नवदुर्गा – नवरात्रि विशेष : दसमहा विद्या और शक्ति उपासना- 2


नवदुर्गा नवरात्रि विशेष : दसमहाविद्या और शक्ति उपासना- 2

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’

नवदुर्गा नौ हैं – देवी की नौ मूर्तियां हैं जिन्‍हें नवदुर्गा कहा जाता है

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी । तृतीयं चन्‍द्रघण्‍टेति कूष्‍माण्‍डेति चतुर्थकम् ।।

पंचमं स्‍कन्‍द मातेति षष्‍ठं कात्‍यायनीति च । सप्‍तमं कालरात्रीति महागौरी चाष्‍टमम् ।।

नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गा प्रकीर्तिता: । उक्‍तान्‍येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्‍मना ।।

उपरोक्‍तानुसार 1. शैलपुत्री 2. ब्रह्मचारिणी 3. चन्‍द्रघण्‍टा 4. कूष्‍माण्‍डा 5. स्‍कन्‍दमाता 6. कात्‍यायनी 7. कालरात्रि 8. महागौरी 9. सिद्धिदात्री ये नव दुर्गा की नौ मूर्तियां हैं ।

इस सम्‍बन्‍ध में पूजा अर्चना उपासना हेतु प्रमाणिक ग्रंथ व साहित्‍य गीता प्रेस गोरखपुर से प्रकाशित श्रीदुर्गा सप्‍तशती, मार्कण्‍डेय पुराण, श्रीमद्देवीभागवत आदि ग्रंथ हैं , और इनके अध्‍ययन मनन चिन्‍तन उपरान्‍त यथा साध्‍य विधिपूर्वक पंचोपचार या दशोपचार या षोडशोपचार पूजा या साधना करना चाहिये ।

नवरात्रि काल में रात्रि का विशेष महत्‍व होता है और दन दिनों रात्रि जागरण अवश्‍य करना चाहिये एवं यथा संभव रात्रिकाल में ही पूजा हवन आदि करना चाहिये । श्रीमद्देवी भागवत में नवदुर्गा पूजन का विशेष विषय पिस्‍तार है । नवदुर्गा में कुमारिका यानि कुमारी पूजन का विशेष अर्थ एवं महत्‍व है । गॉंवों में इन्‍हें कन्‍या पूजन कहते हैं । जिसमें कन्‍या पूजन कर उन्‍हें भोज प्रसाद दान उपहार आदि से उनकी सेवा की जाती है । यह विषय भी श्रीमद्देवीभागवत में विस्‍तार से मिल जाता है । कुमारिका तंत्रम पर चर्चा हम आगे करेंगें ।

दस महाविद्यायें एवं कुमारी तन्‍त्र

दस महाविद्यायें एवं कुमारी तंत्र आदि देवी के विशिष्‍ट अवतारों व रूपों की साधनायें हैं हालांकि इन दसों महाविद्याओं के साधारण पूजा पाठ को हरेक प्राणी कर सकता है लेकिन इनकी तांत्रिक साधना व पूजा की विशेष महत्‍ता है । केवल एक महाविद्या से सुहागिन स्‍त्रीयों को पूर्णत: वर्जित किया गया है और इस महाविद्या के दर्शन पूजा उपासना साधना आदि कृत्‍य सुहागिन स्त्रियों हेतु प्रतिबंधित हैं । इसका कारण हम आगे लिखेंगे ।

विषय विस्‍तार पर आने से पूर्व हमें साधारण पूजा और तंत्र साधना में फर्क जान लेना चाहिये । साधारण पूजा पंचोपचार से लेकर षोडशोपचार तक हो सकती है जबकि तंत्र साधना के अनेक एवं भिन्‍न रूप आवश्‍यकतानुसार होते हैं । हम यहॉं विषय में केवल देवी की तंत्र साधनाओं का ही जिक्र करेंगें अन्‍यथा आलेख की जगह ग्रंथ तैयार हो जायेगा ।

तन्‍त्र मन्‍त्र व यन्‍त्र क्‍या हैं व इनमें फर्क क्‍या हैं

तन्‍त्र शब्‍द तनु तथा त्रय धातु से बना है जिन्‍हें मिलाने पर वर्ण तन्‍त्र प्राप्‍त होता है जिसका अर्थ है तनु अर्थात शरीर त्र अर्थात त्राण करने वाला , जो शरीर को सुखी, निरोगी बना कर सुरक्षित, संरक्षित प्रचण्‍ड तेज और प्रभावी बनाये उसे कष्‍टों से बाहर निकाल कर निर्मुक्‍त करे उसे तन्‍त्र कहते हैं । अँग्रेजी में तंत्र को सिस्‍टम कहा जाता है , शाब्दिक तात्‍पर्य यह कि यह जो शरीर है एक सिस्‍टम है एक तंत्र है इसे विधिपूर्वक सुविधा सेवित कर तेज पुष्टि स्‍वास्‍थ्‍य व सौन्‍दर्य प्रदान करने की विधा ही तंत्र है । इसमें चिकित्‍सा पद्धति से लेकर रोजमर्रा में उपयोग किया जाने वाला सौन्‍दर्य शास्‍त्र व सामुद्रिक शास्‍त्र (बॉडी लैंग्‍वेज), योग आदि भी इस तंत्र के अधीन आता है । हर वह विधि, क्रिया प्रक्रिया जो सिस्‍टम को या संरचना को या शरीर को दुरूस्‍त स्‍वच्‍छ सुन्‍दर व स्‍वस्‍थ बनाती है तंत्र कहलाती है । कुल मतलब ये कि तंत्र को ठीक करने या रखने के लिये जिस सिस्‍टम का उपयोग होता है वह तंत्र ही है ।

मन्‍त्र का अर्थ मन एवं त्रय धातु से बना है जिसका उपरोक्‍त तंत्र की व्‍याख्‍या से ही शाब्दिक अर्थ मन का त्राण करने वाला है । जो मन को ठीक करे या रखे वह ही मंत्र है । मंत्र के लिये जिस आवृत्ति ध्‍वनि, उच्‍चारण, आयाम, तारत्‍व आदि का प्रयोग होता है वही मंत्र सुमंत्र या कुमंत्र हो जाता है । यदि किसी गीत विशेष को सुनने से या किसी व्‍यक्ति विशेष की वाणी या वाक्‍य सुनने से मन को स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा एवं आयाम व विकास प्राप्‍त हो तो वही मंत्र है । लेकिन तंत्र शास्‍त्र कुछ मंत्रों की सीमायें बांध देता है और कई मंत्रों तक सामान्‍य व्‍यक्ति की पहुँच को रोक देता है इसमें सीधा तात्‍पर्य अपात्र व कुपात्र से मंत्र शक्ति को बचाना है , कई मंत्रों में चुम्‍बकीय आकर्षण होता है वे बड़ी तेजी से असर करते हैं उनके ध्‍वनि तारत्‍व आवृत्ति आयाम आदि इस प्रकार के होते हैं कि वे किसी भी तंत्र या संरचना को पल भर में ढहा सकते हैं या रच कर खड़ा कर सकते हैं ।

यन्‍त्र शब्‍द की व्‍युत्‍पत्ति यन तथा त्रय धातु के संयोग से हुयी है जिसका अर्थ है बेसिक स्‍ट्रक्‍चर यानि आधारभूत संरचना इन्‍फ्रास्‍ट्रक्‍चर जिसमें भरकर एक संरचना तैयार की जा सके या गलत संरचना को जो मरम्‍मत या रिपेयर कर सुधार सके । या एक ज्‍यामिति या एक निर्देशांक ज्‍यामिति जिसमें कुछ कार्डिनेटस या निर्देशांक एक आधारभूत संरचना का खाका तैयार करते हैं । मसलन यन्‍त्रों में शक्ति यानि स्‍त्री यंत्रों को अधोमुखी त्रिकोण व बिन्‍दु आदि से व्‍यक्‍त करते हैं और पुरूष या शिवरूपी यंत्रों में ऊर्ध्‍वमुखी त्रि‍कोण आदि के प्रतीक प्रयोग किये जाते हैं , कुछ विशिष्‍ट यंत्रों में जिनमें कि दोनों को सम्मिलित रूप से दर्शाना हो जैसे श्री यंत्र तो दोनों प्रकार के त्रिकोण व बिन्‍दु अणु आदि लिखे व व्‍यक्‍त किये जाते हैं, ऊर्ध्‍वमुखी व अधोमुखी त्रिकोण संख्‍या भेद से श्रीयंत्र का रूप व प्रकार बदल जाता है ।

तंत्र एवं देवी साधनायें

तंत्र साधनाओं में में सामान्‍यत: दो पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है एक तो वाम मार्गी और दूसरी दक्षिणमार्गी । वाममार्गी साधनायें पंचमकारी होती हैं लेकिन शीघ्र सिद्धिदायक या विनाशकारक होतीं हैं , दक्षिणमार्गी साधनायें पूर्णत: शुद्ध सात्विक एवं साचारित्रिक होतीं हैं । देवी की साधनाओं में दोनों ही पद्धतियों का जम कर प्रयोग किया जाता है जिसको जो सुभीता प्रतीत हो वह उसी साधना पद्धति को अंगीकार करता है । दक्षिणमार्गी में सिद्धि में समय अधिक लगता है तो विनाशक भी कम और देर से होतीं हैं ।

हम यहॉं दक्षिणमार्गी साधनाओं का ही जिक्र करेंगे ।

शिव के विभिन्‍न दस अवतार शिव पुराण में उल्‍लेखित हैं इन अवतारों की दसों शक्तियों को दस महाविद्या कहा जाता है । ये इस प्रकार हैं –

