श्री कृष्‍ण जन्‍म अष्‍टमी पर विशेष प्रस्‍तुति


कुबेर एवं यक्षि‍ण‍ियों की साधना व सिद्धि


ग्‍वालियर टाइम्‍स की 130 वीं फ‍िल्‍म – आषाढ़ पूर्ण‍िमा से शुरू होने वाली – यक्ष‍िणीयों की एवं कुबेर मंत्र सिद्धि साधना
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सूर्य को प्रात: जल क्‍यों व कैसे चढ़ाना चाहिये


ग्‍वालियर टाइम्‍स की 111 वीं फ‍िल्‍म – सूर्य को प्रात: जल क्‍यों व कैसे चढायें – स्‍वर व उच्‍चारण – नरेन्‍द्र सिंह तोमर ”आनन्‍द”
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4 मार्च से होलाष्‍टक प्रारंभ होंगें , 12 को होलिका दहन, तंत्र मंत्र सिद्धि का श्रेष्‍ठ योग


04 मार्च से प्रारंभ होंगें होलाष्‍टक , 12 को होलिका दहन, तंत्र मंत्र यंत्र प्रयोग के लिये सर्वश्रेष्‍ठ सिद्धि साधना योग
– नरेन्‍द्र सिंह तोमर ”आनन्‍द”
ग्‍वालियर टाइम्‍स , 1 मार्च 2017 । 02 मार्च को सर्वार्थ सिद्धि योग रहेगा , 04 मार्च को होलाष्‍टक प्रारंभ होगें , प्रात: 6 बज कर 10 मिनिट के बाद इस बार होलाष्‍टकों के लिये सर्वोत्‍तम योग महूर्त हैं , होलाष्‍टक की शुरूआत के दिन ही सर्वाथ सिद्धि योग एवं अमृत सिद्धि योग रहेंगें , ज्ञातव्‍य एवं स्‍मरणीय है कि तंत्र मंत्र यंत्र एवं अनुष्‍ठान आदि , अभि‍चारादि कर्म करने या उनको हटाने , पलटने, काटने, उतारे व उसारे आदि के लिये होलाष्‍टक से लेकर होलिका दहन के दिन व रात्रि का प्रयोग किया जाता है ।
होलाष्‍टकों के दरम्‍यान ही 09 फरवरी 2017 को तीन मुख्‍य महत्‍वपूर्ण सिद्धि योग एक साथ पड़ेंगें , इस दिन गुरू पुष्‍य नक्षत्र राज सिद्धि योग , सर्वार्थ सिद्धि योग एवं अमृत सिद्धि योग एक साथ रहेंगें , इस लिहाज से इस बार ये होलाष्‍टक सम्‍पूर्ण सिद्धि व साधना हेतु उपयुक्‍त एवं अति दुर्लभ हैं ।
होलाष्‍टकों की पूर्ण आहूति होलिका दहन की अकाटय दहन मूहूर्त ( संपूर्ण दिन व संपूर्ण रात्रि) पर होगी ।
जो लोग तंत्र मंत्र यंत्रादि के जानकार नहीं हैं , वे 04 मार्च से होलिका दहन दिनांक 12 मार्च 2017 तक अपने स्‍तर पर विशेष सावधानियां रखें , इस वक्‍त तमाम प्रकार के अनुष्‍ठान व तंत्र क्रियायें आदि संपन्‍न की जातीं हैं , एवं उतारे व उसारे आदि किये जाते हैं , काट, पलट , उलट आदि क्रियायें व नवीन तंत्र मंत्र यंत्र प्रयोग किये जाते हैं, लिहाजा तिराहों चौराहों से देख कर व बचकर गुजरें, इसके अलावा अपने घर , दूकान व व्‍यापार , व्‍यवसाय की विशेष सावधानी , स्‍वयं की विशेष रक्षात्‍मक उपाय करें व स्‍वयं को बचायें ।
इसके ठीक बाद ही चैत्र नवरात्रि के प्रयोग व अनुष्‍ठान आदि चलेंगें , लिहाजा इस पूरी अवधि‍ के दौरान मुकम्‍मल सावधानी रखें ।

Bismil Museum Morena & Black Magic


 

