महाभारत सम्राट दिल्लीपति महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर की दिल्ली से चम्बल में ऐसाहगढ़ी तक की यात्रा और ग्वालियर में तोमर साम्राज्य * पांडवों की तीन भारी ऐतिहासिक भूलें और बदल गया समूचे महाभारत का इतिहास * भारत नाम किसी भूखंड या देश का नहीं , एक राजकुल का है, जानिये क्यों कहते हैं तोमरों को भारत * जानिये कैसे हुये क्षत्रिय उपनाम लगाने वाले जाट , गूजर और भंगी पैदा


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महाभारत सम्राट दिल्लीपति महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर की दिल्ली से चम्बल में ऐसाहगढ़ी तक की यात्रा और ग्वालियर में तोमर साम्राज्य ( भाग- 2)
* पांडवों की तीन भारी ऐतिहासिक भूलें और बदल गया समूचे महाभारत का इतिहास
* भारत नाम किसी भूखंड या देश का नहीं , एक राजकुल का है, जानिये क्यों कहते हैं तोमरों को भारत
* जानिये कैसे हुये क्षत्रिय उपनाम लगाने वाले जाट , गूजर और भंगी पैदा
नरेन्द्र सिंह तोमर ‘’आनंद’’ ( एडवोकेट )
Gwalior Times
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( गतांक से आगे ) भारत के इतिहास का विद्रूपीकरण व कूटरचना का सबसे बड़ा साक्ष्य और भौतिक प्रमाण कोई एक नहीं वरन सैकड़ों हजारों की संख्या में मौजूद हैं । लेकिन चूंकि यह आलेख चन्द्र वंश के महाप्रतापी पराक्रमी राजपूत महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर से संबंधि‍त है अत: इसकी विषयवस्तु को केव तोमर राजवंश तक ही सीमित रखा जायेगा ।
सबसे पहले यह उल्लेख समीचीन होगा कि क्षत्रिय राजपूत वंशों में कुल कितने क्षत्रिय कुल है और किन्हें क्षत्रिय शास्त्राज्ञा एवं राजाज्ञा द्वारा माना व घोषि‍त किया गया है ।
इस सम्बन्ध में एक दोहा क्षत्रियों में सर्व प्रचलित एवं मान्य है ।
दस रवि सों , दस चन्द्र सों , द्वादश ऋषि‍ प्रमान ।
चार हुतासन यज्ञ सों, यह छत्तीस कुली तू जान ।।
अर्थात क्षत्रियों के कुल मात्र चार वंश हैं, सूर्य वंश, चन्द्र वंश , ऋषि‍ वंश, और अग्नि वंश । इसमें अर्थात इन चार वंशों केवल संपूर्ण मात्र मिला कर छत्तीस कुल शामिल हैं, इसे क्षत्रियों की छत्तीस कुरी ( कुली) कहा पुकारा जाता है , जिसमें सूर्य वंश में केवल दस क्षत्रिय कुल हैं, चन्द्र वंश में केवल दस क्षत्रिय कुल हैं । ऋषि‍ वंश मं बारह क्षत्रिय कुल हैं । और अग्निै वंश में केवल चार क्षत्रिय कुल हैं ।
चन्द्र वंश के दस क्षत्रिय कुलों में से एक ‘’तोमर’’ क्षत्रिय कुल है , इसी प्रकार इसी चन्द्र वंश में दूसरा क्षत्रिय कुल यदु है जिसे तत्समय यादव कुल और वर्तमान में जादौन कहा जाता है, किंतु मूल कुल रूप में ‘’यदुकुल’’ ही शास्त्राज्ञा एवं राजाज्ञा से मान्यता प्राप्त है । अहीरों किरारों व अन्य गैर क्षत्रियों द्वारा कलयुग में ‘’यादव’’ शब्द अपने उपनाम में लिखे जाने से यह राजाज्ञा व शास्त्राज्ञा अनुसार यह क्षत्रिय वर्तमान में ‘’जादौन’’ क्षत्रिय राजपूत कहे पुकारे जाते हैं, और किसी भी क्षत्रिय द्वारा यादव शब्द वर्तमान में उपयोग नहीं किया जाता । भगवान श्री कृष्ण इसी यदुकुल से या जादौन वंश के राजा और राजपुत्र ( राजपूत) रहे हैं ।