काली तारा महाविद्या षोडशी भुवनेश्‍वरी । भैरवी छिन्‍नमस्‍ता च विद्या धूमावती तथा ।।

बगला सिद्ध विद्या च मातंगी कमलात्मिका । एता विद्या महेशानि महाविद्या प्रकीर्तिता ।।

इसके अनुसार दस महाविद्यायें हैं , देवी की दस महाविद्याओं के नाम 1. काली यानि महाकाली 2. तारा 3. षोडशी यानि श्रीविद्या यानि त्रिपुर सुन्‍दरी 4. भुवनेश्‍वरी 5. भैरवी 6. छिन्‍न मस्‍ता 7. धूमावती 8. बगला यानि बगलामुखी 9. मातंगी यानि सरस्‍वती 10. कमला यानि महालक्ष्‍मी हैं

शाक्‍त साधनाओं में या देवी की साधनाओं में दस महाविद्या साधना सबसे उच्‍चकोटि की तंत्र साधनायें हैं , हरेक को सिद्ध भी नहीं होतीं और जिसको सिद्ध हो जायें उसे फिर कोई लगता नहीं ।

क्रमश: जारी अगले अंक में

शहीदे आजम भगत सिंह : यूं महज कुर्बान ीयां याद करने से कुछ न होगा…नरेन ्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’


शहीदे आजम भगत सिंह : यूं महज कुर्बानीयां याद करने से कुछ न होगा…

गर होगा तो फिर एक शहीद पैदा करने से ही कुछ होगा

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द

23 मार्च शहीदे आजम भगत सिंह की शहादत का दिन हो या 19 दिसम्‍बर रामप्रसाद विस्मिल का या 28 फरवरी चन्‍द्र शेखर आजाद का या… आज भारत में जब मैं इन तारीखों पर चन्‍द जुमलों के साथ चन्‍द लमहों के लिये सियासती ऑसूं बहाने वालों को देखता हूं तो कई बार लगता है कि … बस बन्‍द करों शहीदों का यूं अपमान करना , हमारे सियासतदारों के करम ऐसे हैं कि उन्‍हें शहीदों को याद करने का तो छोडि़ये नाम लेने तक का हक नहीं हैं ।

वो शुक्र है उस परवरदिगार का उसने अच्‍छे फूल चमन से चुन लिये !

गर आज चमन में होते तो बिन चुने ही कुम्‍हलाते उजड़ते चमन को देख कर ।।

ओ बिस्मिल ओ भगत सिंह ओ आजाद ए मेरे वतन आ के देखो तुम जरा ।

अपनी जॉं औ खून से बोये आजादी के जो बीज यहॉं आ के देखो तुम जरा ।।

आजादी औ आजाद हिन्‍द दोनों मुकर्रर हो गये अब आ के देखो तुम जरा ।

तुमने जवानी ,जान औ खून की परवाह किये बगैर अब आ के देखो तुम जरा ।।

अँग्रेजी रियासत गोरी सियासत को ललकार मौत को पुकारने वालो आ के देखे तुम जरा ।

अभी भी तुम्‍हारा वतन उन्‍हीं तेवरों में कैद है आ के देखो तुम जरा ।।

भ्रष्टाचार, रिश्‍वत, ना सुनी औ ऐयाशीयों का दौर है आ के देखो तुम जरा ।

चन्‍द सिक्‍को चन्‍द बोतलों चन्‍द औरतों पर निछावर भरतीय आ के देखो तुम जरा ।।

जीत कर नेता हराते पांच सालों तक तुम्‍हारे इस देश को आ के देखो तुम जरा ।

चन्‍द अरबपतियों के हाथ साथ चलती सरकारें यहॉं आ के देखो तुम जरा ।।

पैसे वालों और गरीबों के बीच लम्‍बी एक खाई को आ के देखो तुम जरा ।

रोज पिटते देशभक्‍त को, लातें खाते ईमानदार को आ के देखो तुम जरा ।।

रोज लुटती गरीब की बेटी औ कटती जेब को आओ वतन के लाड़लो आ के देखो तुम जरा ।

अमीरों ऐयाशों के दिल बहलाने के साधन गरीबों के कच्‍चे झोंपड़े आ के देखो तुम जरा ।।

चन्‍द सिक्‍कों की नौकरी वतन के दुश्‍मनों की नौकरी की खतिर बिकते भारत को आ के देखो तुम जरा ।

नौकरी की लाइन में, दो रोटी की आस में अनपढ़ मालिक के यहॉं प्रतिभायें तरसतीं आ के देखो तुम जरा ।।

अब हर देशभक्‍त घोषित पागल यहॉं हर सुन्‍दर कन्‍या कालगर्ल बनती यहॉं आ के देखो तुम जरा ।

वतन में बनते औ छपते नोट सिक्‍कों पर लग रहे अब दाग हैं आ के देखो तुम जरा ।।

वह तुम्‍हारा लाहौर सिंध औ कराची के बाजार गुम हैं वतन से तुम्‍हारे आ के देखो तुम जरा ।

एक नाजायज औलाद हिन्‍दुस्‍तान की रोज धमकाती अपने मॉं बाप को आ के देखो तुम जरा ।।

हर कंस के संग सोती राधिकायें, रावण के घर खुद पहुँचती सीतायें अब आ के देखो तुम जरा ।

कभी हवाला कभी दिवाला देश को बेच तिजारत कर रहे देश के संचालकों को आ के देखो तुम जरा ।।

हर नौजवां तरस रहा इक आस को इक विश्‍वास को रोज लड़ता खुद से कभी औ कभी अपनी सरकार से आ के देखो तुम जरा ।

भारत में यूं घुन लगा, धर्म जाति की धुन बजा औ कभी भाषा कभी लिंग पर बटते देश को आ के देखो तुम जरा ।।

जिन्‍हें जूते मार कर पीटने के कूटने के वक्‍त है, उनके जूतों तले दबे हिन्‍दुस्‍तान को आ के देखो तुम जरा ।

क्‍या लहू अपना तुमने इस देश के लिये बहाया आज उस देश को नजदीक से आ के देखो तुम जरा ।।

हॉं कर लेते हैं पापी भी तुम्‍हें याद चन्‍द लम्‍हों के लिये, तैयार अगले गुनाहों के लिये आ के देखो तुम जरा ।

गुनगुना कर चंद गीत, चंद मालायें डाल कर ए.सी. गाड़ी में बैठ शराब के घूंटों में कलाम बांचते शहीदों के आ के देखो तुम जरा ।।

क्‍या क्‍या देखोगे ओ भगत सिंह, ओ सुभाष ओ चन्‍द्रशेखर ओ बिस्मिल यहॉं ।

कि हर शाख पे अँग्रेजी सियासत औ वो खूनी रियासत देख कर शहादत नहीं आत्‍महत्‍या कर लोगे यहॉं ।।

तुमने चन्‍द सियासत अँग्रेजों की इक अल्‍प रियासत अँग्रेजी की देख शहादत दे डाली ।

ओ वीरो तुमने वीरता की दास्‍तायें देशभक्ति के अफसाने जिस कम उमर में लिख डालीं ।।

ओ मेरे देश के पावन रक्‍त अब कौन सा वो रक्‍त है जो तुम्‍हारी रक्‍त गंगा में मिले ।

मेरे पास बस चंद ऑंसू है कुछ तुम्‍हारे लिये औ कुछ देश के लिये जो विरासत में मिले ।।

मैं कल दैनिक भस्‍कर में रस्किन बाण्‍ड का कलकत्‍ता के अँग्रेजों के बारे में और आज वेद प्रताप वैदिक का डॉ. राम मनोहर लोहिया और एक रिटायर्ड डिप्‍टी कलेक्‍टर कस आलेख ‘’अब तो निलंबन एक मजाक है ‘’ पढ़ रहा था , मुझे जहॉं एक ओर बेहद तकलीफ भी हुयी और दूसरी ओर कुछ हैरत भी । कुल मिला कर मैं अपनी पढ़ने लायक सामग्री का चयन में भी बेहद सावधानी और सतर्कता बरतता हूं । मुझे क्‍या पढ़ना है मुझे पता रहता है , लेकिन जब आज देश की दुर्गत और शहीदों की शहादत के लिये उन लोगों के मगरमच्‍छी ऑंसू देखता हूं जिनके कारण समूचे देश की ऑंखों में ऑंसू हैं तो फिर लिखता भी अपनी ही पसन्‍द का हूं और इसका चयन भी मैं खुद ही करता हूं । जिनमें शहीदों के प्रति प्रतिउपकार का जज्‍बा हो या न हो लेकिन देश के लिये चन्‍द काम भी ऐसा किया है कि उन्‍होंने भगत सिंह, चन्‍द्र शेखर आजाद, रामप्रसाद विस्मिल, सुभाष चन्‍द्र बोस ….. के इस देश की ऑंखों में ऑंसू पैदा किये हैं उनके लहू से सींचे इस चमन में उस अँग्रेजी सियासत और रियासत की फसल को हजार गुना बढ़ा कर अब हर पत्‍ते पत्‍ते पर फैला दिया है उन्‍हें या तो खुद ही शर्म होना चाहिये वरना मैं कहता हूं कि प्रलाप तत्‍काल बन्‍द करें उन्‍हें शहीदों के नाम स्‍मरण तक का हक नहीं हैं , वे पावन रक्‍त हैं , उनके कर्म वाणी सब पावन हैं और अपावन उनके नाम का उच्‍चारण न ही करें तो बेहतर हैं… कभी सोच के देखना ठण्‍डे दिमाग से वे देश के लिये क्‍या कर गये और तुमने क्‍या किया .. क्‍या कर रहे हो…. जय हिन्‍द