फिल्‍न्‍म – बिस्‍मि‍ल संग्रहालय – मुरैना का विश्‍वव्‍यापी प्रसारण हुआ
भारत व चम्‍बल के इतिहास की एक बानगी , एक झलक, महाभारत कालीन वीर प्रसूता जननी पर भारत व चम्‍बल के इतिहास वीरता शौर्य पराक्रम के साथ चम्‍बल तब से अब तक की बरनगी दिखाता एक संग्रहालय देखें इस फिल्‍म में
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दस महाविद्या देवी सहस्‍त्रनाम ( महाकाली सहस्‍त्रनाम)


काला जादू, मारण, दीठ मूठ नजर चौकी, असाध्‍य बीमारी की काट – प्रत्‍यंगिरा विधान


प्रत्‍यंगिरा मंत्र विधान एवं स्‍तोत्र का विश्‍वव्‍यापी प्रसारण
मारण, असाध्‍य बीमारी, मूठ , चौकी , नजर , काला जादू की काट, पलट, उलट, व खात्‍मा का प्रत्‍यंगिरा माला स्‍तोत्र ( शास्‍त्रीय मंत्र विधान )
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क्रिसमस दिवस पर विशेष – एक विश मुहब्‍बत की – फिरदौस खान


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क्रिसमस पर विशेष
संता से मांगी एक ’विश’ मुहब्बत की
-फ़िरदौस ख़ान
यह हमारे देश की सदियों पुरानी परंपरा रही है कि यहां सभी त्‍यौहारों को मिलजुल कर मनाया जाता है. हर त्यौहार का अपना ही उत्साह होता है- बिलकुल ईद और दिवाली की तरह.  क्रिसमस  ईसाइयों के सबसे महत्‍वपूर्ण त्‍यौहारों में से एक है. इसे ईसा मसीह के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाता है. क्रिसमस को बड़े दिन के रूप में भी मनाया जाता है. क्रिसमस से 12 दिन का उत्सव क्रिसमसटाइड शुरू होता है. ‘क्रिसमस’ शब्द ‘क्राइस्ट्स और मास’ दो शब्दों से मिलकर बना है, जो मध्य काल के अंग्रेज़ी शब्द ‘क्रिस्टेमसे’ और पुरानी अंग्रेज़ी शब्द ‘क्रिस्टेसमैसे’ से नक़ल किया गया है. 1038 ई. से इसे ‘क्रिसमस’ कहा जाने लगा. इसमें ‘क्रिस’ का अर्थ ईसा मसीह और ‘मस’ का अर्थ ईसाइयों का प्रार्थनामय समूह या ‘मास’ है. 16वीं शताब्दी के मध्य से ‘क्राइस्ट’ शब्द को रोमन अक्षर एक्स से दर्शाने की प्रथा चल पड़ी. इसलिए अब क्रिसमस को एक्समस भी कहा जाता है. भारत सहित दुनिया के ज़्यादातर देशों में क्रिसमस 25 दिसंबर को मनाया जाता है, लेकिन रूस, जार्जिया, मिस्त्र, अरमेनिया, युक्रेन और सर्बिया आदि देशों में 7 जनवरी को लोग क्रिसमस मनाते हैं, क्योंकि पारंपरिक जुलियन कैलंडर का 25 दिसंबर यानी क्रिसमस का दिन गेगोरियन कैलंडर और रोमन कैलंडर के मुताबिक़ 7 जनवरी को आता है. हालांकि पवित्र बाइबल में कहीं भी इसका ज़िक्र नहीं है कि क्रिसमस मनाने की परंपरा आख़िर कैसे, कब और कहां शुरू हुई. एन्नो डोमिनी काल प्रणाली के आधार पर यीशु का जन्म, 7 से 2 ई.पू. के बीच हुआ था. 25 दिसंबर यीशु मसीह के जन्म की कोई ज्ञात वास्तविक जन्म तिथि नहीं है.शोधकर्ताओं का कहना है कि ईसा मसीह के जन्म की निश्चित तिथि के बारे में पता लगाना काफ़ी मुश्किल है. सबसे पहले रोम के बिशप लिबेरियुस ने ईसाई सदस्यों के साथ मिलकर 354 ई. में 25 दिसंबर को क्रिसमस मनाया था. उसके बाद 432 ई. में मिस्त्र में पुराने जुलियन कैलंडर के मुताबिक़ 6 जनवरी को क्रिसमस मनाया गया था. उसके बाद धीरे-धीरे पूरी दुनिया में जहां भी ईसाइयों की तादाद ज़्यादा थी, यह त्योहार मनाया जाने लगा. छठी सदी के अंत तक इंग्लैंड में यह एक परंपरा का रूप ले चुका था.
