संस्‍कृति भी ऑन लाइन होगी , कवियों स ाहित्‍यकारों के साथ एन.जी.ओ. की ने टवर्क भी ऑनलाइन होगी


संस्‍कृति भी ऑन लाइन होगी , कवियों साहित्‍यकारों के साथ एन.जी.ओ. की नेटवर्क भी ऑनलाइन होगी

मुरैना 28 नवम्‍बर 09, चम्‍बल की प्रसिद्ध स्‍वयंसेवी संस्‍था ‘’संस्‍कृति’’ भी शीघ्र ही ऑन लाइन होकर इण्‍टरनेट पर आ रही है । ग्‍वालियर टाइम्‍स समूह संस्‍कृति संस्‍था को ऑनलाइन करने की व्‍यापक तैयारीयां कर रहा है ।

संस्‍कृति की वेबसाइट इण्‍टरेक्टिव होगी तथा साहित्‍यकार, कवि एवं स्‍वयंसेवी संगठनों की विशाल नेटवर्क संस्‍कृति की वेबसाइट पर उपलब्‍ध होगी , साथ ही संस्‍कृति अपनी परियोजनाये, सूचना का अधिकार सहित कई अनेक चैनल उपलब्‍ध करायेगी ।

संस्‍कृति के निदेशक प्रसिद्ध कवि एवं साहित्‍यकार देवेन्‍द्र तोमर ग्‍वालियर टाइम्‍स समूह से जुड़कर संस्‍कृति संस्‍था के कार्यो की बृहद परियोजना बनाने में जुटे हैं । संस्‍कृति की वेबसाइट में चम्‍बल के ही नहीं बल्कि देश भर के साहित्‍यकारों व कवियों को उनकी रचनाओं के साथ एक जगह पर ही प्रकाशित किया जायेगा । और कई ख्‍यातनाम साहित्‍यकारों व कवियों की दुर्लभ कृतियां भी यहॉं पढ़ीं जा सकेगी । उनकी तथा स्‍वयंसेवी संस्‍थाओं की विशाल नेटवर्क एवं डायरेक्‍ट्री भी यहॉं मय वेबसाइट उपलब्‍ध होगी । जिसमें आनलाइन पंजीयन कराने से लेकर प्रकाशन प्रसारण वेब नेटवर्किंग जैसी सुविधायें तथा आटो अपडेशन एवं आटो पब्‍िलिशिंग की सुविधा भी दी जायेगी ।

ग्‍वालियर टाइम्‍स के मुख्‍य कार्यपालन अधिकारी एवं प्रधान संपादक नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’ वेब साइट की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं । इसके पश्‍चात चम्‍बल की करीब 16 अन्‍य स्‍वयंसेवी संस्‍थायें भी ऑन लाइन की जायेंगी । नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’ ने कहा है कि चम्‍बल के बारे में विश्‍व में व्‍याप्‍त भ्रांतियां दूर कर असल चम्‍बल से परिचित कराने के अपनी परियोजना के दूसरे चरण पर तथा ई कामर्स व ई गवर्नेन्‍स के तीसरे चरण को नेशनल नोबल यूथ अकादमी ने कार्य करना प्रारंभ कर दिया है । शीघ्र ही वे ग्‍वालियर चम्‍बल में एक विशेष अभियान छेड़ कर कार्यक्रम को गति देंगे ।

ग्‍वालियर टाइम्‍स ग्‍वालियर चम्‍बल के पत्रकारों, राजनेताओं, विद्यालयों, महाविद्यालयों, चिकित्‍सकों, अभिभाषकों की डायरेक्‍ट्री भी शीघ्र ही ऑनलाइन करने जा रही है यह भी इण्‍टरेक्टिव होगी और इसमें भी आन लाइन पंजीयन, आटो अपडेशन व आटो पब्‍िलिशंग की सुविधा रहेगी ।

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आसपड़ौस : अबू नहीं, संविधान पिटा- रा केश अचल


आसपड़ौस : अबू नहीं, संविधान पिटा

राकेश अचल

(लेखक ग्‍वालियर चम्‍बल क्षेत्र के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं )

महाराष्ट्र विधानसभा मे जो हुआ वह शर्मनाक है। राज ठाकरे के विधायकों ने पूरी दुनियां मे महाराष्ट्र की और उससे बढ़कर इस अखंड राष्ट्र भारत की नाक कटवा दी। उन्होने हिंदी में शपथ लेने पर समाजवादी पार्टी के विधायक अबू आजमी को नहीं पीटा बल्कि पूरे संविधान पर हमला किया है।

भारत के संविधान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उसने प्रत्येक भारतवासी को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रा दी है। भारत मे रहने वाला कोई भी व्यक्ति किसी भी भाषा में लिख सकता है, पढ़ सकता है, बोल सकता है। अभिव्यक्ति की इस स्वतंत्रता की रक्षा के लिए कानून है। कानून के उल्लघंन पर सजा का प्रावधान हैं लेकिन लगता है राजनीति में नए-नए आए राजठाकरे या तो इन कानूनों, सजाओं की परवाह नही करते या फिर वे अनपढ़ है, उनके लिए संविधान की मोटी किताब में काली स्याही में लिखें सोने के अच्छर भैंस के बराबर है।

मराठी मानुष की राजनीति करने वाले राज को उनके चाचा बाल ठाकरे ने जो संस्कार दिए थे वे अब फल फूल रहे है। व्यक्तिगत अस्मिता की रक्षा के लिए मराठी भाषा और मराठी मानुष का इस्तेमाल करने वाले इस युवा तुर्क की समझ में क्यों नही आता कि हाल में विधानसभा चुनावों मे जनता ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना को अस्वीकार कर दिया है। दो सैंकड़ा सीटों वाली विधान सभा में राज के केवल एक दर्जन गुर्गे ही विधायक बनकर प्रवेष पा सके है।

दर असल महाराष्ट में राष्ट्र के विरूध्द भावनाएं भड़काने का जो खेल चार दषक पहले शुरू हुआ था, वह रह-रह कर अब भी जारी है, वोटो की राजनीति के आगे नतमस्तक सत्तारूढ़ दल राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में सलंग्न क्षेत्रीय दलों के आगे बौने साबित हो रहे है।

विधानसभा में अबू आजमी पर हमला करने वाले मनसे के 4 विधायको के निलंबन से इस शर्मनाक घटना का पटाक्षेप होने वाला नहीं है। इस घटना की देष व्यापी प्रतिक्रिया होना चाहिए। राजठाकरें के खिलाफ कानूनी कार्रावाई के लिए राज्य सरकार आगे क्यों नहीं आ रही? क्यों राज के फतबों को गैर कानूनी करार नहीं दिया जा रहा? राज के खिलाफ जो काम महाराष्ट्रके महान हिंदी प्रेमियों को करना चाहिए था, वह म.प्र. के हिंदी प्रेमियो ने किया।

मंदसौर की एक अदालत ने एक हिंदी सेवी की प्रार्थना पर संज्ञान लेते हुए राजठाकरे के खिलाफ राष्ट्रभाषा के अपमान का प्रकरण दर्ज कर इस दिषा में पहल की है, लेकिन सवाल यह है कि क्या मंदसौर की अदालत महाराष्ट्र कि इस मराठीदा को सबक सिखा पाएगी?