एयरटेल की नेटवर्क फिर ध्‍वस्‍त, शिका यतें न दर्ज हो रहीं न सुनवाई हो रही ह ै, बड़े बड़े दावों के पीछे ढोल की पोल


एयरटेल की नेटवर्क फिर ध्‍वस्‍त, शिकायतें न दर्ज हो रहीं न सुनवाई हो रही है, बड़े बड़े दावों के पीछे ढोल की पोल

क्‍या आप भी किसी मोबाइल सेवा प्रदाता कम्‍पनी की ठगी का शिकार हैं तो इसे ध्‍यान से पढ़ें

हर तीसरे दिन लुप्‍त हो जाता है एयरटेल का नेटवर्क

यूं ही नहीं चलते लाखों के इनामी टी.वी. कार्यक्रम कम्‍पनीयों के , इस तरह करोड़ो अरबों बटोरतीं हैं कम्‍पनीयॉं, और चलाती हैं देश की आवाज और क्रेजी किया रे जैसे लुभावने कार्यक्रम

मुरैना 22 मार्च 10 , विगत 8 फरवरी से गड़बड़ाया एयरटेल (भारती एयरटेल) का नेटवर्क पिछले दिनों की तरह आज फिर ध्‍वस्‍त हो गया ।

विगत 8 फरवरी से ठप्‍प हुये एयरटेल संचार प्रणाली में मजे की बात यह भी है कि उपभोक्‍ताओं को जम कर कम्‍पनी द्वारा चूना भी लगाया जा रहा है । जहॉं कम्‍पनी द्वारा घोषित टोल फ्री शिकायत नंबर 198 कभी भी नहीं लगता वही कम्‍पनी जबरन बाध्‍य कर शिकायतें पहले खुद ही पैदा करती है और उसके बाद शिकायत दर्ज कराने के पैसे वसूलती है ।

जहॉं कम्‍पनी कुछ नंबरों पर एस.एम.एस. से शिकायत भेजने के लिये शुल्‍क नहीं लेती थी मसलन 121, अब इस नंबर पर भी एस.एम.एस. भेजने के पैसे काटे जाते हैं वह भी 1 रू. प्रति एस.एम.एस. की दर से शुल्‍क वसूलती है , आज हमने जब 198 , 121 सभी नंबरों के फेल होने पर 121 पर एस.एम.एस. भेजे तो पूरे 6 रू. काट लिये गये ।

उल्‍लेखनीय है कि कम्‍पनी के नेटवर्क टावर विगत 8 फरवरी से चम्‍बल में उपलब्‍ध नहीं हो रहे हैं । सैकड़ों उपभोक्‍ता कम्‍पनी के पास शिकायत दर्ज कराने को झकमारी करते फिर रहे हैं , अव्‍वल तो कम्‍पनी शिकायत ही दर्ज नहीं करती और कोई उपभोक्‍ता पैसे खर्च कर शिकायत दर्ज भी करवा दे तो फिर उस पर कोई कार्यवाही नहीं की जाती । उपभोक्‍ता पैसे खर्च करता रहता है और ठगा जा कर कम्‍पनी की चालबाजी और धोखाधड़ी का शिकार होता रहता है ।

कम्‍पनी के तमाम उपभोक्‍ता मोबाइल आफिस के नाम से इण्‍टरनेट सेवायें प्रयोग करते हैं , उनके साथ कम्‍पनी न केवल धोखाधड़ी कर रही है बल्कि जम कर ठगी भी कर रही है । कुछ उपभोक्‍ताओं से मासिक शुल्‍क एकमुश्‍त काट कर कम्‍पनी महीने भर इण्‍टरनेट सेवायें प्रदान करने का वायदा करके साधारण संचार नेटवर्क तक उपलब्‍ध नहीं करा पाई वही कुछ उपभोक्‍ता 10 रू प्रति दिवस का भुगतान करके भी इण्‍टरनेट छोडि़ये साधारण फोन पर बात भी नहीं कर पाये । और विगत 8 फरवरी से तकरीबन हर दूसरे दिन अपने गांठ से पैसे खर्च करके शिकायतें भी करते रहे और रोजाना 10 रू भी कटाते रहे फिर भी वही ढाक के तीन पात ही रहे ।

इससे भी आगे बढ़ कर कम्‍पनी और भी कई करिश्‍मे दिखाती है , मसलन इस कम्‍पनी की मोगाइल सेवाओं पर बिना चालू किये ही अपने आप ही अश्‍लील गानों की कालर टयून नामक सेवा प्रारंभ हो जाती है और जबरन रातों रात आपके मोबाइल फोन से 60- 70 रूपये गायब हो जायेंगें ।

और भी तमाशा ये हैं कि आप के फोन पर कोई भी सुविधा आप प्राप्‍त करें या न करें यदि आपने अपना बैलेन्‍स 100 रूपये से ऊपर मोबाइल में रखा है तो रातों रात सैकड़ों रूपये गायब होकर चन्‍द पैसे का बैलेन्‍स मात्र शेष रह जायेगा । कई उपभोक्‍ताओं के इस तरह सैकड़ो हजारों रूपये साफ हो चुके हैं । जिसकी शिकायतें जागो ग्राहक जागो और ट्राई तक हो चुकीं हैं , ज्‍यादा पीछे पड़ने वाले ग्राहक के पैसे तो कम्‍पनी लौटा देती है लेकिन लापरवाह , सुस्‍त या शिकायत न करने वाले या पीछे न पड़ने वालों के पैसे कम्‍पनी हजम कर जाती है । हमने इस समाचार के सम्‍बन्‍ध में सभी साक्ष्‍य प्राप्‍त कर लिये हैं और हमारे पास सुरक्षित हैं । जनहित में सूचित करते हैं कि ऐसी किसी भी कम्‍पनी से पीडि़त होने पर बी.एस.एन.एल. के फोन से टोल फ्री नंबर 1800-11-4000 पर शिकायत तुरन्‍त दर्ज करायें ।

नवदुर्गा – नवरात्रि विशेष : दस मह ाविद्या और शक्ति उपासना – नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’


नवदुर्गा नवरात्रि विशेष : दसमहाविद्या और शक्ति उपासना

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’

भारत में शक्ति उपासना आराधना एवं पूजा विशेष रूप से प्रचलित एवं सर्व मान्‍यता प्राप्‍त है । केवल भारत ही नहीं अपितु सम्‍पूर्ण विश्‍व में ही शक्ति की उपासना किसी न किसी प्रकार से हर धर्म हर जाति हर समुदाय में की जाती है ।

बहुधा लोग शक्ति उपासना आराधना के भेद जाने बगैर आराधना और उपासना करते हैं । हालांकि विधि जाने बगैर पूजा उपासना करना कोई अपराध नहीं हैं और बहुधा अनिष्‍टकारी भी नहीं होता । लेकिन कई बार अनिष्‍टकारी भी होता है । यदि विधिपूर्वक शक्ति उपासना की जायेगा तो कहना ही क्‍या है और इसका फल भी सुनिश्चित एवं सुफलित होता है ।

अव्‍वल तो यह जान लेना बेहद जरूरी है कि भारतीय समाज में शक्ति उपासना का अर्थ एवं भेद क्‍या हैं इसके बाद हर समाज हर धर्म समुदाय एवं हर देश में की जाने वाली शक्ति पूजा उपासना व आराधना का भेद भलीभांति स्‍वत: ही समझ आ जायेगा ।

नारी, प्रकृति, शक्ति, दुर्गा, आद्यशक्ति एवं कुण्‍डलिनी

शक्ति से सीधा तात्‍पर्य नारी से है, नारी का सीधा तात्‍पर्य प्रकृति से व प्रकृति का सीधा संबंध शक्ति से, शक्ति का ताल्‍लुक दुर्गा से व दुर्गा का आद्यशक्ति से और इन सबका सीधा संबंध कुण्‍डलिनी से है ।

शक्ति विहीन मनुष्‍य सिर्फ केवल एक शव मात्र है और उसमें शक्ति का स्‍पर्श होते ही वह सजीव, सचेतन और सक्रिय हो उठता है । शिव में से शक्ति मात्रा इ (इकार मात्रा) हटाते ही वह शव हो जाता है और शक्ति की इ मात्रा लगाते ही वह शिव हो जाता है तथा शवों का भक्षण करने वाला महाकाल हो जाता है ।

ठीक इसी का विपरीत क्रम है बिना शव के शक्ति केवल प्रवाह मात्र है और यूं ही यत्र तत्र विचरण करती रहती है वह स्‍वयं कुछ कर पाने में असमर्थ एवं प्रभावहीन होती है , लेकिन जब उसे माध्‍यम मिल जाता है यानि की एक शव प्राप्‍त होता है तो वह उसे शिव बना कर सदैव सदैव उसकी शक्ति बन कर न केवल सृष्टि रचना का स्‍त्रोत बन जाती है अपितु सृष्टि कर नियामक, पालक, संहारक भी बन जाती है । शक्ति और शव के इसी समुचित व सम्‍यक सम्मिलन एवं संयुक्‍तीकरण से प्रकृति का सूचित सुचारू संचालन होता है । इस योग में किंचित भी विकार या रोग पैदा होने पर न्रकृति का संतुलन गड़बड़ा कर प्रकृति चक्र असंतुलित व विनाशकारी हो उठता है ।

