नर्रा रहे मीडिया का टेंटुआ ऐंठा, बिज ली पानी पूरी तरह बन्द, ग्वालियर चम् बल में कोहराम


नर्रा रहे मीडिया का टेंटुआ ऐंठा, बिजली पानी पूरी तरह बन्द, ग्वालियर चम्बल में कोहराम

19 घण्टे तक चैलेन्ज के साथ ठोक के बिजली कटौती, पानी सप्लाई अपने आप ही बन्द

हम अमन चाहते हैं जुल्म के खिलाफ, फैसला गर जंग से होगा तो जंग ही सही !

ग्वालियर/ भिण्ड/ मुरैना/ श्योपुर 16- 27 जून 09 , सरकार से पंगा यानि खुलेआम दंगा ! ग्वालियर चम्बल संभाग में पिछले 1 जून से की जा रही अंधाधुन्ध अघोषित कटौती पर जहाँ आम जनता और वकीलों ने सड़को पर उतर कर आन्दोलन तथा विरोध प्रदर्शन के जरिये भारी भभ्भर मचा रखा था वहीं मीडिया दनादन और धुऑंधार बिजली कटौती के खिलाफ खबरें लगाने में जुटा था !

अंतत: सरकार को जो करना था वह उसने कर डाला, भारत की दो कहावत बड़ी मशहूर हैं एक तो – काला बामन गोरा ….. इसका मतलब और अर्थ म.प्र. वासी इस समय भली भांति समझ रहे हैं दूसरी भैंस पूंछ उठायेगी तो का करेगी…..गोबर ! यानि जित्ती ज्यादा से ज्यादा बिगाड़ने की ताकत होगी बस उत्ता ही बिगाड़ेगी !

ग्वालियर चम्बल वाले इन दिनों इन कहावतों से रोजाना दो चार हो रहे हैं !

बदला बदला बदला, बदला लेना केवल चम्बल वालों का प्रायवेट हक ही नहीं बल्कि सरकार भी इस हक से परिपूर्ण है !

नर्रा रहे मीडिया और आन्दोलन कारीयों को आखिर सबक सिखाते हुये ग्वालियर चम्बल के समूचे जिले में शहरों और गॉवों में सोमवार 15 जून से सरकार ने खासी रणनीति के तहत विशेष कार्यवाही की ! हुआ ये कि चुन चुन कर कुछ चुनिन्दा क्षेत्र विशेषों में बिजली सप्लाई सुबह नियमित बिजली कटौती के साथ रात 1 बजे तक के लिये पूरी तरह बन्द कर दी ! बिजली सप्लाई बन्द होने से पीने का पानी अपने आप ही बन्द हो गया ! और सरकार के कहर से इन पीड़ित क्षेत्र विशेष में बिजली पानी के लिये त्राहि त्राहि मच गयी ! 23 जून से यह बिजली कटौती सबेरे 6 बजे से रात 3 बजे तक कर दी ।

मजे की बात ये रही कि बिजली घर पर जब इस सम्बन्ध में चर्चा की गयी तो बिजली घर वालों का रिरियाते हुये जवाब था कि का करें साब आप तो जानते ही हैं, हम मजबूर हैं ऊपर से जबरदस्ती बिजली काटने का आदेश दिया है, कारो बामन है, बमहनियाई तो दिखावेगा ! बिजलीघर के इस अप्रत्याशित जवाब को हमने रिकार्ड किया है !

कारो बामन तो स्टेट लेवल पर है लेकिन मुरैना मे तो बनियों की सरकार है, प्रभारी मंत्री, संभाग आयुक्त, कलेक्टर से लेकर एस.ई. जे.ई सब बनिये बैठे हैं, ये बनिये कब से बमहिनयाई करने लगे, हम गरजे, वह फिर रिरियाया ! का करें साब हम पर दया रखना, हम मजबूर हैं !

चलो खैर उस गरीब छोटे कर्मचारी से आगे बात करना बेकार था लेकिन यह अनुभव सारे विश्व के साथ शेयर करने लायक जरूर है !

खैर बिजली काटने से हमें नुकसान कम सरकार को नुकसान ज्यादा है , समाचार नहीं प्रकाशित होते तो साली सरकार के नहीं छपते, हमारा आलेख कभी रूकता नहीं, पूरी दम लगा लें तो भी रोक नही सकते !

खैर म.प्र. स्वर्णिम राज्य बनने जा रहा है, पूत के पाँव पालने में नजर आ रहे हैं, जब आप पूरे संभाग में पूरी प्रशासनिक सरकार केवल एक जाति विशेष की बैठा देते हैं तब ऐसा ही होता है, यह हमारा पुराना अनुभव है ! खैर मुरैना की सरकार तो सेठ जी के हाथों में है सो यहाँ जो भी अफसर रहेगा सेठ जी का आदमी ही रहेगा, कोई हैरत की बात नहीं ! पता नहीं कैसे पुलिस विभाग में अभी तक बनिये क्‍यों नहीं भेजे , मुख्‍यमंत्री शिवराज सिंह जी हमारी इल्‍तजा है कि मुरैना पुलिस जो अब तक ठीक ठाक चल रही है, कोई बनिया एस.पी. और सी.एस.पी. तलाश के मुरैना भिजवा दो, दूसरी जाति के अफसर शोभा नहीं दे रहे और ऐसे लग रहे हैं जैसे बगुलों के बीच में हँस घुस बैठे हों । बनिये कलेक्‍टर और कमिश्‍नर यहॉं पहले भी रहे हैं लेकिन सरकार की आजादी से लेकर ऐसी दुर्दशा हमने आज तक नहीं देखी । और हॉं लगे हाथ एकाध बनिये को जिला पंचायत और शिक्षा विभाग में भी भिजवा देना, जिससे बनिया प्रशासन की टेढ़ी नजर इन विभाग पर से हट जाये । बनिया प्रशासन अभी उन्‍हीं विभागों पर कहर ढा रहा है जहॉं बनिये अफसर नहीं हैं ।

अभी प्रभारी मंत्री की पत्रकारवार्ता को गुजरे महज दो हफ्ते ही गुजरे हैं और बिजली कटौती पर प्रभारी मंत्री की पत्रकारों ने 70 फीसदी टाइम तक खिंचाई की ओर मंत्री को बिना जवाब दिये ही पत्रकार वार्ता खत्म करके बिलबिलाते हमने ऑखों से देखा था ! संयोग देखिये कि प्रभारी मंत्री भी बनिया है ! यानि ऊपर से नीचे तक तराजू तनी है !

अब का कहिये – अंजामे गुलिस्तां का होगा, हर जगह तराजू ठुकी हुयी ! तौल के मिलेगी पानी और बिजली, नर्राओगे तो टेंटुआ दाब के कटेगी बिजली और पानी !

बनिया प्रशासन के कारनामों पर हमने पूरी रिपोर्ट तैयार की है और हम जगत को बताने के भारी इच्‍छुक हैं कि कैसे चम्‍बल में इन दिनों हर चीज पर हर सरकारी काम पर सौदेबाजी होती है और भ्रष्‍टाचार का नंगा ताण्‍डव चम्‍बल में चल रहा है, केवल भ्रष्‍टाचार ही नहीं बल्कि कई नंगे सच इस रिपोर्ट में हैं । हमें नहीं लगता कि आपका बनिया प्रशासन इसे छपने देगा , हॉंलांकि इस रिपोर्ट का 70 फीसदी भाग चम्‍बल पर और 30 फीसदी भाग समूचे मध्‍यप्रदेश पर है , हम आपके स्‍वर्णिम मध्‍यप्रदेश के कुछ राज फाश करने के लिये बेताब हैं, कुछ मामले तो तत्‍काल कार्यवाही योग्‍य हैं । बिजली रही तो वायदा है जल्‍दी ही इसकी पूरी श्रंखला छापेंगें भी और कार्यवाही भी करवायेंगें । आप नहीं करोगे तो कोई और करेगा । विष वृक्षों को उखाड़ फेंकना अपना पुराना शौक है । हम इसे उखाड़ फेंकेंगे यह हमारा प्रण है । बिजली नहीं रहे ये दुआ करना, जब तक बिजली नहीं तभी तक टोपी सलामत मानना सेठजी ।

ये भारत का नया संविधान है, नया संस्करण है भईये जहाँ हर अफसर, मंत्री और मातहत बनिया होवेगा, तराजू साथ रखेगा, ठाला बैठा तौल बॉट करेगा, धरजा और मरजा का राग अलापेगा ! ऐसी की तैसी लोकतंत्र की करेगा ! जय श्री राम, जय हिन्द, जय भारत !

जल प्रेम का इतिहास बताती ग्वालियर की बावड़ियाँ


जल प्रेम का इतिहास बताती ग्वालियर की बावड़ियाँ

देव श्रीमाली

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा ग्रामीण पत्रकारिता विकास संस्थान के अध्यक्ष हैं)

ग्वालियर संगीत की नगरी है । इसी जमीं पर मियाँ तानसेन उर्फ तन्ना मिश्रा ने संगीत का ककहरा सीखा । संगीत सम्राट बने और बादशाह अकबर के नौ रत्नों में शुमार हुए । तोमर राजवंश के महान शासक राजा मानसिंह तोमर ने यहीं पर ‘ध्रुपद’ की रचना की। लेकिन संगीत ही नहीं ग्वालियर के शासकों का प्रेम जल संरक्षण को लेकर भी उतना ही प्रगाढ़ रहा है जितना संगीत के प्रति । इसकी गवाही देने के लिए आज भी ग्वालियर शहर के कोने – कोने पर कहीं जीर्ण शीर्ण तो कहीं ठीक ठाक हालत में मौजूद बावड़ियों के अवशेषों से स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है ।

ग्वालियर बावड़ियों के लिहाज से इतना समृध्द है और इनका निर्माण इतने शानदार स्थापत्य के साथ और कलात्मक तरीके से कराया गया है कि आज के इंजीनियर तक इन्हें देखकर चमत्कृत हो जाते हैं । यही वजह है कि कई बार तो जल संरक्षण से जुड़े लोग कहते हैं कि ग्वालियर को सिर्फ संगीत ही नही बल्कि ” संगीत और बावड़ियों का शहर ” कहा जाना चाहिए ।