वस्तुत: अब समय आ गया है जब क्षेत्रवाद तथा भाषावाद के नाम पर होने वालो राजनीति का बहिष्कार किया जाए। यदि यह न हुआ तो आमयी मुबई और आपण महाराष्ट्र का भाव मराठियों को महाराष्ट्र के बाहर परेषानी का सबब बन सकता है।

दक्षिण के हिंदी विरोधी आंदोलन का हश्र सबने देखा है। तमिलनाडु में हिंदी का प्रबल विरोध करने वाले द्रविण पुत्र व्यापार के लिए फर्राटेदार हिंदी बोलते है। कष्मीर मे पष्तो बोलने बालों का पेट हिंदी में बोले बिना भर नहीं सकता। इस मामले में पूर्वी राज्य एक आदर्ष उदाहरण है। पूर्व के किसी भी राज्य में हिंदी को लेकर कहीं कोई दुराग्रह नहीं है, असम का वोडो आंदोलन भी फुस्स हो चुका है। एक दिन यही सब मनसे के मराठी आंदोलन का भी होगा।

मराठी भाषा को लेकर पूरे देष मे किसी को कोई दुराग्रह नही है। मराठी साहित्य का सर्वाधिक अनुवाद हिंदी में हुआ। मराठी सद-संस्कृति और सुसभ्यता की वाहक भाषा है। उसे लेकर राज परेषान क्यों है? राज शायद नही जानते कि भाषाओ का अस्तित्व राजनीतिक आंदोलनों से नहीं संस्कारों से बनता है। साढ़े तीन हजार सालों से तमिल भाषा का अस्तित्व किसी राजनीतिक आंदोलन की वजह से नहीं बल्कि संस्कारों की वजह से है।

बेहतर हो कि राजठाकरे मराठी प्रेम को छोड़ मराठी मानष में षिक्षा, स्वास्थ्य और उनके आर्थिक हको के लिए संघर्ष करें। मराठियों के लिए कष्मीरियों की तरह विषेषाधिकारों की मांग करना बेमानी है। राज भूल जाते है कि महाराष्ट्र के महान नेताओं को राष्ट्र ने अपने सिरमाथे उनके मराठी भाषी होने के कारण नहीं उनकी योग्यताओं के कारण लिया था। लोकसभा अध्यक्ष से लेकर केंद्र सरकार के तमाम महत्व पूर्ण मंत्रालयों की कमान शुरू से महाराष्ट्र के नेताओं के हाथ मे रही। इसके लिए न बालठाकरे साहब के आंदोलन की जरूरत पड़ी न किसी और भाषाई आंदोलन की।

संविधान समिति के प्रमुख डा. भीमराव अंबेडकर से लेकर सुषील षिंदे तक को देष में सम्मान। षिव सेना या महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने ही दिलाया। मराठी भाषी अच्छी तरह जानते है कि महाराष्ट्र के इन बेटो को सम्मान उनकी योग्यता, कर्मठता और राष्ट्र के प्रति निष्ठा से मिला है।

मेरे ख्याल से राजठाकरे के कुव्सित राजनीतिक आंदोलन का विरोध महाराष्ट्र से ही शुरू होना चाहिए। मराठी जनता को समझना चाहिए कि राज उनका हित नही अहित कर रहे है। महाराष्ट्र की अर्थ व्यवस्था में अकेले मराठियों का नही बल्कि पूरे देष की भागीदारी है देष के प्रत्येक राज्य की प्रतिभा से महाराष्ट्र, महा-राष्ट्र बना है। अगर इसे बाधित किया गया तो महाराष्ट्र ”महा-राष्ट्र” नही रह जाएगा।

महाराष्ट्र को संप्रभु भारत राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़े रखने के लिए सेनाओं की नहीं प्रतिबंध्द राजनीतिक दलो की जरूरत है राज और उध्दव ठाकरे को चाहिए कि वे यदि सचमुच मराठी अस्मिता की रक्षा करना चाहते है तो अपनी-अपनी सेनाओं की पहचान समाप्त कर राष्ट्रीय दलो मे अपने आपको समाहित कर संघर्ष करें।

आज जब पूरी दुनियां बहुत छोटी हो गई है। तब महाराष्ट्र में राजठाकरे के आंदोलन से देष बदनाम ही हो रहा है। आजादी के सत्तर साल बाद भी भारत में भाषा और क्षेत्र के नाम पर आंदोलनों के जीवित रहने से लगता है कि हमारी आजादी या तो अधूरी है, या हम आजदी का मर्म ही नही समझ सके।

समय है जब पूरा देष दुनियां की महाषक्तियों के मुकाबले भारत को ”महान भारत” बनाने के लिए भाषा और क्षेत्र की संकीर्णताओं से बाहर आकर पूरी ताकत के साथ एक जुट होकर खड़ा हों। इस एक जुटता में जो आड़े आए, उसे तिरस्कृत कर देना ही श्रेयस्कर है फिर चाहे वह राज ठाकरे हो या बालठाकरे। जो राष्ट्र का नही वह ”महाराष्ट्र” का कैसे हो सकता है? संविधान के आगे सब बराबर है। (भावार्थ)

Rakesh Achal

दल तंत्र भगाओ – जनतंत्र बचाओ अभियान में सहभागिता की अपील- गोपाल दास गर ्ग


दल तंत्र भगाओ – जनतंत्र बचाओ अभियान में सहभागिता की अपील- गोपाल दास गर्ग

सम्मानीय देशवासियों,

आज की दल तंत्रीय राजनीति ने देश की एकता और अखण्डता को अक्षुण्ण बनाये रखना प्रश्नांकित कर दिया है। समूचे देश में चारों तरफ देश का विद्यटन हो रहा है। प्रत्येक राजनीतिक दल अपनी अपनी सत्ता और संप्रभुता स्थापित करने में लगा है। जिसके लिये वह आये दिन दलवाद, जातिवाद, लिंगवाद, भाषावाद, क्षेत्रवाद, आर्थिक सम्पन्नता/विपन्नता वाद आदि अनेकानेक वादों का जहर फैलाकर अपने अपने तरीके से अपने लक्ष्य को पाने के लिये अमर्यादित आचरण कर रहा है।