विज्ञान यानि साइन्‍स में शक्ति को पावर और पॉवर के पीछे ऊर्जा को संवाहक व नियामक माना जाता है । इस सम्‍बन्‍ध में आइन्‍सटीन ने ऊर्जा का संरक्षण सिद्धान्‍त प्रतिपादित किया “Energy can not be produce nor be destroyed, that can only transform in various forms (it may only can change in one form to another form) ‘’ यह सिद्धान्‍त विज्ञान यानि साइन्‍स का प्रसिद्ध सिद्धान्‍त है और भारतीय शक्ति पूजा उपासना और शक्ति अवस्थिति को बेहद सटीक रूप से व्‍याख्‍या कर देता है, वे लोग जो नास्तिक हैं या शक्ति पूजा उपासना में विश्‍वास नहीं करते उन्‍हें आइन्‍सटीन के इस सिद्धान्‍त पर तो गुरेज ही नहीं होगा । फिर आइन्‍सटीन ने तो आखिर में स्‍वयं को ईश्‍वरवादी और आस्तिक ही घोषित कर स्‍वयं को उस अलौकिक ईश्‍वरीय शक्ति का अनन्‍य भक्‍त कह कर नतमस्‍तकता जाहिर की थी । इस सिद्धान्‍त के अनुसार ऊर्जा को न तो पैदा किया जा सकता है, न उसे नष्‍ट किया जा सकता है केवल उसे रूपा‍न्‍तरित मात्र किया जा सकता है ।

भारतीय शाक्‍त सिद्धान्‍त भी इसी बात को कहता है और इसी सिद्धान्‍त पर पूरी शाक्‍त साधना, पूजा उपासना अर्चना टिकी हुयी है । आइन्‍सटीन ने ऊर्जा सिद्धान्‍त पर कार्य करते हुये ऊर्जा समीकरण एवं ऊर्जा शक्ति की प्रचण्‍ड ताकत का सूत्र निष्‍पादित कर दिया यह समीकरण ही विश्‍व भर में परमाणु बम, परमाणु ऊर्जा और परमाणु शक्ति की जनक एवं कारण बन गई आइन्‍सटीन की ऊर्जा शक्ति की प्रचण्‍ड ताकत को नापने वाली प्रसिद्ध समीकरण E = mc2 है । यही ताकत भारतीय शाक्‍त सिद्धान्‍त में शक्ति उपासना के लिये वर्णित है लेकिन बेहद विस्‍तार से ।

भारतीय शाक्‍त सिद्धान्‍त के अनुसार जब शक्ति यानि महाऊर्जा ब्रह्माण्‍ड में स्‍वतंत्र एवं अकेली विचरणशील थी जिसे आद्यशक्ति कहा गया है तो उसे सृष्टि , प्रकृति एवं सक्रिय संरचना के सुन्‍दर एवं अदभुत संसार की लालसा हुयी तब शक्ति ने पुरूष को प्रकट किया और आदि देवों त्रिदेवों की उत्‍पत्ति हुयी , आद्य शक्ति ने उन्‍हें त्रिशक्तियां अर्पित व समर्पित कीं तब प्रकृति व सृष्टि रचना आगे बढ़ी और सुन्‍दर संसार का निर्माण हुआ ।

शक्ति के रूप व भेदान्‍तर

शक्ति के असल में कितने भेद हैं यह काफी गूढ़ व रहस्‍यात्‍मक है विज्ञान भी अभी इस मामले में काफी पीछे चल रहा है और एक खोज नई हो पाती है तब तक दूसरी नई रहस्‍य श्रंखला समाने आ जाती है । भारतीय शाक्‍त सिद्धान्‍त ने इसके भेद शाक्‍त सिद्धान्‍त में वर्णन किये हैं जिसमें केन्‍द्र बिन्‍दु में नारी यानि स्‍त्री और प्रकृति एवं शक्ति नियमों को रखा गया है तथा सिद्धांत प्रतिपादन हुये हैं ।

बहुधा अधिक न जानने वाले लोग चकरा जाते हैं कि आखिर दुर्गा यानि शक्ति के असल में कितने रूप हैं और आखिर किस रूप की साधना उपासना से उनका वाछित कल्‍याण संभव है । इस प्रश्‍न का उत्‍तर बेहद आसान है आद्य शक्ति जगत्जननी मॉं जगदम्‍बा की उपासना जब आप करते हैं तो शक्ति के मूल रूप यानि मॉं की उपासना करते हैं और मातृ शक्ति मूल आराधना का विषय आप अपने समक्ष रखते हैं ।

जैसे ही आप शक्ति भेद से रूपान्‍तरित शक्ति उपासनाओं की ओर बढ़ते हैं वैसे ही या तो अपनी कामनाओं के अनुरूप शक्ति उपासना करते हैं या फिर अनजाने में या अकारण ही निर्लिप्‍त व निष्‍काम भाव से शक्ति के किसी रूप की साधना में जुट बैठते हैं । लेकिन फल सबका ही प्राप्‍त होता है । शक्ति के रूप भेद से फल भी बदल जाता है , साधना पद्धति एवं विधि क्रम भी बदल जाते हैं ।

नवदुर्गा एवं दस महाविद्यायें तथा क्षुद्र साधनायें

हालांकि तन्‍त्र शास्‍त्र एवं नारी शास्‍त्र में कतिपय कई शक्ति भेद वर्णित हैं जिसमें क्षुद्र से लेकर आद्य शक्ति स्‍तर तक की शक्ति भेद व नारीयों का वर्णन आता है , लेकिन यह व्‍याख्‍या या वर्णन इस आलेख का उद्देश्‍य नहीं हैं बस इतना समझना पर्याप्‍त होगा कि शक्ति के क्षुद्र रूपों में सामान्‍य नारी, भूतनी , प्रेतनी, पिशाचनी,चाण्‍डालनी, यक्षणी, किन्‍नरी, जिन्‍न, गंधर्व एवं अप्‍सरा, निशाचनी, राक्षसी जैसी साधनाओं से क्षुद्र सिद्धिदायक साधनाओं के फल क्षुद्र एवं विनाशकारी ही होते हैं इनसे दूरी रखना चाहिये । और उच्‍च स्‍तर की साधना पूजा उपासना देवी साधना, पूजा, अर्चना उपासना जिसके भेद वर्णन हम आगे करेंगें ही करना श्रेष्‍ठ रहता है । इस सम्‍बन्‍ध में तन्‍त्र शास्‍त्र भी पर्याप्‍त सावधान करता है और श्रीमदभगवद गीता में श्रीकृष्‍ण भी स्‍पष्‍ट कहते हैं ‘’भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्‍त होते हैं, यक्षों को पूजने वाले यक्षों को प्राप्‍त होते हैं देवों को पूजने वाले देवों को प्राप्‍त होते हैं और जो मेरा पूजन करते हैं वे मुझ ही को प्राप्‍त होते हैं ‘’ आगे श्रीकृष्‍ण ने यह भी कहा कि ‘’जो जिसका पूजन करता है उसका स्‍वयं का स्‍वरूप भी वैसा ही बन जाता है’’ गीता के इन श्‍लोकों में तंत्र व पूजा का भारी भेद एवं रहस्‍य वर्णित है । यही भारतीय तन्‍त्र शास्‍त्र भी कहता है और इसकी अधिक व्‍याख्‍या करता है, तन्‍त्र शास्‍त्र साफ कहता है कि जिसको पूजोगे वैसे ही हो जाओगे और वैसे ही फल प्राप्‍त होंगें तथा जीवन के अंत में उसी के साथ चले जाओगे यानि वही बन जाओगे ।

क्रमश: जारी अगले अंक में …

लेख : विद्युत क्षेत्र में जन भागीदार ी की व्यापक संभावनायें- विवेक रंजन श्रीवास्तव


लेख: विद्युत क्षेत्र में जन भागीदारी की व्यापक संभावनायें

विवेक रंजन श्रीवास्तव
अतिरिक्त अधीक्षण इंजीनियर
म.प्र.राज्य विद्युत मण्डल , जबलपुर
बंगला नम्बर ..ओ बी ११ , विद्युत मण्डल कालोनी , रामपुर, जबलपुर , मो ९४२५८०६२५२

उपभोक्‍ता अधिकार एवं शिकायत प्रण ाली – डॉ. शीतल कपूर डॉ.शीतल कपूर


उपभोक्‍ता अधिकार एवं शिकायत प्रणाली

डॉ.शीतल कपूर

(डा कपूर उपभोक्ता क्लब की संयोजक हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय के कमला नेहरू कालेंज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

वैश्वीकरण एवं भारतीय बाजार को विदेशी कंपनियों के लिए खोले जाने के कारण आज भारतीय उपभोक्ताओं की कई ब्रांडों तक पहुंच कायम हो गयी है। हर उद्योग में, चाहे वह त्वरित इस्तेमाल होने वाली उपभोक्ता वस्तु (एफएमसीजी) हो या अधिक दिनों तक चलने वाले सामान हों या फिर सेवा क्षेत्र हो, उपभोक्ताओं की जरूरतों को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर 20 से अधिक ब्रांड हैं। पर्याप्त उपलब्धता की यह स्थिति उपभोक्ता को विविध प्रकार की वस्तुओं एवं सेवाओं में से कोई एक चुनने का अवसर प्रदान करती है। लेकिन सवाल यह है कि क्या उपभोक्ता को उसकी धनराशि की कीमत मिल रही है? आज के परिदृश्य में उपभोक्ता संरक्षण क्यों जरूरी हो गया है? क्या खरीददार को जागरूक बनाएं की अवधारणा अब भी कायम है या फिर हम उपभोक्ता संप्रुभता की ओर आगे बढ रहे हैं।

