राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय : कृषि तथा संबध्द वि षयों में शिक्षा का अभिनव केन्द्र


राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय :  कृषि तथा संबध्द विषयों में शिक्षा का अभिनव केन्द्र

PRESENTED BY : ZONAL PUBLIC RELATIONS OFFICE- GWALIOR- CHAMBAL ZONE

ग्वालियर 27 मई 09। गालव ऋषि की नगरी ग्वालियर में प्रदेश के प्रथम कृषि विद्यालय की स्थापना वर्ष 1950 में हुई थी । गत वर्ष कृषि तथा संबध्द विषयों में शिक्षा, अनुसंधान एवं प्रसार को अग्रसर करने तथा उनसे आनुषंगिक अन्य विषयों की व्यवस्था करने  के लिए मध्यप्रदेश शासन ने ग्वालियर कृषि विश्वविद्यालय अध्यादेश 2008 के द्वारा नवीन कृषि विश्वविद्यालय की स्थापना ग्वालियर में है । ग्वालियर कृषि विश्वविद्यालय अध्यादेश के स्थान पर राजमाता विजयाराजे सिंधिया कृषि विश्वविद्यालय अधिनियम 2009 (क्रमांक 4, सन् 2009) दिनांक 12 फरवरी 2009 से अधिसूचना जारी की गयी है । प्रदेश के जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय का विभाजन कर दोनों  कृषि विश्वविद्यालय के क्षेत्राधिकार में 25-25 जिलो को निर्धारित किया गया है ।

       विश्वविद्यालय के कार्यक्षेत्र के अर्न्तगत चार कृषि महाविद्यालय ग्वालियर, सीहोर, इंदौर एवं खंडवा, एक उद्यानिकी महाविद्यालय मंदसौर एवं एक पशुचिकित्सा एवं पशुपालन महाविद्यालय, महू के साथ ही पाँच जोनल कृषि अनुसंधान केन्द्र (मुरैना, खरगौन, झाबुआ, कृषि महाविद्यालय सीहोर एवं इंदौर), चार क्षेत्रीय कृषि अनुसंधान केन्द्र (उज्जैन, मंदसौर, खंडवा एवं कृषि महाविद्यालय ग्वालियर), तीन उपकृषि अनुसंधान केन्द्र क्रमश: कृषि अनुसंधान केन्द बागवई (ग्वालियर,) फल अनुसंधान केन्द्र, ईंटखेड़ी (भोपाल) उद्यानिकी अनुसंधान केन्द्र जावरा (रतलाम) तथा उन्नत तकनीकी के हस्तांतरण हेतु 19 कृषि विज्ञान केन्द्र क्रमश: झाबुआ, आरोन (गुना), राजगढ़, खंडवा, ग्वालियर, खरगौन,धार, भिंड, उज्जैन, शाजापुर, मंदसौर, श्योपुर, शिवपुरी,अशोकनगर, दतिया, बड़वानी, नीमच, देवास, मुरैना कार्यरत हैं । प्रदेश के छ: कृषि जलवायु क्षेत्र गिर्द, बुदेलखंड, मालवा पठार, झाबुआ पहाड़ी, निमाड़ घाटी तथा विंध्य पठार विश्वविद्यालय के कव्हरेज अन्तर्गत आते हैं 1

       विश्वविद्यालय क्षेत्राधिकार के अन्तर्गत राज्य के नागरिकों, ग्रामीणों के जीविकोपार्जन हेतु कृषि शिक्षा, अनुसंधान एवं विस्तार गतिविधियों के माध्यम से फसलों एवं अन्य कृषिगत साधनों वृध्दि कर खेती को टिकाऊ एवं लाभप्रद बनाना कृषि विश्वविद्यालय का लक्ष्य है ।

       विश्वविद्यालय के द्वारा स्नातक पाठयक्रम में कृषि, उद्यानिकी तथा पशु चिकित्सा एवं पशुपालन विषयों में क्रमश: 308,56, एवं 77 छात्र – छात्राओं को प्रवेश दिया जाता है । इन पाठयक्रमों मे व्यापम द्वारा पी. ए. टी.एवं पी.एम.टी.परीक्षाओं के साथ ही आई. सी. ए. आर. आई. वी. सी .एवं एनआरआई के माध्यम से छात्र -छात्राओं को प्रवेश दिए जाते हैं।

       विश्वविद्यालय द्वारा कृषि संकाय के अन्तर्गत आठ, उद्यानिकी, के अन्तर्गत छ: तथा पशु चिकित्सा एवं पशुपालन  के अन्तर्गत ग्यारह विषयों में स्नातकोत्तर कार्यक्रम चलाऐ जा रहे है । जिसमें कृषि, उद्यानिकी तथा पशु चिकित्सा एवं पशुपालन विषयों में क्रमश: 186,21 एवं 65 छात्र-छात्राओं को प्रवेश दिया जाता है ।

       कृषि संकाय के अनतर्गत कृषि अर्थशास्त्र एवं प्रक्षेत्र प्रबंधन, कृषि अभियांत्रिकी, शस्य विज्ञान, जैव प्रोद्यौगिकी, कीट विज्ञान, प्रसार शिक्षा एवं ग्रामीण प्रबंधन, खाद्य विज्ञान एवं तकनीकी, उद्यानिकी एवं वानिकी, पादप प्रजनन एवं अनुवांशिकी, पादप रोग विज्ञान, मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन, पादप कार्य की विज्ञान, पशुपालन एवं पशु चिकित्सा विज्ञान आदि के अन्तर्गत अध्यापन, अनुसंधान एवं सम्पूर्ण कृषि तकनीक प्रसार का कार्य वर्तमान में विश्वविद्यालय द्वारा किया जा रहा है ।