यदि समय रहते जनतंत्र को बचाने का कोई कारगर उपचार नहीं हुआ तो देश से जंनतंत्र पूरी तरह मिट जावेगा। देश टुकड़े-टुकड़े हो जावेगा। आज का शोषित वर्ग और अधिक शोषित होगा तथा दल तंत्रीय राजनीति के पोषक, स्वंयभू बन जावेगें।

अभियान का किसी दल से या दल के प्रत्याशी से कोई विरोध नहीं है अपितु दल तंत्रीय शासन प्रणाली से विरोध है। दल का प्रत्याशी कहने को जनप्रतिनिधि होता है किन्तु व्यवहारिक सत्य यह है कि वह जनप्रतिनिधि के नाम वास्तविक तौर पर वह अपने दल का प्रतिनिधि होता है। उसकी निष्ठा पूर्णत: अपने दल के प्रति होती है। दल का प्रत्याशी देश, देश के संविधान, देश की जनता या क्षेत्र के मतदाताओं के प्रति कतई वफादार नहीं होता। वह केवल अपने दल के प्रति ही वफादार रहता है। लोकसभा या विधानसभा में प्रस्तुत विषयों पर वह अपने दल के हितों के अधीन अपना वोट देता है न कि जनहित में। इस प्रकार जनहित, दलीय राजनीति में नष्ट हो जाता है।

दल का प्रतिनिधि, जनप्रतिनिधि के रूप में समय-समय पर भारत के संविधान के अनुच्छेद 173 (क) अंतर्गत बारम्बार यह शपथ लेता है कि वह विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रध्दा और निष्ठा रखेगा तथा भारत की संप्रभुता और अखण्डता को अक्षुण्ण रखेगा। किन्तु व्यवहार में वह इस शपथ को भूल जाता है और दलीय दल-दल में उलझ जाता है।

इस सत्य का प्रमाण आये दिन सदन में सभी दलों द्वारा किये जा रहे आचरण से स्पष्ट प्रमाणित हो रहा है। कोई भी दल तथा उसके प्रतिनिधि स्परूप चुना गया प्रतिनिधि, विधि द्वारा स्थापित भारत के संविधान के प्रति न तो सच्ची श्रध्दा रखता है और न ही निष्ठा।

जनता द्वारा चुनें गये ये सभी जनप्रतिनिधि, भारत की संप्रभुता और अखण्डता को अक्षुण्ण न रखकर, केवल अपने-अपने दल की संप्रभुता और अखण्डता को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिये भारत के संविधान तथा उसके अंतर्गत निर्मित एवं स्थापित विधि के विपरीत प्राय: अविधिक आचरण कर सदनों को आये दिन शर्मसार करते रहते है। सभी राजनीतिक दलों का यह आचरण, जनतंत्र की हत्या कर, दल तंत्र की महत्ता को प्रतिस्थापित करने की ओर अग्रसर होना इंगित करता है।

जनप्रतिनिधियों की खरीद-फरोख्त करने का आरोप-प्रत्यारोप एक दल, दूसरे दल पर आये दिन लगाता रहता है किन्तु रिश्वत लेने व देने के लिये निर्मित भ्रष्टाचार निरोधी कानून के तहत अपेक्षित कार्यवाही करने या कराने की पहल किसी भी दल द्वारा नहीं की जाती है। राजनीतिक दलों का यह आचरण भारत की जनता को यह संदेश देता हैं कि कोई भी दल भारत के संविधान के प्रति सच्ची श्रध्दा और निष्ठा नहीं रखता है और न ही संसद द्वारा बनाये गये किसी कानून के अनुपालन में उनकी स्वयं की कोई रूचि ही है।

भारत देश में संवैधानिक विधि द्वारा निर्मित व स्थापित कानून का शासन है जो देश के प्रत्येक राजनीतिक दल, दल के पदाधिकारी, प्रतिनिधि, कार्यकर्ता एवं नागरिक पर बिना किसी भेदभाव के समान रूप से प्रभावी है। किन्तु आये दिन देखने में यह आ रहा है कि कोई भी राजनीतिक दल संवैधानिक विधि द्वारा निर्मित व स्थापित कानून का पालन नहीं करना चाहता है तथा संवैधानिक विधि द्वारा निर्मित व स्थापित कानून को कानून मानने के लिये तैयार नहीं है।

प्रत्येक राजनीतिक दल स्वविचारित विचार को ही कानून की संज्ञा देकर, जनहित के नाम पर, अपने-अपने दलों की श्रेष्ठता व महत्ता को प्रतिष्ठित व प्रतिपादित करने के लिये आये दिन समूचे देश में हड़ताल, बाजार बंदी, चक्काजाम, तोड़-फोड़, लूटपाट, दंगाफसाद, धार्मिक उन्माद, बम विस्फोट आदि अनेकानेक भिन्न-भिन्न विद्यटनात्मक तथा हिंसात्मक तरीके अमल में लाते हुये राष्ट्रीय सम्पत्तियों को क्षति तथा देश की आम जनता को जन-धन की हानि पहुचाने जैसी गतिविधियों में संलग्न रहता है। दलबंदी के इस आचरण से देश में भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार और महगांई में आये दिन उत्तरोत्तर वृध्दि होती जा रही है। राजनीतिक दलों का यह आचरण जनतंत्र की हत्या कर, दल तंत्रीय राष्ट्र्र्र की स्थापना किये जाने का द्योतक है।

इसलिये दलतंत्र भगाओं – जनतंत्र बचाओं अभियान का दीप प्रज्वलित करना आज के समय की प्रासंगिकता है।

दल तंत्र को भगाना और जनतंत्र को बचाना हमारे अभियान का लक्ष्य है। लक्ष्य प्राप्ति के चार कारक है 1. निष्ठा 2. श्रम 3. कर्म 4. साधना। यदि आप देश प्रेम की भावना से ओतप्रोत है और अपनी स्वतंत्रता को अक्षुण्ण बनाये रखने हेतु संकल्पित, देश पर अपनी जान न्यौछावर करने हेतु तत्पर, किसी भी प्रकार के लालच से परे, निष्ठा के धनी, श्रम को समर्पित, कर्म के पुजारी और साधना के साधक है तो इस अभियान को गति प्रदान करने में अपना योगदान दे सकते है।