दरअसल ग्वालियर का जन्म ही चमत्कारिक जल के जल संरक्षण के प्रयासों के साथ ही हुआ अर्थात ग्वालियर राज्य की नींव ही एक बावड़ी की स्थापना के साथ हुई । ग्वालियर के ऐतिहासिक दुर्ग का निर्माण गोपगिरि पर्वत पर किया गया जो बाद में गोपाद्रि और उसके बाद गोपाचल पर्वत कहलाया । फजल अली के एतिहासिक ग्रंथ – ‘कुलियाते ग्वालियर’ जो कि अकबर के शासन काल में लिखा गया था, मैं ग्वालियर के क्षेत्रीय इतिहास के उपलब्ध फारसी स्त्रोतों में लिखा है – ” विक्रमादित्य के हुकूमत के 332 वर्ष गुजरे थे और हिजरी सन् 332 वर्ष पूर्व एक जमींदार सूरसेन का था, उसने ग्वालियर किले की बुनियाद रखी । उसने प्रथम निर्माण ‘ सूरजकुंड ‘ के रूप में करवाया तथा ग्वालिपा ऋषि के आर्शीवाद से 36 वर्ष राज्य किया । इस मामले को लेकर एक किंवदंती थी इस अंचल में शताब्दियों से प्रचलित है । इसके मुताबिक सूरसेन कोढ़ रोग से पीड़ित था और बड़ा जमींदार होने के बावजूद अपने इस रोग के कारण बहुत दु:खी रहता था । एक बार वह जंगल में भटकते हुए गोपगिरि पर पहुँच गया जहाँ ग्वालिपा ऋषि तपस्यारत थे । प्यास से व्याकुल सूरसेन को देखकर ग्वालिपा ऋषि ने उससे कहा -” बहुत दु:खी और परेशान हो । जाओ सामने के कुण्ड में जाकर हाथ धोकर पानी पी लो ।” ऋषि ग्वालिपा के बताये अनुसार जब वह पास में स्थित छोटे से गड्डे के पास पहुँचा और उसने पानी में हाथ डालकर धोए । पानी पीकर प्यास बुझाने के बाद जब उसकी निगाह अपने हाथों पर पड़ी तो वह एकदम चमत्कृत हो गया । उस करिश्माई जल के स्पर्श से सूरसेन के हाथों का कोढ़ जाता रहा । वह प्रसन्नतापूर्वक ग्वालिपा ऋषि के पास जाकर उनके चरणों में जाकर गिर पड़ा । ग्वालिपा ऋषि ने राज करने का आर्शीवाद दिया । सूरसेन से उस गड्डे पर एक भव्य बावड़ी का निर्माण करके ग्वालियर राज्य की स्थापना की । यह ऐतिहासिक बावड़ी आज भी ग्वालियर दुर्ग में स्थित है जो ”सूरजकुंड ” के नाम से जानी जाती है ।

ग्वालियर दुर्ग परिसर में ही एक और दुर्लभ बावड़ी स्थित है – एक पत्थर की बावड़ी । इस अद्भुत वास्तु कौशल से निर्मित बावड़ी का निर्माण तत्कालीन तोमर शासक डूंगरेंद्र सिंह और कीर्ति सिंह (1394-1520) ने कराया । इसकी खासियत यह है कि इसका निर्माण एक ही पत्थर पर काटकर किया गया है । तात्कालीन शासक जैन धर्मावलंबी थे लिहाजा उन्होनें इसमें भगवान पार्श्वनाथ की पद्मासनस्थ प्रतिमा भी निर्मित कराई। दुर्ग परिसर में स्थित यह स्थल देशभर के जैन धर्मावलंबियों का बड़ा तीर्थ क्षेत्र है ।

इस अंचल के लोगों के जल प्रेम का एक और किस्सा विश्व विख्यात है । यह है ग्वालियर के राजा मानसिंह तोमर और एक गूजरी निन्नी की प्रेम कहानी, जो इतिहास में मृगनयनी के रूप में जानी जाती है । कहा जाता है कि राजा मानसिंह तोमर शिकार के लिए राई गाँव की ओर गये । रास्ते में दो भैंसो की लड़ाई हो रही थी जिससे मार्ग अवरूध्द हो गया। यह लड़ाई देखने के लिए राजा भी खड़े हो गये । पास मे ही गाँव की कुछ कन्याएँ खड़ी थीं, जो कि गूजर समाज की थी । इनमें एक ने आगे बढ़कर भैंस का सींग पकड़कर उन्हें अलग अलग कर दिया । राजा उस गूजरी की बहादुरी और उसके अद्वितीय नैसर्गिक सौंदर्य पर मोहित हो गए । उन्होनें उसे विवाह का प्रस्ताव दिया । लेकिन निन्नी नामक इस गूजरी ने राजा के समक्ष एक शर्त रखी कि वह तभी शादी करेगी जब उसके पीने के लिए सांक नदी का पानी किले में पहुँचे । राजा मानसिंह ने दुर्ग पर एक पृथक महल बनवाया जो आज भी गूजरी महल के नाम से जाना जाता है और राजा मानसिंह ने मृगनयनी नामक अपनी इस रानी को पीने के लिए सांक नदी से महल तक पानी लाने के लिए पाइप लाइन डलवाई थी किले पर उस जल संरक्षण के लिए एक बावड़ी का भी निर्माण भी कराया था । इनके अवशेष अभी भी ग्वालियर दुर्ग के आसपास मौजूद हैं ।

ग्वालियर में मौजूद कुछ पुरातन ऐतिहासिक बावड़ियॉ :-

यूँ तो ग्वालियर शहर के हर हिस्से में बावड़ियों के अवशेष मौजूद है, जिनकी संख्या सैकड़ों में है । इनमें से अनेक नष्ट हो गई । कुछ अतिक्रमण का शिकार हो गई और कई सिकुड़कर कुएँ में तब्दील हो गई ।ऐसी कुछ बावड़ियों की जानकारी को दो भागों में बॉटा जा सकता है :- (क) ग्वालियर दुर्ग की बावड़ियाँ और (ख) शहर में स्थित बावड़ियाँ ।

(क) ग्वालियर दुर्ग

भारत में ऐसे कम ही ऐसे दुर्ग है जहाँ इतनी ऊँचाई पर जल प्रदाय व्यवस्था के सुचारू प्रयास किये गये हों । यहाँ स्थित प्रमुख बावड़ियाँ इस प्रकार हैं :-

सूरजकुंड :- ग्वालियर ऋषि के कहने पर सूरजसेन ने इसको उत्तम सरोवर में तब्दील किया । माना जाता है कि इस कुंड के निर्माण से निकले पत्थरों से ही दुर्ग के लिए दीवारें बनाई गई । मातृचेट ने इसे सुधारा और पुननिर्माण कराया ।

गंगोला ताल :- दुर्ग पर ही स्थित तालनुमा इस बावड़ी का निर्माण 8 वीं सदी में किया गया । इसका नाम राजा मानसिंह कालीन गंगू भगत के नाम पर पड़ा । माना जाता है कि इससे निकले पत्थरों से तेली का मंदिर बनवाया गया ।

ग्वालियर दुर्ग के बारे में इब्नबतूता ने जो अपना यात्रा वृतांत लिखा है कि उसके मुताबिक ”किले के अंदर काफी पानी के हौज हैं । किले की दीवार मिले हुए 20 कुएँ हैं जिनके पास ही दीवार में मजनीक और अरादे लगे हुए हैं ।’ यहाँ मध्य युग में 21 कुएँ, सरोवर और बावड़ियों की मौजूदगी का उल्लेख मिलता है । इनमें से जौहर ताल, तिकोनिया ताल, रानी ताल, चेरी ताल, एक खंबा ताल, कटोरा ताल, नूर सागर अभी भी अवशेष की दशा में मौजूद हैं ।

(ख) ग्वालियर शहर

ग्वालियर शहर में बावड़ियों की भरमार रही है । इनमें से कई का तो अब अता पता ही नहीं है । मसलन बेला की बावड़ी के नाम से ग्वालियर में एक प्रसिध्द स्थान है लेकिन वर्तमान में यहाँ कोई बावड़ी नहीं है । इतिहास में लेख है कि राजा मानसिंह ने बेला की बावड़ी का निर्माण कराया था । राजा वीर सिंह ने भी एक बावड़ी बनवाई थी जिसे कालांतर में बॉध के रूप में विकसित किया गया था । इसको हाल ही में सरकार ने पुन: विकसित किया है जो वीरपुर बाँध के नाम से जाना जाता है ।

सिंधिया राज परिवार के शाही निवास जय विलास पैलेस, ऊषा किरण पैलेस, की चहारदीवारी में रहे कई किलोमीटर लंबे परिसर में, जो अब कालोनियों में तब्दील हो गई हैं में दर्जनों बावड़ियाँ जीर्ण शीर्ण हालत में मौजूद है । ग्वालियर शहर में जनकताल, सागर ताल, गजराराजा स्कूल,कमलाराजा कालेज पुराने हाईकोर्ट के पास, माधौनगर, हिरणवन, शारदा विहार, निम्बाजी की खोह में शानदार स्थापत्य वाली बावड़ियों के अवशेष अभी भी मौजूद हैं । इनमें से कुछ बावड़ियों का जीर्णोध्दार भी किया गया है जो नागरिकों के लिए पेयजल की आपूर्ति कर रही है ।यदि बाकी बावड़ियों को संरक्षित एवं पुनर्जीवित किया जाए तो एक ओर तो ग्वालियर की इन ऐतिहासिक धरोहरों का संरक्षण होगा वहीं ये ग्वालियर की पेयजल समस्या से निजात दिलाने में सहायक होंगी ।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार तथा ग्रामीण पत्रकारिता विकास संस्थान के अध्यक्ष हैं)

म.प्र. पी.ई.टी. 2009 का परीक्षा परिणाम घोषित


म.प्र. पी.ई.टी. 2009 का परीक्षा परिणाम घोषित

भोपाल/ मुरैना (ग्‍वालियर टाइम्‍स) 24 जून 09 म.प्र. व्‍यावसायिक प्रवेश परीक्षा मण्‍डल द्वारा आयोजित प्री इंजीनियर टेस्‍ट परीक्षा 2009 पी.ई.टी.- 2009 का परीक्षा परिणाम घोषित कर दिया गया है ।

आज रात 23 जून को 10 बज कर 25 मिनिट पर मण्‍डल द्वारा परीक्षा परिणाम इण्‍टरनेट पर जारी कर दिया गया । रात भर छात्र छात्रायें अपना परीक्षा परिणाम इण्‍टरनेट पर देखते रहे तथा इण्‍टरनेट संचालकों से मोबाइल फोन के जरिये परिणाम पता लगाते रहे । उल्‍लेखनीय है कि विगत 7 जून को पी.ई.टी. की परीक्षा सम्‍पन्‍न हुयी थी ।

राजनीति से लोकनीति, राजनेता से लो कनेता बनाम राजतंत्र से लोकतंत्र- का ंग्रेस की पहल बनाम चिथड़ों से इज्जत ढ ांपने की कवायद


चमचा में गुन बहुत हैं सदा राखिये संग, कांग्रेस रोती फिरे सामन्ती के संग

राजनीति से लोकनीति, राजनेता से लोकनेता बनाम राजतंत्र से लोकतंत्र- कांग्रेस की पहल बनाम चिथड़ों से इज्जत ढांपने की कवायद

नरेन्द्र सिंह तोमर ”आनन्द”

अभी हाल ही में एक खबर पढ़ने में आयी कि कांग्रेस ने राजे रजवाड़े या सामन्ती प्रतीक नाम उल्लेखों के उपयोग पर रोक लगा दी है !