       उद्यानिकी महाविद्यालय, मंदसौर में उद्यानिकी विषयों के छ: विभाग (फ्लोरीकल्चर एवं लैण्डस्केपिंग, फल विज्ञान, मेडीसीनल एवं एरोमेटिक क्रॉप्स, प्लान्टेशन एवं स्पाइसिस क्रॉप्स, पोस्ट हारवेस्ट मैनेजमेंट एवं सब्जी विज्ञान) सृजित हैं जिनके माध्यम से शिक्षण कार्य सुचारू रूप से किया  जा रहा है ।

       इसी प्रकार से पशु संकाय के अन्तर्गत शरीर रचना एवं ऊतिकी विज्ञान, पशु प्रजनन एवं अनुवांशिकी विज्ञान, पशु पोषण एवं आहार तकनीकी विज्ञान, व्याधि विज्ञान, पशु महामारी शास्त्र एवं पशु रोग निवारण औषधी विभाग, पशु औषधि विभाग, पशु उत्पादन एवं प्रबंधन, पशु उतपदन तकनीकी, पशु प्रजनन एवं प्रसूति, कुक्कुट विज्ञान, पशु भौषिक एवं विषाक्त, पशु शरीर क्रिया, पशु शल्य चिकित्सा एवं क्षय विकिरण, पशु लोक स्वास्थ्य एवं महामारी विज्ञान, जीव रसायन विज्ञान, सूक्ष्म जीवाणु विज्ञान, प्रसार शिक्षा आदि विभागों के माध्यम से कृषि शिक्षा, अनुसंधान कार्य एवं प्रसार का कार्य सुचारू रूप से संपादित किया जा रहा है ।

       इन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए विश्वविद्यालय में अनुभवी प्राध्यापक/वैज्ञानिक कार्यरत हैं, जिन्होनें अंतर्राष्ट्रीय एवं राष्ट्रीय स्तर पर अनुसंधान एवं अन्य शोघ कार्य प्रकाशित किये हैं ।

सामुदायिक योगदान को तवज्‍जो देकर ही हम बन सकते हैं नंबर 1


सामुदायिक योगदान को तवज्‍जो देकर ही हम बन सकते हैं नंबर 1

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ”आनन्‍द”

एक उक्ति है कि विरोधी को साथ लेकर चलना कला है, लेकिन विरोधी से अपना काम कराना तो कौशल यानि महारत है

हालांकि हमारे देश ने विकास के लिये मिश्रित व्‍यवस्‍था को अपनाया है, लेकिन कई साल के अनुभव के बाद यह लाजमी हो गया है कि मिश्रित व्‍यवस्‍था के मूल ढांचे को यथावत रखते हुये इसमें सामुदायिक योगदान बढ़ायें और भारत के सर्व समुदाय को विश्‍वास में लेकर उसे देश के विकास और तरक्‍की में भागीदार बनायें । लेकिन इसका आशय कतई यह नहीं होना चाहिये कि हम अयोग्‍य, अनुभवहीन और अपरिपक्‍व लोगों को सामुदायिक नेतृत्‍व सौंप दें 1 बहुधा ऐसा हुआ और हमने कई नकारात्‍मक परिणाम भी झेले हैं ।

अब यह वक्‍त आ ही गया है कि हम परिपक्‍वता, अनुभव और योग्‍यता के आधार पर सामुदायिक वर्गीकरण के सिद्धान्‍त को अंगीकार करें, हम इसी वर्गीकरण को आधार मान कर समुदाय में प्रत्‍येक मानव मात्र को उसकी भूमिका अदा करने का अवसर प्रदान करें । अयोग्‍य, अपरिपक्‍व व अनुभवहीन को उसकी सही जगह पहुंचायें तथा उचित योग्‍यता व उचित अनुभव से परिपूर्ण परिपक्‍वों को ससम्‍मान उनका स्‍थान दें , इससे सामुदायिक आक्रोश भी कम होगा और देश की प्रगति में तीव्रता आयेगी जो कि वर्तमान में तत्‍काल अपेक्षित है ।

असल में हमने समुदाय को राजनीतिक व सामाजिक तौर पर अभी तक वर्गीकृत कर रखा है और देश व प्रदेश की प्रगति से जुड़े महत्‍वपूर्ण नेतृत्‍वकारी पदों पर हम इसी आधार पर कई अयोग्‍य, अपरिपक्‍व व अनुभवहीनों को राजनीतिक व सामाजिक स्‍वार्थों के वशीभूत होकर बिठाते रहे हैं । परिणामत:चन्‍द विद्वान और मेहनतकशों ने जितना देश को आगे बढ़ाने की कोशिश की, हमारे राजनीतिक व सामाजिक स्‍वार्थ देश को उससे कहीं ज्‍यादा पीछे धकेलते गये ।

केवल यह कह देने भर से बात नहीं बनेगी कि दुश्‍मन मुल्‍क हमारी तरक्‍की से जलते हैं और कभी आतंकवाद तो कभी मंदीवाद जैसे असुर छोड़ छोड़ कर हमारी तरक्‍की की राह की रूकावट बनते हैं । यदि यह सच होता तो केन्‍द्र में कांग्रेस की पुनर्वापसी वह भी सशक्‍त होकर आना सम्‍भव नहीं होती । मगर समूचे विश्‍व ने देखा कि भारत काम करने में यकीन रखने वालों को समर्थन देता है और दमदारी से उन्‍हीं का साथ देता है जो जुबान के धनी, काम करने वाले तथा जनता के मन से सोचने वाले हैं । (मैं यहॉं स्‍पष्‍ट करना चाहूंगा , कांग्रेस को और भी अधिक करीब 80-90 सीटें अधिक मिलतीं यदि प्रत्‍याशी चयन सही किया गया होता और उसे किसी के भी समर्थन की जरूरत नहीं होती)