इन समस्त कुलों का और वंशों का विस्तृत व विशद विवरण समस्त भारतीय ग्रंथों व शास्त्रों ( विशेषकर वेदादि) , अठारह पुराणादि में श्रीमद भागवत महाग्रंथ , श्री महाभारत , श्री खि‍लभाग हरिवंश पुराणादि में बृहद रूप से और समग्रत: वर्णिशत है ।
वंश विस्तार व कुल विस्तार पर बृहद चर्चा इस आलेख की विषयवस्तु से परे है । अत: सीधे विषय पर आते हैं ।
दिल्लीपति महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर के बारे में अनेक शि‍लालेख प्राचीन दिल्ली के लालकोट परिसर, इन्द्रप्रस्थ के पुराने किले और जहॉं जहॉं से दिल्ली से चलकर महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर गुजरे वहॉं वहॉं यत्र तत्र मिलने क बाद उनका अंतिम ठिकाना ऐसाह गढ़ी जिला मुरैना म.प्र. में मिलता है ।
महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर क बारे में ‘’विबुध श्रीधर’’ ग्रंथ में बहुत विस्तार से और ‘’पृथ्वीराज रासो’’ नामक ग्रंथ में उनका विस्तार से वर्णन उपलब्ध है ।
महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर के बारे में कहा गया है कि चन्द्रवंश का यह क्षत्रिय राजपूत इतना शौर्यशाली पराक्रमी , वीर व बलवान था कि महज एक हाथ से तलवार चलाता था , और इसमें इतनी प्रचण्ड शक्ति व असीम तेज था कि यह मात्र अपनी तलवार से ही पूरी की पूरी ही रोक देता था । महाराजा अनंगपाल सिंह तोमर के पराक्रम व वीरता के बारे में ग्रंथों व शास्त्रों में बहुत कुछ लिखा गया है ।
कैसे बने महाभारत सम्राट , इन्द्रप्रस्थ के शासक महाराजा से ‘’दिल्लीपति’’
यह विषय बड़ा ही रोचक है और इसका उल्लेख समीचीन है कि पांडव अर्जुन के महाभारत सम्राट , इन्द्रप्रस्थ का महाराजा बनने के बाद उनके पौत्र अभि‍मन्यु के पुत्र परीक्षत और उसके बाद समस्त पीढ़ीयां महाभारत सम्राट एवं इन्द्रप्रस्थ पति या इन्द्रप्रस्थ महाराज ही कहीं पुकारी गयीं म‍हाराजा अनंगपाल सिंह तोमर तक को भी महाभारत सम्राट और इन्द्रप्रस्थ पति या इन्द्रप्रस्थ महाराज कहा पुकारा गया । फिर आखि‍र ऐसा क्या हुआ कि वह ‘’दिल्लीपति’’ कहे पुकारे गये , तब जबकि दिल्ली नामक कोई भी जगह या स्थान संपूर्ण भारतवर्ष ( भारत वंश का जहॉं तक राज्य रहा, उस स्थान को भारतवर्ष कहा पुकारा जाता है )
महाभारत सम्राट इन्द्रप्रस्थ महाराज का दिल्लीपति के रूप में नाम पड़ना बहुत ही रोचक व अद्भुत वृत्तांत है । तथा इसका उल्लेख बाकायदा ग्रंथों में और शि‍लालेखों सहित महरौली दिल्ली में गड़े हुये लौह स्तम्भ जिसे ‘’दिल्ली की किल्ली’’ कहा पुकारा जाता है , इस दिलली की किल्ली पर भी यह लेख अंकित है । मजे की बात यह है कि असल लेख व असल शि‍लालेख संस्कृत भाषा में है , मगर फर्जी इतिहासकारों व इतिहास की कूटरचना करने वाले चाटुकार चारण भाटों ने इस संस्कृत के लेख व शि‍लालेख का भी अनुवाद कुछ का कुछ और ही कर दिया है । आगे हम आपको उस संस्कृत के असल लेख व शि‍लालेख तथा दिल्ली की किल्ली पर खुदे लेख का भी चित्र दिखायेंगें और उस संस्कृत की असल हिन्दी भाषा में पूरी व्याख्या व अनुवाद भी बतायेंगें ।
………… क्रमश : अगले अंक में जारी

1 टिप्पणी

  1. oshrivastava said,

    अप्रैल 4, 2015 at 7:27 अपराह्न

    Reblogged this on oshriradhekrishnabole.

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