Pro Bono Advocate has been Lodged F. I. R to D. G. P. of Madhya Pradesh


प्रोबोनो एडवोकेट नरेन्द्र सिंह तोमर ने भारत सरकार की ओर से म. प्र. पुलिस के डी. जी. पी. के सायबर सेल में दर्ज कराई एफ. आई. आर. और एडिशनल इत्तलायें दीं. मामला सायबर क्राइम , आई. टी. एक्ट, आई. पी. सी. एवं लीगल एड सर्विसेज अथॉरिटीज एक्ट 1987. से संबंधित.

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Govardhan Giriraj Ji Ki Parikrama Part – 2


Nava Griha Stotra & Kanak Dhaara Stotra


सूर्य को प्रात: जल क्‍यों व कैसे चढ़ाना चाहिये


ग्‍वालियर टाइम्‍स की 111 वीं फ‍िल्‍म – सूर्य को प्रात: जल क्‍यों व कैसे चढायें – स्‍वर व उच्‍चारण – नरेन्‍द्र सिंह तोमर ”आनन्‍द”
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Bismil Museum Morena & Black Magic


 

फिल्‍न्‍म – बिस्‍मि‍ल संग्रहालय – मुरैना का विश्‍वव्‍यापी प्रसारण हुआ
भारत व चम्‍बल के इतिहास की एक बानगी , एक झलक, महाभारत कालीन वीर प्रसूता जननी पर भारत व चम्‍बल के इतिहास वीरता शौर्य पराक्रम के साथ चम्‍बल तब से अब तक की बरनगी दिखाता एक संग्रहालय देखें इस फिल्‍म में
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दस महाविद्या देवी सहस्‍त्रनाम ( महाकाली सहस्‍त्रनाम)


काला जादू, मारण, दीठ मूठ नजर चौकी, असाध्‍य बीमारी की काट – प्रत्‍यंगिरा विधान


प्रत्‍यंगिरा मंत्र विधान एवं स्‍तोत्र का विश्‍वव्‍यापी प्रसारण
मारण, असाध्‍य बीमारी, मूठ , चौकी , नजर , काला जादू की काट, पलट, उलट, व खात्‍मा का प्रत्‍यंगिरा माला स्‍तोत्र ( शास्‍त्रीय मंत्र विधान )
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क्रिसमस दिवस पर विशेष – एक विश मुहब्‍बत की – फिरदौस खान