खबर ठीक है, और लगता है कि कांग्रेस देश में आधे अधूरे लोकतंत्र को या राजतंत्र के बदनुमा दागों को साफ कर साफ सुथरा परिपक्व लोकतंत्र लाना चाह रही है ! साधारण बुध्दि के हर व्यक्ति को यही आभास होगा ! मैंने इस पर चिन्तन किया ! मुझे इसलिये भी विचार करना पड़ा कि मेरा खुद का सम्बन्ध भी रजवाड़े से है और यह अलग बात है कि जो असल रजवाड़े या राजपूत हैं वे आमतौर पर किसी भी सामन्ती नामोल्लेख को नहीं करते ! असल राजा और राजवंश अधिकतर न तो आमतौर पर कुंवर, राजा या महाराजा या अन्य ऐसा कुछ लिखते हैं बल्कि सीधे सपाट अपना नाम लिखते हैं ! भारत में राजपूतों व रजवाड़ों में अपने उपनाम को साथ लिखने का सामान्य तौर पर रिवाज है जैसे मैं तोमर हूँ और तोमर राजवंश का प्रतीक उपनाम तोमर जो कि मुझे जन्म से ही मिला हुआ है अब भई इसे मैं कैसे छोड़ सकता हूँ !

अब तोमर राजवंश ने दिल्ली बसाई, महाभारत जैसा महान युध्द लड़ा, इन्द्रप्रस्थ निर्मित किया, महाराजा अनंगपाल सिंह ने दिल्ली में लालकोट बनवाया, लोहे की कील गड़वाई (लौह स्तम्भ) या सूरजकुण्ड हरियाणा में ठुकवा दिया या ऐसाह में गढ़ी बसाई या महाराज देववरम या वीरमदेव ने ग्वालियर पर तोमर राज्य स्थापना की तो इसमें मेरा क्या कसूर है ! अगर पुरखों को पता होता कि सन 2009 में जाकर उनके वंशजों को उनके कुकर्मों का दण्ड भोगना पड़ेगा और अपने होने की पहचान खत्म करना पड़ेगी और तोमर होना या कहलाना एक राजनीतिक दल विशेष के लिये अयोग्यता हो जायेगी या भारतीय जीवनतंत्र में उन्हें बहिष्कृत होना पड़ेगा तो वे काहे को ससुरी दिल्ली बसाते काहे को राज्य संचालन करते काहे को महाभारत लड़ते और काहे को इस भारत की सीमाये समूची एशिया तक फैलाते ! काहे को भगवान श्रीकृष्ण के वसुदैव कुटुम्बकम सिध्दान्त पर अमल कर अमनो चैन का शासन करते !

अब कुछ लग रहा है कि पुरखों ने दिल्ली बसा कर ही गलत कर दिया न दिल्ली होती न देश में टेंशन होता ! दिल्ली की वजह से पूरे देश में टेंशन है ! खैर चलो अच्छा हुआ कि हम किसी सामन्ती लफ्ज का इस्तेमाल नहीं करते, चलो अच्छा है कि हम कांग्रेस में नहीं है, अब तो भविष्य में भी नहीं जाना है, नही ंतो पता चलेगा कि चौबे जी छब्बे बनने गये थे और दुबे बन कर लौट आये यानि रही बची नाक और दुम कटा कर नकटा और दुमकटा भई हमें तो नहीं बनना ! ना बाबा ना ! कतई ना !

खैर यह कोई नई बात नहीं कांग्रेस ऐसे औंधे सीधे काम पहले से ही करती आयी है उसके लिये भगवान श्री राम एक काल्पनिक व्यक्ति थे, महाभारत एक काल्पनिक युध्द था ! होगा भई होगा कांग्रेस के लिये होगा, हमारे तो पुरखों ने लड़ा है सो भईया हम तो मानेंगे, मानेंगे मानेंगे !

चलो हमारी बात हम तक ठीक है वह तो खैर है कि भारत के कुछ राजपूत अपना उपनाम नहीं लिखते जैसे उ.प्र. के कुछ हिस्सों में कई राजपूत महज सिंह लिखते हैं यही हाल कुछ और प्रदेशों में भी है !

मेरे ख्याल से टाइटलिंग अक्सर वे करते हैं जो जनाना चाहते हैं और जताना चाहते हैं कि वे किसी राजघराने से हैं या राजपूत हैं या दो नंबर के राजपूत हैं (दो नंबर के राजपूत- यह राजपूतों का कोडवर्ड है भई इसका अर्थ है गुलाम राजपूत या मीठा पानी या जिनके खानदान में गड़बड़ आ गयी है) या नकली या फर्जी राजपूत जिन्हें बताना पड़ता है कि वे राजपूत हैं या वे कहीं के राजा रहे हैं ! कांग्रेस में कुछ ज्‍यादा ही नकली और फर्जी राजे रजवाड़े हैं जिनका काम स्‍वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों का साथ देना और उनकी चमचागिरी व जी हुजूरी करना ही था (हम नहीं कहते भारत का इतिहास कहता है) इन लोगों ने भारतीय स्‍वतंत्रता सेनानीयों और क्रान्तिकारीयों की अंग्रेजों के साथ मिलकर या उनका साथ देकर हत्‍यायें कीं और देश को आजाद होने में तकरीबन 100 साल (1657 से 1947 तक) लगवा दिये 1 देश के ये गद्दार आज कांग्रेस की ही शान नहीं बल्कि भारत के महान व माननीय हैं , इसीलिये कांग्रेस कहती है कि आजादी की लड़ाई से उसका रिश्‍ता रहा है, हॉं सत्‍य है आजादी की लड़ाई के गद्दारों की फौज उसके पास है । अभी हाल ही में महारानी लक्ष्‍मीबाई का बलिदान दिवस 18 जून को गुजरा, आजादी की लड़ाई से रिश्‍ता बताने वाली कांग्रेस के किसी भी सिपाही को शहादत साम्राज्ञी का नाम तक स्‍मरण करने की सुध नहीं आयी , आखिर आती भी क्‍यों महारानी लक्ष्‍मीबाई का कोई वंशज कांग्रेस में नहीं है , हॉं महारानी लक्ष्‍मीबाई की शहादत जिसके कारण हुयी वह गद्दार जरूर कांग्रेस में है और माननीय एवं कांग्रेस के कर्णधार हैं । आप नहीं जानते तो बता देते हैं कि एक फर्जी रजवाड़ा ऐसा भी है जिसे महारानी लक्ष्‍मीबाई के शहादत स्‍थल पर जाने की इजाजत नहीं है । और कांग्रेस यानि आजादी की लड़ाई वाली कांग्रेस का सच्‍चा सिपाही है । मालुम है क्‍यों …….नहीं तो पता लगा लीजिये । शायद इसीलिये कांग्रेस को भारत के असल इतिहास से चिढ़ है और उसे बार बार बदलने और तोड़ने मोड़ने मरोड़ने की नौटंकी रचती रहती है । उसका वश चले तो भारत का इतिहास पूरी तरह खत्‍म ही कर डाले, यहॉं की सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक परम्‍परायें पूरी तरह नेस्‍तनाबूद कर डाले । भगवान राम, भगवान श्री कृष्‍ण, राजा हरिश्‍चन्‍द्र, महाराणा प्रताप सब के सब काल्‍पनिक मिथक हैं 1

हालांकि आज न राजा रहे न रजवाड़े मगर राजा रजवाड़े और राजपूत के नाम पर कई लोग ऐश फरमा रहे हैं, आज तक राज कर रहे हैं ! मौज मार रहे हैं ! अधिकांशत: इनमें फर्जी या नकली राजा हैं ! जिनका राजवंश या कुल गोत्र खानदान या रजवाई से कोई ताल्लुक नहीं रहा ! मगर आज तो जलजला ऐसे नकली राजाओं का ही है !

कुछ उपाधियां या नाम प्रतीक सामन्ती नहीं होते

अब जब बात छिड़ी है तो लगे हाथ बता दें कि कुंवर, राज, श्रीमंत आदि जैसे पूर्व नाम सम्बोधन सामन्ती नहीं हैं ! भारत के हिन्दू समाज में चाहे वह जाति से बनिया हो या चमार हो या भंगी हो या गूजर हो या ब्राह्मण हो या राजपूत हो अपने दामाद या बिटिया के पति को हमेशा ही कुंवर साहब ही कह कर संबोधित करते हैं यहॉ तक कि पूरा गॉंव ही किसी भी जाति के दामाद को कुंवर साहब ही कह कर बुलाता है या गाँव मजरे में बाहर के मेहमान को कुंवर साहब ही कहा जाता है यह एक सम्मान का श्रेष्ठ आदर देने का एक प्रतीक उल्लेख है न कि सामन्ती प्रतीक ! पता नहीं किस बेवकूफ ने कुंवर जैसे नित्य प्रयोगी शब्द को सामन्ती बता दिया ! पहले तो उस बेवकूफ को ढंग से हिन्दी सीखनी चाहिये फिर भारतीय हिन्दू समाज, संस्कार व सभ्यता को जानना चाहिये !