दलतंत्र भगाओ – जनतंत्र बचाओं अभियान के दीप – प्रज्जवन का प्रथम चरण, हमारा निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में मुरैना विधान सभा क्षेत्र से चुनाव लड़ना था। इस कार्य के लिये हमें किसी भी प्रकार के धनबल व बाहुबल की कतई दरकार नहीं रही। हमने सिर्फ मतदाता के जनमत समर्थन को शीर्ष प्राथमिकता दी। हम यह अच्छी तरह जानते है कि दलतंत्र का खात्मा धनबल या बाहुबल से नहीं किया जा सकता है। दल तंत्र का खात्मा केवल जनमत से ही हो सकता है।

भारत देश के वासियों एवं मतदाताओं से अभियान की यह अपील है कि दलतंत्र को भगाकर जनतंत्र को बचाने के लिये भारत का प्रत्येक मतदाता भावी चुनावों (लोकसभा/विधानसभा/स्थानीय संस्थाओं के चुनाव) में अपने अपने निर्वाचन क्षेत्र में अपना वोट दलों के किसी भी प्रत्याशी को न देकर केवल निर्दलीय प्रत्याशियों को ही अपना वोट दे। एवं दल तंत्र भगाओं – जनतंत्र बचाओं अभियान को सफल बनाने में अपनी महती भूमिका निर्वहन करें।

अपीलार्थी

गोपाल दास गर्ग

संयोजक

दलतंत्र भगाओ- जनतंत्र बचाओ अभियान

गणेशपुरा, मुरैना म0प्र

07532-227836

दीनबन्धु भये मंत्री -अफसर, नेता द ीनानाथ कहाये


दीनबन्धु भये मंत्री -अफसर, नेता दीनानाथ कहाये

गोपाल दास गर्ग

जनता बनी है सानी सबकी

दीनबन्धु भये मंत्री -अफसर, नेता दीनानाथ कहाये।

दीन हीन जनता ने पूजा, फिर भी उसके कष्ट बढ़ृाये ॥1॥

कुर्सी-धारक करते मनमर्जी, नहीं सुनते हैं किसी की अर्जी. ॥2॥

मंत्री खाता, अफसर खाता, नेता खाता और खिलाता।

जनता बनी है सानी सबकी, सत्ताकी खदान में खाता ॥ 3॥

धन लोलुपता की बाढ़ आ गई, मान वहे मनमानी में।

घर-द्वार सब चौपट हो गया, आपसी खींचातानी में ॥ 4॥

धन आधारित राजनीति में, नैतिकता का हरण हुआ।

देश समर्पित नेताओं का, राजनीति से क्षरण हुआ ॥ 5॥

शासन और प्रशासन में, धरणीधर का मान है।

आम प्रजाजन रोता फिरता,नहीं कोई पहचान है॥ 6॥

दलतंत्र भगाओं- जनतंत्र बचाओं अभियान में,

सबका कद समान है। ना ही कोई छोटा-बड़ा ना कोई पद पहचान है।

तरण करेगा इस पीड़ा से, ऐसा यह अभियान है ॥ 7॥

प्रस्तुती..गोपालदास गर्ग मुरैना

अधिकारी बन कर भी न भूलें सामाजिक परि वेश को: अमिया चंद्रा


अधिकारी बन कर भी न भूलें सामाजिक परिवेश को: अमिया चंद्रा

..बच्चे हिम्मत एवं परिश्रम के साथ उन्नति का पथ प्रशस्त करें: मधुमिता

अभ्युदय आश्रम में बाल दिवस पर बाल व महिला अधिकारों पर कार्यशाला सम्पन्न

21 हजार रूपये का चैक भेंट

मुरैना.दिल्ली से आये नगर निगम आयुक्त श्री अमिया चंद्रा

एवं श्रीमती मधुमिता कोठारी व जनाव तनवीर अख्तर ने अभ्युदय आश्रम को

21 हजार रूपये की सहायता का चैक भी भेंट किया। जिसे आश्रम की ओर से श्री रामस्नेही द्वारा ग्रहण किया गया।

मुरैना. आज यहां बाल दिवस के अवसर पर स्थानीय राष्ट्रीय महत्व की स्वयंसेवी संस्था अभ्युदय आश्रम में आयोजित कार्यशाला के अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में श्री अमियाचंद्रा आयुक्त नगर निगम दिल्ली तथा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी, सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली की एडवोके ट श्री मती मधुमिता कोठारी, इंडिया फाउंडेशन सोसाइटी के अध्यक्ष जनाव तनवीर अख्तर सदस्य अखिलभारतीय कांग्रेस कमेटी एवं महासचिव बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी,रघुराज सिंह कंषाना जिला पंचायत अध्यक्ष मुरैना, नरेन्द्र सिंह तोमर आनंद समाजसेवी पत्रकार शामिल थे।

श्री अमिया चंद्रा वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी एवं नगर निगम आयुक्त तथा विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी

ने कार्यशाला को संबोधित करते हुये कहा कि मैंने अपने शुरूवाती जीवन और बचपन को काफी कठिनाइयों एवं संघर्ष के साथ जिया है, मेरे पिता एक ब्राम्हण परिवार में घरेलू नौकर थे और मेरी परिस्थ्ितिया ऐसी नही थी की मैं शिक्षा या उच्च शिक्षा प्राप्त कर एक उच्च अधिकारी बनने का सपना भी देख सकूं ।

मैंने फिर भी अपने पिता से हर कठिन परिस्थ्िति में संघर्ष करना सीखा और मैंने पढ़ाई करके आई.ए.एस. तक का पद प्राप्त किया। और भारत सरकार के कई मंत्रालयों में काम करने के बाद यहां नगर निगम दिल्ली में कार्यरत हँ और मैं कभी भी अपनी पृष्ठभूमि और परिवेश को नही भूला मेरे कार्यालय में कोई भी व्यकित बेधड़क कभी भी बिना पूर्व मुलाकात समय लिये बगैर इजाजत-बगैर रूकावट मिल सकता है। और मुझसे अपने परिवार के सदस्य की तरह कैसी भी समस्या बता सकता है और मैं सदा आम आदमी के साथ घुलमिल कर रहना पसंद करता हूं और सदा विनयशील रहता हॅू यही मेरी सफलता का राज है। तथा हर अधिकारी को एक लोक सेवक की तरह आचरण करना चाहिए न की जनता को अपना सेवक समझकर तंग करना चाहिए। तथा सीखने की प्रक्रीया आजीवन जारी रखना चाहिए। जो सीखना बंद करदेता है उसका भविष्य भी समाप्त हो जाता है।