ग़ौरतलब है ईसा मसीह के जन्‍म के बारे में व्‍यापक रूप से स्‍वीकार्य ईसाई पौराणिक कथा के मुताबिक़ प्रभु ने मैरी नामक एक कुंवारी लड़की के पास गैब्रियल नामक देवदूत भेजा. गैब्रियल ने मैरी को बताया कि वह प्रभु के पुत्र को जन्‍म देगी और बच्‍चे का नाम जीसस रखा जाएगा. व‍ह बड़ा होकर राजा बनेगा, तथा उसके राज्‍य की कोई सीमाएं नहीं होंगी. देवदूत गैब्रियल, जोसफ़ के पास भी गया और उसे बताया कि मैरी एक बच्‍चे को जन्‍म देगी, और उसे सलाह दी कि वह मैरी की देखभाल करे व उसका परित्‍याग न करे. जिस रात को जीसस का जन्‍म हुआ, उस वक़्त लागू नियमों के मुताबिक़ अपने नाम पंजीकृत कराने के लिए मैरी और जोसफ बेथलेहेम जाने के लिए रास्‍ते में थे. उन्‍होंने एक अस्‍तबल में शरण ली, जहां मैरी ने आधी रात को जीसस को जन्‍म दिया और उसे एक नांद में लिटा दिया. इस प्रकार जीसस का जन्‍म हुआ. क्रिसमस समारोह आधी रात के बाद शुरू होता है. इसके बाद मनोरंजन किया जाता है. सुंदर रंगीन वस्‍त्र पहने बच्‍चे ड्रम्‍स, झांझ-मंजीरों के आर्केस्‍ट्रा के साथ हाथ में चमकीली छड़ियां  लिए हुए सामूहिक नृत्‍य करते हैं.
क्रिसमस का एक और दिलचस्प पहलू यह है कि ईसा मसीह के जन्म की कहानी का संता क्लॉज की कहानी के साथ कोई रिश्ता नहीं है. वैसे तो संता क्लॉज को याद करने का चलन चौथी सदी से शुरू हुआ था और वे संत निकोलस थे, जो तुर्किस्तान के मीरा नामक शहर के बिशप थे. उन्हें बच्चों से अत्यंत प्रेम था और वे ग़रीब, अनाथ और बेसहारा बच्चों को तोहफ़े दिया करते थे.
पुरानी कैथलिक परंपरा के मुताबिक़ क्रिसमस की रात को ईसाई बच्चे अपनी तमन्नाओं और ज़रूरतों को एक पत्र में लिखकर सोने से पूर्व अपने घर की खिड़कियों में रख देते थे. यह पत्र बालक ईसा मसीह के नाम लिखा जाता था. यह मान्यता थी कि फ़रिश्ते उनके पत्रों को बालक ईसा मसीह से पहुंचा देंगे. क्रिसमस ट्री की कहानी भी बहुत ही रोचक है. किवदंती है कि सर्दियों के महीने में एक लड़का जंगल में अकेला भटक रहा था. वह सर्दी से ठिठुर रहा था. वह ठंड से बचने के लिए आसरा तलाशने लगा. तभी उसकी नजर एक झोपड़ी पर पड़ी. वह झोपडी के पास गया और उसने दरवाजा खटखटाया. कुछ देर बाद एक लकड़हारे ने दरवाजा खोला. लड़के ने उस लकड़हारे से झोपड़ी के भीतर आने का अनुरोध किया. जब लकड़हारे ने ठंड में कांपते उस लड़के को देखा, तो उसे लड़के पर तरस आ गया और उसने उसे अपनी झोपड़ी में बुला लिया और उसे गर्म कपड़े भी दिए. उसके पास जो रूख-सूखा था, उसने लड़के को बभी खिलाया. इस अतिथि सत्कार से लड़का बहुत खुश हुआ. वास्तव में वह लड़का एक फ़रिश्ता था और लकड़हारे की परीक्षा लेने आया था. उसने लकड़हारे के घर के पास खड़े फ़र के पेड़ से एक तिनका निकाला और लकड़हारे को देकर कहा कि इसे ज़मीन में बो दो. लकड़हारे ने ठीक वैसा ही किया जैसा लड़के ने बताया था. लकडहारा और उसकी पत्नी इस पौधे की देखभाल अकरने लगे. एक साल बाद क्रिसमस के दिन उस पेड़ में फल लग गए. फलों को देखकर लकड़हारा और उसकी पत्नी हैरान रह गए, क्योंकि ये फल, साधारण फल नहीं थे बल्कि सोने और चांदी के थे. कहा जाता