हमें लौटना होगा दोबारा पुरानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ओर – नरेन्द्र सिंह तोमर ”आनन्द”


हमें लौटना होगा दोबारा पुरानी ग्रामीण अर्थव्यवस्था की ओर
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– नरेन्द्र सिंह तोमर ”आनन्द”
काफी चिन्तन के बाद एक निष्कर्ष तो लगभग तय है कि तथा कथि‍त अर्थशास्त्रीयों द्वारा तय की गई आधुनिक व आज की भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है , यद्यपि अर्थव्यवस्था के भूमंडलीकरण ( ग्लोबलाइजेशन) और रूपये का प्रसार व फैलाव बढ़ाना तो ठीक बात है लेकिन इसके कारण बढ़ती मुद्रा स्फीति का बेलगाम होना और देश भर में मंहगाई का सुरसा के मुँह की तरह फैलना बेशक ही सोचनीय व चिन्तनीय बात है और इस जगह आकर ही आप साबित कर देते हैं कि भारत की प्राचीन ग्रामीण अर्थव्यवस्था संबंधी प्रणाली बेहद पुख्ता और सुदृढ़ रही है जिसमें मुख्य विनिमय आधार पारस्परिक सेवा विनिमय या वस्तु विनिमय रहा है और बीच में ”रूपया” जैसे माध्यम के लिये बहुत ही संकीर्ण और लगभग ” ना” के बराबर स्थान रहा है । जब से अर्थव्यस्था के सुदृढ़ीकरण के नाम पर बीच में माध्यम यानि ”रूपया” डाला गया है, तब से बेशक ही तथाकथि‍त विदेशों में जाकर पढ़ लिख कर समय व धन बर्बाद करके आये अर्थशास्त्री देश के लिये या भारतीय अर्थव्यवस्था के लिये स्वत: ही अपरिचित , अन्जाने एवं अप्रासंगिक हो गये और उनके लिये यह भारत देश एक अर्थशास्त्र के प्रयोगों को करने की प्रयोगशाला मात्र बनकर रह गया । प्रयोगधर्मिता व ”विकासशील” के नाम पर किये गये सारे ही प्रयोग भारत के ढांचे के अनुसार असफल और विनाशकारी ही सिद्ध हुये , हमने मुद्रास्फीति बढ़ाकर हमेशा सोचा कि हम विकास दर बढ़ा कर आगे जा रहे विकासशील देश हैं और कभी सोचा कि हम मुद्रास्फीति घटा कर विकास दर बढ़ा रहे हैं , आदमी की या साधारण आदमी की क्रय शक्त‍ि घटाते बढ़ाते रहने के फार्मूले में हमने इतने कीमती वर्ष गंवा दिये और आज हम अपने देश को गंवा देने और विदेशी धन के देश में विनियोग की या किसी भीख मांगते भि‍खारी की तरह दयनीय हालत में पहुँच चुके हैं । आज प्रदेशों व राज्यों की हालत बहुत नाजुक एवं खस्ता है , वे किसी अमीर उद्योगपति या औद्योगिक घरानों के तलुये चाट चाट कर पूरा राज्य लाल कारपेट बिछा कर उसे बदले में देने को तैयार हैं भले ही विधि‍ की सत्ता की यह अवधारणा हो कि ”राज्य जनता व वहॉं रहे प्रत्येक प्राणी की अमूल्य निधि‍ व संपत्त‍ि है, लेकिन राजनेताओं को विधि‍ की सत्ता की इस अवधारणा से कुछ लेना देना नहीं , वे अपने बाप का माल समझ कर पूरे प्रदेश को जैसे चाहे जिसे चाहे , जब चाहें सौंप देते हैं , इसके लिये उन्हें लगता है कि जनता ने उन्हें 5 साल के लिये खुद को और खुद की सारी निधि‍यों व संपत्त‍ि को ( जिसमें जनता की सामूहिक व निजी व्यक्त‍िगत प्रतिष्ठा एवं सम्मान भी शामिल है) किसी को भी सौंप देने का लायसेन्स दे दिया है और वे सब कुछ कर सकते हैं । उनकी अज्ञानता , अनुभवहीनता व विशेषज्ञता हीनता उन्हें स्वयं कुछ सोचने समझने विचारने की शक्त‍ि से विहीन करके उन्हे किराये के टट्टू सुझाव देने वाले सलाहकार या किसी अन्य बैसाखी लगा कर चलने वाले पंगु व मतिहीन की तरह बाध्य कर देती है । लिहाजा पहले तो इसका उसका परामर्शदाता , सलाहकार सुझाव मंडल , परामर्शदाता मंडल चाहिये , यानि कि आपके पास स्वयं का दिमाग नहीं और ऊपर से आप चीख चीख कर साबित करते हैं कि आपके आसपास खड़ी करोड़ों कर्मचारीयों और अफसरों से भरी पड़ी , सातवें वेतनमान ( जनसंपत्ति‍ ) से पल पोस कर बढ़ रही पूरी की पूरी फौज बेमतलब की , नाकारा व मतिहीन , दिमाग विहीन तथा योजना परियोजना विहीन , वैसे ही यूं ही नियुक्त कर लिये गये गधों व टट्टूओं की फौज है , लिहाजा हर काम के लिये आपको कंसल्टैण्ट चाहिये , फिर ये सरकारी अफसरों व कर्मचारीयों की अनावश्यक सरकारी सातवें वेतनमान की इस फौज का मतलब भी क्या है , हटाइये इसे और कंसल्टैण्ट ही पालिये , कुल मिलाकर धारणा अवधारण तोड़कर पूरी तरह से पंगु हो चुकी राजनीति में आज हालत इतनी दयनीय व नाजुक है कि हर कोई यानि कि राज्य सरकार से लेकर देश की सरकार तक किसी न किसी को यह देश दे देने या सौंपने को हर पल तैयार है ।
