्रतिदिन की जा रही साढ़े सात घण्टेा की डिक्लेहयर्ड बिजली कटौती के बाद अब भीषण गर्मी के मौसम में अतिरिक्तभ बिजली कटौती का चम्बिल संभाग के निवासियों को और अधिक सामना करना पड़ रहा है ।
आजकल जहॉं रात में शाम 5 बजे से रात 12 बजे तक की अतिरिक्त बिजली कटौती की जा रही है वहीं इस भीषण गर्मी में प्रात: साढ़े पांच बजे से काटी गयी बिजली कटौती इस समाचार के लिखे और प्रकाशित किये जाने के वक्‍त तक समूचे चंबल संभाग में बिजली कटोती जारी है । वर्तमान में शहर में बिजली का शट डाउन चल रहा है । उल्लेखनीय है कि चम्बंल के ६५ फीसदी ग्रामीण क्षेत्र में बिजली है ही नहीं वहीं जहॉं हैं वहॉं दो दिन छोड़ कर महज ४ घण्टेट के लिये मात्र बिजली दी जा रही है । ऐन भीषण गर्मी में की जा रही अनाप शनाप भारी बिजली कटौती से जनता में भारी रोष व आक्रोश व्याप्तब हो गया है । स्मकरणीय है मुरेना शहर चम्बल संभाग का संभागीय मुख्यावलय है । इस दरम्याान बिजली घर का शिकायत दर्ज कराने का फोन नंबर ०७५३२- २३२२४४ सहित सभी अधिकारीयों एवं कर्मचारीयों के फोन बन्दक चल रहे हैं जो कि हरदम बिजली शट डाउन करने से पूर्व आउट ऑफ क्रेडल एवं स्विच आफॅ कर लिये जाते हें ।

आखिर दिल्‍ली तक पहुँच ही गया तोमर का बेटा, बसपा और कांग्रेस की सोशल इंज ीनियरिंग ध्‍वस्‍त

भारत की एक प्राचीन कहावत है कि ‘’ लौट के दिल्‍ली तोमर की’’ इस कहावत के परिप्रेक्ष्‍य में तोमर राजपूतों को पहली बार विधिवत दिलली जाना आखिर नसीब हो ही गया है, मुरैना संसदीय सीट पर न केवल तोमर राजपूतों का बल्कि क्षेत्र के अन्‍य सभी राजपूतों और राजपूत समर्थक अन्‍य जातियों व समुदायों की यह हार्दिक इच्‍छा थी कि तोमर दिल्‍ली तक कैसे भी पहुँचें । सबकी तमन्‍ना आखिर नरेन्‍द्र सिंह तोमर की जीत के साथ पूरी हो गयी, चम्‍बल घाटी में तोमर की जीत से भारी उत्‍सव व हर्ष का माहौल है । लोकतंत्र के इस महारण में पहली बार क्षेत्र में एक विचित्र व अदभुत जातिगत ध्रुवीकरण हो गया था , परिणामत: किसी भी अन्‍य राजपूत ने तोमर के विरूद्ध फार्म नहीं भरा और खुल कर तोमर को जी जान से खुद ही जिता दिया , जनता ने चुनाव और प्रचार की कमान खुद ही संभाल ली और करके दिखा दिया ।

लोक सभा निर्वाचन- 2009 : संसदीय निर्वाचन क्षेत्र 01 मुरैना के परिणाम

क्र.

नाम प्रत्याशी

01 श्योपुर

02 विजयपुर

03 सबलगढ़

04

जौरा

05 सुमावली

06

मुरैना

07 दिमनी

08 अम्बाह

डाक मत

कुल योग

1

जुगल किशोर पिप्पल

900

927

489

778

626

719

617

481

0

5537

2

नरेन्द्र सिंह तोमर

29623

27757

30832

38268

45579

26271

48595

53670

52

300647

3

बलवीर सिंह डंण्डोतिया

9916

9485

16974

18879

23533

20689

19401

23195

1

142073

4

एङ बैजनाथ कुशवाह

1884

5817

8481

6179

5180

2090

1666

832

0

32129

5

रामनिवास रावत

31718

36874

32841

19662

20621

32400

13553

11977

4

199650

6

अनीता हितेन्द्र चौधरी

610

629

302

200

165

188

133

150

0

2377

7

देवेन्द्र सिह सिकरवार

184

279

195

435

77

87

101

162

0

1520

8

रामबाबू सिंह परिहार

170

219

71

55

66

112

45

68

0

806

9

विशनलाल अग्रवाल

156

208

78

86

43

111

71

65

0

818

10

उत्तम सिंह मित्तल

169

220

102

160

56

42

63

65

0

877

11

ऊषा रावत

175

279

85

81

43

71

63

76

0

873

12

कलावती रमेश अर्गल

578

968

317

267

198

188

222

239

0

2977

13

गन्दर्व

169

241

115

103

70

74

92

94

0

958

14

जोगेन्द्र

238

335

153

159

100

119

143

178

0

1425

15

धल्लू(अल्लाबक्स)

328

407

151

205

147

242

148

216

0

1844

16

नरेन्द्र सिंह

660

881

250

218

189

241

203

284

0

2926

17

महेश जाटव

261

405

126

110

96

95

89

141

0

1323

18

महेश सिंह जाटव

307

409

221

243

211

167

194

300

0

2052

19

राजवीर सिंह

470

744

442

422

269

279

325

487

0

3438

20

रामनिवास कुशवाह

195

228

172

167

80

94

87

78

0

1101

21

रामसेवक

312

314

207

178

102

128

105

109

0

1455

22

विजय कुमार

164

235

114

99

52

68

90

94

0

916

23

विवेक आपटे

230

439

181

177

86

97

141

183

0

1534

24

सत्येन्द्र जैन शम्मी

274

377

153

150

89

113

90

164

0

1410

योग-

79691

88677

93052

87281

97678

84685

86237

93308

57

710666

भाजपा के नरेन्द्र सिंह तोमर अपने निकटतम कांग्रेस के रामनिवास रावत से 100997 मतों के अन्तर से विजयी ।

फर्जी अफवाह फैलाने पर न्‍यूज चैनल के खिलाफ मामला, आयोग का नोटिस

मुरैना में मतदान के दौरान बसपाईयों का उपद्रव, जम कर गोलीबारी और गुण्‍डागर्दी मचाई, तीन घायल

बसपाई गुण्‍डों का भाजपाईयों पर कहर, जम कर चलाईं गोलींयां

फर्जी अफवाह फैलाने पर न्‍यूज चैनल के खिलाफ मामला, आयोग का नोटिस

दिमनी अम्‍बाह विधानसभाओं में अफवाहें फैलाकर बदली मतदान की दिशा

सुमावली विधानसभा में लज्‍जाराम ने किये पोलिंग कैप्‍चर  

अतर सिंह डण्‍डोतिया (संवाददाता एवं फोटोग्राफर ग्‍वालियर टाइम्‍स)

इस समाचार के फोटो एवं वीडियो वेबसाइट पर देखें तथा आई बी.एन. जोश 18 का वीडियो देखने हेतु यहॉं क्लिक करें

मुरैना 30 अप्रेल, छिटपुट घटनाओं को छोड़ मुरैना संसदीय क्षेत्र में आमतौर पर मतदान शान्तिपूर्ण व निर्विघ्‍न संपन्‍न हुआ ।

मुरैना संसदीय क्षेत्र के अम्बाह, सुमावली और दिमनी विधानसभा क्षेत्रों के कुछ मतदान केंद्रों पर राजनीतिक दलों के कार्यकर्ताओं के बीच झड़प और बूथ पर कब्जा करने की कोशिशों के दौरान हुई फायरिंग में तीन लोग घायल हो गए।

सुमावली विधानसभा क्षेत्र के कासपुरा मतदान केंद्र पर भारतीय जनता पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच हुई झड़प में बीएसपी समर्थकों की ओर से चली गोली से बीजेपी के मतदान एजेंट सरनाम सिंह सिकरवार घायल हो गए। सिकरवार को मुरैना के जिला अस्पताल में दाखिल कराया गया है।

इसी विधानसभा क्षेत्र के गुडाचंबल गांव में बीएसपी के समर्थकों ने सूबेदार सिंह नामक व्यक्ति को गोली मार दी। सूबेदार को उपचार के लिए ग्वालियर भेजा गया है। आरोपियों ने परिवार के दो अन्य सदस्यों पर भी धारदार हथियार और लाठी से हमला कर उन्हें घायल कर दिया।