उपभोक्ता कल्याण की महत्ता

उपभोक्तावाद, बाजार में उपभोक्ता का महत्व और उपभोक्ताओं के बीच जागरूकता भारत में उपभोक्ता मामले के विकास में कुछ मील के पत्थर हैं। दरअसल किसी भी देश की अर्थव्यवस्था उसके बाजार के चारों ओर घूमती है। जब यह विक्रेता का बाजार होता है तो उपभोक्ताओं का अधिकतम शोषण होता है। जब तक क्रेता और विक्रेता बड़ी संख्या में होते हैं तब उपभोक्ताओं के पास कई विकल्प होते हैं। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 बनने से पहले तक भारत में विक्रेता बाजार था। इस प्रकार वर्ष 1986 एक ऐतिहासिक वर्ष था क्योंकि उसके बाद से उपभोक्ता संरक्षण भारत में गति पकड़ने लगा था।

1991 में अर्थव्यवस्था के उदारीकरण ने भारतीय उपभोक्ताओं को प्रतिस्पर्धी कीमतों पर गुणवत्तापूर्ण उत्पाद पाने का अवसर प्रदान किया। उसके पहले सरकार ने हमारे अपने उद्योग जगत को सुरक्षा प्रदान करने के लिए विदेशी प्रतिस्पर्धा पर रोक लगा दी थी। इससे ऐसी स्थिति पैदा हुई जहां उपभोक्ता को बहुत कम विकल्प मिल रहे थे और गुणवत्ता की दृष्टि से भी हमारे उत्पाद बहुत ही घटिया थे। एक कार खरीदने के लिए बहुत पहले बुकिंग करनी पड़ती थी और केवल दो ब्रांड उपलब्ध थे। किसी को भी उपभोक्ता के हितों की परवाह नहीं थी और हमारे उद्योग को संरक्षण देने का ही रुख था।

इस प्रकार इस कानून के जरिए उपभोक्ता संतुष्टि और उपभोक्ता संरक्षण को मान्यता मिली। उपभोक्ता को सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक प्रणाली का अपरिहार्य हिस्सा समझा जाने लगा, जहां दो पक्षों यानि क्रेता और विक्रेता के बीच विनिमय का तीसरे पक्ष यानी कि समाज पर असर होता है। हालांकि बड़े पैमाने पर होने वाले उत्पादन एवं बिक्री में लाभ की स्वभाविक मंशा कई विनिर्माताओं एवं डीलरों को उपभोक्ताओं का शोषण करने का अवसर भी प्रदान करती है। खराब सामान, सेवाओं में कमी, जाली और नकली ब्रांड, गुमराह करने वाले विज्ञापन जैसी बातें आम हो गयीं हैं और भोले-भाले उपभोक्ता अक्सर इनके शिकार बन जाते हैं।

संक्षिप्त इतिहास

9 अप्रैल, 1985 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने उपभोक्ता संरक्षण के लिए कुछ दिशानिर्देशों को अपनाते हुए एक प्रस्ताव पारित किया था और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को सदस्य देशों खासकर विकासशील देशों को उपभोक्ताओं के हितों के बेहतर संरक्षण के लिए नीतिंयां और कानून अपनाने के लिए राजी करने का जिम्मा सौंपा था। उपभोक्ता आज अपने पैसे की कीमत चाहता है। वह चाहता है कि उत्पाद या सेवा ऐसी हो जो तर्कसंगत उम्मीदों पर खरी उतरे और इस्तेमाल में सुरक्षित हो। वह संबंधित उत्पाद की खासियत को भी जानना चाहता है। इन आकांक्षाओं को उपभोक्ता अधिकार का नाम दिया गया। 15 मार्च को विश्व उपभोक्ता दिवस मनाया जाता है।

इस तारीख का ऐतिहासिक महत्व है क्योंकि यह वही दिन है जब 1962 में अमेरिकी संसद कांग्रेस में उपभोक्ता अधिकार विधेयक पेश किया गया था। अपने भाषण में राष्ट्रपति जॉन एफ केनेडी ने कहा था, न्नन्न यदि उपभोक्ता को घटिया सामान दिया जाता है, यदि कीमतें बहुत अधिक है, यदि दवाएं असुरक्षित और बेकार हैं, यदि उपभोक्ता सूचना के आधार पर चुनने में असमर्थ है तो उसका डालर बर्बाद चला जाता है, उसकी सेहत और सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है और राष्ट्रीय हित का भी नुकसान होता है।

उपभोक्ता अंतर्राष्ट्रीय (सीआई), जो पहले अंतर्राष्ट्रीय उपभोक्ता यूनियन संगठन (आईओसीयू) के नाम से जाना जाता था, ने अमेरिकी विधेयक में संलग्न उपभोक्ता अधिकार के घोषणापत्र के तत्वों को बढा क़र आठ कर दिया जो इस प्रकार है- 1.मूल जरूरत 2.सुरक्षा, 3. सूचना, 4. विकल्पपसंद 5. अभ्यावेदन 6. निवारण 7. उपभोक्ता शिक्षण और 8. अच्छा माहौल। सीआई एक बहुत बड़ा संगठन है और इससे 100 से अधिक देशों के 240 संगठन जुड़े हुए हैं।

इस घोषणापत्र का सार्वभौमिक महत्व है क्योंकि यह गरीबों और सुविधाहीनों की आकांक्षाओं का प्रतीक है। इसके आधार पर संयुक्त राष्ट्र ने अप्रैल, 1985 को उपभोक्ता संरक्षण के लिए अपना दिशानिर्देश संबंधी एक प्रस्ताव पारित किया।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम,1986

भारत ने इस प्रस्ताव के हस्ताक्षरकर्ता देश के तौर पर इसके दायित्व को पूरा करने के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 बनाया। संसद ने दिसंबर, 1986 को यह कानून बनाया जो 15 अप्रैल, 1987 से लागू हो गया। इस कानून का मुख्य उद्देश्य उपभोक्ताओं के हितों को बेहतर सुरक्षा प्रदान करना है। इसके तहत उपभोक्ता विवादों के निवारण के लिए उपभोक्ता परिषदों और अन्य प्राधिकरणों की स्थापना का प्रावधान है।

यह अधिनियम उपभोक्ताओं को अनुचित सौदों और शोषण के खिलाफ प्रभावी, जनोन्मुख और कुशल उपचार उपलब्ध कराता है। अधिनियम सभी सामानों और सेवाओं, चाहें वे निजी, सार्वजनिक या सहकारी क्षेत्र की हों, पर लागू होता है बशर्ते कि वह केंद्र सरकार द्वारा अधिकारिक गजट में विशेष अधिसूचना द्वारा मुक्त न कर दिया गया हो। अधिनियम उपभोक्ताओं के लिये पहले से मौजूदा कानूनों में एक सुधार है क्योंकि यह क्षतिपूर्ति प्रकृति का है, जबकि अन्य कानून मूलत: दंडाधारित है और उसे विशेष स्थितियों में राहत प्रदान करने लायक बनाया गया है। इस अधिनियम के तहत उपचार की सुविधा पहले से लागू अन्य कानूनों के अतिरिक्त है और वह अन्य कानूनों का उल्लंघन नहीं करता। अधिनियम उपभोक्ताओं के छह अधिकारों को कानूनी अमली जामा पहनाता है वे हैं- सुरक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार, चुनाव का अधिकार, अपनी बात कहने का अधिकार, शिकायत निवारण का अधिकार और उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार। अधिनियम में उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए सलाहकार एवं न्याय निकायों के गठन का प्रावधान भी है। इसके सलाहकार स्वरूप के तहत केंद्र, राज्य और जिला स्तर पर उपभोक्ता सुरक्षा परिषद आते हैं। परिषदों का गठन निजी-सार्वजनिक साझेदारी के आधार पर किया जाता है। इन निकायों का उद्देश्य सरकार की उपभोक्ता संबंधी नीतियों की समीक्षा करना और उनमें सुधार के लिए उपाय सुझाना है।

अधिनियम में तीन स्तरों जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तरों पर जिला फोरम, राज्य उपभोक्ता शिकायत निवारण आयोग और राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग जैसे अर्ध्दन्यायिक निकाय मशीनरी का भी प्रावधान है। फिलहाल देश में 621 जिला फोरम, 35 राज्य आयोग और एक राष्ट्रीय आयोग है। जिला फोरम उन मामलों में फैसले करता है जहां 20 लाख रूपए तक का दावा होता है। राज्य आयोग 20 लाख से ऊपर एक करोड़ रूपए तक के मामलों की सुनवाई करता है जबकि राष्ट्रीय आयोग एक करोड़ रूपए से अधिक की राशि के दावे वाले मामलों की सुनवाई करता है। ये निकाय अर्ध्द-न्यायिक होते हैं और प्राकृतिक न्याय के सिध्दांतों से संचालित होते हैं। उन्हें नोटिस के तीन महीनों के अंदर शिकायतों का निवारण करना होता है और इस अवधि के दौरान कोई जांच नहीं होती है जबकि यदि मामले की सुनवाई पांच महीने तक चलती है तो उसमें जांच भी की जाती है।

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 समेकित एवं प्रभावी तरीके से उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा और संवर्ध्दन से संबंधित सामाजिक-आर्थिक कानून है। अधिनियम उपभोक्ताओं के लिए विक्रेताओं, विनिर्माताओं और व्यापारियों द्वारा शोषण जैसे खराब सामान, सेवाओं में कमी, अनुचित व्यापारिक परिपाटी आदि के खिलाफ एक हथियार है। अपनी स्थापना से लेकर 01 जनवरी, 2010 तक राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर की उपभोक्ता अदालतों में 33,30,237 मामले दर्ज हुए और 29,58,875 मामले निपटाए गए।