अब वक्‍त सामुदायिक सहयोग व सामुदायिक नेतृत्‍व में समूची प्रणाली के बदलाव करने का है । और यह कर ही देना चाहिये, राजनीतिक व सामाजिक स्‍वार्थपूर्ति के लिये उपकृत की जाने वाली नियुक्तियां तुरन्‍त बन्‍द कर देना चाहिये तभी देश का कल्‍याण संभव है तथा देश तभी तरक्‍की कर नंबर 1 स्‍थान पर गण्‍य होगा ।

अच्‍छी सामुदायिक भावना और अच्‍छी सामुदायिक टीम के जरिये ही देश का विकास संभव है वरना अभी ओर 50 साल तक हम हम अपनी समस्‍याओं के लिये ही रोते झीकते रहेंगे ।

विकास, प्रगति और तरक्‍की जिस प्रकार भिन्‍न शब्‍द हैं उसी प्रकार इनके अर्थ भी भिन्‍न हैं , मुश्किल यह है कि हमने इन सबको मिलाकर एक बना डाला है और इनका अर्थ भी एक कर दिया है परिणामस्‍वरूप हम भटक गये हैं ।

पुरातन संस्‍कृति, ऐतिहासिक सरोकार हमारी धरोहर हैं हमारी पहचान हैं, हमारी सबसे अधिक प्राचीन सभ्‍यता होने के अकाट्य प्रमाण हैं इन्‍हें हमें अक्षुण्‍ण रख कर आधुनिक एवं नवीनतम प्रौद्यागिकी के साथ सामंजस्‍य बिठा कर तरक्‍की की अदभुत राह निर्धारित करना होगा ।

युगों पुरानी शिक्षा प्रणाली से मुक्‍त होकर ऐसी ही सामंजस्‍य युक्‍त शिक्षा जीवन शिक्षा तथा निर्वाह व औचित्‍यपूर्ण शिक्षा अपने बच्‍चों को प्रदान करना होगी एवं उन्‍हें अति उपयोगी राष्‍ट्र नागरिक बनाने वाली देश को तरक्‍की के बहुआयाम देने वाली शिक्षा प्रणाली का आविष्‍कार करना होगा, जिससे आने वाले भारत का भ्रम व भटकाव न हो सके ।

यह शर्मनाक है कि हमारे स्‍कूलों में ही पढ़ा लिखा नौजवान हमारे ही समाज के लिये असामाजिक हो जाता है और अपराधी बन जाता है, अब यह खोजना ही होगा कि आखिर कहॉं कमी छूटी, उसे हमीं ने शिक्षा दी तो उस शिक्षा के इस प्रकार के ऋणात्‍मक परिणाम के लिये जिम्‍मेवार भी हमें खुद को ही मानना होगा । और इस ऋणात्‍मक परिणाम के जिममेवार सभी तत्‍वों को तुरन्‍त से तुरन्‍त ध्‍वस्‍त करना होगा । सल्‍तनतें तो आती जाती रहती हैं, सत्‍तायें बदलती रहतीं हैं लेकिन जो चिर स्‍थायी है वह है मानवीय मूल्‍य और सांस्‍कृतिक सभ्‍यता ।

बड़ी तकलीफदेह व विलक्षण बात है कि आजादी के 62 साल बाद भी हम देश के सवा अरब लोगों में से योग्‍य सामुदायिक नेतृत्‍व को नहीं तलाश पाते और क्राइटीरिया के नकली दायरे बना बना कर वाहियात लोगों को सामुदायिक नेतृत्‍व सौंप कर बकाया समुदाय को बागी होने या कहलाने का तमगा सौंप देते हैं ।

क्‍या मजे की बात है यदि केन्‍द्र या राज्‍य में कांग्रेस की सरकार है तो सारे कांग्रेसी योग्‍य व पात्र स्‍वत: ही हो जाते हैं (चाहे वास्‍तव में वे कितने भी अयोग्‍य , नकारा , अनुभवहीन व अपरिपक्‍व ही क्‍यों न हों) , और दूसरी किसी भी पार्टी के लोग स्‍वत: ही अपात्र , अयोग्‍य और नकारा हो जाते हैं तथा सत्‍ता पक्ष एवं सरकारी अधिकारी उन्‍हें अपराधी या बागी की भांति व्‍यवहृत करने लगते है ( चाहे वे कितने भी योग्‍य, पात्र, शालीन व अनुभवी एवं परिपक्‍व ही क्‍यों न हों) बस इस देश में सारे फसाद की जड़ यही है, ऐसा अमरीका में नहीं है, वहॉं विपक्षीयों में से भी योग्‍य को तलाश कर सामुदायिक नेतृत्‍व सौंप देने का रिवाज है, विपक्ष को बागी या अपराधी नहीं बल्कि समान राष्‍ट्र का समान नागरिक मानने का रिवाज है , परिणाम सामने है, हम पिछलग्‍गू हैं और अमरीका हमसे आगे है ।

भारत की राजनीतिक अवधारणा है कि जितने भी अपराधी, आतंकवादी या बागी हैं वे सभी विपक्षी दलों में है । यह बात देश के गले नहीं उतरती । आखिर अब तो देश की राजनीतिक शक्तियों को सतर्क हो ही जाना चाहिये, प्रयोग, परिभाषायें और अवधारणायें बदल डालने का वक्‍त आ गया है, बदल ही देना चाहिये । जनता जूते चप्‍पल बरसाना खुद ब खुद बन्‍द कर देगी या फिर आप तैयार हो जाइये आर्म्‍स एक्‍ट में संशोधन करने के लिये तथा जूते चप्‍पलों को भी अस्‍त्र शस्‍त्र में परिभाषित कर दीजिये क्‍योंकि आने वाले वक्‍त में इसका उपयोग कुछ ज्‍यादा ही होगा, संभवत: केवल चुनाव के वक्‍त नहीं बल्कि हर वक्‍त होगा । सामुदायिक आक्रोश को समझिये यह आक्रोश किसी पार्टी विशेष के प्रति नहीं बल्कि व्‍यक्ति विशेष के प्रति होता है ।