इसी संसदीय क्षेत्र के अम्बाह विधानसभा क्षेत्र के सबसुखकापुरा मतदान केंद्र पर पुलिस द्वारा की गई फायरिंग में एक व्यक्ति के घायल होने की सूचना है। गोली लगने से जख्मी विश्वनाथ सिंह तोमर को मुरैना जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

मुरैना के ही दिमनी विधानसभा क्षेत्र के किशनपुर, कीरतपुर मतदान केंद्रों पर पुलिस और उपद्रवियों के बीच फायरिंग होने की खबर मिली है। पुलिस ने यहां मतदान केंद्र पर कब्जा करने की उपद्रवियों की मंशा को नाकाम कर दिया।

रैन बसेरा पर ई.वी.एम. हुयी खराब

शहर मुरैना सिंगल बस्‍ती स्थित रैन बसेरा मतदान केन्‍द्र पर करीब एक घण्‍टे मतदान रूका रहा, ई.वी.एम. मशीन खराब हो गयी थी 1 जिसे बाद में ठीक कर मतदान चालू हुआ ।

सबसुख का पुरा में पुलिस ने मारी गोलीयां

दिमनी विधानसभा क्षेत्र में सबसुख का पुरा मतदान केन्‍द्र पर भाजपा के मतदाताओं पर किसी दीक्षित नामक बसपा समर्थक पुलिस कर्मी ने अंधाधुन्‍ध फायरिंग कर दीं और तकरीबन 20- 25 फायर किये तथा विश्‍वनाथ सिंह तोमर पुत्र महाराज सिंह तोमर जो कि मतदान करने गया था, को पुलिस थानेदार दीक्षित ने मतदान से रोका जब वह वोट डालने के लिये वहीं खड़ा रहा तो दीक्षित ने उसके पैरों में गोलीयां मार दीं तथा 20 – 25 फायर किये, फरियादी की हालत नाजुक है । मुरैना जिला चिकित्‍सालय में भर्ती है ।

गलेथा मोतीपुरा में बसपाईयों ने भाजपा एजेण्‍ट को गोली मारी

सुमावली विधानसभा के मोतीपुरा गलेथा मतदान केन्‍द्र पर कांसपुरा के बसपाईयों हरिजन व ऋषीश्‍वर ब्राह्मणों ने सैकड़ा संख्‍या में धावा बोल कर मतदान कैप्‍चर हेतु जम कर गोलीयां चलाईं, पथराव किया और मतदान केन्‍द्र पर मतदान एजेण्‍टों को मारा पीटा तथा भाजपा के एजेण्‍ट सरनाम सिंह सिकरवार पुत्र गुलाब सिंह सिकरवार को गोली मार दी, जिससे वह घायल हो गया और जिला चिकित्‍सालय मुरैना में नाजुक हालत में भर्ती है ।

सत्‍यप्रकाश को हाकीयों से फोड़ा

सत्‍यप्रकाश शर्मा निवासी मुरैना भाजपा का मतदाता था, उसे केशव कालोनी के ब्राह्मणों ने मतदान नहीं करने दिया और हाकीयों से फोड़ दिया वह जिला चिकित्‍सालय मुरैना में नाजुक हालत में भर्ती है ।

नरेन्‍द्र सिंह तोमर और शिवमंगल सिंह तोमर घायलों से मिले

मुरैना जिला चिकित्‍सालय में सभी घायलों से मिलने राष्‍ट्रीय जनता दल के नेता नरेन्‍द्र सिंह तोमर और दिमनी विधान सभा के विधायक शिवमंगल सिंह तोमर मिलने गये और घायलों से बातचीत कर घटनाओं का विस्‍तृत ब्‍यौरा लिया ।

बसपाईयों ने हर हथकण्‍डा अपनाया

चुनाव येन केन प्रकारेण जीतने के लिये बसपा नेताओं ने हर ओछा बड़ा हथकण्‍डा इस्‍तेमाल किया । जहॉं कई बसपा कार्यकर्ता केवल अफवाहें फैलाने के काम में लगे रहे और एक अफवाह यह भी फैला दी कि भाजपा पार्षद अनिल गोयल अल्‍ली को भाजपा प्रत्‍याशी नरेन्‍द्र सिंह तोमर ने चॉंटा मार दिया है । जबकि यह अफवाह सरासर गलत सिद्ध हुयी जब खुद अनिल गोयल अल्‍ली ने इसका खण्‍डन किया और बताया कि नरेन्‍द्र सिंह तोमर से उनकी भेंट सबेरे से नहीं हुयी है और ऐसा कभी हो ही नहीं सकता । कुछ लोग इसे कांग्रेसीयों की शरारत बता रहे हैं । दूसरी अफवाह एक न्‍यूज चैनल के मार्फत फैलवाई गयी और न्‍यूज चैनल ने सबेरे से ही फर्जी खबर प्रसारित करना शुरू कर दी कि मुरैना में रोरियापुरा में दलितों को वोट डालने से रोका गया है । यह खबर भी सरासर फर्जी थी और वीडियो फुटेज जाली थे । लिर्वाचन आयोग के आदेश पर दो न्‍यूज चैनलों को इस फर्जी खबर के प्रसारण से निर्वाचन प्रभावित करने और मिथ्‍या साक्ष्‍य गढ़ने, और उनका उपयोग करने के सम्‍बन्‍ध में आपराधिक प्रकरण दर्ज किये जाने हेतु नोटिस जारी कर दिये हैं । वहीं बसपाईयों ने हर उपद्रव में हरिजनों को साथ रखा जिससे मौका पड़ने पर हरिजन एक्‍ट का उपयोग किया जा सके ।

कांग्रेसियों ने भी अपनाये हथकण्‍डे

दिमनी व अम्‍बाह विधानसभा क्षेत्रों में कुछ कांग्रेसी शराब के नशे में धुत्‍त होकर गालियां बकते और रूतबा बघारते हुये मतदान केन्‍द्रों पर घूमे तथा स्‍वयं को भाजपा प्रत्‍याशी नरेन्‍द्र सिंह तोमर का कार्यकर्ता बताते हुये कहा कि उन्‍हें मुफ्त शराब और लड़कियां मिलीं है तथा हर मतदाता को उन्‍होंने 250 रू. नरेन्‍द्र सिंह तोमर की तरफ से बंटवाये हैं, और मॉं बहिन की गालियां बकते हुये मतदाताओं से कहा कि तोमर को वोट देना । लोगों ने चिढ़कर इसके बाद तोमर के बजाय कांग्रेस को वोट देना शुरू कर दिये । यह किस्‍सा दिमनी विधानसभा के गोठ गॉंव के मतदान केन्‍द्र पर हमने ऑंखों से देखा ।

सुमावली विधानसभा के एक मतदान केन्‍द्र पर एक कांग्रेसी नेता लज्‍जाराम पाराशर ने सबेरे से ही मतदान केन्‍द्रों पर कब्‍जे कर लिये और नंगी तलवार और कुल्‍हाड़ी लेकर बैठा रहा तथा उसने न तो ब्राह्मणों को न गूजरों को और न दलितों को मतदान केन्‍द्र पर आने दिया, तथा कई गॉंवों में जाकर मतदाताओं को धमका आया कि अगर वोट डालने आये तो काट डालेगा ।