(डा कपूर उपभोक्ता क्लब की संयोजक हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय के कमला नेहरू कालेंज में एसोसिएट प्रोफेसर हैं।)

मुरैना तेल माफिया का चक्रव्‍यूह अभी बरकरार, पंजाब के किसानों को पकड़ क र बंद कराया


मुरैना तेल माफिया का चक्रव्‍यूह अभी बरकरार, पंजाब के किसानों को पकड़ कर बंद कराया

सी.बी.आई. दस्‍ते मुरेना पहुँचने की खबर से हड़कम्‍प

मुरैना 18 मार्च 10, कल अचानक तेल माफिया के काला बाजार नेटवर्क ने एक और तगड़ा काण्‍ड कर डाला । लम्‍बे समय से चम्‍बल के किसानों का एकक्षत्र शोषण का रहे तेल माफिया नेटवर्क के लोगों द्वारा बाहर से चम्‍बल के किसानों से गॉंव गॉंव जाकर सरसों की खरीद फरोख्‍त करने वाले 28 किसानों को मुरैना के तेल माफिया की पालतू मण्‍डी नेटवर्क ने न केवल अवैध रूप से पकड़ लिया बल्कि पुलिस के हवाले कर दिया , साथ ही तकरीबन 700 क्विंटल सरसों और लाखों रूपये भी उनसे छीन लिये ।

पुलिस ने किसानों पर कोई आपराधिक मामला बनते न देख हाथ खड़े कर दिये और आनन फानन में मामले को शान्ति भंग का मामला बना कर धारा 151 में बंद कर के मामले की खानापूर्ति कर दी ।

गौर तलब है कि तेल माफिया में मुरैना जिला की मण्डियों समेत कई व्‍यापारीयों के साथ मिलकर एक आपराधिक गिरोह नुमा नेटवर्क बना रखी है जो कि चम्‍बल के किसानों से न केवल दवाब डालकर उद्दीपन के जरिये कम दामों पर अपनी फसल बेच कर जाने को मजबूर करते हैं बल्कि उनसे भारी कमीशन और रिश्‍वत भी जबरन वसूलते हैं अन्‍यथा दूर दूर से माल बेचने आये किसान हफ्तों तक पड़े रहते हैं उनका माल न तो खरीदा जाता है उल्‍टे कई तरह से उन लोगों को तंग भी किया जाता है ।

किसानों के शोषण और चम्‍बल के पीले सोने में को कारोबार के दाग का सरगना के.एस. आयल्‍स समूह हालांकि पतन और बर्बादी के हत्‍थे चढ़ चुका है लेकिन उसकी जमी जमाई नेटवर्क अभी ज्‍यों की त्‍यों है जिसमें जिले की मण्डियां और कई व्‍यापारी एवं आढ़तिये शामिल है ।

सी.बी.आई. के दस्‍ते की खबर से हड़कम्‍प मचा

हालांकि पंजाब के पकड़े गये किसानों को भले ही धारा 151 लगा कर हाल फिलहाल भले ही बंद कर दिया हो लेकिन उनकी 700 क्विंटल सरसों और लाखों रूपये कहॉं गये यह अभी रहस्‍य में है । मण्‍डी की भूमिका पर काफी प्रश्‍नचिह्न एवं आरोप खड़े हो गये हैं । वहीं आज सुबह हवा उड़ी कि पंजाब के किसान सी.बी.आई. की नेशनल नेटवर्क के सदस्‍य हैं और सी.बी.आई. की तेल माफिया के खिलाफ सी.बी.आई. द्वारा की जा रही विशेष खुफिया पड़ताल में यह सदस्‍य किसान व्‍यापारी बनकर चम्‍बल के गॉंवों में हाल और हालात टटोल कर सरसों के पीले सोने के छिपे काले कारोबार के सुराग ढूंढने में लगे थे और बदकिस्‍मती तेल माफिया के नेटवर्क में शामिल मण्‍डीयों और व्‍यापारीयों की यह रही कि सी.बी.आई. के गुप्‍त दस्‍ते के इन सदस्‍यों को ही धर दबोचा । और भ्रष्‍टाचार तथा गड़गड़ी के सारे रंग भी जम कर व खुल कर दिखा डाले ।

सी.बी.आई. का विशेष दस्‍ता होने की खबर से जहॉं अफसरों की हवाईयां उड़ रहीं थीं तभी अचानक खबर आयी कि एक और नेशनल नेटवर्क का ही अगला गुप्‍त दस्‍ता भी आज रात चम्‍बल में पहुँच गया है । सी.बी.आई के दस्‍ते की खबर की हकीकत चाहे कुछ भी हो , भ्रष्‍ट व चोरों में भारी खौफ , दहशत व आतंक के चित्र उनके चेहरे पर साफ नजर आते हैं ।

के.एस. आयल्‍स बनाम रमेश चन्‍द्र गर्ग : खाकशाह से भामाशाह और शहंशाह तक क ा सफर -2


के.एस. आयल्‍स बनाम रमेश चन्‍द्र गर्ग : खाकशाह से भामाशाह और शहंशाह तक का सफर -2

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’

कुतवार के बनिये बेहद समृद्धि शाली थे पहले बैंक वगैरह नहीं होतीं थी सो अधिकतर लोग अपना माल जमीन में तहखाने खोद कर जिन्‍हें अक्‍सर गॉंवों में खौंह कहा जाता है में बड़े बक्‍सों, घड़ों , कलसों, तम्‍हेडि़यों जैसी चीजों में या सीधे ही नांद या चपटों में जमीन में गाड़ का दबा कर रखते थे । भय व आतंक से भागे बनियों के मालमत्‍ते केवल कुतवार ही नहीं बल्कि अधिकांश गॉंवों में रह गये । कुतवार पर मुझे रिसर्च का मौका मिला । बनियों की खाली पड़ी हवेलियों और दूकानों पर आसपास रहने वाले तथा इधर उधर से रिश्‍तेदारों आदि को बुला कर काछीयों ने कब्‍जे कर लिये । बमुश्किल अपवाद स्‍वरूप दीगर जाति का एकाध आदमी ही बनियों के खाली पड़े मकानों तक पहुँचा । बनियों की खेती की जमीनों पर भी काछीयों का कब्‍जा हो गाया । बनिये सब जान कर भी चुप रहे और यही सोचते रहे कि चलो इस बहाने मकानों दूकानों की देख रेख साफ सफाई भी होती रही , ठौर सुरक्षित रहेगा तथा शान्ति आने पर वापस लौट जायेंगे । और दबे माल की जानकारी काछीयों को तो है नहीं सो वो भी सुरक्षित रहेगा ।

बची खुची पुंजी जो वे साथ लेकर आ सकते थे यानि कैश इन हैण्‍ड के साथ में मुरैना या अन्‍य कस्बों, अम्‍बाह पोरसा सबलगढ़, पहाड़गढ़, बामौर, जौरा, कैलारस जैसी जगह थोड़ी बहुत जमीन मकान लेकर या मकान आदि बनवा कर छोटे छोटे काम धंधे और व्‍यवसाय प्रारंभ कर दिये साथ ही ग्रामीण क्षेत्रों में शांति का इंतजार करते रहे ।

चम्‍बल में दिक्‍कत ये थी कि एक डकैत या बागी गिरोह से छुटकारा मिलता और दूसरा पैदा हो जाता । बनिये सब्र धारण कर कभी अपने अपने क्षेत्र में साहूकार, सेठ जी, नगर सेठ, जमीन्‍दार, जागीरदार, वसूलीदार, चौधरी आदि नामों से जाने जाने वाले लोग जिन्‍होंने प्रतिष्‍ठा और वैभव की जो दुनियां देख रखी थी और समृद्धि का उनका जो इतिहास था उन्‍हें बार बार याद आता । लेकिन भारी कष्‍ट आर्थिक विपन्‍नता और तंगहाली झेल कर भी बनिये महज आस पर जिन्‍दा बने रहे हालांकि कई बनिये पागल भी हो गये, और अपना छोटे मोटे कारोबार के साथ ही अपना और परिवार का पेट पालते रहे ।

इधर ये होता रहा उधर उनके मकानों पर काबिज हुये काछीयों ने उनके खजानों की सुगन्‍ध पा ली और धीरे धीरे कुतवार में काछीयों ने खोज खोज कर खुदायी शुरू की । और बनियों के खजाने काछीयों के हाथ लगते गये , काछी मालदार होते चले गये, अब तो शायद ही कुछ जगह मात्र बची हैं जहॉं अभी माल शेष बचा रह गया है और वह जगह भी केचल उन्‍हीं बनियों को या उनके बच्‍चों को ही मालुम है । अब क्षेत्र में डाकूओं और बागीयो का आतंक नहीं रहा , शान्ति है बनिये इस बीच में जा जा कर थोड़ा बहुत माल गुप्‍त रूप से निकाल कर लाते भी रहे , लेकिन उनका अधिकांश माल काछीयों ने ही निकाल लिया ।

बात दबे खजाने की है अत: कई झगड़े विवादों के बावजूद भी दोनों में से एक भी पक्ष पुलिस या सरकार के पास नहीं गया । मुझे कुछ बनिये अपने घर ले गये और मुझे काछीयों द्वारा खुदायी के चिह्न व सुरंगें दिखाईं । मजे की बात ये रही कि दोनों ही पक्ष स खजाने के लिये जो कि बनियों का खुद का पैतृक और काछीयों लिये छप्‍पर फाड़ के आ टपकने वाला था जम कर तंत्र मंत्र यंत्र और पूजा पाठ कराते रहे ।