श्री चंन्द्रा ने अभ्युदय आश्रम के संचालक श्री रामस्नेही को आदर्श एवं कर्तव्य परायण बताते हुये उनके पथ को सभी को अपना ने एवं उनके आदर्शे को अपने जीवन में उतारने की भी जरूरत बताई ।

इस अवसर पर एडवोकेट श्रीमती मधुमिता कोठारी ने कहा कि सभी बच्चे कोमल मिटटी की भॉति होते हैं उनमें जैसे संस्कार व शिक्षा का बीजारोपण किया जाता है। वे वैसे ही हो जाते है। और वैसा ही उनका विकास होता है। उन्होंने बच्चों के साथ मिलकर हम होगें कामयाब नामक गीत भी मिलकर गाया । श्रीमती कोठारी ने बच्चों को जीवन में साहसी बनकर हर परिस्थिति का डटकर मुकावला करने तथा जीवन में हार माने बगैर आगे बढने का आव्हान किया तथा महिलाओं को अपने अधिकारों के लिये सजग रहकर संघर्ष करने और पुरूष से कंधा से कंधा मिलाकर आगे बढ़ने का भी आव्हान किया ।

इस मौके पर इंडिया फाउडेशन सोसाइटी के अध्यक्ष तनवीर अख्तर ने कहा कि जरा-जरा सी कोशिशे बड़ी सफलता को आधार देती है। मुझे मुरैना आकर काफी गर्व और सुखद अनुभूति हो रही है कि मैं इस बृहद अभियान को आज साक्षात देख रहा हूॅ और श्री रामस्नेही का जैसा नाम सुना था उससे भी कही बढ़कर काम आज मैं यहॉ देख-रहा हूॅ।

जिला पंचायत अध्यक्ष रघुराज सिंह कंषाना ने कहा कि लोग समाज सेवा को कई रूपों में करते है। किन्तु श्री रामस्नेही जी ने समाज सेवा को अपना पूरा जीवन समर्पित करके एक मिसाल रची है और समाज सेवीयों के लिये वे अनुक रणीय बन गये है।

नरेन्द्र सिंह तोमर ने इस अवसर पर कहा कि हर क्षेत्र में पारदर्शिता और भ्रष्टाचार मुक्त वातावरण का होना आवश्यक है समाज सेवी संस्थाओं को भ्रष्टाचार के कारण कई कठिनाइयों का सामना करना पडता है और श्री तोमर ने सूचना का अधिकार अधिनियम , कोमन सर्विस सेन्टर,ई-गर्वेनेंस आदि पर भी प्रकाश डाला और कहा कि सरकारी कर्मचारियों को लोकसेवक की भॉति आचरण करना चाहिए न कि लोक अधिकारी की तरह जो की संविधानिक भावना के विरूद्ध है।

श्री रामस्नेही अध्यक्ष अभ्युदय आश्रम ने आश्रम की पृष्ठ भूमि, कार्यप्रणाली , और संघर्ष कथा पर विस्तार से प्रकाश डालते हुये कहा कि वे एक ऐसे समाज सेवी रहे है। जिन्हें कभी रिश्वत या भ्रष्टाचार का सामना नहीं करना पड़ा और पुलिस तथा प्रशासन ने सदा ही उनका आगे बढ़कर सहयोग किया जिसके कारण आज वे समाज में से वेश्यावृति उन्मूलन की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर सकें इसके लिये उन्होंने प्रशासन,पुलिस व अधिकारियों का धन्यवाद भी ज्ञापित किया। और कहाकि उनका रास्ता हालाकि काफी कठिन था लेकिन सरकार के सहयोग के कारण वे इस लड़ाई को लड़ सके तथा बच्चों को एवं महिलाओं को उत्तम परिवेश दिला सके।

कार्यक्रम को कुमारी नेहा छारी ने भी संबोधित किया एवं आश्रम के वालक एवं बालिकाओं द्वारा कई सांस्कृतिक कार्यक्रम भजन प्रार्थना, एवं जूडों कराटे आदि का भी प्रर्दशन किया। कार्यक्रम का संचालन करते हुये प्रसिद्ध स्वयंसेवी संस्था धरती के संचालक श्री देवेन्द्र सिंह भदौरिया ने कहा कि जहॉ चम्बल में बालिकाओं की संख्या में कमी चिंता का विषय रही है वही अभ्युदय आश्रम जैसी संस्थाओं ने बालिकाओं व महिलाओं को संम्मान पूर्वक जीवन जीने और शिक्षा रोजगार पुनर्वास प्रकाश स्तम्भ जैसी सरचना प्रदान करी है॥ आभार प्रदर्शन भीकम सिंह तोमर ने किया।

म.प्र. में बिजली के लिये त्राहि –त्र ाहि मची, गॉंवों में किसानों को दो दि न बाद दो घण्‍टे और शहरों में सिर्फ 3 घण्‍टे मिलती है बिजली


म.प्र. में बिजली के लिये त्राहि –त्राहि मची, गॉंवों में किसानों को दो दिन बाद दो घण्‍टे और शहरों में सिर्फ 3 घण्‍टे मिलती है बिजली

नरेन्‍द्र सिंह तोमर ‘’आनन्‍द’’

यूं जर्रा जर्रा महताब हुआ, मेरा सजन तो आफताब हुआ, उनकी इस अदा का क्‍या कहिये कि जो बचा खुचा था वो भी सूपड़ा साफ हुआ ।

बदले बदले से सरकार नजर आते हैं, जिनके कन्‍धों पर पग रख के पहुँचे एक ऊँचाई तलक, आज कहते हैं कि मैं आसमान हुआ ।

आसमां पे उड़ने वाले तेरी पतंग की डोर जिन हाथों में, जरा खौफ खा वरना मत कहना कि ये क्‍या कमाल हुआ ।

ये जर्रा धूल का, फांकोगे तो ऑंतें फुंक जायेगी, फेफडे चलनी हो जायेंगे, ठोकर मारोगे तो न कहना कि सिर पे सवार हुआ ।

कल तक जिस मिट्टी ने तुझे पुतला बना कर एक भगवान बना दिया, उस मिट्टी को ललकारेगा तो न कहना कि क्‍या सब्‍जबाग हुआ ।

तू भूल गया उपने जानो जॉं पर खेल खून के कतरे बहाने वालों को, मत कहना कि ये कतरा तो अब दरिया हुआ ।