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क्रिसमस पर विशेष
संता से मांगी एक ’विश’ मुहब्बत की
-फ़िरदौस ख़ान
यह हमारे देश की सदियों पुरानी परंपरा रही है कि यहां सभी त्‍यौहारों को मिलजुल कर मनाया जाता है. हर त्यौहार का अपना ही उत्साह होता है- बिलकुल ईद और दिवाली की तरह.  क्रिसमस  ईसाइयों के सबसे महत्‍वपूर्ण त्‍यौहारों में से एक है. इसे ईसा मसीह के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाता है. क्रिसमस को बड़े दिन के रूप में भी मनाया जाता है. क्रिसमस से 12 दिन का उत्सव क्रिसमसटाइड शुरू होता है. ‘क्रिसमस’ शब्द ‘क्राइस्ट्स और मास’ दो शब्दों से मिलकर बना है, जो मध्य काल के अंग्रेज़ी शब्द ‘क्रिस्टेमसे’ और पुरानी अंग्रेज़ी शब्द ‘क्रिस्टेसमैसे’ से नक़ल किया गया है. 1038 ई. से इसे ‘क्रिसमस’ कहा जाने लगा. इसमें ‘क्रिस’ का अर्थ ईसा मसीह और ‘मस’ का अर्थ ईसाइयों का प्रार्थनामय समूह या ‘मास’ है. 16वीं शताब्दी के मध्य से ‘क्राइस्ट’ शब्द को रोमन अक्षर एक्स से दर्शाने की प्रथा चल पड़ी. इसलिए अब क्रिसमस को एक्समस भी कहा जाता है. भारत सहित दुनिया के ज़्यादातर देशों में क्रिसमस 25 दिसंबर को मनाया जाता है, लेकिन रूस, जार्जिया, मिस्त्र, अरमेनिया, युक्रेन और सर्बिया आदि देशों में 7 जनवरी को लोग क्रिसमस मनाते हैं, क्योंकि पारंपरिक जुलियन कैलंडर का 25 दिसंबर यानी क्रिसमस का दिन गेगोरियन कैलंडर और रोमन कैलंडर के मुताबिक़ 7 जनवरी को आता है. हालांकि पवित्र बाइबल में कहीं भी इसका ज़िक्र नहीं है कि क्रिसमस मनाने की परंपरा आख़िर कैसे, कब और कहां शुरू हुई. एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर यीशु का जन्म, 7 से 2 ई.पू. के बीच हुआ था. 25 दिसंबर यीशु मसीह के जन्म की कोई ज्ञात वास्तविक जन्म तिथि नहीं है.शोधकर्ताओं का कहना है कि ईसा मसीह के जन्म की निश्चित तिथि के बारे में पता लगाना काफ़ी मुश्किल है. सबसे पहले रोम के बिशप लिबेरियुस ने ईसाई सदस्यों के साथ मिलकर 354 ई. में 25 दिसंबर को क्रिसमस मनाया था. उसके बाद 432 ई. में मिस्त्र में पुराने जुलियन कैलंडर के मुताबिक़ 6 जनवरी को क्रिसमस मनाया गया था. उसके बाद धीरे-धीरे पूरी दुनिया में जहां भी ईसाइयों की तादाद ज़्यादा थी, यह त्योहार मनाया जाने लगा. छठी सदी के अंत तक इंग्लैंड में यह एक परंपरा का रूप ले चुका था.
ग़ौरतलब है ईसा मसीह के जन्‍म के बारे में व्‍यापक रूप से स्‍वीकार्य ईसाई पौराणिक कथा के मुताबिक़ प्रभु ने मैरी नामक एक कुंवारी लड़की के पास गैब्रियल नामक देवदूत भेजा. गैब्रियल ने मैरी को बताया कि वह प्रभु के पुत्र को जन्‍म देगी और बच्‍चे का नाम जीसस रखा जाएगा. व‍ह बड़ा होकर राजा बनेगा, तथा उसके राज्‍य की कोई सीमाएं नहीं होंगी. देवदूत गैब्रियल, जोसफ़ के पास भी गया और उसे बताया कि मैरी एक बच्‍चे को जन्‍म देगी, और उसे सलाह दी कि वह मैरी की देखभाल करे व