है कि इस पेड़ की याद में आज भी क्रिसमस ट्री सजाया जाता है. मगर मॉडर्न क्रिसमस ट्री शुरुआत जर्मनी में हुई. उस समय एडम और ईव के नाटक में स्टेज पर फर के पेड़ लगाए जाते थे. इस पर सेब लटके होते थे और स्टेज पर एक पिरामिड भी रखा जाता था. इस पिरामिड को हरे पत्तों और रंग-बिरंगी मोमबत्तियों से सजाया जाता था. पेड़ के ऊपर एक चमकता तारा लगाया जाता था. बाद में सोलहवीं शताब्दी में फर का पेड़ और पिरामिड एक हो गए और इसका नाम हो गया क्रिसमस ट्री अट्ठारहवीं सदी तक क्रिसमस ट्री बेहद लोकप्रिय हो चुका था. जर्मनी के राजकुमार अल्बर्ट की पत्नी महारानी विक्टोरिया के देश इंग्लैंड में भी धीरे-धीरे यह लोकप्रिय होने लगा. इंग्लैंड के लोगों ने क्रिसमस ट्री को रिबन से सजाकर और आकर्षक बना दिया. उन्नीसवीं शताब्दी तक क्रिसमस ट्री उत्तरी अमेरिका तक जा पहुंचा और वहां से यह पूरी दुनिया में लोकप्रिय हो गया. क्रिसमस के मौक़े पर अन्य त्यौहारों की तरह अपने घर में तैयार की हुई मिठाइयां और व्यंजनों को आपस में बांटने व क्रिसमस के नाम से तोहफ़े देने की परंपरा भी काफ़ी पुरानी है. इसके अलावा बालक ईसा मसीह के जन्म की कहानी के आधार पर बेथलेहम शहर के एक गौशाले की चरनी में लेटे बालक ईसा मसीह और गाय-बैलों की मूर्तियों के साथ पहाड़ों के ऊपर फ़रिश्तों और चमकते तारों को सजा कर झांकियां बनाई जाती हैं, जो दो हज़ार साल पुरानी ईसा मसीह के जन्म की याद दिलाती हैं.
दिसंबर का महीना शुरू होते ही क्रिसमस की तैयारियां शुरू हो जाती हैं . गिरजाघरों को सजाया जाता है. भारत में अन्य धर्मों के लोग भी क्रिसमस के उत्सव में शामिल होते हैं. क्रिसमस के दौरान प्रभु की प्रशंसा में लोग कैरोल गाते हैं. वे प्रेम और भाईचारे का संदेश देते हुए घर-घर जाते हैं. भारत में विशेषकर गोवा में कुछ लोकप्रिय चर्च हैं, जहां क्रिसमस बहुत उत्‍साह के साथ मनाया जाता है. इनमें से ज़्यादातर चर्च भारत में ब्रि‍टिश वऔरपुर्तगाली शासन के दौरान बनाए गए थे. इनके अलावा देश के अन्य बड़े भारत के कुछ बड़े चर्चों मे सेंट जोसफ़ कैथेड्रिल, आंध्र प्रदेश का मेढक चर्च, सेंट कै‍थेड्रल, चर्च ऑफ़ सेंट फ्रांसिस ऑफ़ आसीसि और गोवा का बैसिलिका व बोर्न जीसस, सेंट जांस चर्च इन विल्‍डरनेस और हिमाचल में क्राइस्‍ट चर्च, सांता क्‍लाज बैसिलिका चर्च, और केरल का सेंट फ्रासिस चर्च, होली क्राइस्‍ट चर्च, महाराष्‍ट्र में माउन्‍ट मेरी चर्च, तमिलनाडु में क्राइस्‍ट द किंग चर्च व वेलान्‍कन्‍नी चर्च, और आल सेंट्स चर्च और उत्तर प्रदेश का कानपुर मेमोरियल चर्च शामिल हैं. बहरहाल, देश के सभी छोटे-बड़े चर्चों में रौनक़ है.
तीज-त्यौहार ख़ुशियां लाते हैं. और जब बात क्रिसमस की हो, तो उम्मीदें और भी ज़्यादा बढ़ जाती हैं. माना जाता है कि क्रिसमस पर सांता क्लाज़ आते हैं और सबकी ’विश’ पूरी करते हैं. आज के दौर में जब नफ़रतें बढ़ रही हैं, तो ऐसे में मुहब्बत की विश की ज़रूरत है, ताकि हर तरफ़ बस मुहब्बत का उजियारा हो और नफ़रतों का अंधेरा हमेशा के लिए छंट जाए. हर इंसान ख़ुशहाल हो, सबका अपना घरबार हो, सबकी ज़िन्दगी में चैन-सुकून हो. (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

