ग्वालियर किले के मंदिर शैलोत्की र्ण प्रतिमाएं व चैत्य गुफाएँ -श्रीम ती राजबाला


ग्वालियर किले के मंदिर शैलोत्कीर्ण प्रतिमाएं व चैत्य गुफाएँ

-श्रीमती राजबाला

दिल्ली से 318 किलोमीटर व आगरा से मात्र 110 किलोमीटर दक्षिण में आगरा-मुम्बई राष्ट्रीय मार्ग पर ऐतिहासिक शहर ग्वालियर है, जिसके माथे पर मुकुट की भांति विराजमान ग्वालियर किला जनमानस के बीच कौतूहल का सबब रहा है। मुस्लिम इतिहासकार हसन निजामी ने अपनी पुस्तक ताजुल – मसअर में किले को हिन्दुस्तान के तमाम किलों की मणिमाला में प्रमुख मोती निरूपित किया है। ग्वालियर का उल्लेख पौराणिक गाथाओं में भी मिलता है। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि ग्वालियर किले का अस्तित्व हजारों वर्ष पुराना है। मध्य युगीन काल के प्रतिहारी कच्छपघाती शासकों तत्पश्चात, तोमर वंशी राजाओं के शासन काल में हुए कला एवं सांस्कृतिक विस्तार ने ग्वालियर किले को नई पहचान दी। किले पर जहाँ भारतीय स्थापत्य की दृष्टि से विलक्षण भव्य महल हैं, वही हिन्दू व जैन मंदिर एवं शैलोत्कीर्ण गुफाएँ भी बेमिसाल हैं । हालांकि आज अधिकांश मंदिर व मूर्तियां यवन आक्रान्ताओं की क्रूरता की मूक साक्षी बनी कालजयी हस्ताक्षर सी भग्नावेशों के रूप में विद्यमान है।

ग्वालियर किला जिस पर्वत पर स्थित है उसे गोपाचल पर्वत कहते हैं। विभिन्न अभिलेखों में गोपाचल पर्वत के अन्य नामों का भी उल्लेख मिलता है मसलन गोपगिरि, गोप पर्वत, गोपाद्रि व गोपचन्द्र गिरीन्द्र। जैन मनीषियों के लिये गोपाचल पर्वत एक पवित्र धर्म स्थली है, जहां प्रतिवर्ष महावीर जयन्ती के पावन अवसर पर हजारों श्रध्दालुओं का जमावड़ा होता है। आठवीं से दसवीं शताब्दी में मध्ययुगीन प्रतिहारी कछवाहा (कच्छपघात) शासकों के शासन काल के दौरान वैष्णव, शैव व जैन धर्मों को फलने-फूलने का मौका मिला। तब ग्वालियर का स्वर्णिम युग था ।इस अवधि में स्थापत्य के क्षेत्र में सर्वाधिक सुन्दर व महत्वपूर्ण निर्माण हुये । चतुर्भुज मंदिर, तेली का मंदिर व सासबहू का मंदिर आज भी पर्यटकों के लिये आकर्षण का केन्द्र है।

चतुर्भुज मंदिर

चतुर्भुज मंदिर दौ सौ फुट ऊंचे पहाड़ी चट्टान पर बना है जो एक पहाड़ी को ऊपर से नीचे की ओर काटकर बनाया है। मंदिर मे लगे शिलालेख के अनुसार मंदिर का निर्माण 876-877 ई. में कन्नौज के शासक मिहिर भोज के शासन काल में नियुक्त कोटपाल अल्ल के निर्देशन में बनवाया गया । मंदिर के गर्भगृह में चतुर्भुजी विष्णु भगवान की स्थानक (खड़ी) मूर्ति है । गर्भगृह के सामने स्तम्भों पर टिके मुख्य मंडप की छत के नीचे श्रीकृष्ण की लीलाएं उकेरी गई हैं । स्तम्भों पर कलश, कबूतर, घंटियां, देवी-देवताओं व पशुओं की आकर्षक आकृतियां उत्कीर्ण हैं । यह शैलोत्कीर्ण मंदिर उस समय का शिल्प की दृष्टि से अनूठा प्रयोगवादी निर्माण था । किले पर बने अन्य हिन्दू मंदिरों की तुलना में चतुर्भुज मंदिर दो महत्वपूर्ण भिन्नताएं लिये हैं । एक तो यह मंदिर उत्तर भारतीय आर्य शैली में बना सम्भवत: प्राचीनतम मंदिर है व दूसरा इस मंदिर के गर्भगृह में लगे शिलालेख में विश्व की प्रथम जीरो यानि शून्य का उल्लेख है । मंदिर का मूल शिखर आक्रांताओं द्वारा नष्ट कर दिया गया था जिसे बाद में चूने द्वारा संधारित किया गया है ।