निगम की समस्त पानी की टंकियां विज्ञा पन के लिये दी जावेगी : निगमायुक्त


निगम की समस्त पानी की टंकियां विज्ञापन के लिये दी जावेगी : निगमायुक्त

हमें खेद है – मुरैना में चल रही भारी बिजली कटोती (18 घण्‍टे और शेष समय वोल्‍टेज फ्लक्‍चुयेशन के कारण यह समाचार समय पर प्रकाशित नहीं किये जा सके )

ग्वालियर दिनांक 21.05.2009– निगमायुक्त डॉ. पवन कुमार शर्मा ने विज्ञापन प्रभारी अभय राजनगांवकर को निर्देशित किया है कि नगर निगम सीमा क्षेत्र में स्थापित पानी की समस्त टंकियों को विज्ञापन के लिये विभिन्न एजेंसियों संस्थाओं को उपलब्ध कराई जावे, इसके लिये शीघ्र अतिशीघ्र टेण्डर आंमत्रित किये जावे। टेण्डर आंमत्रित की प्रक्रिया पूर्ण कर निगम की समस्त टंकियां विज्ञापन के लिये विज्ञापनदाताओं को उपलब्ध कराई जावे जिससे नगर निगम ग्वालियर को एक अतिरिक्त आय के साधन में बढ़ोत्तरी  होगी।

       विज्ञापन प्रभारी एवं उपायुक्त अभय राजनगांवकर ने जानकारी देते हुये बताया है कि शीघ्र अतिशीघ्र इस संबंध में टेण्डर आंमत्रित किये जावेंगे। नियमानुसार  पूर्ण कार्यवाही कर विज्ञापनदाताओं को पानी की टंकियों पर विज्ञापन हेतु अधिकृत किया जावेगा।

मुरैना के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अन ुराग शर्मा का एक अंदाज यह भी


मुरैना के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अनुराग शर्मा का एक अंदाज यह भी

पुलिस की नौकरी के अलावा एक बेहतर प्रतिभा और कला का धनी भी है यह अफसर

नरेन्द्र सिंह तोमर ”आनन्द”

कई बार प्रतिभायें और विद्वता अपनी कलात्मक खूबियों को लेकर सरकारी वर्दी के पीछे कर्तव्य पालन की वेदी पर भेंट चढ़ जातीं हैं और अक्सर सरकारी अफसरों को हम सदा एक अलग नजरिये से देखते हैं !

मैंने इण्टरनेट पर भीड़ में से सदा कुछ विशिष्ट लोगों की तलाश की है, आज मैं कुछ तलाश रहा था कि अचानक एक जाना पहचाना चेहरा (जाने पहचाने लोग इण्टरनेट पर यदा कदा ही मिलते हैं) मेरी नजर में आया और मुरैना के कुन्तलपुर यानि कुतवार पर आलेख पढ़ते पढ़ते मुझे लगा कि किसी ने वाकई बड़ा बेहतरीन आलेख लिखा है वह भी मय चित्रों के ! जिज्ञासावश लेखक को जानने की इच्छा हुयी तो जो श्रीमान इस लेख के रचयिता थे उनकी प्रोफाइल देखकर मैं चौंक गया !

इस आलेख के रचयिता थे मुरैना की मशहूर पुलिस हस्ती भाई अनुराग शर्मा जो कि मुरैना में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक हैं ! उसके बाद मैंने उनका सारा ब्यौरा और सारा ब्लाग देखा ! मुझे कुछ खास बात लगी तो मैंने आपके साथ शेयर करना उचित समझा !

अभी तक आप सब हमारे बिहार के मुजफ्फरनगर के डी.आई.जी. पुलिस अरविन्द पाण्डेय से खास परिचित हो ही गये होंगे ! उनकी प्रतिभा, कला और भावनाओं का वाकई मैं कायल हूँ और जब भी उनकी कोई नई पोस्ट आती है, मैं तुरन्त मॉडरेशन में प्रकाशित कर देता हूँ ! उनकी भावनायें और रचनायें इतनी श्रेष्ठ होतीं हैं कि लगता है कि काश हर पुलिस आफिसर मानवता के इतने नजदीक होता ! उनके गीत और कविताये तो दिल को छू जातीं हैं , कुछ गीत तो उन्होंने अपनी बिटिया के स्वर में प्रस्तुत किये हैं ! हालांकि पाण्डेय जी शायद तकनीकी स्त्राेतों व संसाधनों का बेहतर उपयोग नहीं कर पा रहे हैं या शायद अनभिज्ञ हैं, वरना और भी करिश्मा उभर कर आता ! अब तो उनका प्रकरणों को सुलझाने का सामाजिक व पारिवारिक स्टाइल भी मुझे खूब भाया !

अभी तक अरविन्द पाण्डेय भैया का इण्टरनेट पर धमाल मचा था लेकिन अब हमारे मुरैना के एडीशनल एस.पी. अनुराग शर्मा जी ने भी दस्तक दे दी है ! और एण्ट्री भी काफी धमाकेदार है !

आप जो लिखते हैं, आपके साहित्य व विचार से आपका व्यक्तित्व भली भांति जाना जा सकता है !

अनुराग शर्मा जी ने अपने ब्लाग पर जो भी अभी तक प्रस्तुत किया है वह जिज्ञासुओं और अन्वेषकों तथा उत्कृष्ट साहित्य के इच्छुकों के लिये बहुत बेहतर है ! उनके द्वारा लिखे गये लेख वाकई बेहतरीन उत्कृष्ट कोटि के हैं तथा भाषा व साहित्य के व्याकरण पर पकड़ भी इतनी बेहतर है कि अच्छे अच्छे पत्रकार व साहित्यकार (जो खुद को उच्च कोटि का साहित्यकार या पत्रकार मानते हैं वे अनुराग शर्मा जी को जरूर पढ़ें ) बेहद संतुलित व संयमित वाक्यावली स्वत: ही मनमोहन हैं !