ओ कान में तेल औ ऊंगली फंसा के सोने वाले, जिनकी नींद हराम हुयी फिर न कहना कि ये क्‍या कोहराम हुआ ।

जिद तेरी है इस वतन की मिट्टी को मिटाने की, तो इक जिद मेरी भी है इसे बचाने की, जब दो जिद टकरायें तो न कहना कि व्‍यर्थ संग्राम हुआ ।

हम तो खिलाड़ी हैं घर फूंक तमाशे वाले, तेरा चमन गर उजड़ा तो न कहना कि ये क्‍या वीरान हुआ ।

चम्‍बल के बेटों को शौक है मौत से टकराने का, तेरी वो बिसात कहॉं, गर मौत बन कर हम टूटें तो न कहना कि ये क्‍या जंजाल हुआ ।

कितना भी उँचा तू उठा अभी मेरे मुकाबिल नहीं पहुँचा, तुझसे छिनने लुटने को काफी है मैं नंगा ही सही, फिर न कहना कि ये क्‍या किस किस को बचाऊं क्‍या ये बवाल हुआ ।

दौलत और शोहरत के भ्रष्‍ट समन्‍दर में तैरने वाले, हम जो तूफां बन के तेरी किश्‍ती डुबोये तो न कहना कि ये क्‍या मंझधार हुआ ।

हसरत है गर तेरी दो दो हाथ की, मन मेरा भी है अब तुझये टकराने का , लगा जोर तू पूरा फिर न कहना कि तुझे कह कर नहीं मारा ।

यूं अब आही जा मुकाबिल मेरे, मैं हिन्‍दुस्‍तान तो तू पाकिस्‍तान सही, तेरी हसरत और मेरा मन भर जायेगा फिर न कहना कि मुकाबला ही कहॉं हुआ ।

क्‍या जरूरत कंस की रावण की औ किसी अन्‍य शैतान की, तू तो सबका नया अवतार हुआ ।

उस्‍ताद समझता है तो आ सामने, हो दो दो हाथ तुझसे यूं छुप छुप के लड़ता है तो भरम दोस्‍ती का होता है, आ दुश्‍मन की तरह टकरायें वरना फिर न कहना कि तेरा तो कत्‍लेआम हुआ ।

कहने को संभागीय मुख्‍यालय है शहर मुरैना लेकिन बिजली कटोती के हाल इतने बदतर कि महज तीन घण्‍टे ही शहरवासीयों को 24 घण्‍टे के दरम्‍यां मिलती है बिजली, न कोई सुनने वाला न कोई निराकरण करने वाला यहॉं वम्‍बल संभाग का कमिश्‍नर और मुरैना जिला का कलेक्‍टर दोनो ही बैठते हैं लेकिन जनता की समस्‍याओं से पूरी तरह नावाकिफ ये दोनो अधिकारी अपनी अपनी धींगामस्‍ती में मस्‍त हैं । गॉंवों के हाल तो और भी बदतर हैं गॉंवों में रबी की फसल जब सिंचाई के लिये तरस रही है तब उन्‍हें दो दिन में एक बार यानि 60 घण्‍टे में महज दो घण्‍टे बिजली आपूर्ति की जा रही है, अब फर्जी सरकारी दावों की पोल खोलती नीचे किसानों के साथ गुजारी एक रात की दास्‍तां हम यथावत यहॉं दे रहे हैं हालांकि इसमें चम्‍बल की ठेठ देहाती भाषा में बातें कहीं गईं हैं और कुछ गाली गलौज की भाषा भी किसानों द्वारा प्रयोग की गयी है लेकिन बात तो थी उसे साहित्यिक और परिष्कृत रूप देकर हम नहीं चाहते थे कि बात की तासीर या ग्रामीणों के आक्रोश का इजहार कमतर हो जाये । सो लिहाजा जो सच है हम बेबाक यहॉं दे रहे हैं, हमने ग्राम और ग्रामीणों के नाम यहॉं जानबूझ कर प्रकाशित नहीं किये हैं हम नहीं चाहते कि वे किसी भी राजनीतिक या सरकारी या अफसरी कोपभाजन के वे भोले भाले निर्दोष लोग शिकार हों । वक्‍त पड़ने पर हम सारी वार्ता साबित करने में सक्षम व समर्थ हैं ।

अभी लगे हाथ बताता चलूं कि मुझे चम्‍बल के कई गॉंवो का एक साथ दौरा करने को मिला , मेरे बचपन के कुछ ग्रामीण मित्रों ने मुझसे रात को एक गॉंव में हुये चौपाल पर चौगोला (यह काव्‍य की ग्रामीण लोक विधा है ) सम्‍मेलन में बैठने का आग्रह किया और अपने विचार उन्‍हे बताने तथा उनके विचार जानने की विनयपूर्ण आमंत्रण दिया । मैं हालांकि काफी थकावट महसूस कर रहा था लेकिन ग्रामीण दोस्‍तों (भई मैं स्‍वयं भी ग्रामीण परिवेश का हूँ – मेरा जन्‍म चम्‍बल के गॉंव में हुआ, वही पला बढ़ा और थोड़ी बहुत पढ़ाई लिखाई भी गॉंव में की, गाय भैंस चराने से लेकर, हल जोतने और सभी किसानी कार्यों का मुझे लम्‍बा मैंदानी अनुभव है ये दीगर बात है कि बाद में उच्‍च स्‍तर तथा प्रायमरी माध्‍यमिक और अन्‍य शिक्षा दीक्षा ग्‍वालियर, भिण्‍ड और भिलाई –दुर्ग, मुरैना आदि जगहों पर हुयी ) पर मेरे गॉंव का नाता अभी तक कायम है, मेरी पैतृक जमीन जायदाद खेती बाड़ी अभी कायम है सो गॉंव से नाता भी बदस्‍तूर कायम है तथा पुरानी रजवाड़ी, फिर जागीरदारी, जमीन्‍दारी भी रही है सो सारे रिश्‍ते अभी तक मुकम्‍मल कायम हैं)