आग लगाऊ दिग्विजय सिंह की सभाओं में सरकार भेजती है फायर ब्रिगेड

आग लगाऊ दिग्विजय सिंह की सभाओं में सरकार भेजती है फायर ब्रिगेड
चुनाव चर्चा-3
नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’
आज के अखबारों में खबर छपी है हालांकि खबर का शीर्षक तो दुखद है लेकिन खबर के भीतर जो खबर है वह काफी हैरत अंगेज है, कम से कम मैं तो इसे पढ़ कर चौंक ही गया । खबर भिण्‍ड जिले के एक गॉंव के बारे में हैं, कल भिण्‍ड जिला में एक गॉंव आग लग गई तकरीबन 20 घर पूरी तरह जल कर खाक हो गये, सरकारी आकलन के मुताबिक 15 लाख का माल मशरूका जल कर भस्‍म हो गया ।
वैसे तो इन गर्मी के दिनों में एक तो विकट गर्मी के कारण हर चीज सूख कर ईंधन बन जाती है ऊपर से गर्म हवा की लपटों से जरा सी चिंगारी भी विकराल रूप धारण कर लेती है । हर साल अकेली चम्‍बल ही गर्मीयों में करीब 1 से 7-8 करोड़ रू का नुकसान आग से झेलती है । कई वजह से आग लगती है, कभी बिजली के शॉर्ट सर्किट से तो कभी सिगरेट बीड़ी के ठूंठ से तो कभी चूल्‍हे या बरोसी से उड़े तिलंगों से । चिंगारी से भड़कने वाली यह आग कभी ज्‍वाला बन जाती है तो कभी समूचे गॉंव या खेत खलिहान को भस्‍म कर डालती है । मैं जब छोटा सा था तब से अब तक यह आग देखता आ रहा हूँ हर साल लगती है और सैकड़ों किसानों ( कई जगह के ग्रामीण तो भूमिहीन होकर केवल पशुपालन या अन्‍य लोगों के खेतों में मजदूरी पर ही आश्रित हैं) व ग्रामीणों का सब अन्‍न दाना , कपड़ा लत्‍ता सब लील जाती है । मुझे लगता था कि मैं कुछ बना तो जरूर गरीब ग्रामीणों की इस समस्‍या के लिये कुछ न कुछ करूंगा । खैर चलो हम तो बन नहीं पाये लेकिन जो लोग बने उन्‍होंने कभी गरीब ग्रामीणों के इस आपत्ति काल व आकस्मिक समस्‍याओं के बारे में कभी नहीं सोचा, उन्‍हें अपनी वी.आई.पी. जिन्‍दगी से नीचे इस आम जिन्‍दगी की ओर झांकने का मौका तक नहीं मिला ।
किसी नेता या पत्रकार के लिये एक गॉंव का आग में स्‍वाहा हो जाना या लाखों करोड़ों का नुकसान हो जाना महज एक समाचार हो सकता है लेकिन एक गरीब किसान या ग्रामीण जो कि साल भर की पूरी मेहनत के साथ अपने पूरे घर गॉंव को जल कर भस्‍म होते देखता है, तो उसकी ऑंखों के ऑंसू थमने का नाम नहीं लेते और चन्‍द पलों के भीतर वह राजा से रंक हो जाता है । और मालिक से मजदूर बन जाता है, साल भर के पेट पालन के लिये न जाने क्‍या क्‍या बेचने और गिरवी धरने पर मजबूर हो जाता है । यहॉं तक कि बहू बेटियों की अस्‍मत भी । किसी नेता या किसी पार्टी ने हर साल गरीब ग्रामीणों पर आने वाली इस तयशुदा विपदा के लिये न कभी डायजास्‍टर मैनेजमेण्‍ट चलाया न इसके लिये कोई राहत कोष ही कभी स्‍थापित किया ।
किसान आयोग बनाने और खेती किसानी को मुनाफे को धन्‍धा बनाने या उद्योग का दर्जा देने की बात करने वाले सब इस मुद्दे से अनजान, बेपरवाह और खामोश है । किसान का घर जलना तो जैसे आम बात है , उफ शर्म शर्म शर्म ….
मुझे लोगों के लॉंक (फसल का ढेर गॉंवों में लॉंक कहा जाता है) के साथ साल, रोजी रोटी और सपनों को जिन्‍दा जलते देखने का अवसर कई बार मिला है । मुझे तकलीफ होती है । हर खबर जैसे मुझे झिंझोड़ देती है ।
आज भिण्‍ड के बारे में खबर अखबारों में आयी तो तकलीफ हुयी, भिण्‍ड से मेरा बहुत पुराना गहरा नाता है, पूरी प्रायमरी तक पढ़ाई लिखाई मुझे भिण्‍ड में ही नसीब हुयी वहीं सन्‍त कुमार लोहिया जैसा आदर्श गुरूओं की शिष्‍यता मुझे प्राप्‍त हुयी उनके आशीर्वाद और वरद हस्‍त ने मुझे ज्ञान और विवेक से परिचित कराया, राकेश पाठक (नई दुनिया के सम्‍पादक) प्रवीर सचान (इसरो के वैज्ञानिक) से लेकर विदेशों में सेवायें दे रहे बड़े बड़े वैज्ञानिक और इंजीनियर भारत की उच्‍च स्‍तरीय सेवाओं में पदस्‍थ कई अनमोल मित्र भी मुझे भिण्‍ड से ही मिले । आगे चल कर ससुराल भी भिण्‍ड ही बन गयी । संयोगवश लोकसभा चुनाव भी मैंने भिण्‍ड से ही लड़ा ।
भिण्‍ड में डॉं रामलखन सिंह (वर्तमान सिटिंग सांसद) के विरूद्ध मुझे लोकसभा का चुनाव लड़ने का मौका किला, उनका भी सांसदी का वह पहला चुनाव था मेरा भी यह पहला अवसर था । फर्क यह था कि वे भाजपा के बैनर पर थे हम पैदल थे । बाद में आगे चलकर डॉ. रामलखन सिंह भी हमारे रिश्‍तेदार बन गये ।
डॉं. रामलखन सिंह के हवाले से अखबारों में छपा है कि गॉंव में आग लगने की खबर उन्‍होंने प्रशासन को दी लेकिन प्रशासन ने कहा कि फायर ब्रिगेड उपलब्‍ध नहीं हैं, भिण्‍ड जिला में म.प्र. के पूर्व मुख्‍यमंत्री औंर कॉंग्रेस के राष्‍ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह की सभायें हो रहीं हैं सो फायर ब्रिगेड दिग्विजय सिंह की सभाओं में गयीं हैं ।
मुझे इस खबर से झन्‍नाटा लगना था सो लगा । दिग्विजय सिंह की सभाओं में फायरब्रिगेड भेजना मुझे कुछ अजीबो गरीब सा लगा । या तो हमारे डॉं. साहब झूठ बोल रहे हैं सरासर झूठ या फिर यह सच है तो हैरत अंगेज है ।
क्‍या दिग्विजय सिंह उमा भारती की तरह फायर ब्राण्‍ड नेता हैं जो आग लगाते फिरते हैं, सो सरकार को उनके संग हर सभा में फायर ब्रिगेड भेजनी पड़ती है ।
खैर भाजपाई सोच सकते हैं सोचो सोचो …गालिब दिल बहलाने को ख्‍याल अच्‍छा है । यूं सोचो कि दिग्विजय सिंह जहॉं जाते हैं वहीं आग लगा आते हैं, जिसे बुझाने के लिये भाजपाईयों को दिन रात एक करके हफ्तों तक पसीना बहा कर पानी छिड़कना पड़ता है । और राजा हैं कि मानते ही नहीं, छेड़ना, ऊंगली करना, आग लगाना, खिला खिला कर मारना ये सब दिग्विजय सिंह की बहुत पुरानी आदतें हैं । और तो और आदमी एक बार आग लगा कर भाग जाये तो भी बात बने मगर दिक्‍कत ये है कि राजा रोज आ धमकते हैं और हनुमान जी जैसी पूंछ पसार कर कभी यहॉं तो कभी वहॉं आग लगा देते हैं, कहॉं कहॉं बुझायें कैसे कैसे बुझायें वाकई टेंशन है । भाजपा के लिये दिग्यिजय सिंह आग लगाऊ मशीन बन गये हैं । ज‍हॉं जाते हैं वहीं गड़बड़ कर देते हैं ।
लगता है भाजपा ने राजा का तोड़ खोज लिया है, इसलिये दिग्विजय सिंह की हर सभा में फायर ब्रिगेड भेजना शुरू कर दी है । अब भईया किसी गॉंव शहर में कहीं आग लगे तो फायर ब्रिगेड के बजाय राजा दिग्विजय सिंह को फोन लगायें जिससे कम से कम फायर ब्रिगेड तो पहुँच जायेगी । मैं तो कहता हूँ कि फोन डायरेक्‍ट्री में फायर ब्रिगेड का नंबर बदल कर राजा साहब का नंबर छाप देना चाहिये । अब भईया मेरे तो राजा साहब से भी अच्‍छे ताल्‍लुक हैं, उनके साथ काम करने का मौका भी मिला है, कभी मौका मिला तो उन्‍हें चिट्ठी लिखकर अवगत करा दूंगा कि अपना नंबर फायर ब्रिगेड में छपवा दीजिये । वैसे तो इस आलेख को वे इण्‍टरनेट पर वे पढ़ ही लेंगें उनके साथ और भी कई हाईप्रोफाइल पढ़ कर उनका नंबर फायर ब्रिगेड में डलवा ही देंगें ।
सिर उठाने लगा राजस्‍थान का मीणा गूजर मुद्दा
राजस्‍थान के गूजर मीणा संग्राम से लगभग सभी भारतवासी अवगत ही हैं, मुरैना से कांग्रेस प्रत्‍याशी रामनिवास रावत भी जाति से मीणा हैं । आज रावत ने अपनी मदद के लिये राजस्‍थान से नमो नारायण मीणा को बुलवाया हैं । उधर रावत के मीणा वाद से मुरैना के गूजर नेता भड़क गये हैं, गूजर वोटो पर अब तक आस टिकाये रामनिवास के लिये चम्‍बल के गूजर समुदाय से खतरे की घण्‍टी बजने लगी है । और रही सही गूजर वोट की आस भी जाती खिसकती नजर आने लगी है ।
गूजर पहले से ही कांग्रेस द्वारा मीणा (राम निवास रावत) को यहॉं टिकिट देने से खफा चल रहे थे अब खुल कर बोलने भी लगे हैं । हालांकि राजस्‍थान मुद्दे की बात गूजर केवल अपनी जाति समुदाय के बीच करते हैं लेकिन आम जनता में बड़ा अलग ही तर्क दे रहे हैं, उनका तर्क है कि – मुरैना सामान्‍य सीट है या आरक्षित, अगर आदिवासी (चम्‍बल के गूजर चम्‍बल के मीणाओं को आदिवासी कहते हैं) ही वोट देना है तो फिर इस सीट को समान्‍य कराने की जरूरत क्‍या थी ।
मैं गूजरों के ऐसे ओछे तर्कों से सहमत नहीं हूँ भई चम्‍बल में मीणा आदिवासी नहीं बल्कि पिछड़े वर्ग में आते हैं, राजस्‍थान की बात राजस्‍थान तक ही रहने दीजिये, और रामनिवास को भी राजस्‍थान से जातिवादी नेता इम्‍पोर्ट नहीं करना चाहिये थे ।