उनके द्वारा प्रदत्त जानकारीयां प्रमाणिक व उच्च स्तरीय हैं और चौंकाने वाली भी क्योंकि जो काम हम लोग कर रहे हैं या हमें करना है उसे कोई और भी गुप्त तरीके से भी कर रहा है ! और हम सबसे अधिक बेहतर तरीके से ! फोटोग्राफों की क्वालिटी भी उच्च कोटि की है !

उनके आलेखों में विद्वता, रिसर्च और प्रमाणिकता का तत्व स्वत: ही महसूस हो जाता है ! हालांकि ककनमठ, कुतवार और बटेश्‍वरा पर उनका आलेख तथ्यात्मक रूप से त्रुटिपूर्ण है और मैंने इस सम्बन्ध में उन्हें टिप्पणी के जरिये संकेत भी कर दिया है !

अनुराग जी का ब्लॉग ब्लागर पर बना हुआ है और ऍंग्रेजी वाक्य इम्प्रेशन्स के नाम से है ! आप यहाँ क्लिक करके उन्हें पढ़ सकते हैं ! http://yoursanurag.blogspot.com/ उनका ब्लागर पर आगमन फरवरी 2009 में हुआ है तथा पहली पोस्ट मार्च में लिखी है एवं अंतिम अपडेट 10 मई 2009 को हुयी है !

अनुराग शर्मा जी कवितायें भी लिखते हैं यहॉं ग्‍वालियर टाइम्‍स पर हम उनकी लिखी हुयी कविता दे रहे हैं जिससे आप उनके इस पहलू से भी वाकिफ हो सकें ! उनकी कविता तथा कुछ लेख आप ग्वालियर टाइम्स पर पढ़ सकेंगे ! तथा भविष्य में सिंडीकेशन के जरिये उनके ताजे अपडेट भी ग्वालियर टाइम्स पर देखने को मिलेंगे !

अनुराग शर्मा जी को पुराने फिल्मी गाने पसन्द हैं , उनके पसन्दीदा गायक जगजीत सिंह व चित्रा सिंह गजल गायक हैं फिल्मी गीत उन्हें यसुदास के और गुलजार के पसन्द हैं ! उन्हें अंग्रेजी फिल्में पसन्द हैं ! पसन्दीदा फिल्मों की उनकी सूची काफी लम्बी है ! अनुराग शर्मा की पसन्दीदा पुस्तकें शरलॉक होम्स, पेरी मेसन की किताबें, और राग दरबारी हैं ! अभी तक उनकी प्रोफाइल करीब 250 बार विजिट की गयी है !  

लोक उपयोगी सेवाओं की लोक अदालत हर मा ह अन्तिम शनिवार को


लोक उपयोगी सेवाओं की लोक अदालत हर माह अन्तिम शनिवार को

शुक्रवार 22 मई वाले प्रकरणों की सुनवाई शनिवार 30 मई को होगी

ग्वालियर 20 मई 09। लोक उपयोगी सेवाओं की लोक अदालत अब हर माह अन्तिम शनिवार को होगी। यह जानकारी जिला विधिक सहायता अधिकारी श्री अरूण प्रधान ने दी है। उन्होंने बताया कि राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण जबलपुर के निर्देशानुसार यह व्यवस्था की गई है। पूर्व में लोक उपयोगी सेवाओं की लोक अदालत का आयोजन हर शुक्रवार को किया जाता था। परिवर्तन के फलस्वरूप शुक्रवार 22 मई को नियत प्रकरणों की सुनवाई अब इस माह के अन्तिम शनिवार 30 मई को प्रात: 10.30 बजे से की जायेगी। उन्होंने सम्बन्धित पक्षकारों को 30 मई को लोक उपयोगी सेवाओं की लोक अदालत में उपस्थित होने को कहा है।

      उल्लेखनीय है कि लोक उपयोगी सेवाओं की लोक अदालत में वायु, जल, सड़क, परिवहन सेवा, डाकतार, दूरभाष, सार्वजनिक प्रकाश व्यवस्था, जल प्रदाय सेवा, मलवहन/स्वच्छता प्रणाली, चिकित्सा सेवायें, बीमा सहित लोक उपयोगी सेवाओं से सम्बन्धी प्रकरणों का निराकरण किया जाता है।

पशुपालक पौष्टिकता बढ़ाने के लिये भूसा/पुआल का यूरिया उपचार करें


पशुपालक पौष्टिकता बढ़ाने के लिये भूसा/पुआल का यूरिया उपचार करें

Article Presented BY : Zonal Public Relations Office , Gwalior – Chambal Zone

ग्वालियर,20 मई 09। पशुओं के स्वास्थ्य व दुग्ध उत्पादन हेतु हरा चारा व पशु आहार एक आदर्श भोजन है किन्तु हरे चारे का वर्ष भर उपलब्ध न होना तथा पशुआहार की अधिक कीमत पशु पालकों के लिए एक समस्या है।