मेरे गाँव में एक युवक है जिसका नाम है कुमरराज या अधिक शुध्द हिन्दी में कहें तो कुंवर राज ! बेचारा गरीब किसान है सबेरे खा ले तो शाम का हिल्ला नहीं ! उसकी तो ऐसी तैसी हो गयी ! इसे तो गारण्टी से जिन्दगी में कांग्रेस में एण्ट्री नहीं मिलेगी ! भारत के गाँवों में हजारों लाखों कुअर सिंह, कुंवर सिंह, कुवरराज भरे पड़े हैं कांग्रेस के लिये ये अछूत हो गये !

श्रीमंत शब्द भी सामन्ती नहीं है भाई ! या तो आप सही हिन्दी नहीं जानते या फिर हिन्दू समाज के बारे में अ आ इ ई नहीं जानते ! हिन्दूओं में किसी को भी श्री लगा कर सम्बोधित करना बहुत पुराना रिवाज है और श्री का अर्थ होता है लक्ष्मी ! श्री और मन्त को मिलाने पर बनता है श्रीमन्त अर्थात लक्ष्मीमन्त या लक्ष्मीवन्त या लक्ष्मीवान यानि अति धनाढय व्यक्ति यानि श्रीमंत बोले तो नगरसेठ !

श्रीमंत शब्द राजा या रजवाड़े का प्रतीक नहीं है बल्कि अधिक पैसे वाले का द्योतक है ! श्रीमंत शब्द ग्वालियर के सिंधिया परिवार के लिये प्रयोग किया जाता रहा है ! और जिसका साफ अर्थ है कि अति धनाढय होने के कारण इस परिवार को श्रीमंत कह कर पुकारा गया न कि राजा या सामन्ती कारणों से !

एक कहानी – नाम में क्या धरा है

एक बहुत पुरानी कहानी है, हिन्दी में है और लम्बे समय तक स्कूलों में पढ़ाई जाती रही है जिसका शीर्षक है – नाम में क्या धरा है ! कांग्रेस को इसे पढ़ना चाहिये !

साथ ही यह भी पढ़ना चाहिये –

जात न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान !

मोल करो तलवार का पड़ी रहन दो म्यान !!

वैसे मेरे विचार में कांग्रेस शायद कुछ और करना चाहती होगी लेकिन भटक गयी और कर कुछ और बैठी ! कांग्रेस की सबसे बड़ी समस्या सामन्ती प्रतीक या सामन्तीक नामोल्लेख नहीं बल्कि उसके नेताओं का सामन्ती रवैया एवं आचरण है ! उसके पास नेता कम और चमचे ज्यादा हैं ! उसके जो चन्द नेता हैं उन्हें रूआब जमाने और चमचे पालने का खासा शौक है ! कांग्रेस में टिकिट तक किसी न किसी की चमचागिरी से ही मिलता है ! और उसका नेता जो कि अपने खास व अंधे चमचे को टिकिट दिलाता है ! पॉच साल तक उसके चुन लिये जाने के बाद भी उसे नेता नहीं बनने देता बल्कि चमचा बनाये रखता है और अपने दरवाजे पर ढोक बजवाता है !

ग्वालियर चम्बल में आप जैसे ही कांग्रेस टिकिटों की बात करते हैं तो हर चुनाव में पत्रकार पहले ही अखबारों में संभावित नाम उछाल देते हैं और कांग्रेस के उम्मीदवार बता देते हैं ! क्या आप बता सकते हैं कि ऐसा कैसे होता है ! ग्वालियर चम्बल के पत्रकार इसका अधिक सटीक उत्तर दे सकते हैं, पत्रकार अपनी पैमायश का फीता योग्यता या निष्ठा या पात्रता के आधार पर नहीं बल्कि चमचागिरी के आधार पर तय करते हैं और यह जान लेना बड़ा आसान है कि कौन कितना बड़ा चमचा है ! जो जितना बड़ा चमचा उसकी दावेदारी उतनी ही अधिक मजबूत !

जो चमचा है वह नेता कैसे हो सकता है , चमचा तो सदा चमचा ही रहेगा वह नेता कभी नहीं बन सकता, इसलिये अभी तक ग्वालियर चम्बल में कांग्रेस नेता पैदा नहीं कर सकी ! चमचों को नेता बनाना एक असंभव काम है ! जो कांग्रेस से बाहर रहे वे नेता बन गये ! हाल के विधानसभा और लोकसभा चुनाव परिणाम इसका स्पष्ट जीवन्त उदाहरण हैं !

कांग्रेस को सही मायने में लोकतंत्र लाना है तो सामन्ती प्रतीक या नामोल्लेखों के पचड़े से दूर अपने नेताओं के सामन्ती आचरण व व्यवहार से छुटकारा पाना होगा, चमचे पालने वाले नेताओं को हतोत्साहित करना होगा ! चमचे हटेंगे तो नेता अपने आप आ जायेंगे ! नेता किसी का चमचा नहीं हो सकता, नेता चाहिये तो चमचे खदेड़िये ! नेताओं के सामन्ती आचरण व व्यवहार को सुधारिये ! फिर आपको जरूरत ही नहीं पड़ेगी तथाकथित नाम प्रतीक उल्लेखों को रोकने की ! चमचे ढोक बजाना बन्द कर देंगें तो कांग्रेस का खोया रूतबा लौट आयेगा ! वरना गालिब दिल बहलाने को खयाल अच्छा है !

चमचा में गुन बहुत हैं सदा राखिये संग , सदा राखिये संग, काम बहुत ही आवें !

गधा होंय बलवान प्रभु भगवान बचावे, डाके डाले पापी जम के कतल करावे !!

चरणन चाटे धूल, चमचा महान बतावे, खुद ही जावे भूल मगर सबन को गैल बतावे !!

राम प्रसाद विस्मिल : 18 जून को मनाया जायेगा अमर शहीद रामप्रसाद विस् मिल का जन्म दिन


राम प्रसाद विस्मिल : 18 जून को मनाया जायेगा अमर शहीद रामप्रसाद विस्मिल का जन्म दिन

सरफरोशी की तमन्‍ना अब हमारे दिल में है …

मुरैना 15 जून 2009/ गोली और बोली तथा डकैतों के लिए कुख्यात चम्बल अंचल को अमर शहीद रामप्रसाद विस्मिल की पितृभूमि के नाम से भी जाना जाता है । उनके पितामह नारायण सिंह तोमर मुरैना जिले के ग्राम बरवाई में रहा करते थे । गरीबी से तंग आकर वे ग्राम बरवाई को छोड़कर शाहजहांपुर जाकर बस गये । उनके ज्येष्ठ पुत्र मुरलीधर के यहां क्रांति के अमर सपूत रामप्रसाद का जन्म 18 जून 1897 (ज्येष्ठ शुक्ल 11 सम्बंत 1954 )को हुआ । उनकी मां का नाम मूलमती देवी था । उनके जन्म दिन को यादगार दिवस के रूप में मनाने के लिए 18 जून 2009 को ग्राम बरवाई में भव्य समारोह का आयोजन किया जायेगा ।

अमर शहीद रामप्रसाद विस्मिल के हृदय में परमानंद भाई के प्रभाव में आने पर देश भक्ति के भाव जागृत हुए । लाहौरकांड में परमानंद भाई को फांसी की सजा दी गई । उसी समय रामप्रसाद विस्मिल ने ब्रिटिश राज्य का नाश करने की प्रतिज्ञा ली और चाकू, लाठी, भाला , पिस्तौल आदि चलाना सीखा । उन्होने अपना क्रांति दल बनाया । मैनपुरी षडयंत्र में उनका वारंट जारी हुआ । गिरफ्तारी से बचने के लिए उन्होंने चम्बल के बरवाई में आकर रहना शुरू कर दिया । क्रांति दल ने अंग्रेज राज्य का धन लूटने की योजना बनाई और रामप्रसाद विस्मिल की अगुआई में 9 अगस्त 1925 को काकोरी के पास रेल रोक कर ब्रिटिश सरकार का धन लूट लिया । इससे ब्रिटिस सरकार दहशत खा गई और काफी प्रयासों के बाद क्रांति के अमर सपूत रामप्रसाद विस्मिल को गिरफ्तार करने में सफल हुई । 19 दिसम्बर 1926 को गोरखपुर की जेल में उन्हें फांसी दी गई । मुरैना जिले के ग्राम बरवाई में उनकी याद को चिर स्थाई बनाने के लिए स्मारक बना हुआ है ।

ग्वालियर किले के मंदिर शैलोत्की र्ण प्रतिमाएं व चैत्य गुफाएँ -श्रीम ती राजबाला


ग्वालियर किले के मंदिर शैलोत्कीर्ण प्रतिमाएं व चैत्य गुफाएँ

-श्रीमती राजबाला

दिल्ली से 318 किलोमीटर व आगरा से मात्र 110 किलोमीटर दक्षिण में आगरा-मुम्बई राष्ट्रीय मार्ग पर ऐतिहासिक शहर ग्वालियर है, जिसके माथे पर मुकुट की भांति विराजमान ग्वालियर किला जनमानस के बीच कौतूहल का सबब रहा है। मुस्लिम इतिहासकार हसन निजामी ने अपनी पुस्तक ताजुल – मसअर में किले को हिन्दुस्तान के तमाम किलों की मणिमाला में प्रमुख मोती निरूपित किया है। ग्वालियर का उल्लेख पौराणिक गाथाओं में भी मिलता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ग्वालियर किले का अस्तित्व हजारों वर्ष पुराना है। मध्य युगीन काल के प्रतिहारी कच्छपघाती शासकों तत्पश्चात, तोमर वंशी राजाओं के शासन काल में हुए कला एवं सांस्कृतिक विस्तार ने ग्वालियर किले को नई पहचान दी। किले पर जहाँ भारतीय स्थापत्य की दृष्टि से विलक्षण भव्य महल हैं, वही हिन्दू व जैन मंदिर एवं शैलोत्कीर्ण गुफाएँ भी बेमिसाल हैं । हालांकि आज अधिकांश मंदिर व मूर्तियां यवन आक्रान्ताओं की क्रूरता की मूक साक्षी बनी कालजयी हस्ताक्षर सी भग्नावेशों के रूप में विद्यमान है।