उसका परित्‍याग न करे. जिस रात को जीसस का जन्‍म हुआ, उस वक़्त लागू नियमों के मुताबिक़ अपने नाम पंजीकृत कराने के लिए मैरी और जोसफ बेथलेहेम जाने के लिए रास्‍ते में थे. उन्‍होंने एक अस्‍तबल में शरण ली, जहां मैरी ने आधी रात को जीसस को जन्‍म दिया और उसे एक नांद में लिटा दिया. इस प्रकार जीसस का जन्‍म हुआ. क्रिसमस समारोह आधी रात के बाद शुरू होता है. इसके बाद मनोरंजन किया जाता है. सुंदर रंगीन वस्‍त्र पहने बच्‍चे ड्रम्‍स, झांझ-मंजीरों के आर्केस्‍ट्रा के साथ हाथ में चमकीली छड़ियां  लिए हुए सामूहिक नृत्‍य करते हैं.
क्रिसमस का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि ईसा मसीह के जन्म की कहानी का संता क्लॉज की कहानी के साथ कोई रिश्ता नहीं है. वैसे तो संता क्लॉज को याद करने का चलन चौथी सदी से शुरू हुआ था और वे संत निकोलस थे, जो तुर्किस्तान के मीरा नामक शहर के बिशप थे. उन्हें बच्चों से अत्यंत प्रेम था और वे ग़रीब, अनाथ और बेसहारा बच्चों को तोहफ़े दिया करते थे.
पुरानी कैथलिक परंपरा के मुताबिक़ क्रिसमस की रात को ईसाई बच्चे अपनी तमन्नाओं और ज़रूरतों को एक पत्र में लिखकर सोने से पूर्व अपने घर की खिड़कियों में रख देते थे. यह पत्र बालक ईसा मसीह के नाम लिखा जाता था. यह मान्यता थी कि फ़रिश्ते उनके पत्रों को बालक ईसा मसीह से पहुंचा देंगे. क्रिसमस ट्री की कहानी भी बहुत ही रोचक है. किवदंती है कि सर्दियों के महीने में एक लड़का जंगल में अकेला भटक रहा था. वह सर्दी से ठिठुर रहा था. वह ठंड से बचने के लिए आसरा तलाशने लगा. तभी उसकी नजर एक झोपड़ी पर पड़ी. वह झोपडी के पास गया और उसने दरवाजा खटखटाया. कुछ देर बाद एक लकड़हारे ने दरवाजा खोला. लड़के ने उस लकड़हारे से झोपड़ी के भीतर आने का अनुरोध किया. जब लकड़हारे ने ठंड में कांपते उस लड़के को देखा, तो उसे लड़के पर तरस आ गया और उसने उसे अपनी झोपड़ी में बुला लिया और उसे गर्म कपड़े भी दिए. उसके पास जो रूख-सूखा था, उसने लड़के को बभी खिलाया. इस अतिथि सत्कार से लड़का बहुत खुश हुआ. वास्तव में वह लड़का एक फ़रिश्ता था और लकड़हारे की परीक्षा लेने आया था. उसने लकड़हारे के घर के पास खड़े फ़र के पेड़ से एक तिनका निकाला और लकड़हारे को देकर कहा कि इसे ज़मीन में बो दो. लकड़हारे ने ठीक वैसा ही किया जैसा लड़के ने बताया था. लकडहारा और उसकी पत्नी इस पौधे की देखभाल अकरने लगे. एक साल बाद क्रिसमस के दिन उस पेड़ में फल लग गए. फलों को देखकर लकड़हारा और उसकी पत्नी हैरान रह गए, क्योंकि ये फल, साधारण फल नहीं थे बल्कि सोने और चांदी के थे. कहा जाता है कि इस पेड़ की याद में आज भी क्रिसमस ट्री सजाया जाता है. मगर मॉडर्न क्रिसमस ट्री शुरुआत जर्मनी में हुई. उस समय एडम और ईव के नाटक में स्टेज पर फर के पेड़ लगाए जाते थे. इस पर सेब लटके होते थे और स्टेज पर एक पिरामिड भी रखा जाता था. इस पिरामिड को हरे पत्तों और रंग-बिरंगी