      सामान्यत: धान और गेंहूँ का भूसा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध रहता है । लेकिन इनमें पोषक तत्व बहुत कम होते हैं । प्रोटीन की मात्रा 4 प्रतिशत से भी कम होती है । भूसे का यूरिया से उपचार करने से उसकी पौष्टिकता बढती है और प्रोटीन की मात्रा उपचारित भूसे में लगभग 9 प्रतिशत हो जाती है। पशु को यूरिया उपचारित चारा खिलाने पर उसको नियमित दिये जाने वाल पशुआहार में 30 प्रतिशत तक की कमी की जा सकती है । उपचार के लिये चार किलो यूरिया को 40 लीटर पानी में (समिति की दूध वाली केन के बराबर) घोलें । एक क्विंटल भूसे को जमीन में इस तरह फैलायें कि परत की मोटाई लगभग 3 से 4 इंच रहे । तैयार किये गये 40 लीटर घोल को इस फैलाये गये भूसे पर हजारे से छिड़कें । फिर भूसे को पैरों से अच्छी तरह चल-चल कर या कूद-कूद कर दबायें । इस दबाये गये भूसे के ऊपर पुन: एक क्विंटल भूसा फैलाएं और पुन:चार किलो यूरिया को 40 लीटर पानी में घोलकर, हजारे से भूसे के ऊपर छिड़काव करें और पहले की तरह इस परत  को भी चल-चल कर या कूद-कूद कर दबायें ।

      इस तरह एक के ऊपर एक सौ-सौ किलो की 10 पर्ते डालते जायें,घोल का छिड़काव करते जायें और दबाते जायें । उपचारित भूसे को प्लास्टिक शीट से ढक दें और उससे जमीन में छूने वाले किनारों पर मिट्टी डाल दें । जिससे बाद में बनने वाली गैस बाहर न निकल सके । प्लास्टिक शीट न मिलने की स्थिति में ढेर के ऊपर थोड़ा सूखा भूसा डालें । उस पर थोड़ी सूखी मिट्टी /पुआल डालकर चिकनी गीली मिट्टी /गोबर से लीप भी सकते हैं । एक बार में कम से कम एक टन (1000 किलो) भूसे का उपचार करना चाहिये । एक टन भूसे के लिए 40 किलो यूरिया और 400 लीटर पानी का आवश्यकता होती है ।

यूरिया को कभी जानवर को सीधे खिलाने का प्रयास नहीं करना चाहिये । यह पशु के लिए जहर हो सकता है । साथ ही भूसे के उपचार के समय यूरिया के तैयार घोल को भी पशुओं से बचाकर रखें ।

उपचार करने के लिए पक्का फर्श अधिक उपयुक्त रहता है । यदि फर्श कच्चा ही हो तो जमीन में भी एक प्लास्टिक शीट बिछाई जाती है । यह उपचार किसी बंद कमरे में या आंगन के कोने में अधिक सुविधाजनक रहता है ।

फसल की कटाई के समय यदि पशु पालक किसान खेत में या घर में चट्टा (बिटौरा/कूप) बनाकर भूसा रखते हों,तो चट्टा बनाने के समय ही भूसे को उपरोक्त विधि से उपचारित कर सकते हैं। इससे अतिरिक्त श्रम की बचत भी होगी । उपचार किये गये भूसे के ढेर को गर्मी में 21 दिन व सर्दी में 28 दिन बाद ही खोलें । खिलाने से पहले भूसे को लगभग 10 मिनट तक खुली हवा में फैला दें । जिससे उसकी गैस उड़ जाये । शुरूआत में पशु को उपचारित भूसा थोड़ा थोड़ा दें । धीरे-धीरे आदत पड़ने पर पशु इसे चाव से खाने लगता है।

पेयजल समस्या के निराकरण में विलम्ब पर कार्रवाई होगी – कलेक्टर


पेयजल समस्या के निराकरण में विलम्ब पर कार्रवाई होगी कलेक्टर

मुरैना 19 मई 2009/ कलेक्टर श्री एम.के. अग्रवाल ने आज जिले की पेयजल व्यवस्था की विस्तृत समीक्षा की और अधिकारियों को पेयजल समस्या का त्वरित निराकरण करने के निर्देश दिए । उन्होने स्पष्ट किया कि पेयजल सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है । अधिकारियों को चाहिए कि वे जिले के सभी क्षेत्रों में पेयजल की समुचित व्यवस्था सुनिश्चित करें । किसी भी क्षेत्र में कहीं भी पेयजल संकट पाये जाने पर संबंधित अधिकारी के विरूध्द कठोर कार्रवाई की जायेगी । इस अवसर पर मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत श्री अभय वर्मा, सबलगढ़, जौरा और मुरैना के एस.डी.एम., लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के अधिकारी, तहसीलदार, जनपद सीईओ और नगरीय निकायों के सीएमओ उपस्थित थे।

       कलेक्टर ने कहा कि ग्रीष्म काल में कहीं भी पेयजल कासंकट उत्पन्न नहीं होना चाहिए। इसके लिए बंद हैड पंप एवं नल-जल योजनाओं को तत्काल दुरूस्त कराने की कार्रवाई की जाये । पानी की कमी बाले क्षेत्रों में जरूरत पड़ने पर परिवहन के जरिये पेयजल पहुंचाना सुनिश्चित किया जाये । बैठक में बताया गया कि जिले में स्थापित 12 हजार 733 हैडपम्पों में से 260 पानी की कमी और लाइन गिर जाने के कारण बंद है । जिले में स्थापित 111 नल जल योजनाओं में से विद्युत अवरोध के कारण बंद  46 योजनाओं को चालू कराने के प्रयास किये जा रहे है । इनके लिए विद्युत वितरण कम्पनी को आवश्यक धन राशि भी उपलब्ध कराई जा रही है । अल्प वर्षा की स्थिति में जिले के ग्रामीण क्षेत्रों में 180 नलकूपों का खनन व हैण्ड पम्पों की स्थापना , 50 नलकूपों में समर्सीबल पम्पों की स्थापना, तीस बंद नल- जल स्थल जल प्रदाय योजनाओं को पुन: चालू कराना तथा 50 भरे-पटे नलकूपों की सफाई का कार्य प्रस्तावित है ।

       कलेक्टर श्री अग्रवाल ने कहा कि पेयजल समस्या के निराकरण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाय । समस्या के निराकरण में अनावश्यक विलम्ब वर्दाश्त नहीं किया जायेगा और इसके लिए दोषी अधिकारियों के विरूध्द कठोर कार्रवाई की जावेगी ।