सास-बहू का मंदिर

सास-बहू का मंदिर किले के दक्षिणी भाग में पास-पास बने दो सहस्त्रबाहु मंदिर हैं जो आज सास-बहू का मंदिर नाम से विख्यात हैं । यहां लगे शिलालेख के अनुसार इन देवालयों का निर्माण सन् 1093 ई. में पालवंश के राजा महिपाल कछवाहा द्वारा करवाया गया था । जनश्रुति के अनुसार उन्होंने बड़ा विष्णु मंदिर अपनी माता और समीप बने छोटे मंदिर को अपनी शिवभक्त पत्नी को समर्पित किया था । संभवत: इन्हीं कारणों से सहस्त्रबाहू मंदिर का नाम सास-बहू का मंदिर होकर रह गया ।

गुर्जर शैली में बना यह मंदिर 12 फुट की जगती (चबूतरा) पर निर्मित किया गया है जो 100 फुट लम्बा, 63 फुट चौड़ा व 70 फुट ऊंचा है । मध्य में विशाल मंडप है, जिसकी छत चारों कोनों पर बने खम्भों पर आधारित है । मुख्य मंडप के तीन ओर लघु मंडप हैं तथा चौथी ओर गर्भगृह है । मंडप की छत में आकर्षक कलाकृतियां अंकित हैं । मंदिर की बाहरी व भीतरी दीवारों को तक्षण कला से सज्जित किया गया है । छोटा मंदिर यानि बहू का मंदिर मुख्य मंदिर के मुकाबले छोटा है व इसका वास्तु शिल्प भी अपेक्षाकृत साधारण है ।

मुख्य मंदिर का शिखर टूट चुका है । वर्तमान में इन देवालयों में कोई मूर्ति नहीं है । इन मूर्तियों को यवन हमलावरों ने नष्ट कर दिया था ।

तेली का मंदिर

समूचे उत्तर भारत में द्रविड़ आर्य स्थापत्य शैली का समन्वय यहीं ग्वालियर किले पर तेली मंदिर के रूप में देखने को मिलता है । इस मंदिर का वास्तविक नाम तैलंग या तैलंगाना मंदिर रहा होगा । जो बदलते समय के साथ बिगड़ कर तेली का मंदिर कहलाने लगा । लगभग सौ फुट की ऊंचाई लिये किले का यह सर्वाधिक ऊंचाई वाला प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर के निर्माण को लेकर इतिहासकार एकमत नहीं है किन्तु अधिकांश विद्वानों का मत है कि इसका निर्माण कन्नौज के राजा यशोवर्मन ने सन् 750 ई. में करवाया था ।

गंगोलाताल के समीप बना यह मंदिर विशाल जगती पर स्थापित है । शिखर ऊपर की संकरा एवं बेलन की तरह गोलाई लिये हुये है । मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्व की ओर है । भीतर आयताकार गर्भगृह में छोटा मंडप है । निचले भाग में 113 लघु देव प्रकोष्ठ हैं जिनमें देवी-देवताओं की मान्य प्रतिमाएें थीं । मंदिर के चारों ओर की बाह्य दिवारों पर विभिन्न आकार प्रकार के पशु-पक्षी, फूल-पत्ते, देवी-देवताओं की अलंकृत आकृतियां हैं । कहीं-कहीं आसुरी शक्तियों वाली आकृतियां एवं प्रणय मुद्रा में प्रतिमाएॅ भी अंकित हैं । प्रवेश द्वार के एक तरफ कछुए पर यमुना व दूसरी तरफ मकर पर विराजमान गंगा की मानवाकृतियां हैं । आर्य द्रविड़ शैली युक्त इस मंदिर का वास्तुशिल्प अद्वितीय है । मंदिर के शिखर के दोनों ओर चैत्य गवाक्ष बने हैं तथा मंदिर के अग्रभाग में ऊपर की ओर मध्य में गरूढ़ नाग की पूंछ पकड़े अंकित है ।

