चाहे राज्यपाल के हस्ताक्षर हों या न हों, मुरैना नगर निगम का चुनाव हर हाल में मई तक ही इसी साल ही होगा


चाहे राज्यपाल के हस्ताक्षर हों या न हों, मुरैना नगर निगम का चुनाव हर हाल में मई तक ही इसी साल ही होगा
संवैधानिक मजबूरी में बंधे हैं हाथ राज्य सरकार के , नियुक्त प्रशासक का राज्य संविधान की सीमा के दायरे में बंधा है
नरेन्द्र सिंह तोमर ‘’आनंद’’ ( एडवोकेट )
Gwalior Times
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अपनी मनमर्जी और स्वेच्छाचारिता से काम कर रही म.प्र. की भाजपा सरकार भी अपनी मनमर्जी से मुरैना नगर निगम के चुनाव को संविधान में अनुच्छेद 243 में निर्धारित अवधि‍ के भीतर ही हर हाल में किसी भी ग्रामीण या शहरी निकाय का निर्वाचन कराने के लिये बाध्य है ।
कम से कम भारत का संविधान यही कहता है । बहरहाल मुरैना नगर निगम का चुनाव ज्यादा समय तक टाल पाना म. प्र. की शि‍वराज सरकार के लिये नामुमकिन और असंभव है ।
राज्यपाल यदि मुरैना नगर पालिका के सीमा परिवर्तन या नये क्षेत्र परिसीमन के जरिये नगर पालिका को नगर निगम में तब्दील करने के प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं भी करेंगें तो भी हर हाल में मुरैना नगरीय निकाय का चुनाव हर हाल में मई तक संपन्न करा लेना संविधान के तहत सरकार की मजबूरी ही नहीं बल्किि , बेहद जरूरी है ।
अपनी सुविधा के अनुसार नगरपालिका के और नगर निगमों के क्षेत्रों में वृद्धि या घटोत्तरी का खतरनाक षडयंत्री खेल खेल रही म.प्र. की भाजपा सरकार भी संविधान के अनुच्छेद 243 एवं इसमें 1992 के संविधान के 73 वें और 74 वें संशोधन के तारतम्य में 73 वें संशोधन की भाग- 9 में उल्लेखि‍त 16 अनुच्छेद, , ग्यारहवीं अनुसूची के 29 विषय और 74 वें संशोधन की भाग 9- ( क) के 18 अनुच्छेद , बारहवीं अनुसूची के 18 विषयों में बंधी हुई है । और संविधान के यह दोनों ही संशोधन भारत देश में 24 मार्च 1993 से प्रवृत्त हैं ।
मुरैना नगर निगम और मुरैना नगर पालिका मामले में संविधान के मुताबिक ‘’ संक्रमण क्षेत्र’’ एक विषय है और ‘’लघुत्तर नगरीय क्षेत्र से ‘’बृहत्तर नगरीय क्षेत्र ‘’ में तब्दीली दूसरा विषय है , या यूं कहिये कि विवाद या झगड़े की विषय वस्तु है ।
इसके बावजूद भी कलेक्टर मुरैना द्वारा म.प्र. के राज्यपाल को मुरैना नगर पालिका में संव्याप्त या आव्याप्त संक्रमण क्षेत्र को परिसीमित कर नया परिसीमन गठन कर यदि नगर निगम में बदले जाने के प्रस्ताव या नगरपालिका मुरैना द्वारा पारित संकल्प या प्रस्ताव पर हस्ताक्षर नहीं किये जाते हैं या मुजूरी नहीं भी दी जाती है तो भी हर हाल में चालू या लागू पुराने नगरीय निकाय क्षेत्र के आधार पर ही अर्थात नगर निगम नहीं बल्किा नगर पालिका मुरैना के रूप में चुनाव कराने होंगें और यह म. प्र. की , भारत के संविधान की सबसे बड़ी विडम्बना व तौहीन होगी । (पिछली नगर पालिका के प्रथम अधि‍वेशन दिनांक से , उसके 5 साल पूरा होने के भीतर या उसके महज 6 माह पहले तक या 6 माह बाद के भीतर किसी नगरीय निकाय का चुनाव कराना संवैधानिक रूप से अनिवार्य है )Morena Nagar Nigam

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