       सार्वजनिक वितरण प्रणाली की समीक्षा के दौरान कलेक्टर ने संबंधित नोडल अधिकारियों को हिदायत की कि वे वितरण दिनाकों में संबंधित उचित मूल्य दूकान पर अनिवार्य रूप से उपस्थित रह कर अपने समक्ष में खाद्यान्न का वितरण सुनिश्चित करायें । चितरण दिनांकों में नोडल अधिकारी की अनुपस्थिति पर कार्रवाई की जायेगी । उन्होंने अनुविभागीय अधिकारियों को भी निर्देश दिये कि वे वितरण व्यवस्था पर सजग व सतर्क निगाह रखें और कहीं भी किसी प्रकार की गडवड़ी पाये जाने पर कार्रवाई प्रस्तावित करें । इस अवसर पर संबंधित अधिकारी उपस्थित थे ।

राष्ट्रीय बाल श्री सम्मान के लिये पंजीकरण 30 मई तक


राष्ट्रीय बाल श्री सम्मान के लिये पंजीकरण  30 मई तक

ग्वालियर 19 मई 09। राष्ट्रीय बाल श्री सम्मान 2009 के लिये स्थानीय स्तर पर सृजनात्मक प्रदर्शन कला, सृजनात्मक कला, वैज्ञानिक नवीकरण एवं सृजनात्मक लेखन कला के क्षेत्र में स्थानीय स्तर पर चयन हेतु पंजीकरण की अंतिम तिथि 30 मई 2009 है। 5 से 16 वर्ष के इच्छुक बच्चे 30 मई 09 तक अपना पंजीकरण जवाहर बाल भवन 129 मयूर नगर ठाटीपुर ग्वालियर में कार्यालयीन समय में आकर करवा सकते हैं। प्रतियोगिता के विषय में विस्तृत जानकारी भी कार्यालय से प्राप्त ही जा सकती है।

आकाशवाणी द्वारा संगीत प्रतियोगिता के आवेदन आमंत्रित


आकाशवाणी द्वारा संगीत प्रतियोगिता के आवेदन आमंत्रित 

ग्वालियर,19 मई 09/ प्रति वर्षानुसार आकाशवाणी द्वारा युवा प्रतिभाओं की खोज और उनको प्रोत्साहन देने के लिये अखिल भारतीय आकाशवाणी संगीत प्रतियोगिता 2009 का आयोजन किया जा रहा है । यह प्रतियोगिता दो चरणों में होगी । प्रथम प्रतियोगिता प्रत्येक आकाशवाणी केन्द्र पर आयोजित होगी। अंतिम प्रतियोगिता हिन्दुस्तानी संगीत के लिये दिल्ली तथा कर्नाटक संगीत के लिये चेन्नई में आयोजित की जायेगी ।

      प्रतियोगिता के लिये प्रवेश शुल्क 100 रूपये निर्धारित है, जो केन्द्र निदेशक आकाशवाणी ग्वालियर के पक्ष में मनीआर्डर के द्वारा ही देय होगी । इस प्रतियोगिता में वे सभी प्रतियोगी भाग ले सकेंगे जिनकी आयु 29 जून 2009 को 16 से 24 वर्ष के बीच होगी तथा जो स्थानीय स्वर परीक्षण समिति अथवा स्वर परीक्षण समिति महानिदेशालय द्वारा किसी भी केन्द्र पर अनुमोदित कलाकार नहीं है । प्रतियोगिता विभिन्न  वर्गो में आयोजित होगी । इनमें कंठ संगीत में शास्त्रीय संगीत,उप शास्त्रीय संगीत,सुगम संगीत तथा लोक संगीत,वाद्य संगीत में शास्त्रीय संगीत,सुगम संगीत तथा लोक संगीत,वृन्दागान तथा लोक वाद्य शामिल हैं।

      प्रथम प्रतियोगिता दस अगस्त 09 से 28 अगस्त 09 के मध्य आयोजित की जायेगी। इसमें चयनित प्रतियोगियों की रिकार्डिंग अंतिम प्रतियोगिता हेतु की जायेगी। जिसमें विजेता को पारितोषिक प्रदान किया जायेगा। इच्छुक प्रतियोगी द्वारा प्रतियोगिता के लिये आवेदन पत्र आकाशवाणी ग्वालियर के संगीत अनुभाग से किसी भी कार्य दिवस में प्राप्त किये जा सकते हैं। पूर्ण रूप से भरे हुये आवेदन पत्र कार्यालय में प्राप्त होने की अंतिम तिथि 12 जून 2009 निर्धारित है। इसके बाद प्राप्त आवेदन पत्रों पर विचार किया जाना संभव नहीं होगा। 

लाभकारी है- नीबू वर्गीय फलों की खेत ी


लाभकारी है- नीबू वर्गीय फलों की खेती

Article Presented By: Zonal Public Relations Office, Gwalior-Chambal Zone

ग्वालियर,18 मई 09। नीबू वर्गीय फलों में माल्टा, मौसम्बी, किन्नू, संतरा, लेमन, कागजी नीबू, ग्रेपफ्रूट, चकोतरा आदि आते हैं । गिर्द क्षेत्र की जलवायु लगभग सभी प्रकार के नीबू वर्गीय फलों की खेती हेतु उत्तम है । परन्तु अभी तक इस क्षेत्र में सबसे ज्यादा कागजी नीबू,ही लोकप्रिय है एवं अधिकांश क्षेत्रों में इसकी खेती बड़ी आसानी से की जा रही है । माल्टा,मौसम्बी,नारंगी एवं किन्नू के पौधे भी जहाँ पर लगाये गये हैं उनकी वानस्पतिक वृद्वि व फलत अच्छी है । सीडलैस नीबू लगाने की इस क्षेत्र में काफी संभावनायें हैं ।