भिण्‍ड विधायक हत्‍या काण्‍ड – गालिब दिल बहलाने को ख्‍याल अच्‍छा है

भिण्‍ड विधायक हत्‍या काण्‍ड गालिब दिल बहलाने को ख्‍याल अच्‍छा है

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’

चुनाव चर्चा-2

जैसे जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं प्रचार भी अपनी जवानी पर आता जा रहा है । जहॉं तक ग्‍वालियर चम्‍बल की बात है अंचल की चारों सीटों पर परिणाम तकरीबन साफ और परिदृश्‍य एकदम स्‍पष्‍ट दीवार पर लिखी इबारत के मानिन्‍द सुपाठ्य है ।

भिण्‍ड संसदीय सीट पर जहॉं कांग्रेस उम्‍मीदवार डॉ. भागीरथ भारी भरकम विजय परचम फहराने जाते दीख रहे हैं तो वहीं बिल्‍कुल ऐसा ही मुरैना सीट पर विकट जातीय ध्रुवीकरण के चलते भाजपा प्रत्‍याशी नरेन्‍द्र सिंह तोमर भी ऐतिहासिक जीत (रिकार्ड मतों के साथ) अंकित करने जा रहे हैं । मेरे विश्‍लेषण और आकलन के मुताबिक इन दोनों ही सीटों पर चुनाव लगभग एक चक्षीय से हो गये हैं । मुरैना में हालांकि जातीय और सामाजिक माहौल भाजपा प्रत्‍याशी नरेन्‍द्र सिंह तोमर के एकदम खिलाफ था और अंचल के मतदाता तोमर से एकदम खफा थे लेकिन जातीय ध्रुवीकरण (जो कि होना ही था) और एकमात्र दलीय राजपूत प्रत्‍याशी होने का लाभ न केवल नरेन्‍द्र सिंह तोमर को मिलने जा रहा है अपितु मजबूरी में मिले वोट ( लोगों का कहना है क्‍या करें मजबूरी में वोट देना पड़ रहा है ) भी रिकार्ड होंगें तथा यह भी कि इसमें केवल राजपूत वोट ही नहीं बल्कि अन्‍य तकरीबन सभी जातियों के वोट भी नरेन्‍द्र सिंह तोमर को मिलने जा रहे हैं (सभी वोट मजबूरी के वोट हैं) ।

भिण्‍ड में भी ऐसे ही हालात हैं लेकिन एकदम उल्‍टे यानि यहॉं इस संसदीय सीट पर कॉंग्रेस की यही स्थिति है ( यहॉं मजबूरी का वोट नहीं बल्कि मनपसन्‍द प्रत्‍याशी के लिये वोट होगा) । गोहद विधायक स्‍व. माखन लाल जाटव की हत्‍या के बाद डॉ भागीरथ की जीत पुख्‍ता और पुष्‍ट हो गयी है, यह जीत तो हत्‍या से पहले ही लगभग एकदम सुनिश्चित थी । भिण्‍ड सीट पर भाजपा चुनाव प्रचार की शुरूआत से ही प्रभावहीन थी । ऊपर से माखन लाल जाटव की हत्‍या से भाजपा का चुनाव प्रचार एकदम कोमा में पहुँच गया है और भाजपाई डरते दुबकते चुनाव की बात करते हैं । बचे खुचे भाजपा कार्यकर्ता मुरैना और गुना पलायन कर गये हैं ।

अशोक अर्गल (भाजपा प्रत्‍याशी) को जो जिल्‍लत भिण्‍ड में उठानी पड़ रही है वह स्‍वाभाविक ही थी, चम्‍बल की इन दोनों सीटों पर जो भी हो रहा है उसमें किंचित भी कुछ भी विस्‍मयकारी नहीं है ।

गुना ग्‍वालियर में सीधे मुकाबले भाजपा और कांग्रेस के बीच हैं और ग्‍वालियर में मामूली (अधिक भी संभव है)  अन्‍तराल पर कांग्रेस तथा गुना में लम्‍बे अन्‍तराल पर कांग्रेस का विजयी होना लगभग तय माना जा रहा है ।

मुरैना में सीधा मुकाबला भाजपा बसपा के बीच होगा , कांग्रेस और माकपा तीसरे व चौथे स्‍थान के लिये संघर्ष करेंगे । भिण्‍ड में त्रिकोणीय कहिये या एक पक्षीय कहिये कांग्रेस की विजय के साथ भाजपा और बसपा दूसरे व तीसरे स्‍थान के लिये संघर्ष करेंगीं । मुरैना में हालांकि भाजपा प्रत्‍याशी नरेन्‍द्र सिंह तोमर को बड़ी आसानी से हराया जा सकता है लेकिन प्रतिद्वंदी प्रत्‍याशी इसका लाभ नहीं उठा पा रहे । अव्‍वल तो नरेन्‍द्र सिंह तोमर के कमजोर पक्ष (वीक पाइण्‍टस) से वे पूरी तरह या तो अज्ञान या अनजान हैं या फिर उठा नहीं पा रहे या उठाना नहीं चाह रहे । अन्‍य प्रत्‍याशीयों की तुलना नरेन्‍द्र सिंह तोमर का नकारात्‍मक पक्ष अधिक स्‍पष्‍ट व प्रबल था लेकिन यह नरेन्‍द्र सिंह तोमर का भाग्‍य या मुकद्दर है कि उनकी टक्‍कर में कांग्रेस और बसपा ताकतवर प्रत्‍याशी न देकर कमजोर प्रत्‍याशीयों को लेकर आयीं जो कि चुनाव प्रचार की सामान्‍य और बारीक कैसी भी रणनीति और रीति नीति से सर्वथा नावाकिफ हैं ।

मुरैना 23 करोड़ और विदिशा 37 करोड़ में बिके

मुरैना में हालांकि यह अफवाह भी है कि कांग्रेस ने मुरैना और विदिशा सीट क्रमश: 23 करोड़ और 37 करोड़ रू. में भाजपा को बेची हैं । अब इस अफवाह में कितनी दम है या कितनी सच्‍चाई है यह तो भाजपाई जानें या कांग्रेसी बन्‍धु जानें ।

पार्टीयां बेअसर

भिण्‍ड और मुरैना तथा गुना और ग्‍वालियर चारों सीटों पर राजनीतिक पार्टीयां पूरी तरह बेअसर हो गयीं है इन सीटों पर प्रत्‍याशी की व्‍यक्तिगत छवि और जातीय ध्रुवीकरण एवं सामाजिक समीकरणों पर चुनाव आध्‍धरित हो गये हैं । 