बार काउंसिल के विवादित नियमों व फैसलों पर हाई कोर्ट का स्टे , हाईकोर्ट ने कहा नॉन प्रेक्ट‍िशनर्स एडवोकेटस भी बार के चुनावों में मतदाता हैं


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क्या ऊना और क्या पूना जलजला आना है , ज्वालामुखी तो फटना है, महाभारत तो होना है


क्या ऊना और क्या पूना , ज्वालामुखी तो फटना है , अभी महाभारत तो होना है
– नरेन्द्र सिंह तोमर ”आनन्द”
दलित, शूद्र , पिछड़ा , दर असल किसी जाति का नाम नहीं , न किसी भी भारतीय ग्रंथ में या शास्त्र में इनकी कोई जाति दी हुई है , सबसे बड़ा सबूत है इसका महाभारत , जिसमें न कोई दलित मरा, न शूद्र न पिछड़ा , भारत के इतिहास में कभी ये नहीं मरे ।
हम नरेन्द्र मोदी की तथा कथ‍ित गौ रक्षकों के बारे में कही गई बात को सही मानते हैं व उससे सहमत हैं ।
ये जातियां किसने बनाईं , इन जातियों को जातिगत नाम व जन्म किसने दिया , कौन इन नामों की जातियों को अब तक जिन्दा रखे है , भाारत की आजादी के 70 साल गुजरने के बाद भी यह जातियां मुकम्मल कायम व दलित व पिछड़ी हैं, जबकि इस कालांतर में ही नहीं विगत हजारों वर्षो के कालांतर में भी यह शासक रहीं हैं यह शोध का विषय है , वस्तुत: 98 प्रतिशत तथाकथ‍ित दलित एवं पिछड़ी जातियां फर्जी हैं , और इस पर बाकायदा एक बहुत बड़ा अभ‍ियान चला कर इनकी मूल से आज तक वास्तविक सूची बनाई जानी चाहिये , इस फर्जी दलित व पिछड़ा जाति की असलियत सामने लाने का वक्त आ चुका है ।
जब दयाशंकर सिंह की मॉं बहिन बेटी को गरियाया व अपमानित किया जा रहा था तब इनके होठों पर मेंहदी लगी थी या जुबानों पर ताले लगे थे , या कि इनके मोबाइल व कम्प्यूटर के की बोडों में पानी भर गया था । जो दुर्योधन की सभा में द्रोपदी का चीर हरण होते देख , दुर्योधन द्वारा द्रोपदी को अपनी जंघा पर बैठने का आदेश देते देख मौन थे , वे कितने बड़े , बेशक बहुत बड़े महारथी थे , मगर बहुत बुरी भयावह व दर्दनाक मौत मारे गये । उनके सम्पूर्ण कुल व वंशों के विनाश हो गये ।
इसके बाद भी यदि इतने भीषण महाभारत जिसमें अठारह अहौक्षणी सेना व समस्त कौरव वंश का समूल सर्वनाश हो गया था , उस देश में आप क्या उम्मीद करते हैं , आप अपना असत्य, फर्जीवाड़ा , मिथ्यावाद, झूठा तमगीकरण, अपने पापों और अपराधों को छिपाने के लिये दूसरों पर आरोप जड़ते रहने का खेल कब तक … कितने वक्त तक खेल सकते हैं , और प्रतिकार की , बदले की या दण्ड की अपेक्षा नहीं करते । यदि आप किसी मुगालते में हैं वह भी भारत जैसे देश में , जहॉं महाभारत जैसा युद्ध हुआ , सीता की इज्जत पर ऑंच आने से रावण के सम्पूर्ण कुल का सर्वनाश हुआ । वहॉं आप क्या अपेक्षा व उम्मीद करते हैं । ऊना हो या पूना या हो जूना गढ़, यह तो बहुत ही हल्की सी बहुत छोटी सी प्रतिक्रिया है , एक बगावत , एक आक्रोश के दबे हुये बलबले दार ज्वालामुखी का महज कहीं जरा सी गिरी चिंगारी है , ज्वालामुखी तो फटना है , तय है , कब फटेगा कितना व किस हद तक फटेगा , आप जितना कुचल सकते हैं भारत को , भारतवासियों को , समझ लीजिये कुचल चुके दबा चुके , राजनीति बहुत हो गई , बहुत कूटनीति व नेतागिरी कर ली ।