अब अगर इन सब ऐतिहासिक बातों के कायम रहते तोमर राजपूत इस देश के अभिन्‍न अंग होकर न्‍यायप्रिय, क्रोधवान एवं मर मिटने की कूबत से संपन्‍न होकर अन्‍याय व अत्‍याचार के खिलाफ आवाज बुलन्‍द करने में सबसे आगे हैं और बगावत कर बागी बनते हैं तो इसमें न तो तोमरों का दोष है और न मेरा, यह इस वंश का स्‍वाभाविक लक्षण है, वंशगत तेज है, वाणी में ओजस्विता वंशगत है तो अपनी ऑंख के सामने अत्‍याचार देख कर ऑंखे बन्‍द करना तो किसी भी राजपूत के स्‍वभाव में नहीं होता किन्‍तु तोमरों को यह गुण विशिष्‍ट व प्रचुर रूप से मिला है, यही एक वजह है कि चम्‍बल में बगावत होती आयी है और बागी पैदा होते आये हैं , जब तलक अत्‍याचार, अन्‍याय और सरकार का अनसुनापन जारी रहेगा तब तक चम्‍बल में बागी पैदा होते रहेंगे इसमें कोई संशय नहीं है ।

अब अगर –

सच कहना अगर बगावत है, तो समझो हम भी बागी है

यदा यदा हि धर्मस्‍य, तदात्‍मानं सृजाम्‍यहम् परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्‍कृताम, धर्म संस्‍थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।।

(इसके अलावा देखें श्‍लोक संख्‍या 31 अध्‍याय 2, 38 अध्‍याय 2 तथा 43 अध्‍याय 18 श्रीमद्भगवद्गीता)

गॉंव के किसानों के बीच रात को जब चौपाल पर चौगोला मण्‍डली जमी तो कई किस्‍से भोले भाले ग्रामीणों ने अपने ग्रामीण अंदाज में बता डाले मुझे कई चीजें जानकर हैरत हुयी और विचार करने पर मजबूर हो गया मसलन सुनिये उस रात की बातों के चन्‍द अंश, ऊपर लिखी शेर और मुक्‍तक नामक कविता भी मुझे एक ग्रामीण कवि ने सुनाई उनका नाम दिनकर सिंह तोमर था और वे सिंहोनयां के प्रतिष्ठित जमीन्‍दार परिवार (पूर्व सरपंच परिवार ) से ताल्‍लुक रखते हैं ।

‘’ काये आजकल्लि तिहाई सरकार का रहि है’’ कछु फायदा तो दीख नाने रहो उल्‍टी मंहगाई बढि़ति जाय रही है’’

दूसरे ने कहा कि सरकार का करेगी , चुनाव में खच्‍च करो है एक एक नेता कूं चुनाव लड़ायवे दो दो करोड़ रूपया पार्टीयन ने अपने अपने प्रत्‍याशीयन को दये हते, अब वा पैसा ए निकार रही है, शक्‍कर मंहगी, दार (दाल) मंहगी, साग (सब्‍जी) मंहगी जे सब पैसा वापस काढ़वे (निकालने) के इंतजाम हैं ।

वे फिर बोले तो ‘’काये तो जि सिबराजु काये ना कछ़ु कर रहो’’

दूसरे ने कहा कर तो रहो है, बनियन की शक्‍कर पकरि लई, जब पकरी तब बातें पहले तऊ सस्‍ती हती बाने तब ते पकरी है तईं और जादा मंहगी करवाय दई । पकरीयई जईं के लईं हती ताते दाम और जादा बढि़ जाये और बनिया कछू कमाय लें, बनियन ने बऊये तो चन्‍दा दओ होगो सो कढ़वावेगो के नहीं । और फिर जा नरिन्‍दा कोऊं तों बनियन ने वोट दये हते सूनी है कि बनियन को भारी कर्रो चेला है, कमाई करवे वारे सिग कमाऊ पूत अधिकारी वाके चेला हैं, वाये जनता फनता ते कछु मतलब फतलब नानें , जब आवतु है तो नौटंकी सी करिकें चलो जातु है ।

बीच में एक और ग्रामीण टिप्‍पणी करता है कि हओ जोईं है सारो बातन ते करदे खुसी, मोंह (मुंह से) सो नहीं लगन दे भुसी (भूसा)

पहले वाले सज्‍जन फिर बोले पनहियन लायक है, सारे की जमान्‍त जप्‍त होगी, देखिये ये किस्‍सा उस जगह का है जो भाजपा के बरसों पुराने गढ़ रहे हैं और तोमर राजपूतों के दबदबे वाले ठीये हैं ।

चर्चा आगे बढ़ती है तब तक एक सज्‍जन हुक्‍का सुलगा लाते हैं, एक अन्‍य किसान बोलता है मार डारे सारेन ने, बिजली हति नानें , नहर आय नाने रही, खेत सूखि चले, अबकी में तो गेहूँ सरसो को कोऊ हिल्‍लो नानें । वो तो वोट ले कें दुबक के भजि गयो , अब गामन तन कों आवतु ऊ नानें । भई ते भजि जागो कभऊं कहेगो स्‍टेडियम बनवावेगो कभऊं कहेगो के अण्‍डरब्रिज बनवावेगो । जा मूसरसेटी ये जे पूछो के अम्‍बाह में ठौर कहॉं धरो है सो बनवावेगो स्‍टेडियम ।

दूसरा किसान तुरूप का पत्‍ता फेंकता है, बनवावेगो तिहाये हमाये खेत लेकें, बाने सिग ठाकुर नेता तो जिले ते खतम कर दये, कछू ठाकुर एनकाउण्‍टरनि में मरवाय डारे, अब बचे खुचेन के खेतन (खेतों को) लीलें (लीलना) चाहतु है ।

दूसरा किसान तड़ाक से बोलता है – आवन देओ सारे ऐ घाट उड़ाय देंगे, आवेगो तो झईं अबकी औंधी सीधी दे तो डार लेओ सारें कों । और इतेक देओ के गैल भूल जाये ।

एक और नौजवान बीच में बोलता है जा सारे में तो दस दे और एक गिने ।

पर‍ि जे केन्‍द्र की सरकार का करि रई है जा सारे के झां तो छापो परनो चहीयें, एक वा मिसरा के झां जे सारे दोऊ बदमास हैं, एक तो पानी पी गयो पूरो फिर बिजली लील गयो, हमनि सुनी है कि इंजीनियर कालेज सोऊ चलाय रहो है, बड़ भारी कमाई करी है, दोऊ जने अरबन रूपय्यन के मालिक हैं गये हैं । छापो डरवाय दे केन्‍द्र वारें सोईं नप जागें दोऊ फीता लगाय के , के लला ला बताया कितेक कितेक कमाये हैं तैंने सारेन के लाकर होगें, करोड़न के माल कढ़ेंगे ।

दूसरा किसान बोलता है अये जिनके तो बिदेसन में खाते होंगे । अफसर बन गये जिनके राज में, चपरासीन के बंगला तन गये मोबाइल ने बतराउठे, कार ले ले कें चलाय रहे हैं ।