ग्वालियर किला जिस पर्वत पर स्थित है उसे गोपाचल पर्वत कहते हैं। विभिन्न अभिलेखों में गोपाचल पर्वत के अन्य नामों का भी उल्लेख मिलता है मसलन गोपगिरि, गोप पर्वत, गोपाद्रि व गोपचन्द्र गिरीन्द्र। जैन मनीषियों के लिये गोपाचल पर्वत एक पवित्र धर्म स्थली है, जहां प्रतिवर्ष महावीर जयन्ती के पावन अवसर पर हजारों श्रध्दालुओं का जमावड़ा होता है। आठवीं से दसवीं शताब्दी में मध्ययुगीन प्रतिहारी कछवाहा (कच्छपघात) शासकों के शासन काल के दौरान वैष्णव, शैव व जैन धर्मों को फलने-फूलने का मौका मिला। तब ग्वालियर का स्वर्णिम युग था ।इस अवधि में स्थापत्य के क्षेत्र में सर्वाधिक सुन्दर व महत्वपूर्ण निर्माण हुये । चतुर्भुज मंदिर, तेली का मंदिर व सासबहू का मंदिर आज भी पर्यटकों के लिये आकर्षण का केन्द्र है।

चतुर्भुज मंदिर

चतुर्भुज मंदिर दौ सौ फुट ऊंचे पहाड़ी चट्टान पर बना है जो एक पहाड़ी को ऊपर से नीचे की ओर काटकर बनाया है। मंदिर मे लगे शिलालेख के अनुसार मंदिर का निर्माण 876-877 ई. में कन्नौज के शासक मिहिर भोज के शासन काल में नियुक्त कोटपाल अल्ल के निर्देशन में बनवाया गया । मंदिर के गर्भगृह में चतुर्भुजी विष्णु भगवान की स्थानक (खड़ी) मूर्ति है । गर्भगृह के सामने स्तम्भों पर टिके मुख्य मंडप की छत के नीचे श्रीकृष्ण की लीलाएं उकेरी गई हैं । स्तम्भों पर कलश, कबूतर, घंटियां, देवी-देवताओं व पशुओं की आकर्षक आकृतियां उत्कीर्ण हैं । यह शैलोत्कीर्ण मंदिर उस समय का शिल्प की दृष्टि से अनूठा प्रयोगवादी निर्माण था । किले पर बने अन्य हिन्दू मंदिरों की तुलना में चतुर्भुज मंदिर दो महत्वपूर्ण भिन्नताएं लिये हैं । एक तो यह मंदिर उत्तर भारतीय आर्य शैली में बना सम्भवत: प्राचीनतम मंदिर है व दूसरा इस मंदिर के गर्भगृह में लगे शिलालेख में विश्व की प्रथम जीरो यानि शून्य का उल्लेख है । मंदिर का मूल शिखर आक्रांताओं द्वारा नष्ट कर दिया गया था जिसे बाद में चूने द्वारा संधारित किया गया है ।

सास-बहू का मंदिर

सास-बहू का मंदिर किले के दक्षिणी भाग में पास-पास बने दो सहस्त्रबाहु मंदिर हैं जो आज सास-बहू का मंदिर नाम से विख्यात हैं । यहां लगे शिलालेख के अनुसार इन देवालयों का निर्माण सन् 1093 ई. में पालवंश के राजा महिपाल कछवाहा द्वारा करवाया गया था । जनश्रुति के अनुसार उन्होंने बड़ा विष्णु मंदिर अपनी माता और समीप बने छोटे मंदिर को अपनी शिवभक्त पत्नी को समर्पित किया था । संभवत: इन्हीं कारणों से सहस्त्रबाहू मंदिर का नाम सास-बहू का मंदिर होकर रह गया ।

गुर्जर शैली में बना यह मंदिर 12 फुट की जगती (चबूतरा) पर निर्मित किया गया है जो 100 फुट लम्बा, 63 फुट चौड़ा व 70 फुट ऊंचा है । मध्य में विशाल मंडप है, जिसकी छत चारों कोनों पर बने खम्भों पर आधारित है । मुख्य मंडप के तीन ओर लघु मंडप हैं तथा चौथी ओर गर्भगृह है । मंडप की छत में आकर्षक कलाकृतियां अंकित हैं । मंदिर की बाहरी व भीतरी दीवारों को तक्षण कला से सज्जित किया गया है । छोटा मंदिर यानि बहू का मंदिर मुख्य मंदिर के मुकाबले छोटा है व इसका वास्तु शिल्प भी अपेक्षाकृत साधारण है ।

मुख्य मंदिर का शिखर टूट चुका है । वर्तमान में इन देवालयों में कोई मूर्ति नहीं है । इन मूर्तियों को यवन हमलावरों ने नष्ट कर दिया था ।

तेली का मंदिर

समूचे उत्तर भारत में द्रविड़ आर्य स्थापत्य शैली का समन्वय यहीं ग्वालियर किले पर तेली मंदिर के रूप में देखने को मिलता है । इस मंदिर का वास्तविक नाम तैलंग या तैलंगाना मंदिर रहा होगा । जो बदलते समय के साथ बिगड़ कर तेली का मंदिर कहलाने लगा । लगभग सौ फुट की ऊंचाई लिये किले का यह सर्वाधिक ऊंचाई वाला प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर के निर्माण को लेकर इतिहासकार एकमत नहीं है किन्तु अधिकांश विद्वानों का मत है कि इसका निर्माण कन्नौज के राजा यशोवर्मन ने सन् 750 ई. में करवाया था ।

गंगोलाताल के समीप बना यह मंदिर विशाल जगती पर स्थापित है । शिखर ऊपर की संकरा एवं बेलन की तरह गोलाई लिये हुये है । मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व की ओर है । भीतर आयताकार गर्भगृह में छोटा मंडप है । निचले भाग में 113 लघु देव प्रकोष्ठ हैं जिनमें देवी-देवताओं की मान्य प्रतिमाएें थीं । मंदिर के चारों ओर की बाह्य दिवारों पर विभिन्न आकार प्रकार के पशु-पक्षी, फूल-पत्ते, देवी-देवताओं की अलंकृत आकृतियां हैं । कहीं-कहीं आसुरी शक्तियों वाली आकृतियां एवं प्रणय मुद्रा में प्रतिमाएॅ भी अंकित हैं । प्रवेश द्वार के एक तरफ कछुए पर यमुना व दूसरी तरफ मकर पर विराजमान गंगा की मानवाकृतियां हैं । आर्य द्रविड़ शैली युक्त इस मंदिर का वास्तुशिल्प अद्वितीय है । मंदिर के शिखर के दोनों ओर चैत्य गवाक्ष बने हैं तथा मंदिर के अग्रभाग में ऊपर की ओर मध्य में गरूढ़ नाग की पूंछ पकड़े अंकित है ।

उत्तर भारतीय अलंकरण से युक्त इस मंदिर का स्थापत्य दक्षिण द्रविड़ शैली का है । वर्तमान में इस मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है । पर दरअसल यह एक विष्णु मंदिर था । कुछ इतिहासकार इसे शैव मंदिर मानते हैं । सन 1231 में यवन आक्रमणकारी इल्तुमिश द्वारा मंदिर के अधिकांश हिस्से को ध्वस्त कर दिया गया था । तब 1881–1883 ई. के बीच अंग्रेज हुकमरानों ने मंदिर के पुरातात्विक महत्व को समझते हुये मेजर कीथ के निर्देशन में किले पर स्थित अन्य मंदिरों, मान महल(मंदिर)के साथ-साथ तेली का मंदिर का भी सरंक्षण करवाया था । मेजर कीथ ने इधर-उधर पड़े भग्नावशेषों को संजोकर तेली मंदिर के समक्ष विशाल आकर्षक द्वार भी बनवा दिया । द्वार के निचले हिस्से में लगे दो आंग्ल भाषी शिलालेखों में संरक्षण कार्य पर होने वाले खर्च का भी उल्लेख किया है ।

वर्तमान में मंदिर का केवल पूर्वी प्रवेश द्वार है। मूल मंदिर को दिल्ली के सुलतानों के शासन काल में ध्वस्त कर दिया गया था । हालांकि बाद में ब्रिटिश काल में हुये मरम्मत से मंदिर का मूल स्वरूप नष्ट हो गया है, फिर भी मेजर कीथ मंदिरों के संरक्षण कार्य का बीड़ा उठाने के लिये साधुवाद के पात्र हैं ।

माता भगवती का मंदिर

माता भगवती का मंदिर सूरज कुंड के पूर्वी किनारे पर स्थित है जो 12 वीं शताब्दी का प्रतिहार युगीन सप्तरथी मंदिर है । वर्तमान में मंदिर का वेदिबंध व जंघा का भाग ही शेष है । प्रवेश द्वार व शिखर बाद में बनाये गये हैं ।

वर्धमान मंदिर

वर्धमान मंदिर जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर वर्धमान अर्थात महावीर जी का मंदिर है । इसका निर्माण आठवीं सदी में आम नामक दिकपाल की पत्नी ने जैन मुनि आचार्य बप्प भट्ट सूरी के निर्देशन में किया था । गुर्जर शैली का तीन मंजिला यह भवन 50 फुट ऊंचा व 100 फुट लम्बा था । जैन साहित्य के अनुसार मंदिर में ठोस सोने की वर्धमान की प्रतिमा थी जो आताताईयों द्वारा लूट ली गई । सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद किले पर अंग्रेजों का आधिपत्य हो गया । यहां अंग्रेजी सैनिकों के लिये परेड मैदान बना दिया गया था । वर्तमान में इस मंदिर के प्रांगण में सिंधिया स्कूल का खेल मैदान है ।