माखनलाल हत्‍याकाण्‍ड- डेमेज कण्‍ट्रोल बेअसर

भाजपा और पुलिस द्वारा गोहद विधायक माखन लाल जाटव की हत्‍या से बनी स्थिति और हुये डेमेज के कण्‍ट्रोल के लिये खेले गये सर्कस और सीरीयल चुनावी अर्थों में बेअसर हो गये हैं । हत्‍याकाण्‍ड में कांग्रेसी नेताओं को लपेटना लोगों के गले नहीं उतर रहा जबकि हत्‍या की सुपारी के लिये पैसे कहॉं से आये किसने दिये, किसको दिये कब दिये कहॉं दिये जैसे सवाल अभी तक अधर में हैं, पैसे बरामद क्‍यों नहीं हुये, कई सवाल पुलिस की भूमिका और भाजपा नेताओं पर सवालिया निशान लगा रहे हैं । इसमें एक अहम सवाल यह भी है कि जो व्‍यक्ति 32 लाख रू. की सुपारी लेकर हत्‍या कर सकता है, क्‍या वही व्‍यक्ति ज्‍यादा रकम मिलने पर झूठा गुनाह नहीं कबूल कर सकता ( संभव है कि झूठा गुनाह कबूल करने के लिये भी पैसे मिले हों) अभी सवाल कई इस हत्‍याकाण्‍ड पर उठ रहे हैं और पुलिस की भूमिका दिनोंदिन संदिग्‍ध ही होती जा रही है ।   

ग्‍वालियर चम्‍बल- पार्टीयों से हटकर, प्रत्‍याशीयों की व्‍यक्तिगत छवि पर होगा चुनाव संग्राम

चम्‍बल के परिणाम जातिवाद पर ध्रुवीकृत, अफवाहों और कयासों का दौर जारी

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’

चुनाव चर्चा-1

वैसे तो समूचे देश में ही अबकी बार का आम चुनाव कुछ खास और निराले अंदाज में हो रहा है और देश में परिपक्‍व होते लोकतंत्र की एक हल्‍की सी झलक भी इन चुनावों में देखने को मिलेगी ।

अबकी बार पार्टीयों का जादू और जंजाल लगभग पूरी तरह बेअसर है, न कोई मुद्दा है न कोई लहर, पार्टी का नाम बेअसर । चुनाव जैसे पूरी तरह प्रत्‍याशी पर आधारित होकर रह गये हैं ।

पार्टी के बजाय प्रत्‍याशी चयन पर आधारित चुनाव एक स्‍वस्‍थ व परिपक्‍व लोकतांत्रिक अवधारणा का स्‍पष्‍ट संकेत है 1 अब विज्ञापनों से मतदाता बेवकूफ बनने की स्‍िथति में नहीं है, न उस पर जय हो का कोई असर है और न भय हो का । बल्कि ये विज्ञापन आम जनता जनार्दन यानि आम मतदाता यानि गरीब की लुगाई के लिये महज जसपाल भट्टी के उल्‍टा पुल्‍टा जैसे शो मात्र बन कर रह गये हैं और जनता नेताओं की जोकरनुमाई हरकतों का ठहाका मार कर आनन्‍द ले रही है । जैसे चुनाव विज्ञापन अभियान न होकर ठहाका टाइप कामेडी सीरियल चल रहे हों ।

देश में जो अबकी बार सबसे अच्‍छी चीज उभर कर आ रही है वह आम मतदाता का पार्टीवाद से मोह भंग होने का है । अब प्रत्‍याशीवाद पर टिकते जा रहे ये चुनाव यह संकेत भी देगें कि देश को स्‍वतंत्र रूप से सोचने दीजिये, उसे स्‍वतंत्र निर्णय लेने दीजिये , बहुत हुआ व्हिप जारी करने का खेल, किसी एक पार्टी का निर्णय देश का निर्णय नहीं होता, पार्टी गलत करे या सही अब सांसदों की रबर ठप्‍पा भूमिका बन्‍द कराईये । उसे अपने दिल व दिमाग से सोचने दीजिये, सांसदों के नाम पर पालतू कुत्‍ते पालना और टुकड़े फेंक कर दुम हिलवाना बन्‍द करिये ।

राजनीतिक विश्‍लेषण तो यह तीव्र संकेत देता है कि आने वाले दो तीन चुनाव बाद यानि सत्रहवीं या उन्‍नीसवीं लोकसभा तक क्षेत्रीय दलों का भी अस्तित्‍व समाप्‍त हो जायेगा और तकरीबन इक्‍कीसवीं लोकसभा तक पूर्णत: निर्दलीय सरकार या राष्‍ट्रीय सरकार अस्तित्‍व में आ जायेगी ।

नेताओं ने देश को प्रयोग शाला बना रखा है, जिसका तीव्र आक्रोश जनता में स्‍वाभाविक है, लगभग नब्‍बे फीसदी सांसद संसद में अपनी पार्टीयों में अपने आकाओं के महज राजनीतिक चमचे मात्र बन कर पूरे पॉंच साल का वक्‍त गुजार आते हैं और अपने साहब से पांच साल तक सिर्फ ये पूछते रहते हैं कि साब दस्‍तखत कहॉं करना है । न उनमें खुद का दिमाग होता है, न खुद की सोच न खुद का विचार, या तो जो पार्टी कह दे या जो उनका आका कह दे, उन्‍हें सिर्फ वही भूमिका कठपुतली के मानिन्‍द निभानी होती है या फिर महज रबर सील की तरह उनके ठप्‍पे लगते रहते हैं । कुछ ऐसी प्रयोगशाला और अपरिपक्‍व बीमार लोकतंत्र हमारे देश में चलता रहा है, नेताओं ने जनता को चूहा, बंदर या खरगोश की तरह अपने सभी प्रयोग आजमाये हैं, हर भावना में देश को बहाया है, देश ने कभी राम के मंदिर पर विश्‍वास किया तो कभी गरीबी हटाओ पर, कभी सांप्रदायिकता के विरोध को अपनाया तो कभी रामराज्‍य की अवधारणा को, कभी बेरोजगारी मिटाने पर यकीन किया तो कभी सामाजिक न्‍याय पर, कभी धारा 370 को देश की तकदीर माना तो कभी भ्रष्‍टाचार का खात्‍मा उसका सपना बना । मतदाता बेचारा हर बार बार बार बार नेताओं पर विश्‍वास करता रहा, लेकिन उसका सपना कभी नहीं पूरा हुआ । आजादी के 62 साल तक नेता दनादन उसे सपना दिखाते रहे, वह देखता रहा और इन्‍तजार करता रहा कि वह सुबह कभी तो आयेगी । उस सुबह को न आना था न आयी ।

अब नेताओं के पास मतदाता को दिखाने के लिये कुछ नहीं बचा, न झूठे सपने का कोटा बचा और न वायदों का पिटारा । अब आपस में ही एक दूसरे पर आक्‍थू आक्‍थू में भिड़े हैं, अब हालात ये हैं कि एक कह रहा है, तेरी नाक चपटी, दूसरा कह रहा है तेरी मैया नकटी, एक बोलता है कि तू भेड़ा तो दूसरा कह रहा है कि तू केंड़ा । एक दूसरे पे कीच उछालते राजनीतिक दलों के दल दल में सबके कपड़े गन्‍दे हैं, होली खिल रही है मगर कीच की । एक बोला तू सवा सौ साल की बुढि़या तो दूसरा बोला अभी तो मैं जवान तू बुढ्ढा ।

वा रे देश वाह रे नेता, कौन है जो नंगा पैदा नहीं हुआ, कौन है जो हमाम में नंगा नहीं हैं । बहुत हुआ अब एक दूसरे को कित्‍ता नंगा करोगे । लगता है देश नेताओं की ब्‍ल्‍यू फिल्‍म सरे आम सरे राह देख रहा है । कैसे देश चलाओगे, नंगई प्रतियोगिता है या चुनाव । अब तो लगाम दो कीच फिकाई को । मतदाता चकरघिन्‍नी हो रहा है, उसे इतने बुरे गन्‍दे और नंगों में से कम बुरे और कम नंगे कम गन्‍दे को चुनना है, चुन लेने दो । शन्ति से चुन लेने दो । देश को पता है नंगो पर पैसा बहुत है, उल्‍ला रहे हैं, उलीच रहे हैं, दूसरों की नंगई बताते बताते अपने चड्डी खेल कर दिखा रहे हैं कह रहे हैं देखो मेरी नंगई सलामत है । स्‍टाप इट । स्‍टाप इट इमीजियेटली स्‍टाप इट । गरीब निर्दलीयों को भी अपनी बात इस देश में कहने दो, उनमें कहीं अधिक अच्‍छे लोग अच्‍छे उम्‍मीदवार हैं, केवल उन पर पैसा नहीं है इसलिये वे अपना प्रचार तक नहीं कर पा रहे ।

दादा सोमनाथ की बद्दुआ काश कामयाब हो कि ‘’तुम सब हार जाओ’’ सब निर्दलीय जीत जायें ।

क्रमश: जारी अगले अंक में ……..