उत्तर भारतीय अलंकरण से युक्त इस मंदिर का स्थापत्य दक्षिण द्रविड़ शैली का है । वर्तमान में इस मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है । पर दरअसल यह एक विष्णु मंदिर था । कुछ इतिहासकार इसे शैव मंदिर मानते हैं । सन 1231 में यवन आक्रमणकारी इल्तुमिश द्वारा मंदिर के अधिकांश हिस्से को ध्वस्त कर दिया गया था । तब 1881–1883 ई. के बीच अंग्रेज हुकमरानों ने मंदिर के पुरातात्विक महत्व को समझते हुये मेजर कीथ के निर्देशन में किले पर स्थित अन्य मंदिरों, मान महल(मंदिर)के साथ-साथ तेली का मंदिर का भी सरंक्षण करवाया था । मेजर कीथ ने इधर-उधर पड़े भग्नावशेषों को संजोकर तेली मंदिर के समक्ष विशाल आकर्षक द्वार भी बनवा दिया । द्वार के निचले हिस्से में लगे दो आंग्ल भाषी शिलालेखों में संरक्षण कार्य पर होने वाले खर्च का भी उल्लेख किया है ।

वर्तमान में मंदिर का केवल पूर्वी प्रवेश द्वार है। मूल मंदिर को दिल्ली के सुलतानों के शासन काल में ध्वस्त कर दिया गया था । हालांकि बाद में ब्रिटिश काल में हुये मरम्मत से मंदिर का मूल स्वरूप नष्ट हो गया है, फिर भी मेजर कीथ मंदिरों के संरक्षण कार्य का बीड़ा उठाने के लिये साधुवाद के पात्र हैं ।

माता भगवती का मंदिर

माता भगवती का मंदिर सूरज कुंड के पूर्वी किनारे पर स्थित है जो 12 वीं शताब्दी का प्रतिहार युगीन सप्तरथी मंदिर है । वर्तमान में मंदिर का वेदिबंध व जंघा का भाग ही शेष है । प्रवेश द्वार व शिखर बाद में बनाये गये हैं ।

वर्धमान मंदिर

वर्धमान मंदिर जैन धर्म के चौबीसवें तीर्थंकर वर्धमान अर्थात महावीर जी का मंदिर है । इसका निर्माण आठवीं सदी में आम नामक दिकपाल की पत्नी ने जैन मुनि आचार्य बप्प भट्ट सूरी के निर्देशन में किया था । गुर्जर शैली का तीन मंजिला यह भवन 50 फुट ऊंचा व 100 फुट लम्बा था । जैन साहित्य के अनुसार मंदिर में ठोस सोने की वर्धमान की प्रतिमा थी जो आताताईयों द्वारा लूट ली गई । सन् 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के बाद किले पर अंग्रेजों का आधिपत्य हो गया । यहां अंग्रेजी सैनिकों के लिये परेड मैदान बना दिया गया था । वर्तमान में इस मंदिर के प्रांगण में सिंधिया स्कूल का खेल मैदान है ।