शैलोत्कीर्ण शिल्प एवं जैन प्रतिमाएं

भारतीय इतिहास में पत्थरों पर आकृतियां उकरने की कला शैलोत्कीर्ण शिल्प लगभग बाइस सौ वर्ष पुराना है । ग्वालियर किले में विभिन्न स्थानों पर हिन्दू देवताओं व जैन धर्म के तीर्थंकरों की मूर्तियां किले की चट्टानों को काट / तराश कर बनाई गई हैं । किले पर पाई जाने वाली शैलोत्कीर्ण शिल्प को हम दो वर्गों में बाँट सकते हैं। प्रथम वर्ग में 9 वीं शताब्दी में प्रतिहार शासनकाल में मंदिरो के अलावा हिन्दू देवी देवताओं की चट्टानों पर उकेरी गई मूर्तिंयाँ हैं । दूसरे वर्ग में पंद्रहवीं शताब्दी में तोमर शासन काल में जैन धर्मावलम्बियों द्वारा विभिन्न आकार प्रकार की पद्मासन एवं खड्गासन मुद्रा में चट्टानों पर उकेरी गई जैन मूर्तियाँ एवं गुफाएँ है । प्रथम वर्ग की मूर्तियाँ किले पर स्थित लक्ष्मण द्वार एवं हथियापौर के बीच दाहिनी ओर चट्टान को काटकर विशाल शिव के भद्रावतार की मूर्ति है जिसमें गजासुर का वध करते हुए दिखाया गया है । मूर्ति का अधिकांश हिस्सा यवन आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट कर दिया गया था । इसके आगे आयताकार आले में विष्णु एवं सूर्य की स्थानक मूर्तियाँ हैं तथा उमा महेश्वर (पार्वती एवं शिव) की युगल मूर्ति पद्मासन मुद्रा में है । इन मूर्तियों को विशिष्ट अलंकृत शैली में चट्टान पर उकेरा गया है। इनके अलावा महिषासुर मर्दिनी की मूर्तियाँ एवं शिवलिंग उत्कीर्ण है । इसी प्रकार चतुर्भुज मंदिर तथा लक्ष्मण द्वार के मध्य में चट्टानों को काटकर बनाए गये आले में गणेशजी की मूर्ति है । आले की दीवार में संस्कृत में गणेश जी की स्तुति अंकित है । आले के ऊपर दोनों ओर शिव, पार्वती व कुबेर आदि की मूर्तियाँ बनी है । वर्तमान में अधिकांश मूर्तियाँ खण्डित अवस्था में हैं ।

जैन प्रतिमाएँ

दूसरे वर्ग की तोमर वंशी काल खंड में बनी जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरों की विशालकाय से लेकर छोटी- बड़ी कई प्रतिमांएँ हैं । ग्वालियर किले पर छ: अलग -अलग स्थानों पर पहाड़ी चट्टानों को काटकर लघु आकार वाले चैत्य गुफा मंदिर बनाए गये हैं । जैन तीर्थंकरों की ये सभी मूर्तियाँ भारतीय शैलोत्कीर्ण मूर्तिशिल्प का श्रेष्ठ उदाहरण हैं । साथ ही यहाँ के जैन चैत्य गुफा समूह उत्तर भारत में उपलब्ध इस परम्परा के संभवत: अंतिम उदाहरण भी । जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों को उनके पाद-पाठ पर बने खास चिन्हों से पहचाना जा सकता है । जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर की मूर्ति के नीचे बैल की आकृति है । पार्श्वनाथ जी की मूर्ति के पाद आधार पर सर्प की आकृति अंकित है । शंख चिन्ह वाली बाइसवें तीर्थंकर नेमिनाथ भगवान की मूर्तियाँ हैं तथा सिंह चिन्ह वाली चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी की मूर्ति है ।

गोपाचल पर्वत के पूर्वी भाग में एक पत्थर की बावड़ी समूह में छब्बीस चैत्य गुफाएँ हैं जिनमें तीर्थंकरों की स्थानक व आसनानस्थ मूर्तियाँ हैं । ये सभी मूर्तियाँ चट्टानों को काटकर बनाई गई हैं । प्रतिमाओं के पाद पाठ पर शिलालेख भी खुदे हुए हैं । सबसे बाईं तरफ एक पत्थर की बावड़ी है । गुफानुमा प्रवेशद्वार वाली इस बावड़ी की छत को पत्थर के स्तम्भों से टिकाया गया है, जो एक ही चट्टान को काटकर बनायी गयी है । गुफा समूह की दाँई तरफ छब्बीसवीं गुफा में प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की 57 फुट ऊँची विशाल प्रतिमा है जो ऍधेरी गुफा में एक ही चट्टान काटकर अन्दर -अन्दर बनाई गई है जिसे देखकर शिल्पियों के धैर्य एवं लगन का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है । इस गुफा समूह का निर्माण काल पंद्रहवीं शताब्दी का है । अब इस गुफा समूह तक पहुँचने के लिए पहाड़ी को काटकर 50 सीढ़ियाँ बनाई गई हैं ।

किले पर स्थित सभी जैन चैत्य गुफा समूहों में एक पत्थर की बावड़ी चैत्य गुफा समूह सबसे बड़ी है । जिसमें विभिन्न आकार प्रकार की छोटी बड़ी लगभग पन्द्रह सौ जैन प्रतिमाएं हैं। इस गुफा समूह में चट्टान को काटकर बनाई विशाल पत्थर की बावड़ी में आज भी भरपूर पानी है । सम्भवत: पानी की उपलब्धता के चलते जैन मुनि यहाँ तपस्या करते होंगे । कालांतर में यह स्थल धार्मिक स्थल के रूप में पूजा जाने लगा । एक ऐसा ऐतिहासिक दौर आया जब आक्रमणकारियों ने इन प्रतिमाओं को तहस -नहस करने का प्रयास किया । फिर काल क्रम में इनकी गुमनामी का लम्बा अरसा निकल गया ।देश की आजादी के भी कई वर्ष बाद एक पत्थर की बावड़ी गुफा समूह की सुध ली गई । स्थानीय जैन मतावलम्बियों खासकर श्री अजीत बरैया जो श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र गोपाचल पर्वत संरक्षक न्यासके प्रमुख हैं ने इसके जीर्णोध्दार में विशेष भूमिका निभाई । श्री बरैया विगत दो दशकों से इस पवित्र स्थल को हराभरा व रमणीय बनाने के प्रयास में जुटे हैं । जिसका सुफल है कि आज जैन समाज यहाँ आकर श्रध्दा भाव से पूजा पाठ करता हैं ।

दूसरे समूह की मूर्तियाँ किले पर स्थित नूरसागर के पास बड़ी चट्टान को काटकर बनाई गई है । इन गुफाओं में जैन तीर्थंकरों की पद्मासन व खड्गासन मुद्रा में कई प्रतिमांएँ है। गुफा चैत्य के आखिरी सिरे पर बारह फुट ऊँची नेमिनाथ भगवान की खड्गासन प्रतिमा है जो पत्थर के स्तम्भों पर टिके देवालय में स्थापित है । देवालय की छतों व दीवारों पर उनके जन्म से लेकर निर्वाण तक के कथानकों को उत्कीर्ण किया गया है । ये सभी 8 वीं से 10 वीं सदी में निर्मित की गई हैं ।

तीसरे समूह की मूर्तियाँ उरवाई गेट के समीप किले के पश्चिमी भाग में 20 फुट की ऊँचाई पर चट्टानों को तराश कर बनाई गई हैं । जैन तीर्थंकरों की ये मूर्तियॉ कार्योत्सर्ग एवं ध्यान मुद्रा में हैं । सभी मूर्तियों का निर्माण पंद्रहवीं शताब्दी में तोमरवंशी शासक डूंगर सिह के शासन काल में हुआ था । उरवाई गेट के समीप ही बावन गजा मूर्ति समूह की सत्तावन हाथ ऊँचाई वाली भगवान आदिनाथ की प्रमुख प्रतिमां है । यह 20 फुट ऊँचे व 20 फुट चौड़े कक्ष में पहाड़ को काटकर उत्कीर्ण की गई है । किले की जैन प्रतिमाओं में यह सबसे ऊँची प्रतिमा है । उरवाई द्वार के बाहरी भाग में त्रिशला समूह की जैन मूर्तियाँ है जिसमें चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी की माता त्रिशला की मूर्ति लेटी हुई मुद्रा में है ।इस गुफा समूह में भगवान महावीर के जन्म कथानक को कलात्मक ढंग से उत्कीर्ण किया गया है ।

उत्तर पश्चिम दिशा में ढोंढापौर के समीप बने गुफा समूह में कई जैन मूर्तियॉ हैं जो लगभग 50 फुट की ऊँचाई पर अन्दर ही अन्दर कक्ष बनाकर एक ही चट्टान को काटकर निर्मित हैं ।

ग्वालियर का किला जहां सामरिक दृष्टि से खास महत्व रखता था वहीं किले पर बने मदिर व जैन प्रतिमाएं विविधता में एकता व सभी धर्मों का सम्मान करने वाले उस समय के भारतीय समाज को भी दर्शाता है । साथ ही ये हमारे गौरवशाली अतीत और कला वैभव का भी द्योतक है ।

इति।

CBI unleashes a countrywide campaign to curb corruption – All the 16 Heads of Zones conducting Special Drives in their respective areas


CBI unleashes a countrywide campaign to curb corruption – All the 16 Heads of Zones conducting Special Drives in their respective areas

New Delhi, 10-06-2009

CBI has unleashed a countrywide campaign to curb corruption. All the 16 Heads of Zones are conducting Special Drives in their respective areas. In this countrywide operation, searches are continuing in several places and total 67 cases have been registered so far. CBI has also enlisted support from common men by a special drive through SMS campaign on seeking information on these cases or new cases.

During Special Drive in Delhi today, 8 cases were registered in Special Crimes (Hqrs) Zone relating to Forged Scheduled Tribes Certificates. Employees of different government/PSUs had secured jobs on the basis of these forged certificates. Departments covered were, Income Tax, Doordarshan, Delhi Jal Board, C.I.S.F and Oriental Insurance Company Ltd etc. Searches were conducted at the official and residential premises of the officials. Some incriminating documents were also seized.