ई शासन- सवालों व संभावनाओं और घने बादलों के पीछे चमकता भारत का भविष्‍य का सूर्य

ई शासन- सवालों व संभावनाओं और घने बादलों के पीछे चमकता भारत का भविष्‍य का सूर्य

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’

किश्‍तबद्ध आलेख भाग-1

भारत में महाराजा विक्रमादित्‍य का साम्राज्‍य रहा हो या कौटिल्‍य चाणक्‍य के समय की शासन प्रणाली रही हो या फिर राजा राम का राम राज्‍य हो सभी ऐतिहासिक तथ्‍य कम से कम भारत में एक सर्वोत्‍तम सुशासन प्रणाली के पूर्व से अवस्थित रहने की ओर ही संकेत करते हैं ।

सुशासन, पारदर्शिता, न्‍यायप्रियता और दूध का दूध और पानी का पानी, सत्‍यवादिता, निष्‍पक्ष कर्म जैसी मूल बातें भारत की आत्‍मायें हैं और इनके बगैर भारतवर्ष की कल्‍पना असंभव है ।

कोई कितना भी झुठलाये और कितना भी बल और छल के साथ सम्‍पूर्ण ताकतवर होकर भारत की इन मूल भावनाओं को धक्‍का देकर कितना भी भ्रष्‍टाचार फैलाता फिरे या जानकारीयों व सूचनाओं को अपारदर्शी बना कर पारदर्शिता पर कुहासा फैलाये कितना भी अन्‍याय की शक्ति का महिमा बखान करता फिरे अंतत: उसे मात ही खानी पड़ेगी । सत्‍य, न्‍यायप्रियता और सुशासन, ईमानदारी, परहितवाद आतिथ्‍य जैसी परम्‍परायें व संस्‍कार भारत की आत्‍मा में ही केवल नहीं रचते बसते अपितु रग रग में विद्यमान हैं ।

भारत में लंकाधीश रावण का भी साम्राज्‍य का भी इतिहास है तो कंस के अत्‍याचारों की कथायें भी विद्यमान हैं, दुर्योधन के अन्‍यायी कृत्‍यों की कथाओं से भारत का इतिहास भरा है तो कहीं आल्‍हा जैसे महाकाव्‍य में छल कपट और कूटनीति जैसे दुश्‍चारित्रिक उपाख्‍यान भरे हैं तो इन्‍हीं के साथ हमारा विलक्षण व अद्वितीय इतिहास सत्‍य की असत्‍य पर विजय, अन्‍याय पर न्‍याय का अंतत: साम्राज्‍य, कुशासन पर सुशासन का राज्‍य, राम की रावण पर विजय, कृष्‍ण की कंस पर विजय, पाण्‍डवों की कौरवों पर विजय, आल्‍हा, ऊदल, मलखान, इंदल जैसे वीरों की विजय कथायें भी भारत की असल आत्‍मा का ही बोध करातीं हैं । भारत में अँधेरे के राज, असत्‍य के साम्राज्‍य और अन्‍याय की आंधीयाँ आते जाते रहे हैं इनसे प्रकाश, सत्‍य और न्‍याय का युद्ध युगों से चला आ रहा है, वे भी युग युग में प्रकट हुये तो वे भी हर युग में आये । यानि दोनों शक्तियों का अस्तित्‍व और संघर्ष भारत में युगों से होता आया है । बस राक्षस और दैत्‍य अपने नाम और रूप बदल बदल कर आते रहे इसी प्रकार राम और कृष्‍ण भी इनसे लड़ने हर युग में नाम और रूप बदल बदल कर आते रहे ।

वर्तमान परिप्रेक्ष्‍य में दैत्‍यों और राक्षसों ने कुशासन, भ्रष्‍टाचार और अन्‍याय अत्‍याचार के रूप में अपना राज कायम किया है और अपारदर्शिता के मायाजाल में अपने पापों को ढंकने के बेहतरीन इंतजामात के साथ ताकि लम्‍बे समय तक इनके पापों और कुकर्मों के भेद न खुल सकें ।

ई शासन और कुशासन का युद्ध

जैसा कि ऊपर दृष्‍टान्‍तात्‍मक विवरण से इतना तो स्‍पष्‍ट हो ही गया होगा कि सतयुग, त्रेता और द्वापर युग के दैत्‍यों और राक्षसों ने कलयुग में कई रूपों में जन्‍म ले लिया है और निरीह जनता यानि आम आदमी को सताने और उसका रक्‍त पीने व चूसने का काम करने इन ताकतों का अंदाज और स्‍टायल भी नया और आधुनिक यानि मायावी है या‍नि कहीं भ्रष्‍टासुर दो रूपये से लेकर करोड़ों तक के भ्रष्‍टाचार से जनता का लहू चूसने में लगा है तो कहीं कहीं आतंकासुर और बमासुर जगह जगह खून की नदियॉं बहातें फिर रहे हैं, कहीं दूसरी जगह इनका अवतार अन्‍यायासुर के रूप में हुआ है जो फर्जी केसों में लोगों को फंसाने से लेकर फांसी के फन्‍दे से हलाल करने में या जेल में सड़ा सड़ा कर कष्‍ट पीड़ा देने के कारोबार में लगे हैं ।

कहीं तो ठेकासुर चन्‍द चॉंदी के सिक्‍कों के लिये या घर परिवारी भाई भतीजों के कल्‍याण के लिये ठेके बांटने में लगे हैं । कही कहीं दैत्‍यराजों के अवतार बकासुरों यानि बक बक कर भाषण झाड़ू फर्जी खोखले वादासुर नेताओं के रूप में जनम पड़े हैं । कुल मिला कर आप अपने आप को कहीं बलात्‍कासुर तो कहीं भ्रष्‍टासुर या अफवाहासुर किसी न किसी असुर से घिरा पायेंगें कहीं चुगली करते चुगलासुर तो कहीं भ्रष्‍टाचार कर अपारदर्शिता की आड़ में खाये पीये को हजम करते जुगाली करते डकारासुर नजर आयेंगें । इन चौतरफा असुरों की भीड़ के बीच भी आम आदमी जिन्‍दा है, भारत जिन्‍दा है यह हैरत की बात है, विलक्षण बात है ।

विलक्षण के साथ हैरत अंगेज यह भी है कि एक भ्रष्‍टासुर दूसरे भ्रष्‍टाचारासुर का वक्‍त पड़ने पर खून पीने से बाज नहीं आता । यानि सिपाही भी टी.आई. से रिश्‍वत पा जाता है ।

फिर भी भारत जिन्‍दा है हैरत अंगेज है, भारतवासी जिन्‍दा हैं करिश्‍मा है । फिर भी भारत लड़ रहा है यह काबिले तारीफ है । आखिर क्‍यों न हो श्रीकृष्‍ण ने कहा कि ‘’ यदा यदा हि धर्मस्‍य ग्‍लानिर्भवति भारत……..संभवामि युगे युगे ‘’