शैलोत्कीर्ण शिल्प एवं जैन प्रतिमाएं

भारतीय इतिहास में पत्थरों पर आकृतियां उकरने की कला शैलोत्कीर्ण शिल्प लगभग बाइस सौ वर्ष पुराना है । ग्वालियर किले में विभिन्न स्थानों पर हिन्दू देवताओं व जैन धर्म के तीर्थंकरों की मूर्तियां किले की चट्टानों को काट / तराश कर बनाई गई हैं । किले पर पाई जाने वाली शैलोत्कीर्ण शिल्प को हम दो वर्गों में बाँट सकते हैं। प्रथम वर्ग में 9 वीं शताब्दी में प्रतिहार शासनकाल में मंदिरो के अलावा हिन्दू देवी देवताओं की चट्टानों पर उकेरी गई मूर्तिंयाँ हैं । दूसरे वर्ग में पंद्रहवीं शताब्दी में तोमर शासन काल में जैन धर्मावलम्बियों द्वारा विभिन्न आकार प्रकार की पद्मासन एवं खड्गासन मुद्रा में चट्टानों पर उकेरी गई जैन मूर्तियाँ एवं गुफाएँ है । प्रथम वर्ग की मूर्तियाँ किले पर स्थित लक्ष्मण द्वार एवं हथियापौर के बीच दाहिनी ओर चट्टान को काटकर विशाल शिव के भद्रावतार की मूर्ति है जिसमें गजासुर का वध करते हुए दिखाया गया है । मूर्ति का अधिकांश हिस्सा यवन आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट कर दिया गया था । इसके आगे आयताकार आले में विष्णु एवं सूर्य की स्थानक मूर्तियाँ हैं तथा उमा महेश्वर (पार्वती एवं शिव) की युगल मूर्ति पद्मासन मुद्रा में है । इन मूर्तियों को विशिष्ट अलंकृत शैली में चट्टान पर उकेरा गया है। इनके अलावा महिषासुर मर्दिनी की मूर्तियाँ एवं शिवलिंग उत्कीर्ण है । इसी प्रकार चतुर्भुज मंदिर तथा लक्ष्मण द्वार के मध्य में चट्टानों को काटकर बनाए गये आले में गणेशजी की मूर्ति है । आले की दीवार में संस्कृत में गणेश जी की स्तुति अंकित है । आले के ऊपर दोनों ओर शिव, पार्वती व कुबेर आदि की मूर्तियाँ बनी है । वर्तमान में अधिकांश मूर्तियाँ खण्डित अवस्था में हैं ।

जैन प्रतिमाएँ

दूसरे वर्ग की तोमर वंशी काल खंड में बनी जैन धर्म के चौबीस तीर्थंकरों की विशालकाय से लेकर छोटी- बड़ी कई प्रतिमांएँ हैं । ग्वालियर किले पर छ: अलग -अलग स्थानों पर पहाड़ी चट्टानों को काटकर लघु आकार वाले चैत्य गुफा मंदिर बनाए गये हैं । जैन तीर्थंकरों की ये सभी मूर्तियाँ भारतीय शैलोत्कीर्ण मूर्तिशिल्प का श्रेष्ठ उदाहरण हैं । साथ ही यहाँ के जैन चैत्य गुफा समूह उत्तर भारत में उपलब्ध इस परम्परा के संभवत: अंतिम उदाहरण भी । जैन तीर्थंकरों की मूर्तियों को उनके पाद-पाठ पर बने खास चिन्हों से पहचाना जा सकता है । जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर की मूर्ति के नीचे बैल की आकृति है । पार्श्वनाथ जी की मूर्ति के पाद आधार पर सर्प की आकृति अंकित है । शंख चिन्ह वाली बाइसवें तीर्थंकर नेमिनाथ भगवान की मूर्तियाँ हैं तथा सिंह चिन्ह वाली चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी की मूर्ति है ।

गोपाचल पर्वत के पूर्वी भाग में एक पत्थर की बावड़ी समूह में छब्बीस चैत्य गुफाएँ हैं जिनमें तीर्थंकरों की स्थानक व आसनानस्थ मूर्तियाँ हैं । ये सभी मूर्तियाँ चट्टानों को काटकर बनाई गई हैं । प्रतिमाओं के पाद पाठ पर शिलालेख भी खुदे हुए हैं । सबसे बाईं तरफ एक पत्थर की बावड़ी है । गुफानुमा प्रवेशद्वार वाली इस बावड़ी की छत को पत्थर के स्तम्भों से टिकाया गया है, जो एक ही चट्टान को काटकर बनायी गयी है । गुफा समूह की दाँई तरफ छब्बीसवीं गुफा में प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ की 57 फुट ऊँची विशाल प्रतिमा है जो ऍधेरी गुफा में एक ही चट्टान काटकर अन्दर -अन्दर बनाई गई है जिसे देखकर शिल्पियों के धैर्य एवं लगन का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है । इस गुफा समूह का निर्माण काल पंद्रहवीं शताब्दी का है । अब इस गुफा समूह तक पहुँचने के लिए पहाड़ी को काटकर 50 सीढ़ियाँ बनाई गई हैं ।