मोमबत्तियों से सजाया जाता था. पेड़ के ऊपर एक चमकता तारा लगाया जाता था. बाद में सोलहवीं शताब्दी में फर का पेड़ और पिरामिड एक हो गए और इसका नाम हो गया क्रिसमस ट्री अट्ठारहवीं सदी तक क्रिसमस ट्री बेहद लोकप्रिय हो चुका था. जर्मनी के राजकुमार अल्बर्ट की पत्नी महारानी विक्टोरिया के देश इंग्लैंड में भी धीरे-धीरे यह लोकप्रिय होने लगा. इंग्लैंड के लोगों ने क्रिसमस ट्री को रिबन से सजाकर और आकर्षक बना दिया. उन्नीसवीं शताब्दी तक क्रिसमस ट्री उत्तरी अमेरिका तक जा पहुंचा और वहां से यह पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया. क्रिसमस के मौक़े पर अन्य त्यौहारों की तरह अपने घर में तैयार की हुई मिठाइयां और व्यंजनों को आपस में बांटने व क्रिसमस के नाम से तोहफ़े देने की परंपरा भी काफ़ी पुरानी है. इसके अलावा बालक ईसा मसीह के जन्म की कहानी के आधार पर बेथलेहम शहर के एक गौशाले की चरनी में लेटे बालक ईसा मसीह और गाय-बैलों की मूर्तियों के साथ पहाड़ों के ऊपर फ़रिश्तों और चमकते तारों को सजा कर झांकियां बनाई जाती हैं, जो दो हज़ार साल पुरानी ईसा मसीह के जन्म की याद दिलाती हैं.
दिसंबर का महीना शुरू होते ही क्रिसमस की तैयारियां शुरू हो जाती हैं . गिरजाघरों को सजाया जाता है. भारत में अन्य धर्मों के लोग भी क्रिसमस के उत्सव में शामिल होते हैं. क्रिसमस के दौरान प्रभु की प्रशंसा में लोग कैरोल गाते हैं. वे प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हुए घर-घर जाते हैं. भारत में विशेषकर गोवा में कुछ लोकप्रिय चर्च हैं, जहां क्रिसमस बहुत उत्‍साह के साथ मनाया जाता है. इनमें से ज़्यादातर चर्च भारत में ब्रि‍टिश वऔरपुर्तगाली शासन के दौरान बनाए गए थे. इनके अलावा देश के अन्य बड़े भारत के कुछ बड़े चर्चों मे सेंट जोसफ़ कैथेड्रिल, आंध्र प्रदेश का मेढक चर्च, सेंट कै‍थेड्रल, चर्च ऑफ़ सेंट फ्रांसिस ऑफ़ आसीसि और गोवा का बैसिलिका व बोर्न जीसस, सेंट जांस चर्च इन विल्‍डरनेस और हिमाचल में क्राइस्‍ट चर्च, सांता क्‍लाज बैसिलिका चर्च, और केरल का सेंट फ्रासिस चर्च, होली क्राइस्‍ट चर्च, महाराष्‍ट्र में माउन्‍ट मेरी चर्च, तमिलनाडु में क्राइस्‍ट द किंग चर्च व वेलान्‍कन्‍नी चर्च, और आल सेंट्स चर्च और उत्तर प्रदेश का कानपुर मेमोरियल चर्च शामिल हैं. बहरहाल, देश के सभी छोटे-बड़े चर्चों में रौनक़ है.
तीज-त्यौहार ख़ुशियां लाते हैं. और जब बात क्रिसमस की हो, तो उम्मीदें और भी ज़्यादा बढ़ जाती हैं. माना जाता है कि क्रिसमस पर सांता क्लाज़ आते हैं और सबकी ’विश’ पूरी करते हैं. आज के दौर में जब नफ़रतें बढ़ रही हैं, तो ऐसे में मुहब्बत की विश की ज़रूरत है, ताकि हर तरफ़ बस मुहब्बत का उजियारा हो और नफ़रतों का अंधेरा हमेशा के लिए छंट जाए. हर इंसान ख़ुशहाल हो, सबका अपना घरबार हो, सबकी ज़िन्दगी में चैन-सुकून हो. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