खैर श्रीकृष्‍ण तो फिलहाल आने से रहे आखिर आई.पी.सी. (भारतीय दण्‍ड संहिता) की पूरी 511 धारा श्रीकृष्‍ण पर लागू होती हैं । श्रीकृष्‍ण ने जो भी किया आई.पी.सी. में वह अपराध है, श्रीकृष्‍ण की श्रीमद्भागवत या हरिवंश पुराण या महाभारत उनके अपराधों का साक्ष्‍य प्रमाण संग्रह यानि अपराध शास्‍त्र है और अंग्रेजों ने सन 1860 में आई.पी.सी. बना डाली कि श्रीकृष्‍ण और उसकी विचारधारा को ब्‍लॉक करिये, क्‍योंकि उस समय देश में जितना भी क्रान्तिकारी पैदा हो रहा था, सबके सब श्रीकृष्‍ण की गीता पढ़ कर आ रहे थे और क्रान्ति, आजादी के नाम पर बगावत का झण्‍डा उठा लेते थे । अँग्रेजो के लिये श्रीकृष्‍ण को रोकना जरूरी था, श्रीकृष्‍ण की विचारधारा पर लगाम लगाना जरूरी था (श्रीकृष्‍ण की विचार धारा घोड़ा नहीं है भईये पर का करिये ये हमारी बोलचाल और बात समझाने का लहजा है भईये म.प्र. के भ्रष्‍टासुर कर्मचारीगण नोट करें, भईया हम अपने शब्‍द वापस नहीं लिया करते ) सो अँग्रेज आई.पी.सी. रच लाये, श्रीकृष्‍ण का अवतार प्रतिबंधित हो गया और यदा यदा हि धर्मस्‍य सदा के लिये ब्‍लॉक हो गया । चलो अँग्रेज भईयों को ये करना था ये उनकी मजबूरी थी लेकिन । श्रीकृष्‍ण को हम आज तलक राके हैं, उसे अवतार नहीं लेने दे रहे आज तक अँग्रेजों की बनाई आई.पी.सी. सन 1860 से देश चला रहे हैं । आजादी के 62 साल बाद भी अँग्रेजों के कानून से देश चला रहे हैं, हमारे पास कानून के नाम पर अँग्रेजों की सड़ी रद्दी कानूनी किताबों को उलटपुलट कर धूल झड़ाने (संशोधन) का काम केवल बचा है । अब सवाल ये है, कि फिर हम आजादी की लड़ाई किससे लड़ रहे थे अँग्रेजो से या अँगेजों की नीतियों व कानूनों के खिलाफ । अगर उनके कानून ठीक ठाक थे तो फिर अँग्रेजों को यहॉं से विदा करने की जरूरत ही क्‍या थी । जित्‍ते मुठ्ठी भर संशोधन हमने 62 साल में रचे उससे ज्‍यादा तो अँगेज केवल एक चार्टर से या एक नये कानून से कर देते । क्‍या सच में हम आजाद हो गये । हॉं हम आजाद हो गये लेकिन विरासत को सहेजे हैं, कानूनों के रूप में भी, वे भी देश में कृष्‍ण को जन्‍म नहीं लेने देना चाहते थे हम भी 62 साल से नहीं लेने दे रहे । हममें और अँग्रेजों में फर्क क्‍या है । यानि यहॉं भी कहीं न कहीं अंधकासुर छिपा बैठा है ।

खैर आप सोचिये अब ई शासन और सुशासन पर लिखना ही है तो यह आलेख किश्‍तबद्ध रूप में चलेगा आप तब तक इतने पर विचार करिये मैं दूसरी किश्‍त की तैयारी करता हूँ । इस आलेख के साथ आप मानसिक तैयारी व आत्मिक तैयारी के साथ मेरे साथ भारत में सुशासन या ई शासन लाने को तैयार रहिये मैं आपको बताऊंगा कि क्‍यों नहीं आ पा रहा सुशासन और क्‍यों नहीं लागू हो पा रहा ई शासन । लेकिन यदि हर भारतवासी ने यदि ठान लिया कि नहीं नहीं बस बहुत हो लिया अब तो सुशासन होना ही चाहिये, तो मैं कहता हूँ कि यह बहुत आसान है और महज हमसे चन्‍द कदम भर यह दूर है तथा केवल चन्‍द पलों की बात है ।

आओ चलो एक सेना बनायें, घर में दुबकें गाल फुलायें

हास्‍य/ व्‍यंग्‍य

आओ चलो एक सेना बनायें, घर में दुबकें गाल फुलायें

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’

काने सों कानो मत कहो, कानो जागो रूठ । धीरें धीरें पूछ लेउ तेरी कैसे गई है फूट ।।

मेरे एक मित्र देश में बढ़ रहे आतंकवाद और भ्रष्‍टाचार से काफी दुखित होकर मेरे पास आये, साथ में दस बीस पठ्ठे भी उनके साथ बंदूको से लैस होकर सरपंचों की जेड प्‍लस के मानिन्‍द उनके संग थे । उनमें आक्रोश और व्‍यथा दोनों ही गहराई तक समाई थी । आकर मुझसे बोले दादा ये सब क्‍या है, बस बहुत हो गया अब अपन को सबको मिल कर एक सेना बनानी है अब अपन सब खुल कर देश के लिये लड़ेंगें ।

मेरे मित्र जाति से राजपूत थे और संग में उनके ठाकुर बाह्मणों के छोरों की लम्‍बी चौड़ी टोली थी । मुझे उनकी ख्‍वाहिश जान कर कोई खास हैरत नहीं हुयी । 26 -27 नवम्‍बर के बाद से सारे देश से ज्‍यादा गुस्‍सा चम्‍बल में है, और चम्‍बलवासीयों का वश नहीं चल रहा वरना रातों रात आतंकिस्‍तान का नक्‍शा गायब कर भारत में विलय कर 13 अगस्‍त 1947 की स्थिति बहाल कर देते ।

मैंने उन्‍हें फुसलाते हुये पूछा कौनसी सेना बनाना चाहते हो महाराष्‍ट्र वाली शिव सेना या मनसे वाली सेना । वे उतावले होकर बोले हम लक्ष्‍मण सेना बनायेंगें आप गौर कर लो, अंक फंक ज्‍योतिष फ्योतिष से टटोल टटूल कर चेक कर लेना, फिट नहीं बैठे तो राम सेना या लव कुश सेना या फिर हनुमान सेना कर लेना । बस दादा फायनल कर लो और हमारा नेतृत्‍व कर डालों ।

मैं उनके तैश तेवरों को देख चुपके से बोला भाई सिकरवार वो सब तो ठीक है लेकिन ये सेना फेना बनाना ठीक नहीं है, ससुरी सेना बदनाम बहुत हो गयीं हैं, वे बोले कैसे बदनाम हो गयीं हैं हम समझे नहीं । मैंने कहा कि वो जो ठाकरे की शिव सेना है, उसने कभी सेना वाला काम किया नहीं बस लोगों को मारने पीटने, चन्‍दा और हफ्ता वसूली करके सिनेमा के पोस्‍टर उखाड़ता फूंकता रहा है लेकिन नाम अपनी टोली का शिव सेना धर दिया ऐसे ही मनसे की शिव सेना बोर्डिंग होर्डिंग बदलवाने और उत्‍तर भारत के भइया लोगों को खदेड़ने में लगी रही तब तक साला पछांह (पश्चिम) से आतंकिस्‍तानी कूद परै, बिनें देख सारे सेना वारे सैनिक घरनि में दुबक गये और अपने अपने प्रान बचावत फिरे । फिर बेई (वही) गैर मराठी काम आये सो सारे आंतंकिस्‍तानीयन की रेल सी बनाया दयी । सो तबसे ये सेना फेना फर्जी घोषित होय गयीं हैं । काम तो असली सेना ही आवे है । बो ही खाली करवाय पाये है मराठीयन के मठन को ।

सिकरवार साहब बोले तो ठीक है सेना फेना रहन देओ कछू और बनाय लेउ । पर एक संगठन तो होनो ही चाहियें । सो हाल लठ्ठ फोर दे ।

खैर ऊपर लिखी एक ऐसी सच्‍चाई है जो बमुश्किल दो चार रोज पुरानी है और लगभग ऐसे ही हालात अमूमन समूचे देश में हैं । आतंकवाद पर गुस्‍साये एक नेता जी मेरे पास आये बोले कि ये कसाब को मारा क्‍यों नहीं जा रहा अफजल को फांसी पे क्‍यों नहीं लटकाया जा रहा । ये हमारे देश को हो क्‍या गया है । फटाफट एक्‍शन क्‍यों नहीं ले रहा, आतंकिस्‍तान पर हमला क्‍यों नहीं कर रहा ।

मैं उनके ताबड़तोड़ सवालों से बौखला सा गया । मैं बोला भईया नेताजी यार अब ये तो वह बात हो गयी कि पूछ लो सूचना के अधिकार में क्‍यों नहीं विवाह हो रहा, क्‍यों नहीं बच्‍चा हो रहा, क्‍यों नहीं जुड़वां हो रहे । यार कसाब को मारना था तो पकड़ा ही क्‍यों था, उसी वक्‍त ठोक देते, तब काहे नहीं ठोका, यार नेता जी तुम उस बखत कहां थे जब कसाब ताबड़तोड़ गोलियां बरसा रहा था और सेना वाले बिलों में दुबके लाशों की चादर ओढ़कर प्राण बचाते भाग रहे थे, तब तुम्‍हीं पकड़ लेते कसाब को और ठोक देते उसी वक्‍त । अब तुकाराम जी अपनी जान देकर कसाब यानि कसाई मियां को जैसे तैसे एक कीमती सबूत के तौर पर हमें दे गये हैं तो आप कह रहे हो कि इसे म्‍यूजियम में सजाने के बजाय ठोक क्‍यों नहीं रहे, इसका इण्‍टरनेशनल यूज क्‍यों हो रहा है इसे फांसी क्‍यों नहीं चढ़ा देते ।