अब एकदम सब मुझसे मुखातिब होते हैं काय रे तू कैसो चुप्‍प बैठो है, कछू बोल्‍तु काये ना ।

मैंने कहा अब तुमई सिग कछु कहिवे चिपटे हो अब हम का कहें । हम तो जे कहि रहे हैं चुप्‍प रहू, पुरानी कहावत है कि ‘’रहिमन चुप है बैठिये देखि दिनन को फेर’’ सो भईया हम तो चुप्‍प है , पर तुम जे सब बातें कहि रहे हो जे सब गैर कानूनी हैं अगर काऊये पतो लग गईं तो सिगते पहले तिहाओ एनकाउण्‍टर करवाय डारेगो ।

एक किसान गुस्‍से में खौल जाता है, अये तू तो कहेगो ही, तैंनेंई वाये वोट देवेके लईं कही हती सो अब रोय रहे हैं, दो दिना बाद बिजली आय रही है दो घण्‍टा के काजें हमनि पूछि हमनि पे का बीत रही हैं । जा जाय के कहि दीयो वाते हमाओ करवाय दे एनकाउण्‍टर, कटवाय दे मूसर । जाते तो रूस्‍तम तऊ ठीक हतो, भलेऊं गूजर हतो, सुनि तऊ लेतो भलेऊं कछू करतु नहीं हतो । जा तू हमनि फांसी चढ़वाय दीयो । बई बरेह के पीपरा पे ।

मैंने बात संभालते हुये कहा कि भई जे सब बातें गुस्‍से से नहीं ठण्‍डे दिमाग से भी तो हल हो सकतीं हैं, अब जो बिगड़ गया सो बिगड़ गया, आगे ठीक कर लेओ, आगें सो वाय वोट मत दीओ ।

दूसरा किसान और ज्‍यादा आक्राशित हो जाता है , का वोट मत दीओ बुआ वो कलेक्‍टर भ्रष्‍ट बैठो है, काऊये वोट दे अईयो पेटी खुलेगी तो बई के ई वोट कढ़वावेगो । सारे ने ठाकुरनि की तो सिगई सीट रिजरब कर दईं हैं, लेउ सारे हो कैसे लरोगे चुनाव । मैंने कहा कि भई अभी तो नगरपालिका के आरक्षण की प्रक्रिया हुयी है, ग्राम पंचायत की तो बाद में होगी, अभी कैसे कह सकते हो कि ठाकुरों की सीटें रिजर्व कर दी जायेंगी……..

लगे हाथ मेरी बात पूरी होने से पहले ही किसान उखड़ता हुआ बोला कि अये लला हमनि सिग पतो है हमऊं नेकाध राजनीति जान्त हैं । नगरपालिका में तहॉं हरिजन हतई नाने ते सीटें हरिजन कर दई हैं , सारे ठाकुर बामन तो अब पारसद अध्‍यक्ष कितऊं बनई नानें सकतई, वो अपईं गैल के काटें झार रहो है । वाने सिग ठाकुर बामननि की गैल बन्‍द कर दईं हैं और देखि लीयो हमऊं चैलेन्‍ज ते कहि रहे हैं, सारो पंचायतिन में ऊ जिई करेगो । सिग ठाकुर बामननि ए घर बैठारेगो । और तऊ एकाध कितऊं ते लरेगो तो सरकार बाई की है लबरई ते मशीनन में तो और पेटीन में तो बई के वोट कढ़ेंगे ।

मैंने आगे बहस उचित नहीं समझी और नहंद आने का बहाना करके खिसक कर अपने पलंग पर जा लेटा ।

लेकिन ग्रामीणों की उन बातों ने मुझे झिझोड़ कर रख दिया । उनकी समझ और तर्कों के आगे मैं खुद को काफी बौना महसूस कर रहा था ।

पन्‍द्रह हजार के इनामी डकैत राजेन् ‍द्र गूजर को मुरैना पुलिस ने मार गिर ाया, बंगाली सिंह भी पकड़ा गया


पन्‍द्रह हजार के इनामी डकैत राजेन्‍द्र गूजर को मुरैना पुलिस ने मार गिराया, बंगाली सिंह भी पकड़ा गया

मुरैना 3 नवम्‍बर 09 , आज सुबह तड़के 3- 3:30 बजे मुरैना पुलिस ने जांबांजी दिखाते हुये ग्‍वालियर चम्‍बल क्षेत्र में आतंक का पर्याय बने T-35 पर सूचीबद्ध गिरोह के सरगना राजेन्‍द्र गूजर को गोपिया पुरा और पलपुरा के बीच थाना सिविल लाइन्‍स क्षेत्रान्‍तर्गत बीहड़ में हुयी मुठभेड़ के दौरान मार गिराया । राजेन्‍द्र गूजर पर कई कत्‍ल, कई अपहरण और फिरौती वसूली के मामले दर्ज थे । अभी हाल ही में उसने चम्‍बल के बीहड़ों में रतन जोत की खेती करने वाले लोगों को भी फिरौती के लिये धमकाया था

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सात आठ डकैतों से हुयी मुठभेड़ में सरगना राजेन्‍द्र के मारे जाने की जानकारी पत्रकारों को देते हुये चम्‍बल पुलिस महानिरीक्षक श्री संजय कुमार झा , उपमहानिरीक्षक चम्‍बल रेंज श्री आर.बी. शर्मा, मुरैना पुलिस अधीक्षक श्री संतोष सिंह ने पत्रकारों को बताया कि अतिरिक्‍त पुलिस अधीक्षक श्री अनुराग शर्मा के नेतृत्‍व में पुलिस ने आज राजेन्‍द्र गूजर को मार गिराया । फोटो एवं विस्‍तृत समाचार अभी थोड़ी देर में प्रकाशित किया जायेगा ।

बंगाली सिंह भी पकड़ा गया

मुरैना पुलिस द्वारा डकैत राजेन्‍द्र के मूवमेण्‍ट की खबर पर की जा रही सर्चिंग के दौरान सिटी कोतवाली मुरैना के नगर पुलिस अधीक्षक कमल सिंह मौर्य और टी.आई. के.डी. सोनकिया ने डकैत बंगाली सिंह को दबोच लिया उसके पास से पुलिस को एक कट्टा और दो जिन्‍दा कारतूस मिले हैं , वह सबसुख का पुरा से पिछले समय एक शिक्षक के अपहरण में फरार डकैत घोषित था । फोटो एवं विस्‍तृत समाचार अभी थोड़ी देर में प्रकाशित किया जायेगा ।

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