ACB Delhi has conducted searches in Delhi today at 12 places of the accused 3 Jes & 2 Superintending Engineers (retired). These JEs/Superintending Engineers caused undue advantage of more than Rs. one crore to the contractor and corresponding loss to the Delhi Development Authority during 2003-2005. During searches, 6 bank lockers were found in possession of the accused public servants. So far one locker has been searched from which Rs. 9,72,000/- cash, 10 gold biscuits, 29 gold coins, and 810 grams of gold jewellery have been recovered. The cash available in the bank accounts is around Rs. 60 lakhs. Searches of other lockers are still being continued.

The Economic Offences Zone is conducting searches today in several places at Delhi, Chattisgarh, Katni (MP), Punjab, UP, Bangalore, Nagaland, Jind (Haryana), Bangalore, Rookri (Utrakhand) in 7 separate cases involving data theft, supply of sub standard quality of dolomite to Bokaro Steel Plant, causing undue loss to the Vijaya Bank to the tune of Rs.1,33,70,645/- by proprietor of a Punjab based firm, cheating the Punjab National Bank by violating overall credit facility by another firm, several irregularities in the accounts by not creating any stocks hypothecated to the bank, enhancing the credit facility of the bank without obtaining any collateral securities and obtaining loan fraudulently on production of forged receipts and records to the Punjab National Bank.

Similarly CBI has also conducted raids in special drives today in other parts of India. The details are still coming in.

The consolidated All India position, as of now, is: Total cases 67 including Anti Corruption cases, Economic Offences’ cases, Bank Security & Fraud Cases and Special Crime Cases.

The cases have been reported from Delhi Zone (4), Bhopal Zone (2), Lucknow Zone (8), Chandigarh Zone (4), Patna Zone (4), Kolkata Zone (2), Gauwhati Zone (3), Chennai Zone (5), Hyderbad Zone (3), Mumbai-1 Zone (5), Mumbai-2 (1) Zone, Anti Corruption Zone (3), Economic Offences Zone (8), B&FC Zone (6), Special Crime Zone (8), STF (1).

In order to have demonstrative impact, extensive special drives, preferably at least once every quarter are organized to target the known corrupt departments/organisations and identified public servants so as to attack corruption both at the grassroot and high levels. During these drives, extensive and simultaneous searches/surprise checks are conducted to detect quality cases.

It has also been decided that countrywide SMS campaign will be unleased for a fortnight from now, to elicit detailed information about these cases and to seek information for fresh cases.

मुरैना पुलिस ने दबोचा वाहन लूट ओर चो री करने वाला गिरोह, पौन दर्जन अपराध कबूले


मुरैना पुलिस ने दबोचा वाहन लूट ओर चोरी करने वाला गिरोह, पौन दर्जन अपराध कबूले

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ”आनन्‍द” एवं अतर सिंह डण्‍डोतिया

हमें खेद है मुरैना में भारी बिजली कटौती के कारण इस समाचार के प्रकाशन में विलम्‍ब हुआ

मुरैना 7 जून 09 ! आज मुरैना के अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अनुराग शर्मा ने पत्रकारों को जानकारी देते हुये बताया कि विगत 17 मई को नूराबाद थाना सीमान्तर्गत टेकरी एवं करह आश्रम के बीच डम्पर लूटने वाले गिरोह के तीन सदस्यों को पकड़ने में सफलता प्राप्त हुयी है साथ ही तीन अन्य लोग भी गिरफ्तार कर लूटा गया डम्पर और माल मशरूका भी बरामद किया गया है !

आज पुलिस कण्ट्रोल स्म पर पकड़े गये बदमाशों, लूटे गये बरामद माल मशरूका व डम्पर सहित डम्पर स्वामी नीरज शर्मा और डम्पर के चालक नरेन्द्र सिंह से पुलिस ने पत्रकारों के सामने दृश्य करते हुये बताया कि यह गिरोह पहले भी काफी वारदातों को अंजाम दे चुका है और लम्बे समय से वाहन चोरी और लूट मामलों में संलिप्त था ! गिरोह ने अभी तक 9 मामले ट्रेक्टर उड़ाने के कबूले हैं साथ ही कत्ल के कई मामले में भी गिरोह के सदस्य लिप्त रहे हैं !

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक श्री अनुराग शर्मा ने बताया कि 17 मई को डम्पर क्रमांक एम.पी. 07/ जी- 6792 को चालक नरेन्द्र सिंह सुमावली मिट्टी डालने ले जा रहा था ! गोल पहाड़िया टोल टैक्स बैरियर ग्वालियर से 7 लोग डम्पर में सवारी बनकर बैठे और पहले बामौर तक छोड़ने को कहा फिर नूराबाद में छोड़ने को कहा उसके बाद कहा कि डम्पर कहाँ तक जा रहा है, चालक नरेन्द्र सिंह द्वारा यह बताये जाने पर कि सुमावली तक डम्पर जायेगा तब गिरोह के सदस्यों ने बदनीयत से चालक व हैल्पर को फुसलाते हुये कहा कि यह तो अच्छा है चलो हम भी वहाँ करह आश्रम तक चलते हैं मन्दिर में दर्शन भी कर लेंगें !

चालक नरेन्द्र सिंह सिख उर्फ मंगल और हैल्पर मोहन बदमाशों के इरादे नहीं पहचान पाये और आगे की लिफ्ट दे दी ! पहले तो बदमाश हाईवे पर ही वारदात को अंजाम देने के मूड में थे लेकिन हाईवे के भारी यातायात और पुलिस पेट्रोलिंग के चलते वे वारदात के लिये सुरक्षित स्थान की प्रतीक्षा में अपनी मंजिल आगे बढ़ाते रहे !

रात लगभग 8- 9 बजे डम्पर हाई वे से उतरकर जैसे ही टेकरी से सुमावली रोड पर पहुँचा तो मौका अंधेरा और राह सूनसान का फायदा उठाकर टेकरी से करीब 5 कि.मी. दूर करह मार्ग पर हथियार बन्द बदमाशों ने अपने हथियार निकाल कर डम्पर सड़क के एक साइड में लगाने के लिये चालक और हैल्पर को मजबूर कर दिया !

डम्पर साइड में लगते ही बदमाशों ने बुरी तरह डम्पर चालक नरेन्द्र सिंह और हैल्पर मोहन की मार पीट की जिसमें हैल्पर मोहन को बुरी तरह मार पीट कर घायल कर दिया, इसके बाद बदमाशों ने चालक नरेन्द्र सिंह और हैल्पर मोहन को बांध कर सड़क किनारे की खन्ती में फेंक दिया ! और पाँच हजार रूपया पैसा मोबाइल फोन तथा डम्पर लूट कर पाँच बदमाश ले भागे, दो बदमाश वहीं रह गये जो बंधक बनाये हैल्पर और चालक पर निगरानी रखे रहे !

बतौर चालक नरेन्द्र सिंह रात करीब 2 बजे उन पर निगरानी रख रहे दो बदमाशों में से एक के मोबाइल पर फोन आया कि सब ठीक हो गया है काम हो गया है, इसके बाद करीब आधा धण्टे बाद वे दो बदमाश भी वहाँ से चले गये !

दिनांक 18 मई को फरियादी डम्पर चालक नरेन्द्र सिंह पुत्र उन्माद सिंह उम्र 25 साल निवासी टेकपुर थाना चीनौर जिला ग्वालियर की फरियाद पर नूराबाद थाना पर अपराध क्रमांक 67/09 धारा 392 भा0द0वि0 धारा 11 एवं 13 डकैती अधिनियम म.प्र. के तहत कायम कर विवेचना में लिया गया !

जिला पुलिस अधीक्षक श्री संतोष कुमार सिंह द्वारा मामले को गंभीरता से लेते हुये चुनौती के तौर पर लिया गया और बानमौर एस.डी.ओ.पी. श्री आर.डी.प्रजापति तथा थाना प्रभारी नूराबाद श्री बी.के. पाराशर को अभियुक्तों को मय माल मशरूका पकड़ने का निर्देश दिया ! जिस पर पुलिस ने मामले की पतारसी शुरू की और फरियादी द्वारा बताये गये विवरण और बदमाशों के हुलिया आधार पर तफ्तीश की गयी जिसमें सूत्र मिले कि बदमाश सिकन्दर गुर्जर, ऐन्दल गुर्जर, दीपक राठौर, जीतू राठौर आदि शातिर लुटेरे हैं तथा घटना दिनांक को रात में इनकी मौजूदगी धनेला गाँव के आस पास देखी गयी है ! सूचना व सूत्रों के आधार पर पुलिस ने दबिश देकर दीपक पुत्र टी.एल. राठौर निवासी मोहना जिला ग्वालियर, सिकन्दर पुत्र रामजी लाल गुर्जर निवासी केदार सिंह का पुरा, पचोखरा थाना सरायछौला ऐन्दल सिंह गुर्जर पुत्र कुबेर सिंह गुर्जर निवासी खोड़ थाना नगरा जिला मुरैना को गिरफ्तार कर कड़ाई से पूछताछ की जिसमें बदमाशों ने बताया कि उन्होंने ही हरिओम गोस्वामी निवासी धनेला हाल गोल पहाड़िया ग्वालियर, जीतू उर्फ जीतेन्द्र सिंह पुत्र बांकेलाल राठौर निवासी धौलागढ़ थाना सुभाषपुरा जिला शिवपुरी, जबर सिंह गुर्जर निवासी पचोखरा थाना सरायछोला जिला मुरैना के साथ मिलकर लूट की वारदात को अंजाम दिया था !

पकड़े गये बदमाशों की सुरागदेही पर लूटा गया डम्पर, मोबाइल फोन, एव एक स्टेपनी बरामद की गयी है !

अभियुक्तों से प्राप्त सुरागों के आधार पर ज्ञात हुआ कि उक्त घटना के पूर्व 4 अज्ञात आरोपीयों द्वारा डम्पर लूट की घटना कारित की गयी थी लूटे गये डम्पर से 4 टायर मय रिम के लूटकर ले गये थे जिसमें महेश जाटव निवासी छीमका थाना गोहद चौराहा, रामचन्द सिंह तोमर निवासी तुकेंड़ा थाना मालनपुर, रामकुमार भदौरिया निवासी लूट का पुरा जिला ग्वालियर की गिरफ्तारी कर लूट का माल बरामद कर लिया है !