लोगों का अब पुलिस पर , कानून पर , राजनेताओं व सरकार पर, अदालतों पर भरोसा व यकीन नहीं रहा ।
एक बगावत , आक्रोश समूचे भारत में समाई है , भगोड़े टिक कहॉं पाये हैं , जब जंग छिड़ती है और वह जंग जब हक के लिये , न्याय के लिये होती है तो धर्मयुद्ध कहलाती है । महाभारत कहलाती है , इसलिये श्रीमद भगवद गीता पहला श्लोक है ” धर्म क्षेत्रे कुरू क्षेत्रे … ”
और महाभारत का अर्थ है भारत का महान होना .. विस्तृत व विशाल होकर चारों ओर फैलना , बहुतों को मिटा कर और बहुतों को मिला कर भारत बनाना , ऐसा भारत ही महाभारत कहलाया था जिसकी सत्ता 5500 वर्ष तक सम्पूर्ण विश्व भूमि पर रही ।
अब ये फैसला तो श्री कृष्ण ने काफी प्रयास करके पहले उन्हीं लोगों पर छोड़ दिया था जिनके बीच महाभारत का युद्ध हुआ कि ” तुम्हें मिटना है या मिलना है ” और सारी जातियां, धर्म , संप्रदाय , संस्कृतियां , भाषायें , सारे विश्व के लोग …. मिट गये और मिल कर एक हो गये …. और बन गया भारत का महाभारत …
अब आप तय कर लें कि ” भारत की जनता जो कि एक अभ‍िमन्यु है , कब तक निआप सातों महारथ‍ियों ( सरकार, नेता, पुलिस, अदालत, सिस्टम, भ्रष्ट , जनता को अपना गुलाम व खुद को राजा माानने वाले लोग ) हत्थे लाचार इस बालक को चक्रव्यूह में घेर फंसा कर रखना है और कब तक इसे जूझना और संघर्ष कराना है , और कब मार देना है ”
बेशक सातों महारथ‍ियों का खौफनाक व भयावह अंत तय है , महाभारत का मैदान सज रहा है , नया कुरूक्षेत्र बन चुका है , श्री कृष्ण हार चुका है , वह दुर्योधन के छप्पन भोग ठुकरा कर विदुर के घर साग रोटी खा रहा है ।
चिल्लाओ मत , तब चुप थे तो अब भी चुप रहो, बोलने का हक खो खुके हो , जीने का हक खो चुके हो , बोलोगे तो जुबान खुद ही टपक कर नीचे गिर जायेगी , जिन्दगी का अहसास व आस रखोगे तो मौत सुनिश्चत हो खुद ब खुद आ जायेगी ।
क्या ऊना और क्या पूना …. अंधा भी केवल कॉमनसेन्स के आधार पर बता देगा , जुल्म की इन्त‍िहा गुजर चुकी है , अब तो बस आक्रोश व बदले का ज्वालामुखी फटना है , महाभारत के युद्ध का बिगुल बजना है , अर्जुन को रथ पर चढ़ना है , श्री कृष्ण को अपना पांचजन्य शंख फूंकना है ….. बस उसके बाद किसी को मिटना है और किसी को मिलना है , बेशक फिर एक महाभारत बनना है – नरेन्द्र सिंह तोमर ”आनन्द”

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