बनियों के काफी दौलतखाने यूं ही बेआवाज लुट गये ।

तब उधर सन 1972 में माधौ सिंह मोहर सिंह, माखन सिंह आदि के गिरोहों के ऐतिहासिक समर्पण के बाद एक तरफ मंहगायी ने सिर चढ़कर भन्‍नाना शुरू किया उधर शहरों कस्‍बों विशेष कर जिला मुख्‍यालय मुरैना पर बनियों ने ही राजनीति व नेतागिरी का दामन भी व्‍यवसाय के साथ संभाल लिया ।

उधर नहर आने के बाद हालांकि जिले में सरसों तथा अन्‍य फसलों एएवं गन्‍ना आदि की पैदावार तो शुरू हो चुकी थी लेकिन वह फिर भी बहुत कम थी तथा उतनी नहीं होती थी, ऊपर से चकबन्‍दी, नसबन्‍दी, मंहगायी, लेव्‍ही आदि से गॉवों और शहरों में भारी खौफ था । शहरों और गॉंवों में लोग डरे और दुबके रहते थे तथा किसी भी सरकारी आदमी को या सरकारी टीम को देख कर शहर गॉंव छोड़ कर भाग जाते थे । शक्‍कर उस समय बेहद मंहगी हो गयी थी शक्‍कर का दाम उस समय 8 स्‍पये किलो पर पहुंच गया था उधर देश में आपातकाल लागू कर दिया गया था । जरा सा भी विरोध करने वाले को जेल में ठूंस दिया जाता था, मीसा में बन्‍द कर उसका खीसा निपोर दिया जाता था यह भी पता नहीं लगता था कि कहॉ की किस जेल में बन्‍द है , मर गया या अभी तक जिन्‍दा है ।

चारों ओर दहशत ही दहशत और खौफ का मंजर था । उधर उसी समय नब्‍बा कुम्‍हार चम्‍बल में फरार हो गया नब्‍बा डाकू या नब्‍बा बागी बनियों का बहुत बड़ा दुश्‍मन था और बनियों में उसेकी भारी दहशत और खौफ था । उसने जींगनी मुरैना के एक बम्‍बे के पास एक यात्री बस को गोलीयां चला कर रोकने की कोशिश की लेकिन ड्रायवर ने गाड़ी भगाने की कोशिश की संकरी ऊबड़ खाबड़ सड़क, कण्‍डम डिब्‍बा सरकारी बस ने अधिक साथ नहीं दिया , कण्‍डक्‍टर को गोली लग गई , ड्रायवर को गाड़ी रोकनी पड़ी और नब्‍बा यात्रीयों की पकड़ कर के सफलता पूर्वक पहले क्‍वारी नदी के और फिर चम्‍बल के बीहड़ों में गुम हो गया ।

लोग खेतों में उर्वरकों के प्रयोग से दहशत खाते थे और अपने खुद के घूरे की ही खाद खेतों में देते थे । लोगों के पास नहर होने के बावजूद उसमें से पानी लेने का कोई साधन नहीं था , सिंचाई अधिकारी और सरकार किसानों के लिये नहरों पर कुलावे मंजूर नहीं करते थे, एक कुलावा बनवाने के लिये बहुत बड़ी सिफारिशों की जरूरत होती थी जो किसानों के पास नहीं होती थी, भ्रष्‍टाचार व रिश्‍वत उन दिनों अधिक नहीं था , किसानों के पास पैसे ही नहीं होते थे सरकारी अफसरों की तनख्‍वाहें भी अधिकांशत: तीन सौ या पॉंच सौ रूपये मात्र होतीं थीं जिसमें महीना भर घर चलाने के लाले पड़े रहते थे फिर बाबूओं की दशा तो और भी ज्‍यादा खराब थी । इसके बावजूद लोग न रिश्‍वत लेते थे न भ्रष्‍टाचार करते थे क्‍योंकि किसी के पास कुछ भी लेने देने को था ही नहीं ।

मरल में मिलावट उन दिनों नहीं की जाती थी, देशी घी जो कि चम्‍बल का बहुत मशहूर रहा है या फिर तेल हो या बूरा या अन्‍य कुछ एकदम शुद्ध और स्‍वच्‍छ मिलता था , घी रई का बहुत मशहूर और तेल कच्‍ची घानी का , दोनों ही बहुतायत से उपलग्‍ध और मारे मारे फिरते थे देशी घी का दाम पहले चार रूपये किलो था जो मंहगाई आने पर छ: स्‍पये किलो हो गया था इसके बावजूद एकदम शुद्ध मिलता था अज्ञेर मारा मारा फिरता था । दरअसल असल माल ही सड़ता रहता था उसी का कोई खरीददार नहीं होता था तो फिर मिलावट करनी ही नहीं पड़ती थी । शुद्ध माल और कम कीमत के माल के लिये चम्‍बल देश भर में विख्‍यात रही इसका फल ये मिला कि यहॉं का माल धीरे धीरे बाहर सप्‍लाई होने लगा आयात निर्यात के शुरू होते ही चम्‍बल की तकदीर के बदलाव का फिर एक नया अध्‍याय शुरू हुआ । लेकिन तब भी बनियों को माल खरीदने के लिये गॉंव गॉव किसानों के घर घर जाना पड़ता था यह काम उन गॉंवों में या आसपास के गॉवों में शेष बचे बनिये अपने आसपास के गॉंवों से माल इकठ्ठा कर शहर के बनियों को पहुंचाते थे और बीच में कमीशन या दलाली या आढ़त निकाल कर खाते थे , इससे स्‍थानीय ग्रामीण बनियों और शहर के बनियों दोनों को ही माल व धन्‍धा मिल जाता था, और किसानों को नकद पैसा । इन आढ़त निकाल कर खाने वाले बनियों को समय रहते आढ़तिये कहा जाने लगा । आढ़तियों ने बेशक चम्‍बल में ब्रिगड़ी ग्रामीण अर्थव्‍यवस्‍था को धीरे धीरे पटरी पर लाना शुरू किया । लेकिन बाद में इसी दलाली ने बहुत खतरनाक रूप धारण कर किसानों का जम कर शोषण भी किया ।

आढ़तियों की माल आवक से कुछ व्‍यापारी पैदा हो गये और आयात निर्यात से मोटा माल बनाने लगे, सेठ फिर पैदा हुये गद्दियां फिर कायम होने लगीं । मुरैना में जीवाजी गंज जहॉं बड़े बनिये रहते थे और काफी खुला मैदान था मण्‍डी में तब्‍दील हो गया और अनाज या दाल दलहन के लिये खरीद फरोख्‍त की मण्‍डी के रूप में विकसित हो गया । किसाानों को जब ये राज मालुम हुआ कि आढ़तिया उन्‍हें कम पैसा देता है और मण्‍डी में बनियों को सीधा माल बेचने पर अधिक पैसा मिलता है तो वे अपना माल लाद कर सीधे मण्‍डी पहुँचने लगे और मुनाफा कमाने लगे । मण्‍डी ने भी विशाल रूप धारण किया और दो अलग अलग ब्‍लाक बन गये सिकरवारी के बनिये सिकरवारी ब्‍लाक और तोमरघार के बनिये तंवरघारी ब्‍लाक में क्षेत्रवार माल लगवा कर खरीदने लगे । उधर किसानों ने धीरे धीरे अंग्रेजी खाद यानि उर्वरकों का प्रयोग शुरू करने की कोशिश की पहले रेखड़ा आजमाया गया , यूरिया को लेकर अंचल में काफी अफवाहें थीं और किसान यूरिया का प्रयोग करने से भारी डरते थे । लोगों का कहना था कि यूरिया एक बार जिस खेत में डल गया उस खेत को खत्‍म ही समझों उसमें फिर गोबर घूरे की खाद कोई असर नहीं करती और हर बार यूरिया ही डालना पड़ेगा । अत: क्षेत्र में यूरिया का प्रयोग काफी विलम्‍ब से शुरू हुआ , लेकिन कुछ तब के आधुनिक प्रयोगधर्मी किसानों ने हिम्‍मत दिखाई और खेतों में यूरिया डाला । फसल कई गुना अधिक और कई गुना फायदा देख यूरिया का प्रचलन अंचल में धीरे धीरे शुरू हुआ ।

मुरैना में एक बड़ा सरसों के तेल का करखाना लग गया और राठी इण्‍डस्‍ट्रीज के नाम से इस तेल कारखाने ने क्षेत्र के सरसों उत्‍पादकों को कई हौसले दिये । राठी परिवार का तेल उद्योग जहॉं काफी विख्‍यात और चमबल को नयी जीवनरेखा देने वाला था वहीं राठी परिवार की पहचान भी नगर सेठ के रूप में हो गयी । और राठी नाम चम्‍बल में चारों ओर गूंजने लगा , राठी परिवार पर भी काफी अनाप शनाप दौलत आने लगी । लेकिन राठी परिवार ने पैसा कमा कर भी मुरैना के तेल का नाम देश भर में विख्‍यात कर दिया, राठी तेल उद्योग में तेल में मिलावट नहीं की जाती थी, न व्‍यवसाय बढ़ाने के औने पौने औछ हथकण्‍डे इस्‍तेमाल किये जाते थे । न उस समय बिजनिस एक्‍जीक्‍यूटिव्‍हज या एम.बी.ए. प्रोफेशनल होते थे । लेकिन एकदम शुद्ध व गुणवत्‍ता युक्‍त आधुनिक मशीनों और बड़ी मशीनों से बड़े स्‍तर पर बृहद तेल उत्‍पादन के इस कारखाने ने मुरैना के तेल की धाक देश भर में बुलवा दी और अपना सिक्‍का मनवा लिया ।