पूर्णत: आश्रित स्थति से गुजर रहा आज की तारीख में यह भारत देश अभी तक ”विकासशील ” देश है , जबकि सच कुछ अलग व जुदा है , भारत तो बर्षों वर्ष पहले से विकसित देश रहा है और पूरे विश्व का पालनहार देश रहा है , पूरे विश्व की अर्थव्यवस्था का हजारों लाखों साल तक संचालन कर चुका देश है । विकासशील तो 70 साल का बुढ्ढा भी सदा रहता है वह 71 की ओर बढ़ रहा विकासशील है और 69 की तुलना में वह विकसित है , हम हमेशा बगल वाले किसान के खेत की फसल देख कर ही उसे उन्नत समझते आये हैं औ और वह किसान हमारे खेत की फसल देख कर हमें उन्नत समझता रहा है लेकिन शब्द विकासशील का तात्पर्य है अपने से बड़े की ओर देखना व हमेशा खुद को विकासशील कहना , विकसित का अर्थ है हमेशा अपने से छोटे की ओर देखना और खुद को विकसित कहना, हमने अपनी नसों में या तथाकथि‍त अर्थशास्त्रीयों ने देश को इतनी दयनीय व नाजुक हालत में पहुँचा दिया है कि हम हमेशा ही ”विकासशील” देश ही बने रहेंगें और कभी विकसित देश नहीं बन पायेंगें , दूसरी भाषा में इसे ही 99 का फेर कहा जाता है , जो हमेशा पूरे 100 होने की प्रतीक्षा में सदैव ही ”विकासशील” बना रहता है और वह कभी पूरा 100 नहीं बन पाता ।
जिहाजा कुल मिला कर जाहिर है कि जिन मस्त‍िष्क विहीन पंगु राजनेताओं ने पूरे के पूरे देश को ही प्रयोगशाला बना कर बर्बादी के कगार में इस कदर झोंक दिया हो कि उस देश में सरकारें वस्तुत: निर्वाचित नेताओं के हाथ में नहीं , बल्क‍ि किसी व्यापारिक व्यक्ति‍यों द्वारा या औद्योगिक घरानों के विनियोग या कुछ दे देने के लिये 24 घंटे भीख मांगने की हालत में पहुँच चुकी हों और प्रदेश व देश बेच देने के लिये पूरी तरह आतुर व रहम की पात्र बन चुकीं हों , बेशक जहॉं तीन चार पीढ़ीयां पूरी तरह से बेरोजगार बैठीं हों , जिनके घरों का पालन पोषण बाप या दादा की पेंशन पर आश्रित होकर चल रहा हो , उन्हें कितना और बातों के बतासे बांट कर बहला बहला कर ये राजनेता वक्त गुजार सकेगें यह तो वही जानें , किन्तु इतना तो जाहिर है कि असल बेरोजगारी देश में 90 फीसदी से ऊपर जा चुकी है और पेंशनधारी भी कब तक जिन्दा रहेंगें , कब तक इस देश में लोगों के चूल्हे पेंशन पर जलते रहेंगें , एक आदमी की पेंशन में आठ दस लोग जिन्दा हैं , यह दशा कब तक इस देश में बनी रहेगी । यह तो ईश्वर ही जाने मगर यह तो जाहिर है कि इंतहा की भी सरहदें समाप्त हो चुकीं हैं और आने वाले दौर में या वक्त में कुछ ठोस नहीं हुआ तो भारत को जो कि आतंकवाद की प्रयोगशाला भी साथ ही साथ पनप कर बनता चला जा रहा है बेशक वह दिन दूर नहीं जब प्रयेग कर सरकारें बदल बदल कर बार बार उम्मीद लगा रही जनता का अंदरूनी आक्रोश फूट पड़े और ये सब्स‍िडी वो सब्स‍िडी , ये कार्ड , वो कार्ड के सारा खेल खत्म होकर गृहयुद्ध भारत देश में छिड़ जाये , विधि‍ की सत्ता पूर्णत: समाप्त हो जाये और लोग सड़कों पर आ जायें , एक दूसरे को खुलेआम लूटने मारने लगें , यह दिन दूर नहीं , इस लिहाज से आज एक ललित मोदी या विजय माल्या पी खा कर उड़ा कर बाहर भागने के रास्ते टटोलता फिर रहे हैं , पता लगे कि सारे ही नेता देश छोड़ छोड़ कर भाग गये , और जनता के पास उन्हें लूटने के लिये भी कुछ नहीं छोड़ गये । मंजर खतरनाक है , सचेत हो जाईये , सब्जबागों के दिखाते चले जाने से किसी के पेट नहीं भरते , हर फिल्म को एक निश्च‍ित वक्त पर समाप्त होना है , भारतवासी भूखे हैं उन्हें रोटी और रोजगार चाहिये , अवसरों की भरमार चाहिये , वरना खत्म हो यह लंबा इंतजार चाहिये ।

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