नीबू वर्गीय फलों की वृद्वि एवं फलत प्रारम्भ में अच्छी होती है । परन्तु समुचित रख-रखाव के अभाव में कुछ समय पश्चात इनकी वृद्वि धीरे-धीरे कम होने लगती है । प्रतिकूल घटकों के प्रभाव से नीबू वर्गीय फलों में हृास के लक्षण जैसे पौधों में पत्तियाँ पीली व छोटी हो जाना,टहनियाँ सूखना,फलों का आकार छोटा होना एवं फलत कम हो जाने से धीरे-धीरे पौधा अनुत्पादक हो जाता है । नीबू वर्गीय फलों के पौधों के ह्रास को रोकने के लिए एवं नये बगीचे लगाने से पहले कुछ जानकारियां रखना नितान्त आवश्यक होता है । मसलन उद्यान लगाने हेतु दोमट एवं बलुआ दोमट भूमि अच्छी रहती है जिसमें उचित जल निकासी हो सके।

भूमि का पी एच. मान 6 से 7.5 के बीच हो। स्वस्थ एवं विश्वसनीय स्त्रोत के पौधे ही रोपे जावें। पौधों को लगाते समय गङ्ढों में 40 ग्राम क्लोरोपाइरीफास दवा एवं 25 किलो सड़ा गोबर खाद/कम्पोस्ट  तथा 100 ग्राम डी.ए.पी.,125 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटास डालें। फिर एक-दो पानी लगाने के बाद 125 ग्राम यूरिया प्रति वर्ष दें । इस मात्रा को पौधों की उम्र के हिसाब से हर साल बढ़ाते रहें । जब पौधे की उम्र दस साल हो जाये तब खाद एवं उर्वरक की मात्रा स्थिर कर देना चाहिये । उर्वरक की आधी मात्रा सितम्बर तथा आधी दिसम्बर में देना चाहिये । इसके अलावा दस साल की उम्र के पौधे को लेश तत्व 15 किलो मैग्नीशियम तथा 30 किलो सल्फर का उपयोग करें । साथ ही जिंक,कॉपर,बोसन,कैल्सियम,आयरन आदि सूक्ष्म तत्वों का भी छिड़काव करें ।

समय-समय पर उद्यानों/बगीचों में लगाये पौधों का अवलोकन कर उनके थालों की साफ सफाई एवं निंदाई-गुड़ाई तथा सिंचाई करते रहना चाहिये । जुलाई-अगस्त के महीनों में कागजी नीबू एवं किन्नू के पौधों में केंकर का प्रकोप अधिक होता है । अत: इसकी रोकथाम हेतु 3 ग्राम ब्लीटोक्स प्रति लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़कें तथा स्ट्रेप्टोसायक्लीन दवा का 100-200 ग्राम पी.पी.एम.का घोल का दो-तीन बार 15 दिनों के अन्तर से छिड़काव करें । यदि पौधों की जड़ों एवं तनों पर गौंद निकल आये तो 450 ग्राम कॉपर सल्फेट, 900 ग्राम चूना 9 लीटर पानी में घोलकर प्रभावित जड़ तनों की छाल छील कर लेप कर दें।

साधारणत: पोषक तत्वों की कमी के लक्षण अलग-अलग पहचानना कठिन होता है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए जिंक सल्फेट 2.25 कि.ग्रा.,कॉपर सल्फेट 1.35  कि.ग्रा.,मैग्नीशियम सल्फेट 0.90 कि.ग्रा.,फेरस सल्फेट 0.90कि.ग्रा.,बोरिक अम्ल 0.45 कि.ग्रा.,मैग्नीशियम सल्फेट 0.90 कि.ग्रा.,यूरिया 4.50 कि.ग्रा.,चूना 4.00कि.ग्रा.,पानी 450 लीटर में घोल बनाकर छिड़काव करें। यह घोल एक हेक्टर क्षेत्र के लिए पर्याप्त होगा ।

पुराने उद्यानों का जीर्णोद्वार-ऐसे बगीचे जो देखरेख की कमी के कारण अनुत्पादक हो गये हैं । उनकी अच्छी देखभाल कर आर्थिक दृष्टि से उपयोगी बनाया जा सकता है । दिसम्बर के अन्तिम सप्ताह में पौधों की सूखी टहनियों की कटाई छंटाई करें। थालों की गुड़ाई कर प्रति पेड़ एक किलोग्राम डी.ए.पी.,750 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटास तथा 40-50 किलो ग्राम सड़े हुए गोबर खाद को भली भाँति मिला दें। तत्पश्चात पेड़ों की सिंचाई करें। जनवरी-फरवरी में फूल आने के बाद सिंचाई कम करें। नमी बनाये रखें जब तक फल सेट नहीं हो जाता अप्रैल में 750 ग्राम यूरिया,750 ग्राम म्यूरेट ऑफ पोटास प्रति पेड़ की दर से गुड़ाई कर थालों में मिला दें । 3-5 ग्राम एग्रीमीन नामक दवाई प्रति लीटर पानी में छिड़काव करें । जुलाई-अगस्त में क्लाइटॉम्स या डायथेन जेड-78 दवा 3 ग्राम एक लीटर पानी में तथा यूरिया 1-2 प्रतिशत का घोल एक साथ मिलाकर छिड़काव करें । पुराने अनुत्पादक बगीचे से अधिक आर्थिक लाभ मिलेगा ।

नीबू वर्गीय फलों की उन्नत ढंग से खेती करने या इससे सम्बंधित समस्या के निराकरण हेतु जिले के उपसंचालक उद्यान एवं सहायक संचालक उद्यान तथा विकास खण्ड स्तर पर उद्यान अधीक्षक एवं ग्रामीण उद्यान विस्तार अधिकारियों से सम्पर्क कर सकते हैं । 

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