मुरैना के सरसों उत्‍पादन को नया जीवन और नया बल मिला सरसों काफी फायदेमंद खेती बन गई मुरैना पूरे देश को तेल पिलाने लगा । तब तक के.एस. आयल इण्‍डस्‍ट्रीज जैसी इकाईयों का कोई वजूद व वर्चस्‍व नहीं था ।

राठी परिवार को तेल से मालामाल होते देख जहॉं कई बनियों की महात्‍वाकांक्षायें जागने लगीं वहीं कई बनिये राठी परिवार के लिये अपने अपने घरों, गोदामों, प्रतिष्‍ठानों में स्‍पेलर्स लगा कर तेल पेर कर रेडीमेड तेल कारखाने को सप्‍लाई करने लगे । माल की बढ़ती मांग और अधिक खपत तथा पूर्ति में कमी के मद्दे नजर राठी तेल उद्योग अपने कारखाने में पैदा हुये तेल के साथ अन्‍य बनियों द्वारा प्रदत्‍त तेल के साथ मिला कर पैकिंग करवा कर बाहर भिजवाने लगा । इस तरह तेल उत्‍पादन की कई छोटी मोटी दो नंबर की कई गुप्‍त यूनिटें शहर व कस्‍बों में पैदा हो गयी । एक समय के नामी गिरामी इस तेल उद्योग के सामने समस्‍याओं व कठिनाईयों का दौर उस वक्‍त प्रारंभ हुआ जब प्रतिद्वंद्विता में कल्‍लूमल सांवलदास यानि के.एस. परिवार के ओमप्रकाश गर्ग और रमेशचन्‍द्र गर्ग ने एक फर्म कायम कर प्रतिद्वंद्वी तेल व्‍यवसायी के रूप में काम करना शुरू किया ।

पहले महज एक छोटी सी फर्म के रूप में काम प्रारंभ करने वाले ओमप्रकाश गर्ग आसैर रमेश चन्‍द्र गग्र की इस टीम ने समानान्‍तर तेल व्‍यवसाय व उत्‍पादन को जन्‍म देकर हालांकि एक नया आगाज किया लेकिन यह फर्म शुरूआत में कुछ खास थी ही नहीं अव्‍वल तो फर्म के पास पूंजी की कमी थी और दूसरे नामवरी की कमी । लेकिन मुरैना के तेल व्‍यवसाय ने इसी फर्म के जन्‍म के साथ एक नया टर्न लिया हालांकि राठी परिवार को शुरू में इस खतरे का आभास तक नहीं हुआ लेकिन बाद में उसे इस नजर अंदाजी का न केवल तगड़ा खामियाजा भुगतना पड़ा बल्कि राठी तेल उद्योग भी पूरी तरह खत्‍म और चौपट हो गया ।

क्रमश: जारी

के.एस. आयल्‍स मुरैना पर आय कर छापे क ा वीडीयो


के.एस. आयल्‍स बनाम रमेश चन्‍द्र गर्ग : खाकशाह से भामाशाह और शहंशाह तक क ा सफर – 1


के.एस. आयल्‍स बनाम रमेश चन्‍द्र गर्ग : खाकशाह से भामाशाह और शहंशाह तक का सफर – 1

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’

के.एस. आयल्‍स लिमिटेड और रमेश चन्‍द्र गर्ग हाल ही में आयकर छापों के बाद चर्चा में आये चम्‍बल की दो महान शख्सियत हैं । संयोग वश मुझे एक खाकशाह को भामाशाह तक और शहंशाह बनने तक का सफर तय करते नजदीक से देखना नसीब हुआ है । न तो तरक्‍की बुरी है, न पैसे वाला बनना बुरा है , न बिजनेस एम्‍परर बनना ही गलत है , लेकिन सवाल यह है कि बड़े मुकाम तक पहुँचने के लिये आप रास्‍ता क्‍या अख्त्यार करते है, किस मार्ग से ऊँचाईयों को छूते हैं । आज जब चम्‍बल के इस बिजनेस एम्‍परर पर सिंहदृष्टि फेंक कर इसका अंजाम देखता हूं तो कई बिसरी बातें अचानक दिमाग को ढिंझोड़ जाती हैं ।

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कुछ दशक पहले तक चम्‍बल में सरसों नहीं होती थी और लोग यहॉं अलसी का तेल खाने पकाने में उपयोग करते थे । तोमरघार के लोगों को अस्‍सी यानि अलसी के तेल की पूडि़यां खाने वालों के नाम से राजपूताने में एक खास कहावत से जाना जाता था । फिर यहॉं चम्‍बल से अम्‍बाह शाखा नहर निकाली गयी , इस नहर को बनाने वाले इसके ठेकेदार एक बहुत बड़े व्‍यावसायी और एक राजनीतिक दल के फायनेन्‍सर रहे ठाकुर भोला सिंह से भोपाल में जब एक बार मेरी मुलाकात हुयी तो जैसे ही उन्‍होंने जाना कि मैं मुरैना से आया हूं तो उन्‍होंने लपक कर मुझे सीने से लगा लिया और जहॉं चम्‍बल के पुराने धुरन्‍धर राजनीतिज्ञों के हाल चाल पूछ डाले वहीं इस अम्‍बाह शाखा नहर के बनवाने के किस्‍से भी सुना डाले , संयोग से यह नहर मेरे गॉंव से भी गुजरती है ।

इस नहर के आने के बाद चम्‍बल की तकदीर बदल गई और चम्‍ब को अलसी के तेल से छुटकारा मिल गया , यहॉं सरसों पैदा होने लगी , सरसों भी ऐसी और इतनी कि सारे देश में यह क्षेत्र सरसों का सबसे बड़ा और श्रेष्‍ठ उत्‍पादक बन कर मशहूर हो गया ।

धीरे धीरे क्षेत्र में तरक्‍की हुयी, एकाध बस आपरेटर बने, एकाध ने ट्रेक्‍टर लेकर तो किसी ने आटा चक्‍की, ट्यूबवेल और सरसों की पिराई के स्‍पेलर्स यानि कच्‍ची घानी लगवाई । इससे पहले तेल की पिराई तेलियों द्वारा कोल्‍हू से की जाती थी और कोल्‍हू भी हरेक को नसीब नहीं होता था ।

गॉंवों में दो तीन गॉंवों के बीच एकाध आटा चक्‍की और दो तीन पंचायतों के बीच एकाध तेल पिराई की कच्‍ची घानी यानि स्‍पेलर होता था, और एक तिहाई तेल तथा पीना पिराई में निकलते थे । लेकिन तेल भी शुद्ध और पीना भी शुद्ध होती थी । कोई दोबारा पीना को डालकर फिर तेल निकालने का रिवाज ही नहीं था । तेल की झरप इतनी तेज कि तेल पिराई के वक्‍त स्‍पेलर के पास भी बैठ जाओ या निकले तेल के ऊपर सीधे मुँह कर दो ऑखो से ऑसूओ की धार ऐसी बहे कि रूकने का नाम ही न ले ।

मैं उन भाग्‍यशाली लोगों में से हूं जिन्‍होंने यह तेल पिराया भी है और खाया भी है । राजपूताने में इसी तेल को सिर में लगाने, मालिश इत्‍यादि में प्रयोग किया जाता रहा ।

फिर इसी दरम्‍यान चम्‍बल में डक्‍ैतो और बागीयों ने चम्‍बल के ग्रामीण जीवन को बुरी तरह प्रभावित किया, गॉवों से कई जातियॉं निकल कर शहर की ओर भागीं और मुरैना के कलेक्‍टर तथा एस.पी. के निकट ही यानि शहर मुरैना में आकर बसीं तथा खुद को सुरक्षित करने की कोशिश की । इसमें गॉवों को छोड़कर थानों के नजदीक या शहर में जाकर बसने वालों में सबसे बड़ी संख्‍या बनियों की यानि वैश्‍य समुदाय के लोगों की थी । उस समय डकैत या बागी बनियों की पकड़ करते थे और ओछी जाति के लोगों को सीधे या तो गोली मार देते थे या अपनी सेवा कराते थे । गॉवों में भी उन्‍हें सेवा ही करनी होती थी और वह भी बगैर पैसे के और इसके बदले उन्‍हें स्‍यावड़ी यानि हिस्‍सा राशि यानि खेतों में पैदा होने वाले अनाज का कुछ भागांश जो कि तय शुदा होता था गॉंव के हर घर से दिया जाता था ।

बनियों के गॉंव छोड़ देने से गॉवों की अर्थव्‍यवस्‍था और ग्रामीण सुराज व्‍यवस्‍था एकदम चौपट हो गयी और गॉंवों की तकदीर बदहाल होने लगी । विशेषकर बसैया कुतवार, पहाड़गढ़, सबलगढ़, विजयपुर जैसे क्षेत्र बनियों से खाली होकर शहरों में बनियों के बस जाने से गाफव सूने हो गये , तोमरघार के कई गॉव भी बनिये छोड़कर अम्‍बाह, पोरसा और मुरैना में बसेरा कर गये ।

एक बहुत बड़ा और समृद्ध गॉंव जहॉं न केवल विशाल हवेलियॉं है और महल तथा किलेनुमा रहवासों आलीशान नक्‍काशीदार मकानों को छोड़ कर कुतवार जैसे एक समय के महाराजा कुन्‍तीभोज के महान साम्राज्‍य की राजधानी को छोड़कर मुरैना भाग आये, लेकिन बनियों का उस समय लाखों का आज करोड़ों का माल मत्‍ता और खजाना वहीं उनके मकानों में दबा रह गया ।

क्रमश: जारी

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