भाई नेताजी पहले एक कसाब को खुद पकड़ों फिर खुद ठोको या उसे ठोकने की बात करो, कहने में भी सुघर लगोगे और जनता को बात भी रूचेगी, वरना ढपोरशंखी ही बजोगे । पकड़े पकड़ाये पर नर्राना आसान है, टेंटूयें से सुरों के ताल उलीचना सहज है पर पकड़ना कठिन है, यह तो स्‍वर्गीय शहीद तुकाराम भाई बता सकते हैं कि उन्‍होंने अपने प्राण देकर भी पहली बार भारत के हाथ एक ऐसा ब्रह्मास्‍त्र दे दिया कि अब भारत कसाब के बल पर न केवल दुनियां के सामने छाती तान कर खड़ा है बल्कि डिफैन्‍स से निकल कर अटैक की सिचुयेशन में आ गया है । और आप कह रहे हो कि ठोक दो कसाब को, साले नेता जी यार तुम हिन्‍दुस्‍तानी हो कि आतंकिस्‍तानी । आतंकिस्‍तान की मदद करने वाली हर बात तुम्‍हारे मुंह से बार बार नकल रही है ।

अरे जै ठोका ठाकी करनी थी तो नेताजी कंधार में क्‍या अम्‍मा मर गयी थी या नानी पानी भर रही थी । जो दामादों की तरह आंतंकिस्‍तानीयों को लगुन फलदान के संग छोड़ आये थे । बाप ने मारी मेंढ़की बेटा तीरन्‍दाज, क्‍या यार नेताजी देश के स्‍वतंत्रता संग्राम में तुम कहीं नहीं दीखे, अब पकी पकाई खाने को जीभ लपका मार रही है, कसाब के मामले में भी पकी पकाई के लिये लपक मार रहे हो । हम संसद में होते तो कहते शेम शेम शेम । राजनीति का कैसा गेम, शेम शेम शेम

आजाद देश पर हुकूमती के लिये फड़फड़ाना आसान है, और पकड़े पकड़ाये कसाब के लिये नसीहत देना भी आसान है मगर देश आजाद कैसे होता है ये तो वे ही बता सकेगें जिन्‍होंने अपने लहू से भारत की आजादी का इतिहास लिखा और अपनी पीड़ाओं के साये में सुखी जीवन के सपने त्‍याग कर फांसी और गोलीओं का चुम्‍बन लिया, कंधार जाकर दामादों की तरह खुख्‍वार आतंकिस्‍तानीयों को मय लगुन फलदान नहीं जाकर छोड़ा बल्कि उन्‍हीं के दरबार में उन्‍हीं की ऑंख में ऑंख डाल कर आँख निकाल लीं और टेंटुये में हाथ डालकर पेट में से आंतें खींच लीं ।

मुम्‍बई में आतंकिस्‍तानीयों को जो हश्र झेलना पड़ा, अगर यह अंजाम उन्‍हें कंधार में देखने को मिलता तो आज मुम्‍बई तक आने का हौसला नहीं उफान मारता, कंधार में हम आतंकिस्‍तानी भून देते तो मुम्‍बई में उने चरण कमल नहीं पड़ते । कंधार में हम कायर हुये तो मुम्‍बई तक आतंकिस्‍तान चढ़ बैठा । हमारी सेना (असली सेना) ने अपने वीर सैनिकों की जान देकर जिन खुंख्‍वार आतंकिस्‍तानीयों को पकड़ा था हमारे कायर और नाकारा लुगमहरे नेता उन्‍हें कंधार छोड़ कर आये, तब नेता जी काहे नहीं बोले कि ऐसा कर दो वैसा कर दो ।

मुम्‍बई में हमने 200 आदमी की कुर्बानी दी है तब एक जिन्‍दा आतंकिस्‍तानी हाथ आया है, अब इसके कर्म कुकर्म का हिसाब करने का वक्‍त आया है तो नेताजी बोलते हैं कि ठोक काहे नहीं देते । नेताजी ठोका ठोकी कंधार में करना । देश पे बोलने और देश को नसीहत देने या रास्‍ता दिखाने का हक तो कंधार में अपने दामादों के साथ ही छोड़ आये हो ।

भारत के इतिहास की वह शर्मनाक घटनायें जिन्‍हें काले पन्‍नों पर उकेरा जायेगा उसमें कंधार, संसद और मुम्‍बई मे हमला खास होंगें ।

ऑंख में पानी हो तो एक बार शर्मनाक कृत्‍य कर राजपूत आत्‍महत्‍या कर लेता है सारी कौम को नीचा दिखाने के बाद भी अगर वह यह कहे कि मौका पड़ा तो फिर ऐसा करूंगा, ऐसे साले को तो खड़े खड़े भून देना चाहिये । कसाब से ज्‍यादा खतरनाक तो ये नेता है जो, आंतकिस्‍तानीयों के हौसले बढ़ाने का स्‍टेटमेण्‍ट देकर उन्‍हें छपा छपाया इन्विटेशन कार्ड दे रहा है । और कह रहा है, यानि रास्‍ता दिखा रहा है कि आओ मेरे प्‍यारे दामादो और फिर कंधार चलो, मेरी सरकार आयेगी तो फिर तुम्‍हें लगुन फलदान देकर सकुशल विदा करूंगा । ये नेता अफीम वफीम खाता है क्‍या । पता नहीं भारत सरकार इसे गोली क्‍यों नहीं मरवा रही । कुत्‍ता पागल तो गोली और नेता पागल तो ………..।

हवालात में बन्‍द कसाब पे हवा और लात घुमाने वाले नेता जी अकल अड्डे पर रखो नहीं तो ठोक के कसाब के संग ही आतंकिस्‍तान भिजवा दिये जाओगे ।

अब नेता जी बोले कि चलो मान लिया कि हम कायर है पर यार ये अंतुले काहे को कह रहा है कि करकरे को हमने मारा, आतंकिस्‍तानीयों ने नहीं मारा । हम फिर गुस्‍साये, भरे भराये तो बैठे ही थे और अपनी जिह्वा रूपी तोप से फिर गोलों की बौछार शुरू की, और उल्‍टे नेता जी से ही पूछ लिया, यार ये घटना उस रात काहे घटी जब सबेरे पूरी स्‍टेट में वोट डलने थे, उसके बाद दो स्‍टेट में और वोट डलने थे, इस घटना का फायदा किसे मिलता । दूजी बात ये कि एटीएस वाले वे ही क्‍यों मरे जो प्रज्ञा भारती काण्‍ड देख रहे थे (चुन चुन कर ) ये संयोग नहीं हो सकता ( इसके बाद नेता जी के कुछ पालतू ब्‍लागर्स ने लिखा कि साला करकरे हरामी मारा गया, ये शहीद नहीं था एक आम आदमी था करकरे नाम का एक साधारण आदमी मारा गया, साले करकरे ने साधू संतों (प्रज्ञा भारती) से पंगा लिया और निबट गया । (इण्‍टरनेट पर लगभग आधा सैकड़ा ब्‍लाग छद्म नाम से बना कर एक ही मैटर कापी पेस्‍ट किया गया था )

तीजी बात ये कि यार नेता जी शुरू से ही तुम्‍हारे आचरण आतंकिस्‍तानी रहे हैं , अफजल को फांसी की डिमाण्‍ड कम से कम वो नहीं कर सकता जो आंतकवादीयों को दामाद की तरह कंधार में लगुन फलदान देकर आया हो । या जिन्‍ना की मजार पर माथा पटक कर रिरियाया हो ।

नेता जी हमने दो सौ निर्दोष मासूमों का रक्‍त देखा है, लहू खौल जाता है और ऐसे में तुम्‍हारा सुर तुम्‍हारी सूरत सब की सब काल बराबर नजर आती है । अच्‍छा हो कसाब का फैसला उन पर छोड़ो जिन्‍होंने उसे पकड़ा है । अपनी नेतिया टांय टांय बन्‍द रखो तो अच्‍छा है, बोलने का हक कंधार में जो छोड़ आये हो ।

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