मामले की तफ्तीश और बदमाशों की गिरफ्तारी तथा माल बरामदगी में आर.डी. प्रजापति एस.डी.ओ.पी. बामौर, थाना पभारी बी.के. पाराशर, प्रधान आरक्षक 0551 सुभाष पाण्डे, आरक्षक राम सिंह, थाना प्रभारी देवगढ़ श्याम शर्मा एवं उनकी टीम तथा आरक्षक 561 योगेन्द्र सिंह का कार्य व भूमिका उल्लेखनीय व सराहनीय रही ! डम्पर मालिक ग्वालियर निवासी नीरज शर्मा के अनुसार उसके पास दो डम्पर हैं और पुलिस ने इस केस में बहुत मेहनत व सक्रियता दिखाई जिसके कारण न केवल उसका उम्पर और अन्य माल मशरूका बरामद किया जा सका बल्कि मुल्जिम भी कानून के फन्दे में फंस गये !

पॉच हजार का इनाम था बदमाशों को पकड़ने और माल बरामदगी पर

जिला पुलिस अधीक्षक मुरैना संतोष सिंह ने डम्पर लूट काण्ड में शामिल अज्ञात आरोपियों की गिरफ्तारी एवं माल बरामदगी पर पाँच हजार रू. का इनाम घोषित किया था !

मोबाइल फोन ने पकड़वाये बदमाश

बदमाश जितने दुस्साहसी थे उतने ही बेवकूफ भी ! डम्पर लूट में बदमाशों ने चालक नरेन्द्र सिंह से लूटा गया मोबाइल फोन से उसकी सिम निकाल कर फेंक दी तथा अपनी सिम लगा कर उसका इस्तेमाल करने लगे ! पुलिस ने इसी महत्वपूर्ण सुराग से मोबाइल का आई.एम.ई.आई. नंबर ज्ञात कर आरोपियों की लोकेशन और क्राइम एण्ड सिचुएशन डिटेल्स ट्रेस कर लीं और बड़ी आसानी से बदमाश पुलिस के चंगुल में फंस गये !

कबूले 9 मामले और कत्ल भी

बदमाशों ने पुलिस की तफ्तीश और पतारसी में स्वीकार किया कि इससे पहले वे और भी कई वारदातों को अंजाम दे चुके हैं ! उन्होंने 9 ट्रेक्टर इसी तरह लूट व चोरी से उड़ोने कबूले तथा बताया कि इनका साथी हरिओम शर्मा गोस्वामी कुख्यात बदमाश है और उस पर कत्ल एवं लूट के कई मामले दर्ज व नादर्ज हैं ! वह हिस्ट्रीशीटर बदमाश होकर ग्वालियर की सत्यनारायण गली में रहता है ! अन्य बदमाश जीतू उर्फ जीतेन्द्र राठौर पर एक कत्ल एवं 5 लूट के मामले हैं वह भी शातिर व कुख्यात बदमाश है ! लूटे गये ट्रेक्टरों में एक स्वराज – ग्वालियर, एक फार्मा, एक महेन्द्रा, जौरा से एक स्वराज, दबोह से एक सोनालिंक, ग्वालियर से एक स्वराज, मालनपुर से एक, सरायछोला से एक बताये गये हैं !

चालक व हैल्पर ने दांतों से खोले एक दूसरे के बंधन

चालक नरेन्द्र सिंह ने बताया कि जब बदमाश उनसे मारपीट व लूटपाट कर उन्हें बांध कर डाल गये थे तो उन्होंने एक दूसरे के बंधन दांतो से एक के पीछे एक जाकर खोले और रात करीब साढ़े तीन बजे बंधन मुक्त हुये !

गंगास्नान के लिये गये मुरैना के परिव ार को एटा के पास लूटा और लालो की गोल ी मार कर हत्या की


चम्बल पुल बस हादसा, सभी की शिनाख्त म ृतकों में अधिकांश मुरैना जिले के, छ ैरा के मुकेश खटीक का पूरा परिवार का ल कवलित


चम्बल पुल  बस हादसा, सभी की शिनाख्त मृतकों में अधिकांश मुरैना जिले के, छैरा के मुकेश खटीक का पूरा परिवार काल कवलित

-किसी ने पत्नी किसी ने बेटा-बेटी को खोया

मुरैना 2 जून 09 (दैनिक मध्‍यराज्‍य)  – चम्बल नदी पुल से जनवेद ट्रेवल्‍स की मिनी बस के पुल से नीचे गिरने की हृदय विदारक दुर्घटना में सोंमवार को कई परिवारों का अंत होगया, हादसे में 33  यात्रीओं की मौत हो गई थी। मृतक  में महिला व बच्चे भी शामिल है। 6 लोग गंभीर रूप से घायल हैं जिन का  धौलपुर व आगरा के  अस्पताल में इलाज चल रहा है, हादसे में हताहतों में से अभी तीन की शिनाख्त नही हो सकी है। जवकि 31 शवों को शिनाख्त के  बाद शवों को उनके निकट सम्बंधितों को सौंप दिया है।

ज्ञातव्य रहे कि सोमवार को  जनवेद ट्रेवल्स की मिनी बस क्रमांक एमपी06-पी 0114 धौलपुर से मुरैना की ओर आ रही थी कि चम्बल पुल पर चालक बस से नियंत्रण खो बैठा और बस रैलिंग तौडकर 200 फीट नीचे सूखी सतह पर जा गिरी जिससे उस में सवार यात्रियों में से 33 की मौत हो गयी। जबकि सात लोग गंभीर रूप से घायल हो गये। जिन्हे इलाज हेतु  धौलपुर  मुरैना व आगरा के  अस्पताल में दाखिल कराया गया ।

हादसे में मुरेना जिले के सर्वाधिक लोग काल के गाल में समा गये जिनमें छेरा जौरा के मुकेश खटीक का परिवार तथा उसके रिश्‍तेदारों समेत आठ लोग मारे गये। मुकेश खटीक तथा उसकी बीबी वच्चों की मौत हो गई साथ  ही उसके रिश्‍तेदार नरोत्तम खटीक निवासी सैंपऊ धौलपुर भी पत्नी तथा वच्चों समेत इस गंम्भीर हादसे में सदा के लिये दुनिया से अलविदा हो गये। दुर्घटना में अंबाह के त्यागी समाज के माँ बेटा की मौत हो गई तथा थरा गांव के दो सगे भाई मौत के मुहँ में समा गये जिले के जनकपुर ,पिपरई सराय छोला गांव के भी कुछ लोगों की मौत हो गई  धौलपुर के जाटोली निवासी जमुनाप्रसाद कास्थ तो अस्पताल में जीवन और मौत के बीच जंग लड रहा है मगर बस दुर्घटना में उसके बीबी और बच्चों की मौत हो गई धौलपुर बसेडी के गांव गुलालई का एक परमार दम्पति दुर्घटना का शिकार हो गया।

बस हादसे में मृतकों की हुई शिनाख्त के अनुसार-मुकेश पुत्र छददी खटीक उम्र 36 छेरा मुरैना, सर्वेश पत्नी मुकेश खटीक उम्र 34 वर्ष, सचिन पुत्र मुकेश 9 वर्ष, विकास पुत्र मुकेश 7 वर्ष,  कपिल पुत्र मुकेश 5 वर्ष, नरोत्तम पुत्र भवर खटीक उम्र 40 वर्ष सैपऊ धौलपुर, कमला  पत्नी नरोत्तम खटीक उम्र 37 वर्ष सैपऊ धौलपुर, दीपक पुत्र नरोत्तम उम्र 9 वर्ष, मीरा पति रामप्रकाश तिवारी उम्र 35 वर्ष भामवती पुरा, सरला पत्नी ओपप्रकाश तिवारी उम्र 40 वर्ष भामवती पुरा धौलपुर, प्रेमसिहं पुत्र अजमेर सिंह गुर्जर उम्र 25 वर्ष मौरेली धौलपुर, अमित पुत्र जमना प्रशाद कास्त उम्र 10 वर्ष जाटोली धौलपुर, अनीता पुत्री जमुना प्रशाद उम्र 14 वर्ष जाटोली धौलपुर, राधा पत्नी जमुनाप्रसाद उम्र 45  वर्ष जाटोली धौलपुर, राजू पुत्र रामबाबू शार्मा उम्र 30 वर्ष धरा मुरैना, बृजेश पुत्र रामबाबू शर्मा 19 वर्ष थरा मुरैना,  अजीत पुत्र राधाकृष्ण नायक डीडी नगर ग्वालियर, योगेन्द्र पुत्र रामख्त्यार गुर्जर 20 वर्ष पिपरई मुरैना, जण्डेल पुत्र रामनाथ गुर्जर पीपरई मुरैना, वंटी पुत्र दघीराम उम्र 17 वर्ष जनगपुर मुरैना,  रिक्कू पुत्र लक्षमण 18 वर्ष बैरागी सरायाछौला मुरेना, आशाराम पुत्र सिवचरन गुर्जर 35 वर्ष कैमरा मुरैना, मनु पुत्री आशाराम गुर्जर 1 वर्ष कैमरा मुरैना, दिलीप पुत्र महेश त्यागी 18 वर्ष अम्बाह, रतन देवी पत्नी महेश त्यागी 45 वर्ष अम्बाह, मोहित पुत्र भीकमचंन्द्र उपाध्याय उम्र 13 वर्ष जगनेर धौलपुर, राजकुमार पुत्र नैत्रपाल परमार 21 वर्ष गुलालगई बसेडी धोलपुर, संगीता पत्नी राजकुमार परमार पत्नी 21 वर्ष, गुलाली बसई , रामसहाय पुत्र ददाराम गुर्जर उम्र 40 वर्ष गडीसाघरा डागबसई, सुनीता पत्नी रामसहाय गडीसाघरा डागबसई , सिवाराम पुत्र भीमसिंह गुर्जर डागबसई मुरैना ।

बस दुर्घटना घायलों में- रणवीर घोबी 22 वर्ष  कैलारस, सोनूशर्मा उम्र 25 वर्ष आमलीपुरा, शीमा पत्नी बासाराम ठाकुर खाडोली मुरैना, कप्तान रंजक मुद्रादेहली प्रोजेक्ट जयपुर, सतवीर गुर्जर 25 वर्ष पीपरई, जमुना प्रसाद कास्थ जाटोली धौलपुर।

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