धन समृद्धि की वृद्धि की अचूक तंत्र सामग्री


सबई भूमि गोपाल जी की, भारत पाकिस्तान का बंटवारा अवैध व फर्जी , स्वामित्वहीन सरकार


भारत पाकिस्तान का बंटवारी फर्जी और अवैध , किसी भी सरकार के पास आज तक नहीं है भारत का या अन्य किसी देश का स्वामित्व
केवल कब्जा ही कब्जा है , इन मिसाइलों में केवल धुंआ ही धुंआ बचा है , फयूज कण्डक्टर तो आज तक किसी और के पास हैं
नरेन्द्र सिंह तोमर ”आनन्द” , एडवोकेट , मुरैना , म.प्र.
एक शानदार जानदार व रोचक जानकारी – भारत के आज के संविधान और आज प्रचलित कानून के मुताबिक भी , भारत सरकार और पाकिस्तान , बर्मा, बंगलादेश सहित तमाम देशों सरकारों के पास इन देशों की किसी भी सम्पत्ति‍ , भूमि या अन्य किसी भी भौतिक वस्तु व मानव मात्र पर स्वामित्व नहीं है , महज मात्र एक कब्जाधारी के रूप में अतिक्रामक व केवल कब्जाधारी सरकारें हैं , इनमें से स्वामित्व किसी के पास भी नहीं हैं ।
इसे कुछ यूं समझें , कानून में ( अंग्रेजों का बनाया हुआ जो आज तक देश में चिथड़े लग लग कर चल रहा है) किसी भी संपत्त‍ि , का स्वामित्व एक अलग बात है , एक अलग विषय व तथ्य है, तथा संपत्त‍ि पर स्वामी के बजाय किसी अन्य का कब्जा या अवैध कब्जा होना दूसरी बात है , जिसे कानून नहीं मानता और ऐसे फर्जी व अवैध कब्जाधारी को अवैध व उसके विरूद्ध आपराधि‍क एवं सिविल कार्यवाही की जाती है । यानि स्वामी और अवैध कब्जाधारी , या संपत्त‍ि के स्वामी से भि‍न्न किसी अन्य का कब्जा , एक अतिक्रमण एवं दंडनीय अपराध व सिविल कार्यवाही दोनों ही प्रकार का मामला है ।
अब आते हैं असल बात पर , चलिये जरा पीछे चलें , सन 1947 में 14 अगस्त और 15 अगस्त को , अंग्रेजों ने भारत व पाकिस्तान को सत्ता का हस्तांतरण किया , अब सवाल ये है कि , अंग्रेज सत्ता हस्तांतरण करने वाले कौन , क्या वे इसके लिये अधि‍कृत थे , जी नहीं बिल्कुल नहीं कतई नहीं, अंग्रेज भारत पाकिस्तान की किसी भी संपत्त‍ि या मानव मात्र के स्वामी नहीं थे , उनके पास स्वामित्व नहीं था , में महज जबरन अवैध कब्जा करने वाले मात्र अतिक्रामक थे , मुगल भी महज अवैध कब्जाधारी अतिक्रामक अपराधी थे , कुल मिलाकर भारत या अन्य देशों का स्वामित्व अंग्रेजों या मुगलों के पास नहीं था , उनका किसी ने या भारत या अन्य देश के स्वामित्व धारीयों द्वारा राजतिलक या राज्याभि‍षेक नहीं किया , न उनके गुलाम व नियंत्रणाधीन उनके गुलाम राजाओं व चमचों , व फर्जी राजाओं को इन देशों का असली स्वामित्व धारी कभी स्वामित्व का हस्तांतरण किया गया ।
एक फर्जी व अवैध कब्जाधारी अतिक्रामक अपराधी कभी भी जो कि स्वयं ही स्वामित्व नहीं रखता , किसी को भी स्वामित्व का या सत्ता का हस्तांतरण या कब्जा नहीं दे सकता या कर सकता ।
भारत सहित अन्य देशों को आज तक इन देशों की सरकारों को , इन देशों के असली स्वामी द्वारा आज दिनांक तक स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं किया गया ।
केवल फर्जी व अवैध कब्जाधारीयों द्वारा , एक अन्य को कब्जा हस्तांतरण मात्र हुआ , यानि घर में घुस बैठे गुंडों द्वारा किसी घर पर कब्जा किया गया और दूसरे गुण्डों को कब्जा सौंपकर आगे निकल गये , संपत्त‍ि का स्वामी बेचारा शान्त अलग बैठा , गुण्डों द्वारा उसकी संपत्त‍ि व घर से बेदखल किया गया , मजदूरी , खेती किसानी कर रहा है । उसने तो स्वामित्व आज तक किसी को कभी दिया ही नहीं ।
कुल मिलाकर निष्कर्ष यह निकला कि भारत सहित अन्य देशों की सरकारों ने एक अवैध कब्जाधारी जबरन घर में आ घुसे गुण्डे से , दूसरे गुण्डे की तरह कब्जा मात्र हस्तांतरित किया है , इनमें से किसी के पास स्वामित्व आज तक नहीं है , न असल स्वामी द्वारा इन्हें स्वामित्व हस्तांरित किया गया ।
इस बिना पर और इस ठोस तर्क के आधार पर एक अवैध कब्जाधारी चाहे वह ( आज पुकारी जाने वाली सो कॉल्ड सरकार ही क्यों न हो) स्वामित्वहीन महज एक अवैध कब्जाधारी है , उसे न संविधान बनाने के , न कानून बनाने के और न देश चलाने के अख्त्यारात हासिल हैं । अवैध कब्जाधारीयों को किसी भी प्रकार के अख्त्यारात हासिल नहीं होते, इसी तर्क व आधार के प्रकाश में एकदम साफ व स्पष्ट है कि भारत के संविधान की धारा 370 अवैध व फर्जी है, इसके अलावा बल्लभभाई पटेल द्वारा जितनी भी अंग्रेजों की गुलाम व चमचों की सो कॉल्ड रियासतों या अंग्रेजों के गुलाम राजाओं से किये गये भारत संघ में विलय संबंधी सारे मर्जर एग्रीमेण्ट फर्जी व जाली हैं , और ये सभी अवैध कब्जाधारी थे न कि असल स्वामी, और अवैध कब्जाधारी किसी प्रकार का मर्जर एग्रीमेण्ट या स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं कर सकते , केवल गुण्डा अपना अवैध कब्जा , दूसरे गुण्डे को कब्जा हस्तांतरण कर सकता है , और सारे के सारे मर्जर एग्रीमेण्ट स्वामित्व विहीन , केवल कब्जा का हस्तांतरण मात्र हैं ।
पाकिस्तान का स्वामित्व भारत के पास था , पाकिस्तान का कब्जा किसी को भी न तो अंग्रेज दे सकते थे न कोई और , क्योंकि दरअसल सन 1947 में स्वामित्व का हस्तातरण हुआ ही नहीं था , अंग्रेज भारत के स्वामी नहीं थे , इसलिये स्वामित्व का हस्तांतरण नहीं कर सकते थे , केवल कब्जा हस्तातंरण कर सकते थे , सो किया , न भारत का स्वामित्व आज तक और न पाकिस्तान का या अन्य किसी भी देश का स्वामित्व इनमें से किसी भी सरकार के पास है और न कब्जे के कानूनी अधि‍कार हासिल हैं ,न सरकार चलाने के, और न किसी सम्पत्त‍ि या देश या भूमि का बंटवारा आदि करने के ।
नरेन्द्र सिंह तोमर ”आनन्द” , एडवोकेट , मुरैना , म.प्र.

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