किले पर स्थित सभी जैन चैत्य गुफा समूहों में एक पत्थर की बावड़ी चैत्य गुफा समूह सबसे बड़ी है । जिसमें विभिन्न आकार प्रकार की छोटी बड़ी लगभग पन्द्रह सौ जैन प्रतिमाएं हैं। इस गुफा समूह में चट्टान को काटकर बनाई विशाल पत्थर की बावड़ी में आज भी भरपूर पानी है । सम्भवत: पानी की उपलब्धता के चलते जैन मुनि यहाँ तपस्या करते होंगे । कालांतर में यह स्थल धार्मिक स्थल के रूप में पूजा जाने लगा । एक ऐसा ऐतिहासिक दौर आया जब आक्रमणकारियों ने इन प्रतिमाओं को तहस -नहस करने का प्रयास किया । फिर काल क्रम में इनकी गुमनामी का लम्बा अरसा निकल गया ।देश की आजादी के भी कई वर्ष बाद एक पत्थर की बावड़ी गुफा समूह की सुध ली गई । स्थानीय जैन मतावलम्बियों खासकर श्री अजीत बरैया जो श्री दिगम्बर जैन अतिशय क्षेत्र गोपाचल पर्वत संरक्षक न्यासके प्रमुख हैं ने इसके जीर्णोध्दार में विशेष भूमिका निभाई । श्री बरैया विगत दो दशकों से इस पवित्र स्थल को हराभरा व रमणीय बनाने के प्रयास में जुटे हैं । जिसका सुफल है कि आज जैन समाज यहाँ आकर श्रध्दा भाव से पूजा पाठ करता हैं ।

दूसरे समूह की मूर्तियाँ किले पर स्थित नूरसागर के पास बड़ी चट्टान को काटकर बनाई गई है । इन गुफाओं में जैन तीर्थंकरों की पद्मासन व खड्गासन मुद्रा में कई प्रतिमांएँ है। गुफा चैत्य के आखिरी सिरे पर बारह फुट ऊँची नेमिनाथ भगवान की खड्गासन प्रतिमा है जो पत्थर के स्तम्भों पर टिके देवालय में स्थापित है । देवालय की छतों व दीवारों पर उनके जन्म से लेकर निर्वाण तक के कथानकों को उत्कीर्ण किया गया है । ये सभी 8 वीं से 10 वीं सदी में निर्मित की गई हैं ।

तीसरे समूह की मूर्तियाँ उरवाई गेट के समीप किले के पश्चिमी भाग में 20 फुट की ऊँचाई पर चट्टानों को तराश कर बनाई गई हैं । जैन तीर्थंकरों की ये मूर्तियॉ कार्योत्सर्ग एवं ध्यान मुद्रा में हैं । सभी मूर्तियों का निर्माण पंद्रहवीं शताब्दी में तोमरवंशी शासक डूंगर सिह के शासन काल में हुआ था । उरवाई गेट के समीप ही बावन गजा मूर्ति समूह की सत्तावन हाथ ऊँचाई वाली भगवान आदिनाथ की प्रमुख प्रतिमां है । यह 20 फुट ऊँचे व 20 फुट चौड़े कक्ष में पहाड़ को काटकर उत्कीर्ण की गई है । किले की जैन प्रतिमाओं में यह सबसे ऊँची प्रतिमा है । उरवाई द्वार के बाहरी भाग में त्रिशला समूह की जैन मूर्तियाँ है जिसमें चौबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी की माता त्रिशला की मूर्ति लेटी हुई मुद्रा में है ।इस गुफा समूह में भगवान महावीर के जन्म कथानक को कलात्मक ढंग से उत्कीर्ण किया गया है ।

उत्तर पश्चिम दिशा में ढोंढापौर के समीप बने गुफा समूह में कई जैन मूर्तियॉ हैं जो लगभग 50 फुट की ऊँचाई पर अन्दर ही अन्दर कक्ष बनाकर एक ही चट्टान को काटकर निर्मित हैं ।

ग्वालियर का किला जहां सामरिक दृष्टि से खास महत्व रखता था वहीं किले पर बने मदिर व जैन प्रतिमाएं विविधता में एकता व सभी धर्मों का सम्मान करने वाले उस समय के भारतीय समाज को भी दर्शाता है । साथ ही ये हमारे गौरवशाली अतीत और कला वैभव का भी द्योतक है ।

इति।

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